गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
२५१- तीर्थमरणकी महिमा, अन्त समयमें भगवन्नामकी महिमा, शालग्रामशिला तथा तुलसीकी संनिधिमें मरणका फल, मुक्तिदायक तथा स्वर्गदायक प्रशस्त कर्म, इष्टापूर्तकर्म तथा अनाथ प्रेतके संस्कारका माहात्म्य
| ५६६ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ धर्मकाण्ड - |
|---|
करे और उन्हें वहाँसे विदा करे।
हे पक्षिन्! इस विधिसे एक शय्याका एक ही ब्राह्मणको दान देना चाहिये। एक गौ, एक गृह, एक शय्या और एक स्त्रीका दान बहुतोंके लिये नहीं होता है। विभाजित करके दिये गये ये दान दाताको पापकी कोटिमें गिरा देते हैं।
हे तार्क्ष्य! इस प्रकार बतायी गयी विधिके अनुसार जो प्राणी शय्यादिका दान करे तो उसे जो फल प्राप्त होता है, उसको तुम सुनो। इस दानसे दाता सौ दिव्य वर्षोंतक स्वर्गलोकमें निवास करता है। व्यतीपात योग, कार्तिक पूर्णिमा, मकर तथा कर्ककी संक्रान्तिमें, सूर्य-चन्द्रग्रहणमें, द्वारका, प्रयाग, नैमिषारण्य, कुरुक्षेत्र, अर्बुद (आबू) पर्वत, गङ्गा, यमुना तथा सिन्धु नदी और सागरके संगम-तटपर जो दान दिया जाता है, यह उससे भी बड़ा दान है। इस शय्यादानके सोलहवें अंशको भी वे सभी दान प्राप्त नहीं कर पाते हैं। वह प्राणी जहाँ जन्म लेता है, वहीं उस पुण्यका फल भोगता है। स्वर्गमें रहनेयोग्य पुण्यके क्षय होनेके बाद वह सुन्दर स्वरूप धारण करके पृथ्वीपर पुनः जन्म लेता है। वह महाधनी, धर्मज्ञ तथा सर्वशास्त्रोंका निष्णात पण्डित होता है और मृत्यु होनेके बाद वह नरश्रेष्ठ पुनः वैकुण्ठलोक चला जाता है। अद्भुत है! अप्सराओंसे चारों ओर घिरा हुआ वह प्राणी दिव्य विमानपर चढ़कर स्वर्गमें अपने पितरोंके साथ हव्य-कव्य ग्रहण करते हुए प्रसन्न रहता है।
हे तार्क्ष्य! यदि पितर प्रेतत्वको प्राप्त हैं तो सपिण्डीकरणके बिना अष्टका, अमावास्या, मघा नक्षत्र तथा पितृपर्वमें किये गये जो-जो श्राद्ध हैं, वे पितरोंको नहीं प्राप्त होते हैं। सपिण्डीकरणका कार्य वर्ष पूरा हो जानेपर करना चाहिये। इसमें संशय नहीं है। शवकी शुद्धिके लिये आद्य श्राद्ध करके षोडशीका सम्पादन करे। तदनन्तर पितृपंक्तिकी (पितरोंकी पंक्तिमें प्रवेशके लिये) शुद्धिके लिये पचासवें प्रेतपिण्डका अन्य पिण्डोंके साथ मेलन करे। वृद्धि श्राद्धकी सम्भावना होनेपर एक वर्षके पहले ही (छः अथवा तीन माह या डेढ़ माहमें एवं बारहवें दिन सपिण्डीकरण श्राद्ध कर देना चाहिये। शूद्रका श्राद्ध स्वेच्छापूर्वक हो सकता है। अग्निहोत्री ब्राह्मणकी मृत्यु होनेपर द्वादशाहको सपिण्डन-कर्म होना चाहिये। जबतक वह कर्म नहीं किया जाता है, तबतक वह मृत अग्निहोत्री ब्राह्मण प्रेतयोनिमें ही रहता है। अतः अग्निहोत्र करनेवाले ब्राह्मणको द्वादशाहमें ही सपिण्डीकरणकी क्रिया कर देनी चाहिये। गङ्गा आदि महानदियोंमें अस्थि-क्षेपण, गयातीर्थ-श्राद्ध, पितृपक्षमें होनेवाले श्राद्ध सपिण्डीकरणके बिना वर्षके मध्यमें नहीं करना चाहिये। यदि बहुत-सी सपत्नियां हों और उनमेंसे एक भी स्त्री पुत्रवती हो जाय तो उसी एक पुत्रसे ही वे सभी पुत्रवती होती हैं।
असपिण्ड अग्निहोत्री पुत्रको पितृयज्ञ नहीं करना चाहिये। यदि वह ऐसा आचरण करता है तो पापी होगा और उसे पितृहत्याका भी पाप लगेगा। पतिकी मृत्यु होनेपर जो स्त्री अपने प्राणोंका परित्याग कर देती है तो पतिके साथ ही उसका भी सपिण्डीकरण कर देना चाहिये। पिताकी अनुचित रूपसे लायी गयी विवाहिता वैश्यवर्णा अथवा क्षत्रिया जो भी पत्नियाँ हों, उनका सपिण्डन कोई भी पुत्र कर सकता है। जब प्रमादवश ब्राह्मण किसी शूद्रा कन्यासे ही विवाह कर लेता है तो मरनेके बाद उसके लिये एकोद्दिष्ट-श्राद्ध बताया गया है और सपिण्डीकरण-श्राद्ध उसीके साथ करना चाहिये। अन्य चारों वर्णोंसे ब्राह्मणके चाहे दसों पुत्र हों, किंतु उन्हें अपनी-अपनी माँके सपिण्डीकरणकी क्रियामें नियुक्त होना चाहिये। अन्वष्टका पौष, माघ और
प्रेतकल्प ] इष्टापूर्तकर्मकी महिमा तथा और्ध्वदैहिक कृत्य ५६७
फाल्गुनमासके कृष्णपक्षकी नवमी तिथि (जो साग्नियोंका मातृक श्राद्ध होता है)-को होनेवाला तथा वृद्धिहेतुक श्राद्ध एवं सपिण्डन-श्राद्धमें पितासे पृथक् माताका पिण्ड प्रदान करना चाहिये।* हे तार्क्ष्य! पितामहीके साथ माता और पितामहके साथ पिताका सपिण्डन अपेक्षित है, ऐसा मेरा अभिमत है। यदि स्त्री पुत्रहीन ही मर जाती है तो उसका सपिण्डन पति करे। धर्मतः पतिको अपनी माता, पितामही एवं प्रपितामही—इन तीनोंके साथ अपनी पत्नीका सपिण्डन करना चाहिये।
हे गरुड! यदि स्त्रियोंके पुत्र तथा पति दोनों नहीं हैं तो वृद्धिकालके आनेपर स्त्रीका भाई अथवा दायभागका गृहीता या देवर उसका सपिण्डन करें। यदि पति एवं पुत्ररहित स्त्रियोंके न तो कोई सगोत्री हो और न देवर ही हो तो उस समय अन्य व्यक्ति उसके भाइयोंके साथ उसका एकोद्दिष्ट विधानसे श्राद्ध कर सकता है। यदि भूलवश अथवा विघ्नके कारण सपिण्डन-क्रिया किसीकी नहीं हो सकी है तो उसके पुत्र या बन्धु-बान्धवोंको चाहिये कि वे नवक श्राद्ध, षोडश श्राद्ध तथा आब्दिक श्राद्ध करे।
जिसका दाह नहीं हुआ है, उसके लिये श्राद्ध नहीं करना चाहिये। दर्भका पुत्तल बनाकर अग्निसे उसे जलाकर ही श्राद्ध करना चाहिये। पुत्रके द्वारा पिताका सपिण्डीकरण किया जा सकता है, किंतु पुत्रमें पिताका पिण्डमेलन नहीं किया जा सकता। प्रेमाधिक्यके कारण भी पिताको पुत्रमें सपिण्डीकरण नहीं करना चाहिये। जब बहुत-से पुत्र हों, तब भी ज्येष्ठ पुत्र ही उस क्रियाको सम्पन्न करे। नवक, सपिण्डन तथा षोडशादि अन्य सभी श्राद्धोंको करनेका अधिकारी वही एक है। धनका बँटवारा न होनेपर भी एक ही पुत्रको पिताके समस्त और्ध्वदेहिक कृत्य करना चाहिये। मुनियोंने भी इस बातको कहा है कि पिताकी अन्त्येष्टि एक ही पुत्र करता है। यदि पुत्रोंमें परस्पर बँटवारा हो गया है तो उन सभी पुत्रोंको पृथक्-पृथक् सांवत्सरदिक क्रिया करनी चाहिये। स्वयं प्रत्येक पुत्रको अपने पिताका श्राद्ध करना चाहिये। जिनके निमित्त ये षोडश प्रेतश्राद्ध सम्पन्न नहीं किये जाते हैं, उनका अन्य सैकड़ों श्राद्ध करनेपर भी पिशाचत्व स्थिर रहता है।
हे खगेश्वर! पुत्रहीनका सपिण्डीकरण उसके भाई, भतीजे, सपिण्ड अथवा शिष्यको करना चाहिये। सभी पुत्रहीन पुरुषोंका सपिण्डन पत्नी करे अथवा ऋत्विज् या पुरोहितसे उस कार्यको सम्पन्न कराये। पिताकी मृत्यु हो जानेपर वर्षके मध्य जब सूर्यग्रहण या चन्द्रग्रहण हों तो पुत्रोंको पार्वणश्राद्ध, नान्दीश्राद्ध नहीं करना चाहिये। माता-पिता और आचार्यकी मृत्यु होनेपर वर्षके मध्यमें तीर्थश्राद्ध, गयाश्राद्ध तथा अन्य पैतृक श्राद्ध नहीं करना चाहिये। पितृपक्ष, गजच्छाया योग, मन्वादि और युगादि तिथियोंमें सपिण्डीकरणके बिना पिताको पिण्डदान नहीं देना चाहिये। कुछ लोगोंका विचार है कि वर्षके मध्यमें भी यज्ञपुरुष तथा देवतादिके लिये जो देय है, उसका दान देना चाहिये। पितरोंको भी अर्घ्य और पिण्डसे रहित जो कुछ देय है, वह सब दिया जा सकता है। यही विधि कही गयी है।
देवोंके लिये पितर देवता हैं, पितरोंके पितर ऋषि हैं, ऋषियोंके पितर देवता हैं, इस कारण पिता सर्वश्रेष्ठ है। पितर, देवतागण और मनुष्योंके यज्ञनाथ भगवान् विभु हैं। यज्ञनाथको जो कुछ दिया जाता है, वह समस्त शरीरधारियोंको दिया हुआ माना जाता है। पिताके मरनेपर वर्षके मध्य
* अन्वष्टकासु यच्छ्राद्धं यच्छ्राद्धं वृद्धिहेतुकम्। पितुः पृथक् प्रदातव्यं स्त्रियाः पिण्डं सपिण्डने॥ (३४।१२०)