गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
८९- बृहस्पतिप्रोक्त नीतिसार
काण्ड ] प्रायश्चित्त-विधान एवं सान्तपन, कृच्छ्र, पराक तथा चान्द्रायणादि व्रतोंका विविध स्वरूप १८१
मार्जार (बिल्ली), गोह, नेवला, साधारण पशु तथा मेढककी हत्या करनेपर पापी व्यक्ति तीन रात्रितक दुग्धपानके साथ ही पाद कृच्छ्रव्रतका पालन करे। हाथीका वध करनेपर मनुष्यको पाँच नील¹ बैलोंका दान देना चाहिये। शुक पक्षीकी हत्या करनेपर दो वर्षका बछड़ा तथा क्रौंच पक्षीका वध करनेपर तीन वर्षका बछड़ा दान देना चाहिये। गधा, बकरा और भेड़की हत्या करनेपर भी एक बैलका दान दे। वृक्ष, गुल्म, लता तथा झाड़ीको काटनेपर सौ बार गायत्री-जप करे।
मधु और मांसका भक्षण करनेपर कृच्छ्रव्रत तथा अन्य शेष व्रतोंका पालन करना चाहिये। यदि गुरुके द्वारा प्रेषित शिष्यकी मृत्यु मार्गमें हो जाती है तो गुरु तीन कृच्छ्रव्रतका पालन करे, किंतु गुरुके प्रतिकूल कार्य करनेपर शिष्यके द्वारा उन्हें प्रसन्न करनेसे ही शुद्धि हो जाती है।
शत्रुओंको धान्य आदि तथा प्रीति आदिके द्वारा प्रसन्न करे। यदि किये जा रहे उपकारके बीच ही ब्राह्मणकी मृत्यु हो जाती है तो उपकारी व्यक्तिको पाप नहीं लगता।
जो मनुष्य दूसरेको महापापी तथा उपपातकीका मिथ्या दोष लगाता है, ऐसा मनुष्य जितेन्द्रिय रहकर एक मासतक केवल जल पीकर रहे और पापमोचनमन्त्रका जप करे।
असत्-प्रतिग्रह लेनेसे जो पाप होता है, उससे मुक्ति प्राप्त करनेके लिये एक मासपर्यन्त ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए पयोव्रत करे। गोष्ठमें निवासकर गायत्री-मन्त्रके जपमें परायण रहे। ऐसा करनेसे मनुष्य पापविमुक्त हो जाता है।
(यथासमय यज्ञोपवीत-संस्कारादिसे वञ्चित) व्रात्यका यजन करानेवाला तीन कृच्छ्रव्रतका आचरण करके अपने उस पापसे मुक्त हो सकता है। ऐसे ही अभिचारक क्रिया करनेवालेके लिये भी यही प्रायश्चित्त है। वेद²प्लावी वर्षपर्यन्त जौका भक्षण करे। शरणमें आये हुएका परित्याग करनेवाला भी वर्षपर्यन्त जौका भक्षण करे।
गर्दभयान तथा उष्ट्रयानसे गमन करनेवाला तीन प्राणायाम करे। इसी प्रकार नग्नस्नान, नग्न-शयन और दिनमें स्त्रीगमन करनेपर भी तीन प्राणायामसे शुद्धि होती है।
गुरुजनोंको 'तू' कहने तथा 'हूँ' इस प्रकार कहनेसे तथा वाद-प्रतिवादमें ब्राह्मणपर विजय प्राप्त करनेसे मनुष्यको जो पाप लगता है, उससे मुक्ति प्राप्त करनेके लिये पापी मनुष्यको उस गुरु या ब्राह्मणको प्रसन्नकर एक दिनका उपवास करना चाहिये। ब्राह्मणपर प्रहार करनेके लिये उद्यत होनेपर कृच्छ्रव्रत तथा प्रहार कर देनेपर अतिकृच्छ्रव्रतका पालन करना चाहिये।
जिस निन्दित आचरणके लिये प्रायश्चित्त-विधान निर्दिष्ट नहीं है, उसके लिये देश, काल, आयु, शक्ति और पापपर सम्यक् विचार करके ही प्रायश्चित्तका निर्णय करना चाहिये। शास्त्रकारोंने पाप-विमुक्तिका यही समुचित नियम कहा है।
गर्भपात तथा पतिनिन्दा करना स्त्रियोंके पतनके कारण हैं। ऐसी स्त्रियाँ अपने दोषके अनुसार शास्त्रविहित प्रायश्चित्त नहीं करती हैं तो उनका परित्याग ही उचित है अन्यथा उन्हें अपने घरमें जीवनयापनके लिये आवश्यक सामान देकर रखना चाहिये।
जो पाप विख्यात हो चुका है, उसका प्रायश्चित्त गुरुजनोंके (परिषद्के)³ अभिमतके अनुसार ही
१. नील-वृष एक विशिष्ट लक्षणवाले बैलको कहते हैं।
२. या० स्मृति श्लोक २८८ की मिताक्षरा व्याख्याके अनुसार प्रकृतमें विप्लव शब्दके तीन अर्थ हैं—१-जो व्यक्ति वेदकी रक्षा कर सकता है, यदि वह वेदरक्षा नहीं करता तो यह वेदका विप्लव है। २-अनध्यायकालमें वेदका अध्ययन विप्लव है। ३-वेदाध्ययनमें समर्थ अथवा वेदाध्ययन करके उत्कर्ष प्राप्त करनेवाले अधिकारीको वेदाध्ययनके प्रति अनुत्साहित करना विप्लव है। इनमेंसे किसी एक दोषसे युक्त व्यक्ति भी वेदप्लावी कहा जाता है।
३. वेद एवं धर्मके विज्ञाता चार ब्राह्मणों अथवा तीन ब्राह्मणों या ब्रह्मवेत्ता धर्मशास्त्रज्ञ एक ब्राह्मणकी भी परिषद् हो सकती है। (या० स्मृति; आचाराध्याय श्लोक ९)
| १८२ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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करना चाहिये, किंतु जो पाप विख्यात नहीं है, उसका प्रायश्चित्त गुप्तरूपसे करना चाहिये।
गुप्तरूपसे किये जानेवाले कुछ प्रायश्चित्त इस प्रकार समझना चाहिये—ब्रह्महत्या करनेवाला पापी तीन रात्रियोंतक उपवास रखकर विशुद्ध जल (नदी आदिके जलमें निमग्न होकर)-के मध्य अघमर्षण-मन्त्रका जप करे और दूध देनेवाली गायका दान दे तो वह शुद्ध हो जाता है। किंतु यह प्रायश्चित्त अज्ञानमें होनेवाली ब्रह्महत्याके लिये विहित है। अज्ञानमें होनेवाली ब्रह्महत्याके निमित्त यह प्रायश्चित्त भी किया जा सकता है कि ब्रह्महत्याकर्ता अहोरात्रपर्यन्त वायुपान करते हुए जलमें रहनेके बाद प्रातःकाल जलसे बाहर आकर 'लोमभ्य स्वाहा॑०' इत्यादि आठ मन्त्रोंसे पाँच-पाँच आहुतियाँ यथाविधान अग्निमें दे।
मद्यपी एवं सुवर्णकी चोरी करनेवाले पापीको जलके मध्य स्थित होकर रुद्रदेवके मन्त्रका जप करते हुए तीन दिनका उपवास और कुष्माण्डी ऋचासे घृतकी आहुतियाँ देकर आत्मशुद्धि करनी चाहिये। गुरु-पत्नीके साथ सम्पर्क करनेवाला पापी 'सहस्त्रशीर्षा०' मन्त्रका जप करके पापसे विमुक्त हो जाता है।
सौ बार प्राणायाम करनेपर मनुष्य सर्वविध पापोंसे मुक्त हो जाता है। अज्ञानवश किये गये पापकी शान्ति त्रैकालिक संध्योपासनासे हो जाती है। ब्राह्मणोंके द्वारा एकादश आवृत्ति रुद्रानुवाकोंका जप करवानेसे भी पापका शमन होता है। वेदाभ्यास करनेवाले, शान्तिपरायण और पञ्चयज्ञके अनुष्ठाताको पापका स्पर्शतक नहीं होता। वायुमात्रका भक्षण करते हुए पूरे दिन सूर्यदर्शनके साथ एवं पूरी रात्रि जलमें रहकर एक सहस्र गायत्री-मन्त्रका जप करनेसे ब्रह्महत्यासे होनेवाले पापके अतिरिक्त अन्य समस्त पापोंसे मुक्ति हो जाती है।
ब्रह्मचर्य, दया, क्षमा, भगवद्ध्यान, सत्य, निष्कपटता, अहिंसा, अस्तेय (चोरी न करना), माधुर्य और दम—ये दस यम माने गये हैं। स्नान, मौन, उपवास, यज्ञ, स्वाध्याय, इन्द्रियनिग्रह, तपस्या, अक्रोध, गुरुभक्ति और पवित्रता—ये दस नियम कहे जाते हैं।
गोदुग्ध, गोदधि, गोघृत, गोमूत्र तथा गोमयको 'पञ्चगव्य' कहते हैं। इस पञ्चगव्यका कुशोदकके साथ पान कर व्रती दूसरे दिन उपवास करे। इस तरह दो रात्रिका कृच्छ्र-सान्तपनव्रत होता है। पहले दिन गोदुग्ध, दूसरे दिन गोदधि, तीसरे दिन गोघृत, चौथे दिन गोमूत्र, पाँचवें दिन गोमय, छठें दिन कुशोदक मात्र और सातवें दिन कुछ भी न लेकर शुद्ध उपवास कर जो व्रत पूर्ण किया जाता है, वही महासान्तपन नामक व्रत कहा जाता है।
पलाश, गूलर, कमल, बिल्वपत्र इनमेंसे एक-एकको एक-एक दिन जलमें पकाकर उसी जलको क्रमशः एक-एक दिन पीकर चार दिन रहे एवं पाँचवें दिन कुशोदकमात्र पीकर जिस व्रतका पालन किया जाता है, उसको पर्णकृच्छ्रव्रत कहते हैं। तप्तकृच्छ्रव्रतमें व्रतीको पहले दिन गरम गोदुग्ध, दूसरे दिन गरम घृत, तीसरे दिन गरम जलका प्राशन चौथे दिन उपवास करना चाहिये। यह पवित्र (शुद्ध) करनेवाला महातप्तकृच्छ्रव्रत है।
पहले दिन एकभक्तव्रत (चौबीस घण्टेमें मध्याह्नमें केवल एक बार भोजन करना), दूसरे दिन नक्तव्रत अर्थात् चौबीस घण्टेमें एक बार (रात्रिमें), तीसरे दिन अयाचित (बिना याचनासे प्राप्त) अन्नका भोजन करना, चौथे दिन पूर्ण
१- 'ऋतं च सत्यं०' आदि मन्त्र अघमर्षण है।
२- या० स्मृतिमें श्लोक २४७ में इन मन्त्रोंको दिया गया है।