गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
१५२- ब्राह्मीघृत आदि स्नेहपाकोंकी निर्माण-विधि तथा विविध रोगोंमें उनका उपचार
३२० संक्षिप्त गरुडपुराण [ आचार-
चिरायता, नीम, कंजा तथा खदिर आदिसे बने
कल्क अथवा क्वाथके द्वारा सिद्ध किया गया
घृतपाक उपदंशको दूर करता है।
प्राणीको [भग्नसे] हताश हुआ जानकर सबसे
पहले उसे शीतल जलसे सिंचित करे। तदनन्तर
पाकका लेपन तथा कुशकी रस्सीसे भग्न-भागपर
बन्धन लगाये। ऐसे भग्न-रोगीको उड़द, मांस,
मटरकी दाल, उगा हुआ अन्न, घृत, दूध तथा सूप
देना चाहिये।
रसोन (लहसुन), मधु, नासा (अडूसा) तथा
घृतका कल्क बनाकर उसको स्थानसे च्युत अथवा
टूटी हड्डियोंके जोड़पर लगानेसे बहुत ही शीघ्र
सफलता प्राप्त होती है। त्रिफला, त्रिकटु (सोंठ,
पिप्पली और काली मिर्च)-को समान भागमें
पीसकर उनके साथ बराबर मात्रामें मिलाया गया
गुग्गुल टूटे हुए हड्डीके संधि-स्थानको भी जोड़
देता है।
सभी प्रकारके कुष्ठरोगोंमें रोगीके लिये वमन,
रेचन तथा रक्तमोक्षणकी* क्रिया लाभकारी है।
वच, अडूसा, परवल, नीम तथा बहेड़ेकी छालका
क्वाथ मधुके साथ पीनेसे वातरोग नष्ट हो जाता है।
इस रोगमें निसोत, दन्तीफल (एरण्ड-बीज) तथा
त्रिफलाके योगसे विरेचन-क्रिया भी करनी चाहिये।
काली मिर्चके साथ मनःशिल (मैनसिल)-का
सिद्ध तेल कुष्ठरोगका विनाशक है। सभी प्रकारके
कुष्ठरोगोंमें इस तेलका लेप किया जा सकता है।
इस रोगमें पथ्याहार शिव (हरीतकी), पञ्चाम्ल,
गुड़ और भात है। कंजा-एल (सुगन्धित बालुका
नामक लता), गजपिप्पली तथा कुष्ठ (कूट)-के
रसको गोमूत्रके साथ कुष्ठरोगमें प्रलेप करनेसे
लाभ होता है। तेलमें करवीर (कनेर)-के मूलका
पाकसिद्ध उबटन भी कुष्ठनाशक है। हल्दी, चन्दन,
रास्ना, गुडूची, एडगज (तगर), अमलतास और
करञ्जका लेप कुष्ठविनाशक श्रेष्ठतम औषधि है।
मैनसिल, विडंग, वागुजी (वाकुची), सरसों तथा
कंजाको गोमूत्रमें पीसकर तैयार किया गया लेप
सूर्यदेवके समान कुष्ठरोगका विनाशी है।
विडंग, एडगज, वच, कुटकी, निशा
(दारुहल्दी), समुद्रफेन और सरसोंको गोमूत्र तथा
अम्लमें पीसकर तैयार किया गया यह लेप दद्रु
नामक कुष्ठरोगको विनष्ट करता है। प्रपुन्नाड
(चकवड़)-का बीज, आँवला, सर्जरस (विरोजा
या लाख), स्नुही (सेहुँड) और सौवीर (बेर)-
का पिसा हुआ लेप सभी प्रकारके दद्रुरोगोंको दूर
करनेवाला श्रेष्ठ औषध है। कांजीके साथ
अमलतासकी पत्तियोंका तैयार लेप दद्रु, किट्टिम
तथा सिध्म (सेहुवाँ) नामक कुष्ठोंका विनाश करता
है। वकुचीका उष्ण क्वाथ सेवन करके
दूध पीनेसे भी कुष्ठरोगपर विजय प्राप्त की जा
सकती है। तिल, घृत, त्रिफला, क्षौद्र, व्योष (त्रिकटु),
भिलावा तथा शर्करा—ये सभी सात ओषधियाँ
समान भागमें मिलाकर सेवन करनेसे पुरुषत्वमें
वृद्धि होती है। ये पवित्र और कुष्ठरोग-नाशक हैं।
मधुके सहित विडंग, त्रिफला और काली
तुलसीके चूर्णका अवलेह कुष्ठ, कृमि, मेह, नाड़ीव्रण
एवं भगन्दर नामक रोगोंका विनाश करता है। जो
मनुष्य कुष्ठरोगी हो, उसे हरीतकी, नीम, कुटकी,
आँवला तथा दारुहल्दीका सेवन करना चाहिये।
औषधि लेनेके बाद प्रायः एक मासपर्यन्त ऐसा
व्यक्ति शीघ्र कुष्ठरोगसे विमुक्त हो जाता है, इसमें
कोई संदेह नहीं। उष्ण मक्खन, कुम्भ (गुग्गुल),
मूलक (अदरक), खदिर (कत्था), अक्ष (बहेड़ा),
आँवला तथा चम्पा नामक योगसे भी कुष्ठका
विनाश होता है। यह औषधियोंका एक रसायन है।
* सु० शा० अ० ८