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गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ

११९- भविष्यके राजवंशका वर्णन

२३६संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

तिथिव्रत, वारव्रत एवं नक्षत्रादिव्रत-निरूपण और प्रतिपदादि तिथियोंमें पूजनीय देवता

**ब्रह्माजीने कहा—**कामदेवत्रयोदशी तिथिको श्वेतकमल आदिके पुष्पोंसे रति और प्रीतिसे युक्त मणिविभूषित शोकरहित कामदेवकी पूजा करनी चाहिये, इस व्रतका नाम मदनत्रयोदशी है। जो वर्षपर्यन्त प्रत्येक मासके शुक्ल और कृष्णपक्षकी चतुर्दशी एवं अष्टमी तिथिमें उपवास करके शिवपूजन करता है, वह मुक्ति प्राप्त करता है। इसे शिवचतुर्दशी तथा शिवाष्टमीव्रत कहा गया है। तीन रात्रियोंतक उपवास रखकर व्रतीको कार्तिकमासमें एक शुभ भवनका दान देना चाहिये। ऐसा करनेसे सूर्यलोककी प्राप्ति होती है, यह कल्याणकारी धामव्रत है। अमावास्या तिथिमें पितरोंको दिया गया जल आदि अक्षय होता है। नक्तव्रत करके वारोंके नामसे सूर्यादिकी पूजा करके व्रती सभी फलोंको प्राप्त करनेका अधिकारी हो जाता है। ये वारव्रत कहलाते हैं।

हे ब्रह्मर्षि ! प्रत्येक मासके नामकरणके प्रयोजक बारहोंने नक्षत्रसे युक्त उन-उन महीनोंकी पूर्णिमा तिथि हो तो उन नक्षत्रोंके नामसे मनुष्यको सम्यक्-रूपसे भगवान् अच्युतकी पूजा करनी चाहिये। इस व्रतको कार्तिकमाससे प्रारम्भ करना चाहिये। कृत्तिका नक्षत्रयुक्त कार्तिकमासमें केशवकी पूजा करनी चाहिये। क्रमशः चार महीनों (कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष तथा माघ)-में घृतका हवनकर तिल-चावल (कृसरान्न)-की खिचड़ीका भोग निवेदित करना चाहिये। आषाढ आदि चार महीनोंमें पायस निवेदन करके ब्राह्मणोंको पायसका ही भोजन निवेदित करना चाहिये। पञ्चगव्य, जलस्नान और नैवेद्यसे पूजन करना चाहिये। इस प्रकार संवत्सरके अन्तमें विशेषरूपसे भगवान्‌की पूजा करके निम्नलिखित मन्त्रोंसे प्रार्थना करनी चाहिये—

नमो नमस्तेऽच्युत संक्षयोऽस्तु
पापस्य वृद्धिं समुपैतु पुण्यम्।
ऐश्वर्यवित्तादिसदाऽक्षयं मे
तथास्तु मे सन्ततिरक्षयैव॥
यथाच्युत त्वं परतः परस्मात्
स ब्रह्मभूतः परतः परस्मात्।
तथाच्युतं मे कुरु वाञ्छितं सदा
मया कृतं पापहराप्रमेय॥
अच्युतानन्त गोविन्द प्रसीद यदभीप्सितम्।
तदक्षयममेयात्मन् कुरुष्व पुरुषोत्तम॥
(१३७।१०-१२)

हे अच्युत ! आपको बार-बार प्रणाम है। हे देव ! मेरे पापोंका विनाश हो और पुण्यकी वृद्धि हो। मेरे ऐश्वर्य और धनादि सदैव अक्षय रहें। मेरी सन्तान-परम्परा अक्षुण्ण हो। हे अच्युत ! जिस प्रकार आप परात्पर ब्रह्म हैं, वैसे ही मेरे मनोऽभिलषित फलको अविनाशी बना दें। हे अप्रमेय ! सदैव मेरे द्वारा किये जानेवाले पापका विनाश करते रहें। हे अच्युत ! हे अनन्त ! हे गोविन्द ! आप मुझपर प्रसन्न हों। हे अमेयात्मन् ! हे पुरुषोत्तम ! जो मेरे लिये अभीष्ट है, आप उसको भी अक्षय बना दें।

यह मास-नक्षत्रव्रत सात वर्षतक करना चाहिये। ऐसा करनेसे मनुष्यको आयु, लक्ष्मी तथा सद्गति प्राप्त होती है। यदि स्वच्छ हृदयसे उपवाससहित एक वर्षपर्यन्त यथाक्रम एकादशी, अष्टमी, चतुर्दशी और सप्तमी तिथियोंमें विष्णु, दुर्गा, शिव और सूर्यकी पूजा हो तो प्राणीको उन देवोंके लोक तो प्राप्त होते ही हैं, सभी निर्मल अभिलाषाएँ भी पूर्ण हो जाती हैं। व्रतकालमें एकभुक्त, नक्त अथवा

काण्ड ] सूर्यवंशवर्णन २३७


अयाचित एवं उपवास करते हुए शाकादिके द्वारा इन सभी तिथियोंमें सभी देवताओंकी पूजा करनेसे भोग और मोक्ष दोनोंकी प्राप्ति हो जाती है। प्रतिपदा तिथिमें कुबेर, अग्नि, नासत्य और दस्र नामक देव पूज्य हैं। द्वितीया तिथिमें लक्ष्मी तथा यमराज, पञ्चमीमें श्रीसमन्वित पार्वती और नागगणोंकी पूजा करनी चाहिये। षष्ठी तिथिमें कार्तिकेय तथा सप्तमीमें अर्थदाता सूर्यदेवकी पूजा विहित है। अष्टमी तिथिमें दुर्गा, नवमीमें मातृकाओं एवं तक्षककी पूजाका विधान है। दशमीमें इन्द्र और कुबेर तथा एकादशीमें सप्तर्षियोंकी पूजा करनी चाहिये। द्वादशी तिथिमें हरि, त्रयोदशीमें कामदेव, चतुर्दशीमें महेश्वर शिव, पूर्णिमामें ब्रह्मा तथा अमावास्यामें पितरोंकी पूजा करनी चाहिये। (अध्याय १३७)


सूर्यवंशवर्णन

श्रीहरिने कहा—हे रुद्र! अब मैं राजाओंके वंश और उनके चरितका वर्णन करता हूँ। सर्वप्रथम सूर्यवंशका वर्णन सुनें।

भगवान् विष्णुके नाभिकमलसे ब्रह्मा उत्पन्न हुए। ब्रह्माके अङ्गुष्ठभागसे दक्षका जन्म हुआ। दक्षसे उनकी पुत्री अदितिका प्रादुर्भाव हुआ, जो देवमाता कहलाती हैं। उन्हीं अदितिसे विवस्वान् (सूर्य), विवस्वान्‌से वैवस्वत मनु हुए और उन मनुसे इक्ष्वाकु, शर्याति, नृग, धृष्ट, पृषध्र, नरिष्यन्त, नभग, दिष्ट तथा शशक (करूष) नामक नौ पुत्रोंकी उत्पत्ति हुई। हे रुद्र! मनुकी इला नामकी कन्या थी और सुद्युम्न नामक पुत्र था। इलाके बुधसे राजा पुरूरवा उत्पन्न हुए। सुद्युम्नसे उत्कल, विनत तथा गय नामक तीन पुत्रोंका जन्म हुआ।

गोवध करनेके कारण मनुका पुत्र पृषध्र शूद्र हो गया था। करूष (शशक)-से क्षत्रिय लोगोंकी उत्पत्ति हुई, जो कारूष नामसे विख्यात हुए। मनुके पुत्र दिष्टसे जो नाभाग नामका पुत्र हुआ वह वैश्य हो गया था। उससे एक भलन्दन नामक पुत्र हुआ। भलन्दनसे वत्सप्रीति नामक पुत्रकी उत्पत्ति हुई। वत्सप्रीतिसे पांशु और खनित्र—दो पुत्रोंका जन्म हुआ। खनित्रसे भूप, भूपसे क्षुप, क्षुपसे विंश और विंशसे विविंशकने जन्म लिया।

विविंशकसे खनिनेत्र और खनिनेत्रसे विभूति नामक पुत्रका जन्म हुआ। विभूतिसे करन्धम नामक पुत्र हुआ। करन्धमसे अविक्षित, अविक्षितसे मरुत् और मरुत्‌से नरिष्यन्तकी उत्पत्ति मानी जाती है। नरिष्यन्तसे तम, तमसे राजवर्धन, राजवर्धनसे सुधृति, सुधृतिसे नर, नरसे केवल तथा केवलसे बन्धुमान् हुआ।

बन्धुमान्‌के वेगवान्, वेगवान्‌के बुध और बुधके तृणबिन्दु नामक पुत्र हुआ। तृणबिन्दुने अलम्बुषा नामकी अप्सरासे इलविला नामकी कन्या तथा विशाल नामक पुत्र उत्पन्न किया। विशालके हेमचन्द्र नामक पुत्र हुआ। हेमचन्द्रसे चन्द्रक, चन्द्रकसे धूम्राश्व, धूम्राश्वसे सृञ्जय, सृञ्जयसे सहदेवकी उत्पत्ति हुई। सहदेवके कृशाश्व नामक पुत्र हुआ। कृशाश्वसे सोमदत्त और सोमदत्तसे जनमेजय हुआ। जनमेजयसे सुमन्ति नामक पुत्रकी उत्पत्ति हुई। इन सभी (राजाओं)-को वैशालक कहा गया है।

वैवस्वत मनुके पुत्र शर्यातिके सुकन्या नामकी पुत्री हुई, जो च्यवन ऋषिकी भार्या बनी। शर्यातिके अनन्त नामक पुत्र भी था। उससे रेवत नामका पुत्र हुआ। रेवतके भी रैवत नामक पुत्र हुआ। उससे रेवती नामकी कन्या हुई।

वैवस्वत मनुके पुत्र धृष्टके धार्ष्ट हुआ, जो वैष्णव हो गया था। उन्हीं मनुके पुत्र नभगके