गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
२१६- वैकुण्ठलोकका वर्णन, मरणकालमें और मरणके अनन्तर जीवके कल्याणके लिये विहित विभिन्न कर्तव्योंके बारेमें गरुडजीके द्वारा किये गये प्रश्न, प्रेतकल्पका उपक्रम
काण्ड ] आत्मज्ञाननिरूपण ४३७
आत्मज्ञाननिरूपण
श्रीभगवान् बोले—हे नारद! अब मैं आत्मज्ञानका तात्त्विक वर्णन करूँगा, सुनिये।
अद्वैत तत्त्व ही सांख्य है और उसमें एकचित्तता ही योग है। जो अद्वैत तत्त्व-योगसे सम्पन्न हैं, वे भवबन्धनसे मुक्त हो जाते हैं। अद्वैत तत्त्वका ज्ञान होनेपर अतीत, वर्तमान और भविष्यके सभी कर्म नष्ट हो जाते हैं। ज्ञानी व्यक्ति सद्विचाररूपी कुल्हाड़ीके द्वारा संसाररूपी वृक्षको काटकर ज्ञान-वैराग्यरूपी तीर्थके द्वारा वैष्णव पद प्राप्त करता है। जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति—यह तीन प्रकारकी अवस्था ही माया है जो संसारका मूल है। यह माया जबतक रहती है, तबतक संसार ही सत्यमें अवगत होता है। वास्तवमें शाश्वत अद्वैत तत्त्वमें ही सब कुछ प्रविष्ट है। अद्वैत तत्त्व ही परब्रह्म है। यह परब्रह्म नाम-रूप तथा क्रियासे रहित है। यह ब्रह्म ही इस जगत्की सृष्टि कर स्वयं उसीमें प्रविष्ट हो जाता है।
'मैं मायातीत चित्पुरुषको जानता हूँ और मैं भी आत्मस्वरूप हूँ।' इस प्रकारका ज्ञान ही मुक्तिका मार्ग है। मोक्ष-लाभके लिये इससे अतिरिक्त अन्य कोई भी उपाय नहीं है*। श्रवण, मनन और ध्यान—ये सभी ज्ञानके साधन हैं। यज्ञ, दान, तपस्या, वेदाध्ययन और तीर्थसेवामात्रसे मुक्तिकी प्राप्ति नहीं होती है। मुक्ति किसी मतसे दान-ध्यानसे तथा किसीके मतसे पूजादि कर्मोंसे होती है। 'कर्म करो' और 'कर्मका त्याग करो'—ये दोनों वचन वेदमें मिलते हैं। निष्कामभावसे यज्ञादि कर्म मुक्तिके लिये होते हैं, क्योंकि निष्कामभावसे अनुष्ठित यज्ञादि अन्तःकरणकी शुद्धिके साधन हैं। ज्ञान प्राप्त होनेपर एक ही जन्ममें मुक्ति प्राप्त हो जाती है। द्वैत (भेद)-भाव रखनेपर तो मुक्ति सम्भव ही नहीं है। कुयोगी भी मुक्ति प्राप्त नहीं कर सकते। किसी कारण योगभ्रष्ट होनेपर योगियोंके कुलमें उत्पत्ति हो सकती है। ऐसी स्थितिमें मुक्ति सम्भव है।
कर्मोंसे भवबन्धन और ज्ञान होनेसे जीवकी संसारसे मुक्ति हो जाती है, इसलिये आत्मज्ञानका आश्रय करना चाहिये। जो आत्मज्ञानसे भिन्न ज्ञान हैं, उनको भी अज्ञान कहा जाता है। जब हृदयमें स्थित सभी कामनाएँ समाप्त हो जाती हैं, तब जीव जीवनकालमें ही अमरत्वकी प्राप्ति कर लेता है, इसमें संशय नहीं है—
यदा सर्वे विमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि स्थिताः।
तदाऽमृतत्वमाप्नोति जीवन्नेव न संशयः॥
(२३६। १२)
व्यापक होनेसे ब्रह्म कैसे जाता है, कौन जाता है और कहाँ जाता है? ऐसे प्रश्नोंके लिये कोई अवसर ही नहीं है। अनन्त होनेके कारण उसका कोई देश नहीं है; अतः किसी भी रूपमें उसकी गति नहीं हो सकती। परब्रह्म अद्वय है, अतः उससे भिन्न कुछ भी नहीं है। वह ज्ञानस्वरूप है, अतः उसमें जड़ता कैसे हो सकती है? वस्तुतः ब्रह्म आकाशके समान है, इसलिये उसकी गति, अगति और स्थिति आदिका विचार कैसे हो सकता है? जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति आदि अवस्था मायाके द्वारा कल्पित हैं अर्थात् मिथ्या हैं।
वस्तुमात्रका सार ब्रह्म ही है। तेजोरूप ब्रह्मको एक अखण्ड परम पुण्यरूप समझना चाहिये। जैसे अपनी आत्मा सबको प्रिय है, वैसे ही ब्रह्म सबको प्रिय है क्योंकि आत्मा ही ब्रह्म है। हे महामुने!
* वेदाहमेतं पुरुषं चिद्रूपं तमसः परम्। सोऽहमस्मीति मोक्षाय नान्यः पन्था विमुक्तये॥ (२३६। ६)
| ४३८ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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सभी तत्त्वज्ञ ज्ञानको सर्वोच्च मानते हैं, इसलिये चित्तका आलम्बन बोधस्वरूप आत्मा ही है। यह आत्मविज्ञान है। यह पूर्ण है, शाश्वत है। जागते, सोते तथा सुषुप्तावस्थामें प्राप्त होनेवाला सुख पूर्ण सुखरूप ब्रह्मका ही एक क्षुद्र अंश समझना चाहिये। जैसे एक मृण्मय वस्तुका (ज्ञान होनेपर) समस्त मृण्मय पदार्थ जान लिया जाता है।
सर्वत्र व्यास शाश्वत तत्त्व ज्ञानस्वरूप ब्रह्म यदि सदा सर्वत्र सभीके हृदयमें विद्यमान नहीं है तो विस्मृत अर्थका स्मरण नहीं होना चाहिये पर होता है। ऐसी स्थितिमें यह स्मरण किसको होता है, निश्चित ही चेतन तत्त्वको ही होता है। इसे ही आत्मा, ब्रह्म, परमात्मा आदिके रूपमें स्वीकार किया गया है। चेतनतत्त्वकी सत्ता—अणु, अशरीरी अथवा परम व्यापक तत्त्व—किसी भी रूपमें स्वीकार किया जाय, पर स्वीकार करना ही है; अन्यथा प्राणीको सुख-दुःखका अनुभव नहीं हो सकेगा। चेतनतत्त्व प्राणिमात्रके हृदयमें साक्षीरूपसे सदा विद्यमान है, इसीलिये यह उसकी प्रत्येक चेष्टाको जानता रहता है और इस जानकारीका फल यह है कि प्राणीके शुभाशुभ कर्मका फल यथासमय मिलता रहता है। यह ब्रह्मतत्त्व सत्य, ज्ञान एवं आनन्दरूप है तथा अनन्त है। सत्य ज्ञानसे पृथक् नहीं होता, अनन्ततासे पृथक् आनन्द नहीं है। वास्तवमें प्रत्येक जीव सत्य, आनन्द एवं ज्ञानस्वरूप ब्रह्म ही है। स्वयंको ब्रह्मरूपमें जानकर जीव अपने वास्तविक स्वरूप सर्वज्ञताको प्राप्त कर लेता है। जैसे एक हेममणि (पारस)-से अनन्त लौहराशि हेममय हो जाती है, उसी प्रकार ईश (ब्रह्म)-का ज्ञान होनेपर ज्ञानीके द्वारा सकल विश्व जान लिया जाता है, जैसे अन्धकारदोषके कारण रस्सी अपने सत्यस्वरूपमें नहीं दिखायी देती, वैसे ही व्यामोहसे ग्रस्त जीवको आत्माका दर्शन नहीं होता। जिस प्रकार प्रत्यक्ष होनेपर भी द्रव्य दृष्टि-दोषके कारण सही नहीं दिखायी देता है, अपितु वह कुरूप प्रतीत होता है। उसी प्रकार आकाशकी सरूपताके कारण वह आत्मतत्त्व असत्य एवं पृथक् प्रतीत होता है। जैसे रज्जुमें सर्पका और सीपमें रजतका आभास होता है और मृगमरीचिकामें जलका आभास होता है, उसी प्रकार विष्णुमें जगत्की प्रतीति होती है।
जैसे कोई द्विज ग्रहाविष्ट होनेके कारण 'मैं शूद्र हूँ' ऐसा मानता है और ग्रह-बाधा नष्ट होनेके पश्चात् वही व्यक्ति पुनः ध्यान करता हुआ अपनेको ब्राह्मण मानता है, वैसे ही मायासे आच्छन्न जीव यह 'मैं ही हूँ' ऐसा स्वीकार करता है। मायारूपी अज्ञानके समाप्त हो जानेपर पुनः वह अपने स्वरूपमें 'मैं ही ब्रह्म हूँ' ऐसा मान लेता है। जैसे ग्रहके नाश हो जानेपर उसको माननेवाला प्राणी उसे क्रूर ग्रहके रूपमें देखता है, वैसे ही अपने स्वरूपका दर्शन होनेपर मायाके अभावमें उसकी मायिक पदार्थोंसे विरक्ति हो जाती है।
जैसे संसार-चक्र अनादि है, वैसे ही उसके मूल भगवान्की माया भी अनादि है। इस मायाके सत् और असत् दो रूप हैं। व्यवहार-कालमें वह सत् और परमार्थतः असत् है। मायाके कारण ही अज परमात्मा भी अपनी मायाके आवेशसे जगत्के रूपमें परिणत होता है। मायाकी इच्छासे ही पति-पत्नी आदिके रूपमें यह सम्पूर्ण जगत् कल्पित है। अट्ठाईस तत्त्वोंका यह त्रिगुणात्मक जगत् और चौरासी लाख योनियोंके नर और नारियोंकी आकृति मायाके द्वारा ही रचित है। त्रिगुणात्मक अट्ठाईस तत्त्वोंके रूपमें मायाके द्वारा ही खण्डशः विश्वकी सृष्टि होती है। वस्तुतः नाम, रूप और क्रिया आदि जगत्की सत्ता मध्यमें ही है आदि और अन्तमें नहीं। इसलिये व्यवहार-कालमें सत्य
कांड ] गीतासार ४३९
प्रतीत होनेपर भी परमार्थतः यह मिथ्या है। जिस प्रकार स्वप्नावस्थामें रथ आदिकी सत्ता प्रतीत होती है, किंतु वहाँ उनका अस्तित्व रहता नहीं है। उसी प्रकार जाग्रत्-अवस्थामें भी वे समृद्धियाँ उस प्राणीके पास नहीं रहतीं। परमार्थतः जैसे जाग्रत्-अवस्था और स्वप्न-अवस्थाके पदार्थोंका भावाभाव प्रतीत होता है, वैसे ही मायिक पदार्थ भी व्यवहार और परमार्थमें सत्-असत् हैं। स्वप्न तथा जागृतिकी स्थितिमें ऐसा ही इस परम ब्रह्मका अस्तित्व है, किंतु सुषुप्तावस्थामें प्राणीका चित्त निश्चल होता है। सभी ज्ञानेन्द्रियों एवं कर्मेन्द्रियोंके साथ मन उस आत्माके साथ एकाकारकी स्थितिमें रहता है। अतः उस समय सत्-असत्का कुछ भी ज्ञान प्राणीको नहीं होता। इसी निश्चेष्टताको अचल और अद्वैत पद कहते हैं। ऐसा ही उस ब्रह्मका स्वरूप है।
मायाका अस्तित्व अविचारके कारण ही सिद्ध होता है। किंतु विचार करनेपर वह अस्तित्वहीन है। यह ब्रह्मके समान निरन्तर विद्यमान रहती है, ऐसा नहीं है। यह तो मात्र कल्पना है। इस प्रकार उस असत् मायाका आत्मसम्बन्धके कारण सत्यत्व सिद्ध होता है। जो सत्य होता है उसीका अस्तित्व माना जाता है और अस्तित्वके कारण ही पदार्थकी सत्यता स्वीकार की जाती है।
हे नारद! मैं अनन्त हूँ। मेरा ज्ञान भी अनन्त है। मैं अपनेमें पूर्ण हूँ। आत्माके द्वारा अनुभूत अन्तःसुख मैं ही हूँ। सात्त्विक, राजस और तामस गुणसे सम्बन्धित भावोंसे मैं नित्य परे रहता हूँ। मेरी उत्पत्ति अशुद्धतासे नहीं हुई है। मैं शुद्ध हूँ। मैं तो अमृतस्वरूप हूँ। मैं ही ब्रह्म हूँ। मैं प्राणियोंके हृदयमें प्रज्वलित वह ज्योति हूँ, जो दीपकके समान उनके अज्ञानरूपी अन्धकारको विनष्ट करती रहती है। यह आत्मज्ञानकी स्थिति है।
(अध्याय २३६)
गीतासार
श्रीभगवान्ने कहा— [हे नारद!] अब मैं गीताका सारतत्त्व कहूँगा, जिसे मैंने पूर्वमें अर्जुनको सुनाया था।
अष्टाङ्गयोगयुक्त और वेदान्तपारङ्गत मनुष्योंके लिये आत्म-कल्याण सम्भव है। आत्म-कल्याण ही परम कल्याण है, उस आत्मज्ञानसे उत्कृष्ट और कुछ भी लाभ नहीं है। आत्मा देहरहित, रूप आदिसे हीन, इन्द्रियोंसे अतीत है। मैं आत्मा हूँ, संसारादि सम्बन्धके कारण मुझे किसी प्रकारका दुःख नहीं है। धूमरहित प्रज्वलित अग्निशिखा जैसे प्रकाश प्राप्त करती है, वैसे ही आत्मा स्वयं प्रदीप्त रहता है। जैसे आकाशमें विद्युत्-अग्निका प्रकाश होता है, वैसे ही हृदयमें आत्माके द्वारा आत्मा प्रकाशित होता है। श्रोत्र आदि इन्द्रियोंको किसी प्रकारका ज्ञान नहीं है। वे स्वयंको भी नहीं जान सकती हैं, परंतु सर्वज्ञ, सर्वदर्शी, क्षेत्रज्ञ आत्मा ही इन्द्रियोंका दर्शन करता है। जब आत्मा उज्ज्वल प्रदीपके समान हृदयपटलपर प्रकाशित होता है, तब पुरुषोंका पापकर्म नष्ट हो जाता है और ज्ञान उत्पन्न हो जाता है।
जैसे दर्पणमें दृष्टि डालनेपर अपने द्वारा अपनेको देख सकते हैं, वैसे ही आत्मामें दृष्टि करनेपर इन्द्रियोंको, इन्द्रियोंके विषयोंको तथा पञ्चमहाभूतोंका दर्शन किया जा सकता है। मन, बुद्धि, अहंकार और अव्यक्त पुरुष—इन सभीके ज्ञानके द्वारा संसार-बन्धनसे मुक्त हो जाना चाहिये। सभी
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इन्द्रियोंका मनमें अभिनिवेश कर उस मनको अहंकारमें स्थापित करना चाहिये। उस अहंकारको बुद्धिमें, बुद्धिको प्रकृतिमें, प्रकृतिको पुरुषमें एवं पुरुषको परब्रह्ममें विलीन करना चाहिये। इस प्रकार करनेसे ही 'मैं ब्रह्म हूँ' इस प्रकारकी ज्ञान-ज्योतिका प्रकाश होता है। इससे वह पुरुष मुक्त हो जाता है। नौ द्वारोंसे युक्त, तीनों गुणोंके आश्रय तथा आकाश आदि पञ्चभूतात्मक और आत्मासे अधिष्ठित इस शरीरको जो ज्ञानी व्यक्ति जान लेता है, वही श्रेष्ठ है और वही क्रान्तदर्शी है। सौ अश्वमेध या हजारों वाजपेय यज्ञ इस ज्ञानयज्ञके सोलहवें अंशके फलको भी प्रदान नहीं कर सकते। (अध्याय २३७)
गीतासार
श्रीभगवान्ने पुनः कहा— हे अर्जुन! यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, ध्यान, धारणा तथा समाधि—यह अष्टाङ्गयोग मुक्तिके लिये कहा गया है। शरीर, मन और वाणीको सदा सभी प्राणियोंकी हिंसासे निवृत्त रखना चाहिये; क्योंकि अहिंसा ही परम धर्म है और उसीसे परम सुख मिलता है—
कर्मणा मनसा वाचा सर्वभूतेषु सर्वदा॥
हिंसाविरामको धर्मो ह्यहिंसा परमं सुखम्। (२३८।२-३)
सदा सत्य और प्रिय वचन बोलना चाहिये। कभी भी अप्रिय सत्य नहीं बोलना चाहिये, प्रिय-मिथ्या वचन भी नहीं बोलना चाहिये, यही सनातनधर्म है—
सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयान्न ब्रूयात् सत्यमप्रियम्।
प्रियं च नानृतं ब्रूयादेष धर्मः सनातनः॥ (२३८।४)
चोरीसे या बलपूर्वक दूसरेके द्रव्यका अपहरण करना स्तेय है। इसके विपरीत आचरण करना अर्थात् कभी भी चोरी न करना अस्तेय है। स्तेय-कार्य (चोरी) कभी भी नहीं करना चाहिये, क्योंकि अस्तेय (चोरी न करना) ही धर्मका साधन है—
यच्च द्रव्यापहरणं चौर्याद्वाथ बलेन वा।
स्तेयं तस्यानाचरणमस्तेयं धर्मसाधनम्॥ (२३८।५)
सदा और सभी अवस्थामें कर्म, मन और वाणीके द्वारा मैथुनका परित्याग करना चाहिये। इसीको ब्रह्मचर्य कहा जाता है। आपत्तिकालमें भी इच्छापूर्वक द्रव्यका ग्रहण न करना ही अपरिग्रह है। प्रयत्नपूर्वक परिग्रहका परित्याग करना चाहिये। शौच दो प्रकारके हैं—बाह्य और आभ्यन्तर। मृत्तिका और जल आदिके द्वारा बाह्य एवं भाव-शुद्धिके द्वारा आभ्यन्तर शौच होता है। यदृच्छालाभ अर्थात् अनायास-प्राप्तिसे संतुष्ट होना ही संतोष है। यह संतोष ही सभी प्रकारके सुखका साधन है। मन और इन्द्रियोंकी जो एकाग्रता है, वही परम तप है। कृच्छ्र और चान्द्रायण आदि व्रतोंके द्वारा देहका शोषण भी तपस्या है। पुरुषोंकी सत्त्वशुद्धिके लिये जो वेदान्त, शतरुद्रीयका पाठ और 'ॐ'कार आदिका जप है, पण्डितजन उसे स्वाध्याय कहते हैं।
कर्म, मन और वाणीसे हरिकी स्तुति, नाम-स्मरण, पूजादि कार्य और हरिके प्रति अनिश्चला भक्तिको ही ईश्वरका चिन्तन कहा जाता है। स्वस्तिकासन, पद्मासन और अर्धसन आदि आसन कहे गये हैं। अपने शरीरगत वायुका नाम प्राण है। उस वायुके निरोधको प्राणायाम कहा जाता है। हे पाण्डव! इन्द्रियाँ असद्विषयोंमें विचरण करती हैं। उनको विषयोंसे निवारित करना चाहिये।