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गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ

११०- प्रतिपदा, तृतीया, चतुर्थी तथा पञ्चमीमें किये जानेवाले विविध तिथिव्रत

कांड ] रम्भातृतीयाव्रत २१९


धान, फल और रस प्रदान करे तथा ब्राह्मणको स्वर्ण और दक्षिणासे युक्त घट प्रदान करे। सात ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये। इस प्रकार वर्षभर अगस्त्यार्घ्यव्रत करनेवाला सभी प्रकारके श्रेयप्राप्तिका अधिकारी हो जाता है।

(अध्याय ११९)


रम्भातृतीयाव्रत

ब्रह्माजीने कहा— अब मैं सौभाग्य, लक्ष्मी तथा पुत्रादिसे सम्पन्न करनेवाले 'रम्भातृतीयाव्रत'को कहूँगा। यह व्रत मार्गशीर्षमासके शुक्लपक्षकी तृतीया तिथिको किया जाता है। इस तिथिको उपवास रखकर व्रती कुशोदक हाथमें लेकर बिल्वपत्रसे महागौरीकी पूजा करे। इस पूजनमें कदम्ब (वृक्ष)-की दतुअनका प्रयोग करना चाहिये, किंतु पौषमासमें मरुबकके पुष्पोंसे पार्वतीके पूजनका विधान है। व्रती इस मासके व्रतमें मात्र कर्पूरका सेवनकर उपवास करता हुआ उन गौरीको कृसर (तिल-चावलका सिद्धान्न)-का नैवेद्य एवं मल्लिकाओंकी दतुअन अर्पित करे।

माघमासमें व्रतके दिन घृतपानकर उपवास करते हुए व्रतीको कल्हारपुष्प (श्वेतकमल)-से सुभद्रादेवीकी पूजा करके उन्हें मण्डका<sup>१</sup> नैवेद्य समर्पित करना चाहिये।

फाल्गुनमासमें गोमतीकी पूजाका विधान है। कुन्दपुष्पसे उनकी पूजा करके उसीकी नालको दतुअनरूपमें उन्हें निवेदित करे और स्वयं जीवा<sup>२</sup> (जीवन्ती)-का भक्षणकर शष्कुली<sup>३</sup> (पूड़ी)-का नैवेद्य लगाये।

चैत्रमासमें भगवती विशालाक्षीको दमनक-पुष्प, तगर<sup>४</sup> काष्ठकी दतुअन और कृसरान्नका नैवेद्य अर्पित करके स्वयं दहीका प्राशन करे। वैशाखमासमें श्रीमुखीदेवीकी पूजा कर्णिकार (कनैल)-के पुष्प, वटवृक्षकी दतुअनसे करनी चाहिये और व्रतीको अशोककलिकाका प्राशन करना चाहिये।

ज्येष्ठमासमें नारायणीदेवीका पूजन शतपर्णी (छितवन)-के पुष्प एवं दतुअनसे होता है। इस पूजामें देवीको खाँड़का नैवेद्य प्रदानकर स्वयं उपासक लौंगका भक्षण करे। आषाढ़मासमें माधवीकी पूजा करनी चाहिये। इस मासमें व्रती तिलका प्राशन करे और भगवती माधवीकी बिल्वपत्रसे पूजाकर खीर और वटक (घृतपक्व मधुर पिष्टक)-का नैवेद्य अर्पित करे। इस पूजनमें देवीके लिये गूलरकी दतुअन प्रदान करनी चाहिये। श्रावणमासमें क्षीरान्न तथा मल्लिकाकी दतुअन देकर तगरके फूलसे श्रीदेवीकी पूजा करनी चाहिये।

भाद्रपदमासमें सिंघाड़ेका आहारकर व्रतीको उत्तमादेवीके लिये गुड़़का नैवेद्य अर्पित करके पद्मपुष्पोंसे पूजा करनी चाहिये।

आश्विनमासमें राजपुत्रीका पूजन जपापुष्पसे करके उन्हें जीरेसे सुवासित अन्नका नैवेद्य अर्पितकर रात्रिमें प्राशन करना चाहिये। कार्तिकमासमें पद्मजादेवीका जाति नामक पुष्प एवं कृसरान्नके नैवेद्यसे पूजन होता है और उपासकको पञ्चगव्यका प्राशन करना चाहिये।


१-मण्ड—अन्न, दधि आदिका सार।
२-जीवा—शाकविशेष, शर्कराके समान मधुर पुष्पवाली लता।
३-तिल, तण्डुल, उड़दके चूर्णसे बना यवागू भी शष्कुलीका अर्थ है।
४-तगर—पुष्पवृक्ष, सितपुष्प, मदनवृक्ष (टगर)।

२२०संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

इस प्रकार मार्गशीर्षसे कार्तिकमासतक वर्षकी समाप्तिपर सपत्नीक ब्राह्मणोंको घृतोदन (घृतमें पका तण्डुल) देकर उनका पूजन करना चाहिये। उसके बाद पार्वती और शिवकी गुड़ आदिसे बने नैवेद्य, वस्त्र, छत्र और सुवर्ण आदिसे पूजा करके गीत-वाद्यादिसे रात्रि-जागरण करते हुए प्रातः गौ आदिका दान देना चाहिये। ऐसा करनेसे व्रतीको सब कुछ प्राप्त हो जाता है। (अध्याय १२०)

चातुर्मास्यव्रतका निरूपण

**ब्रह्माजीने कहा—**अब मैं चातुर्मास्यव्रतको कहता हूँ। इस व्रतका आरम्भ आषाढ़मासकी एकादशी या पूर्णिमा तिथिमें सब प्रकारसे भगवान् हरिका पूजन करके करे। व्रतारम्भके समय इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये—

इदं व्रतं मया देव गृहीतं पुरतस्तव।
निर्विघ्नं सिद्धिमाप्नोतु प्रसन्ने त्वयि केशव॥
गृहीतेऽस्मिन् व्रते देव यद्यपूर्णे म्रियाम्यहम्।
तन्मे भवतु सम्पूर्णं त्वत्प्रसादाज्जनार्दन॥
(१२१।२-३)

हे देव! आपके समक्ष मैंने इस व्रतको ग्रहण किया है। हे केशव! आपके प्रसन्न होनेपर मुझे निर्विघ्न सिद्धि प्राप्त हो। हे देव! ग्रहण किये गये इस व्रतकी अपूर्णतामें ही यदि मैं मृत्युको प्राप्त हो जाता हूँ तो भी हे जनार्दन! आपकी कृपासे यह मेरा व्रत पूर्ण हो।

इस प्रकार हरिका पूजन करके व्रत, पूजन और जपादिका नियम ग्रहण करना चाहिये। जो हरिके व्रतको करनेकी इच्छा करता है, उसके समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। साधक स्नान करके भगवान् हरिका पूजन कर इस पूजा तथा जपादिकी विहित क्रियाओंकी पूर्तिका संकल्प ले तथा आषाढ़ आदि चार मासोंतक एकभक्तव्रत करता हुआ विष्णुकी पूजा करे। ऐसा करनेवाला विष्णुके परम पवित्र निर्मल लोकमें चला जाता है।

मधु, मांस, सुरा और तेलका परित्याग करनेवाला जो वेदपारंगत, कृच्छ्रपादव्रती<sup>१</sup> विष्णुभक्त हरिका पूजन करता है, वह विष्णुलोकको प्राप्त हो जाता है। एक रात्रिका उपवास करनेसे वैमानिक (विमानपर चढ़कर भ्रमण करनेवाला) देवता हो जाता है। तीन रात्रिपर्यन्त उपवास कर षष्ठांश भोजन करनेसे साधकको श्वेतद्वीपकी प्राप्ति होती है। चान्द्रायणव्रत<sup>२</sup> करनेसे तो भगवान् हरिका लोक और मुक्ति बिना माँगे ही मिल जाती है। प्राजापत्यव्रत<sup>३</sup> करनेसे विष्णुलोक तथा पराकव्रत<sup>४</sup> करनेसे हरिकी प्राप्ति होती है।

इस व्रतमें सत्तू, यवान्नकी भिक्षा कर, दूध, दही तथा घृतका प्राशन कर, गोमूत्रयावकका आहार कर, पञ्चगव्यका पान कर अथवा सभी प्रकारके रसोंका परित्याग कर शाक-मूल-फलादिका भक्षण करते हुए जो साधक विष्णुकी भक्ति करता है, वह विष्णुलोकको प्राप्त करता है। (अध्याय १२१)


१-**कृच्छ्रपादव्रत—**यह तीन दिनका व्रत है। पहले दिन दिनमें एक बार हविष्यान्न-ग्रहण, दूसरे दिन अयाचितरूपमें हविष्यान्नका एक बार ग्रहण और तीसरे दिन अहोरात्र उपवास। (याज्ञ०स्मृति, प्राय० श्लोक ३१८)
२-**चान्द्रायणव्रत—**यह व्रत अनेक प्रकारका है। मनु० ११।२१६ के अनुसार यह है—प्रतिदिन तीनों काल स्नान। पूर्णिमासे व्रतका आरम्भ। इस दिन पंद्रह ग्रास हविष्यान्नमात्र ग्रहण। पूर्णिमाके बाद कृष्णपक्षकी प्रतिपदासे एक-एक ग्रास कम करते हुए अर्थात् १४, १३, १२ इस संख्यामें ग्रास ग्रहण करते हुए कृष्णपक्षकी चतुर्दशीको एक ग्रास ग्रहण। तदनन्तर अमावास्याको पूर्ण उपवास। पुनः अमावास्याके बाद शुक्ल प्रतिपदासे एक-एक ग्रास बढ़ाकर १, २, ३ इस क्रममें दूसरी पूर्णिमाको पंद्रह ग्रास ग्रहण। इस प्रकार एक मासमें यह व्रत पूर्ण होता है।
३-**प्राजापत्यव्रत—**यह व्रत बारह दिनका होता है। प्रथम तीन दिन केवल दिनमें हविष्यान्न-ग्रहण। तत्पश्चात् तीन दिन केवल रातमें हविष्यान्न-ग्रहण। तदनन्तर तीन दिन बिना माँगे जो मिल जाय, उतनामात्र एक बार ग्रहण। अन्तिम तीन दिन पूर्णरूपमें उपवास। (मनु० ११।२११)
४-**पराकव्रत—**इस व्रतमें बारह दिनतक केवल जल ग्रहण करके रहा जाता है। (याज्ञ०स्मृति, प्राय० श्लोक ३२०, मनु०११।२१५)

काण्ड ]भीष्मपञ्चकव्रत२२१

मासोपवासव्रतका निरूपण

**ब्रह्माजीने पुनः कहा—**अब मैं आपसे मासोपवास नामक उस सर्वोत्तम व्रतका वर्णन करूँगा, जिसका पालन वानप्रस्थ, संन्यासी और नारीको करना चाहिये।

आश्विनमासके शुक्लपक्षकी एकादशी तिथिमें उपवास रखकर तीस दिनपर्यन्त इस व्रतको धारण करनेका विधान है। व्रतारम्भके समय सर्वप्रथम भगवान् विष्णुसे इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये—

अद्यप्रभृत्यहं विष्णो यावदुत्थानकं तव।
अर्चये त्वामनश्नंस्तु दिनानि त्रिंशदेव तु॥
कार्तिकाश्विनयोर्विष्णो द्वादश्योः शुक्लयोरहम्।
म्रिये यद्यन्तराले तु व्रतभङ्गो न मे भवेत्॥
(१२२। ३-४)

हे विष्णो! आजसे लेकर जबतक आपका शयनोत्थान नहीं हो जाता है, तबतक तीस दिनपर्यन्त बिना भोजन किये ही मैं आपका पूजन करता रहूँगा। हे विष्णो! यदि मैं आश्विन और कार्तिकमासके शुक्लपक्षमें द्वादशीसे लेकर दूसरी द्वादशी तिथिके मध्य मर जाता हूँ तो मेरा यह व्रत भंग न हो।

इस प्रकार प्रार्थना करनेके पश्चात् प्रातः, मध्याह्न तथा संध्याकालमें स्नान करके उपासक गन्धादिसे भगवान् हरिका देवालयमें पूजन करे, किंतु व्रतीको शरीरमें उबटन तथा सुगन्धित गन्धलेप आदि नहीं करना चाहिये।

द्वादशी तिथिमें भगवान् हरिकी पूजा करके व्रती ब्राह्मणोंको भोजन कराये। एक मासतक हरिका व्रत करनेके पश्चात् व्रती पारणा करे। यदि व्रतधारी इस अवधिके मध्य मूर्च्छित हो जाता है तो उसे दुग्धादिका प्राशन कर लेना चाहिये; क्योंकि दुग्धादिका पान करनेसे व्रत विनष्ट नहीं होता। इस प्रकार मासव्रत करनेसे भुक्ति और मुक्ति दोनों प्राप्त होती हैं। (अध्याय १२२)


भीष्मपञ्चकव्रत

**ब्रह्माजीने कहा—**अब मैं कार्तिकमासमें होनेवाले व्रतोंको कहूँगा। इस मासमें स्नान करके व्रतीको भगवान् विष्णुकी पूजा करनी चाहिये। व्रती एक मासतक एकभक्तव्रत कर, नक्तव्रत कर, अयाचितव्रत कर, दुग्ध, फल, शाक आदिका आहार कर अथवा उपवास कर भगवान् विष्णुकी पूजा करे। ऐसा करनेसे वह व्रती सभी पापोंसे मुक्त होकर समस्त कामनाओंके साथ-साथ भगवान् हरिको प्राप्त कर लेता है।

भगवान् हरिका व्रत करना सदैव श्रेष्ठ है, किंतु सूर्यके दक्षिणायनमें चले जानेपर यह व्रत अधिक प्रशस्त होता है। उसके बाद इस व्रतका काल चातुर्मासमें श्रेयस्कर है। तदनन्तर इस व्रतका उचित काल कार्तिकमास है। इसके बाद भीष्मपञ्चक इस व्रतके लिये श्रेष्ठ समय है किंतु कार्तिकमासके शुक्लपक्षकी एकादशी तिथि इस व्रतके शुभारम्भके लिये सर्वश्रेष्ठ काल होता है। अतः इसी तिथिसे इस व्रतका शुभारम्भ करना चाहिये। उपासक इस दिन प्रातः, मध्याह्न एवं सायंकालीन—इन तीनों सन्ध्याओंमें स्नान कर यवादि पदार्थोंसे पितृगण आदिकी नैत्यिक पूजा करनेके पश्चात् भगवान् हरिका पूजन करे। वह मौन होकर घृत, मधु, शर्करादि तथा पञ्चगव्य एवं जलसे हरिकी मूर्तिको स्नान कराये और कर्पूरादि सुगन्धित द्रव्यसे श्रीहरिके शरीरका अनुलेपन करे।

तदनन्तर व्रतीको घृतसमन्वित गुग्गुलसे पूर्णिमापर्यन्त पाँच दिनोंतक श्रीहरिको धूप देना चाहिये और सुन्दर-सुन्दर पक्वान्न तथा मिष्टान्नका