गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
२७- ब्रह्ममूर्तिके ध्यानका निरूपण
| ६० | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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देवों और असुरोंसे नमस्कृत देवाधिदेव परमेश्वर भगवान् हयग्रीवका पुनः ध्यान करना चाहिये और शङ्ख-चक्रादि मङ्गलमयी मुद्राएँ प्रदर्शित करनी चाहिये। उसके बाद पाद्य, अर्घ्य, आचमन तथा स्नान प्रदान करे। हे वृषध्वज ! उन्हें वस्त्र प्रदान करनेके बाद आचमन प्रदानकर उनको सुन्दर यज्ञोपवीत समर्पित करना चाहिये और उन्हें पाद्य, अर्घ्य आदि प्रदान करना चाहिये। अनन्तर मूल मन्त्रसे भैरवदेवको पाद्यादि प्रदान करते हुए उनका विधिवत् पूजन करना चाहिये।
हे शिव ! इसके बाद शुभदायिनी तथा ऐश्वर्य प्रदान करनेवाली परमादेवी लक्ष्मीकी पूजा करे। पूर्व दिशामें ‘ॐ शङ्खाय नमः’ कहकर शङ्खका, दक्षिण दिशामें ‘ॐ पद्माय नमः’ कहकर पद्मका, पश्चिम दिशामें ‘ॐ चक्राय नमः’ से चक्रका तथा उत्तर दिशामें ‘ॐ गदायै नमः’ से गदाका यथाक्रम पूजन करे।
इसी प्रकार पुनः पूर्व दिशामें ‘ॐ खड्गाय नमः’ से खड्ग, दक्षिण दिशामें ‘ॐ मुसलाय नमः’ से मुसल, पश्चिम दिशामें ‘ॐ पाशाय नमः’ से पाश, उत्तर दिशामें ‘ॐ अंकुशाय नमः’ से अंकुश तथा मध्यमें ‘ॐ सशराय धनुषे नमः’ कहकर शरयुक्त धनुषकी पूजा करनी चाहिये।
हे रुद्र ! पुनः पूर्व आदि चार दिशाओंमें श्रीवत्स, कौस्तुभ, वनमाला और मङ्गलमय पीताम्बरकी पूजा करके पुनः शङ्ख, चक्र, गदाधारी भगवान् हयग्रीवकी पूजा करे।
तदनन्तर ‘ॐ ब्रह्मणे नमः’ से ब्रह्मा, ‘ॐ नारदाय नमः’ से नारद, ‘ॐ सिद्धाय नमः’ से सिद्ध, ‘ॐ गुरुभ्यो नमः’ से गुरु, ‘ॐ परगुरुभ्यो नमः’ से परगुरु और ‘ॐ गुरुपादुकाभ्यां नमः’ से गुरुपादुकाकी पूजा करे।
तत्पश्चात् ‘ॐ सवाहनाय सपरिवाराय इन्द्राय नमः’, ‘ॐ सवाहनाय सपरिवाराय अग्नये नमः’, ‘ॐ यमाय नमः’, ‘ॐ निर्ऋतये नमः’, ‘ॐ वरुणाय नमः’, ‘ॐ वायवे नमः’, ‘ॐ सोमाय नमः’, ‘ॐ ईशानाय नमः’, ‘ॐ अनन्ताय नमः’, ‘ॐ ब्रह्मणे नमः’—इन मन्त्रोंसे पूर्व आदि दिशाओंसे ऊर्ध्वदिशापर्यन्त इन्द्र, अग्नि आदि सभी दिग्-देवताओंकी पूजा करनी चाहिये।
इसके बाद ‘ॐ वज्राय नमः’, ‘ॐ शक्तये नमः’, ‘ॐ दण्डाय नमः’, ‘ॐ खड्गाय नमः’, ‘ॐ पाशाय नमः’, ‘ॐ ध्वजाय नमः’, ‘ॐ गदायै नमः’, ‘ॐ त्रिशूलाय नमः’, ‘ॐ चक्राय नमः’, ‘ॐ पद्माय नमः’—इन मन्त्रोंसे वज्र, शक्ति आदि आयुधोंकी पूजा करे।
तत्पश्चात् ईशानकोणमें ‘ॐ विष्वक्सेनाय नमः’ इस मन्त्रसे विष्वक्सेनकी पूजा करे। इसी प्रकार अनन्तकी भी पूजा करे। हे वृषभध्वज ! भगवान् हयग्रीवके मूल मन्त्रसे गन्ध, पुष्प, धूप, दीप तथा नैवेद्यके द्वारा उनकी पूजा करनी चाहिये। तत्पश्चात् उन (देव हयग्रीव)-की प्रदक्षिणा करके नमस्कार करे और यथाशक्ति मूल मन्त्रका जपकर उन्हें समर्पित कर दे। तदनन्तर देवेश्वर भगवान् हयग्रीवकी इस प्रकार स्तुति करनी चाहिये—
ॐ नमो हयशिरसे विद्याध्यक्षाय वै नमः ॥
नमो विद्यास्वरूपाय विद्यादात्रे नमो नमः।
नमः शान्ताय देवाय त्रिगुणायात्मने नमः ॥
सुरासुरनिहन्त्रे च सर्वदुष्टविनाशिने।
सर्वलोकाधिपतये ब्रह्मरूपाय वै नमः ॥
नमश्चेश्वरवन्द्याय शङ्खचक्रधराय च।
नम आद्याय दान्ताय सर्वसत्त्वहिताय च ॥
त्रिगुणायागुणायैव ब्रह्मविष्णुस्वरूपिणे।
कर्त्रे हर्त्रे सुरेशाय सर्वगाय नमो नमः ॥
(३४। ५०–५४)
‘सर्वविद्याधिपति अश्वशिर भगवान्को नमस्कार
काण्ड ] गायत्रीन्यास तथा संध्या-विधि ६१
है। विद्यास्वरूप, विद्याप्रदायक उन देवके लिये बार-बार नमन है। शान्तस्वरूप, त्रिगुणात्मक, सुर तथा असुरोंका निग्रह करनेवाले, सभी दुष्टोंका विनाश करनेवाले, सर्वलोकाधिपति ब्रह्मस्वरूप उन देव हयग्रीवके लिये नमस्कार है। महेश्वरके लिये भी वन्दनीय, शङ्ख-चक्रधारी, जगत्के आदि कारण, परम उदार तथा सभी प्राणियोंका हित करनेवाले देवके लिये नमस्कार है। त्रिगुणात्मक, त्रिगुणातीत, ब्रह्मा-विष्णुस्वरूप, जगत्की सृष्टिके कर्त्ता, संहर्त्ता, देवेश्वर तथा सर्वव्यापक उन भगवान् हयग्रीवको बारम्बार नमस्कार है।
इस प्रकार स्तुति करके अपने हृदयकमलके मध्य शङ्ख, चक्र और गदाको धारण करनेवाले, करोड़ों सूर्योंके समान कान्तिमान्, सर्वाङ्गसुन्दर, अविनाशी महेश्वरके भी ईश, देवाधिदेव, परमात्मा हयग्रीवका ध्यान करना चाहिये।
हे शङ्कर ! इस प्रकार मैंने भगवान् हयग्रीवकी पूजा-विधिका वर्णन किया। परम भक्तिपूर्वक जो इसका पाठ करता है, वह परमपदको प्राप्त होता है। (अध्याय ३४)
गायत्रीन्यास तथा संध्या-विधि
श्रीहरिने कहा—हे शङ्कर ! अब मैं गायत्रीदेवीके [पूजनमें] न्यासादिका वर्णन करूँगा, आप इसका श्रवण करें। इस (गायत्री-मन्त्र)-के ऋषि विश्वामित्र, देवता सविता, मस्तक ब्रह्मा और शिखा रुद्र हैं। ये विष्णुके हृदयमें रहनेवाली हैं। ये विनियोग-कालमें एकनेत्रा हैं। इनका प्रादुर्भाव कात्यायन-गोत्रमें हुआ है, तीनों लोक इनके चरण हैं तथा ये पृथिवीकी कोखमें स्थित रहती हैं। गायत्रीदेवीके स्वरूपको इस प्रकार जानकर [गायत्री-मन्त्रका] बारह लाख जप करना चाहिये।
इस मन्त्रके त्रिपद तथा चतुष्पाद अर्थात् तीन चरण तथा चार चरण होते हैं। त्रिपादके प्रत्येक चरणमें आठ अक्षर तथा चतुष्पादके प्रत्येक चरणमें छः अक्षर होते हैं। जपमें त्रिपदा और पूजनमें चतुष्पदा गायत्रीके मन्त्रका प्रयोग करनेके लिये कहा गया है<sup>१</sup>।
जप, ध्यान, यज्ञादि कृत्य एवं पूजनके कार्योंमें नित्य इस सर्वपापविनाशिनी गायत्रीदेवीका विधिवत् अपने अङ्गोंमें न्यास करना चाहिये।
पैरके अंगुष्ठ-भागमें, गुल्फ<sup>२</sup>के मध्यमें, दोनों जंघाओं, दोनों जानुओं<sup>३</sup>, ऊरु<sup>४</sup>-भाग, गुह्यस्थान, अण्डकोष, नाडी, नाभि, शरीरके उदरभाग, दोनों स्तन, हृदय, कण्ठ, ओष्ठ, मुख, तालु, दोनों स्कन्धप्रदेश, दोनों नेत्र और भौंहों तथा मस्तकमें इस (गायत्री)-मन्त्रका न्यास करके क्रमशः—पूर्व, दक्षिण, उत्तर तथा पश्चिम दिशामें इनका न्यास करना चाहिये।
हे रुद्र ! इन गायत्रीदेवीके मन्त्रके वर्णों (रंगों)-को कह रहा हूँ। क्रमशः इसके (चौबीस) अक्षर इन्द्रनीलमणि, अग्निसदृश, पीत, श्याम, कपिलवर्ण, श्वेत, विद्युतप्रभ, मौक्तिकवर्ण, कृष्ण, रक्त, श्याम, शुक्ल, पीत, श्वेत, पद्मरागतुल्य, शङ्खवर्ण, पाण्डुर, रक्त, आसवके समान रक्तकृष्णमिश्रित, सूर्यसदृश, सौम्य, श्वेत, शङ्खकी आभाके समान तथा श्वेत हैं।
गायत्रीदेवीके मन्त्रका जप करके मनुष्य जिन-जिन वस्तुओंका हाथसे स्पर्श करता है और नेत्रोंसे
<sup>१</sup> जिस गायत्री-मन्त्रका जप किया जाता है, वह त्रिपदा गायत्री कहलाती है। 'परोरजसेऽसावदोम्०' यह गायत्रीका चतुर्थ पाद है। इस चतुष्पदा गायत्रीका प्रयोग सूर्योपस्थान, पूजन आदिमें होता है।
<sup>२</sup> गुल्फ (पैरकी घुट्टी) पाँवोंकी गाँठें।
<sup>३</sup> जानु (घुटना)।
<sup>४</sup> ऊरु—घुटनेके ऊपरका भाग।
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जिनका-जिनका अवलोकन करता है, वे सभी पवित्र हो जाते हैं। गायत्रीसे श्रेष्ठ कोई दूसरा मन्त्र नहीं है, ऐसा समझना चाहिये—
यद्यत्स्पृशति हस्तेन यच्च पश्यति चक्षुषा।
पूतं भवति तत् सर्वं गायत्र्या न परं विदुः॥
(३५। १९)
श्रीहरिने पुनः कहा— हे रुद्र! अब पापविनाशिनी संध्याकी विधिका वर्णन कर रहा हूँ। उसे आप सुनें। तीन बार प्राणायाम<sup>१</sup> करके संध्या<sup>२</sup>-स्नानका उपक्रम करे। प्राणवायुको संयतकर प्रणवमन्त्र (ॐकार) तथा सप्त व्याहृतिसे युक्त गायत्री-मन्त्रका (आपो ज्योतीरसोऽमृतं भूर्भुवः स्वरोम्) इस गायत्री सिरके साथ तीन बार उच्चारण करनेको प्राणायाम कहते हैं। द्विज प्राणायामोंके द्वारा मानसिक, वाचिक तथा कायिक दोषोंको भस्म कर लेता है। इसीलिये यथाविधि यथानियत सभी कालोंमें प्राणायामपरायण होना चाहिये।
प्रातः 'सूर्यश्च<sup>३</sup>०' इस मन्त्रके द्वारा, मध्याह्नमें 'आपः पु॑नन्तु<sup>४</sup>०' इस मन्त्रसे तथा सायंकाल 'अग्निश्च मा मन्युश्च<sup>५</sup>०' इस मन्त्रके द्वारा यथाविधि आचमन करके प्रणव-मन्त्रसे युक्त 'आपो॑ हि०<sup>६</sup>' इस ऋचासे कुशोदकके द्वारा मार्जन करते हुए प्रत्येक पदपर जल सिरपर छिड़के।
रजोगुणसे उत्पन्न होनेवाले पाप, तमोगुण और अज्ञानजन्य पाप, जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्तिकी स्थितिमें होनेवाले पाप तथा कायिक, वाचिक एवं मानसिक—ये नवों पाप इन नौ मन्त्रोंसे (मार्जनद्वारा) भस्म हो जाते हैं—
रजस्तमःस्वमोहोत्थान् जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिजान्।
वाङ्मनःकर्मजान् दोषान् नवैतान् नवभिर्दहेत्॥
(३६। ६)
दाहिने हाथमें जल लेकर उसे 'द्रुप॑दा०<sup>७</sup>' मन्त्रके द्वारा अभिमन्त्रितकर सिरपर छोड़ दे। अघमर्षण<sup>८</sup> मन्त्रकी तीन, छः, आठ अथवा बारह आवृत्ति करके अघमर्षण करे।
तत्पश्चात् 'उदु त्यं०<sup>९</sup>' तथा 'चि॒त्रं<sup>१०</sup>— इन मन्त्रोंसे सूर्योपस्थान करना चाहिये। इससे दिन तथा रात्रिमें किये गये समस्त पाप उसी क्षण नष्ट हो जाते हैं।
१-यहाँ संध्याका प्रकरण प्राणायामसे प्रारम्भ किया गया है, परंतु प्राणायामसे पूर्व संध्योपासनमें मालाधारण, पवित्रीकरण, शिखाबन्धन, भस्मधारण आदि करनेका विधान है। तत्पश्चात् आचमन, मार्जन, भूमिशोधनके अनन्तर संकल्प करके 'ऋतञ्च०' इस मन्त्रसे आचमन करना चाहिये। तदनन्तर गायत्री-मन्त्रसे दिग्बन्धन करनेके पश्चात् विनियोगपूर्वक प्राणायाम करनेकी विधि है। पूरी संध्योपासनविधि जाननेके लिये गीताप्रेससे प्रकाशित 'नित्यकर्म-पूजाप्रकाश' ग्रन्थ देखना चाहिये।
२-संध्यासे संध्याकाल लेना है। यह काल प्रातः, सायं एवं मध्याह्नमें आता है।
३-सूर्यश्च मा मन्युश्च मन्युपतयश्च मन्युकृतेभ्यः पापेभ्यो रक्षन्ताम्। यद्रात्र्या पापमकार्षं मनसा वाचा हस्ताभ्यां पद्भ्यामुदरेण शिश्ना रात्रिस्तदवलुम्पतु। यत्किञ्च दुरितं मयि इदमहमापोऽमृतयोनौ सूर्ये ज्योतिषि जुहोमि स्वाहा। (तै०आ० प्र० १०, अ० २५)
४-ॐ आपः पुनन्तु पृथिवीं पृथ्वी पूता पुनातु माम्। पुनन्तु ब्रह्मणस्पतिर्ब्रह्मपूता पुनातु माम्। यदुच्छिष्टमभोज्यं च यद्वा दुश्चरितं मम। सर्वं पुनन्तु मामापोऽसतां च प्रतिग्रहग्ं स्वाहा। (तै०आ० प्र० १०, अ० २३)
५-ॐ अग्निश्च मा मन्युश्च मन्युपतयश्च मन्युकृतेभ्यः पापेभ्यो रक्षन्ताम्। यदह्ना पापमकार्षं मनसा वाचा हस्ताभ्यां पद्भ्यामुदरेण शिश्ना अहस्तदवलुम्पतु। यत्किञ्च दुरितं मयि इदमहमापोऽमृतयोनौ सत्ये ज्योतिषि जुहोमि स्वाहा। (तै०आ० प्र० १०, अ० २४)
६-आपो हि ष्ठा मयोभुवस्ता न ऊर्जे दधातन। महे रणाय चक्षसे॥ यो वः शिवतमो रसस्तस्य भाजयतेह नः। उशतीरिव मातरः॥ तस्मा अरं गमाम वो यस्य क्षयाय जिन्वथ। आपो जनयथा च नः॥ (यजु० ११।५०-५२)
७-ॐ द्रुपदादिव मुमुचानः स्विन्नः स्नातो मलादिव। पूतं पवित्रेणेवाज्यमापः शुन्धन्तु मैनसः॥ (यजु० २०।२०)
८-ऋतं च सत्यं चाभीद्धात्तपसोऽध्यजायत। ततो रात्र्यजायत। ततः समुद्रो अर्णवः। समुद्रादर्णवादधि संवत्सरो अजायत। अहोरात्राणि विदधद्विश्वस्य मिषतो वशी। सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत्। दिवं च पृथिवीं चान्तरिक्षमथो स्वः॥ (ऋग्वेद १०।१९०।१)
९-ॐ उदु त्यं जातवेदसं देवं वहन्ति केतवः। दृशे विश्वाय सूर्य स्वाहा॥ (यजु० ७।४१)
१०-ॐ चित्रं देवानामुदगादनीकं चक्षुर्मित्रस्य वरुणस्याग्नेः। आप्रा द्यावापृथिवी अन्तरिक्षं सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च स्वाहा॥ (यजु० ७।४२)