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गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ

२४०- बालकोंकी अन्त्येष्टिक्रियाका स्वरूप, सत्पुत्रकी महिमा तथा औरस और क्षेत्रज आदि पुत्रोंद्वारा अन्त्येष्टि करनेका फल

प्रेतकल्प ] प्रेतयोनि दिलानेवाले निन्दित कर्म ५२९


विश्वास न हो रहा हो, कुछ ज्योतिषी पीड़ाको प्रेतजन्य कहते हों, कभी भी मनुष्यको प्रेत स्वप्नमें न दिखायी दे, उसकी कोई चेष्टा न होती हो तो उस समय मनुष्यको क्या करना चाहिये ? उस उपायको मुझे बतायें।

श्रीभगवान्ने कहा— हे खगराज ! पृथ्वीके देवता ब्राह्मण जो कुछ भी कहते हैं, उस वचनको हृदयसे सत्य समझकर भक्ति-भावपूर्वक पितृभक्तिनिष्ठ हो पुरश्चरणपूर्वक नारायणबलि करके जप, होम तथा दानसे देह-शोधन करना चाहिये। उससे समस्त विघ्न नष्ट हो जाते हैं। यदि वह प्राणी भूत, प्रेत, पिशाच अथवा अन्य किसीसे पीड़ित होता है तो उसको अपने पितरोंके लिये नारायणबलि करनी चाहिये। ऐसा कर वह सभी प्रकारकी पीड़ाओंसे मुक्त हो जाता है। यह मेरा सत्य वचन है। अतः सभी प्रयत्नोंसे पितृभक्तिपरायण होना चाहिये।

नवें या दसवें वर्ष अपने पितरोंके निमित्त प्राणीको दस हजार गायत्री-मन्त्रोंका जप करके दशांश होम करना चाहिये। नारायणबलि करके वृषोत्सर्गादि क्रियाएँ करनी चाहिये। ऐसा करनेसे मनुष्य सभी प्रकारके उपद्रवोंसे रहित हो जाता है, समस्त सुखोंका उपभोग करता है तथा उत्तम लोकको प्राप्त करता है और उसे जाति-प्राधान्य प्राप्त होता है। इस संसारमें माता-पिताके समान श्रेष्ठ अन्य कोई देवता नहीं है। अतः सदैव सम्यक् प्रकारसे अपने माता-पिताकी पूजा करनी चाहिये। हितकर बातोंका उपदेष्टा होनेसे पिता प्रत्यक्ष देवता है। संसारमें जो अन्य देवता हैं वे शरीरधारी नहीं हैं—

पितृमातृसमं लोके नास्त्यन्यद्दैवतं परम्।
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन पूजयेत् पितरौ सदा॥
हितानामुपदेष्टा हि प्रत्यक्षं दैवतं पिता।
अन्या या देवता लोके न देहप्रभवो हि ताः ॥ (२१।२८-२९)

प्राणियोंका शरीर ही स्वर्ग एवं मोक्षका एकमात्र साधन है। ऐसा शरीर जिसके द्वारा प्राप्त हुआ है, उससे बढ़कर पूज्य कौन है ?

हे पक्षिन् ! ऐसा विचार करके मनुष्य जो-जो दान देता है उसका उपभोग वह स्वयं करता है, ऐसा वेदविद् विद्वानोंका कथन है। पुन्नामका जो नरक है उससे पिताकी रक्षा पुत्र करता है। उसी कारणसे इस लोक और परलोकमें उसे पुत्र कहा जाता है—

पुन्नामनरकाद्यस्मात् पितरं त्रायते सुतः।
तस्मात् पुत्र इति प्रोक्त इह चापि परत्र च॥ (२१।३२)

हे खगराज ! किसीके माता-पिताकी अकालमृत्यु हो जाय तो उसे व्रत, तीर्थ, वैवाहिक माङ्गलिक कार्य संवत्सरपर्यन्त नहीं करना चाहिये। जो मनुष्य प्रेत-लक्षण बतानेवाले इस स्वप्नाध्यायका अध्ययन अथवा श्रवण करता है, वह प्रेतका एक चिह्न नहीं देखता है। (अध्याय २१)


प्रेतयोनि दिलानेवाले निन्दित कर्म, पञ्चप्रेतोपाख्यान तथा प्रेतत्वप्राप्ति न करानेवाले श्रेष्ठ कर्म

श्रीगरुड़ने कहा— हे प्रभो ! प्रेतोंकी उत्पत्ति कैसे होती है ? वे कैसे चलते हैं ? उनका कैसा रूप और कैसा भोजन होता है ? वे किस प्रकार प्रसन्न होते हैं और उनका कहाँ निवास होता है? हे प्रसन्नचित्त देवेश ! कृपा कर मेरे इन प्रश्नोंका समाधान करें।

श्रीभगवान्ने कहा— हे पक्षिराज ! सुनो। जो पूर्वजन्मसंचित कर्मके अधीन रहकर पापकर्ममें

५३०संक्षिप्त गरुडपुराण[ धर्मकाण्ड-

अनुरक्त रहते हैं, वे मृत्युके पश्चात् प्रेतयोनिमें जन्म लेते हैं। जो मनुष्य बावली, कूप, जलाशय, उद्यान, देवालय, प्याऊ, घर, आम्रादिक फलदार वृक्ष, रसोईघर, पितृ-पितामहके धर्मको बेच देता है, वह पापका भागी होता है। ऐसा व्यक्ति मरनेके बाद प्रलयकालतक प्रेतयोनिमें रहता है। जो लोग लोभवश गोचारणकी भूमि, ग्रामकी सीमा, जलाशय, उपवन और गुफाभागको जोत लेते हैं, वे प्रेत होते हैं।<sup>१</sup> पापियोंकी मृत्यु चण्डाल, जल, सर्पदंश, ब्राह्मण-शाप, विद्युत्-निपात, अग्नि, दन्त-प्रहार तथा पशुके आक्रमणसे होती है। जो लोग फाँसी लगानेसे, विषद्वारा और शस्त्रसे मरते हैं, जो आत्मघाती हैं, जिनकी विषूचिका (हैजा) आदि रोगोंसे मृत्यु होती है, जो क्षयादिक महारोग, पापजन्य रोग और चोर-डकैतोंके द्वारा मारे जाते हैं, जिनका मरनेपर संस्कार नहीं हुआ है, विहित आचारसे रहित, वृषोत्सर्गादिसे रहित और मासिक पिण्डदान जिनका लुप्त हो गया है, जिस मरे हुए प्राणीके लिये तृण, काष्ठ, हविष्य तथा अग्नि शूद्र लाता है, पर्वतों अथवा दीवालके ढहनेसे जिनकी मृत्यु हो जाती है, निन्दित दोषोंसे जिनकी मृत्यु होती है, जिनकी मृत्यु भूमिमें नहीं होती, जिनकी मृत्यु अन्तरिक्षमें होती है, जो भगवान् विष्णुका स्मरण न करते हुए मर जाते हैं, जिनकी मृत्यु सूतक और श्वानादि निकृष्ट योनियोंके संसर्गमें होती है, वे प्रेतयोनिमें जाते हैं।<sup>२</sup> इसी प्रकारके अन्य कारणोंसे जो प्राणी दुर्मृत्युको प्राप्त होते हैं, उनको प्रेतयोनिमें मरुस्थल प्रदेशमें भटकना पड़ता है।

हे तार्क्ष्य ! जो व्यक्ति निर्दोष माता, बहन, पत्नी, पुत्रवधू तथा कन्याका परित्याग करता है, वह निश्चित ही प्रेत होता है। जो भ्रातृद्रोही, ब्रह्मघाती, गोहन्ता, मद्यपी, गुरुपत्नीके साथ सहवास करनेवाला, स्वर्ण और रेशमका चोर है, वह प्रेतत्वको प्राप्त होता है। घरमें रखी हुई धरोहरका अपहारक, मित्रद्रोही, परस्त्रीरत, विश्वासघाती एवं क्रूर व्यक्ति अवश्य प्रेतयोनिमें जन्म लेता है। जो वंशपरम्परागत धर्मपथका परित्याग करके दूसरे धर्मको स्वीकार करनेवाला है, विद्या और सदाचारसे जो विहीन है, वह भी निस्संदेह प्रेत ही होता है।<sup>३</sup>

हे सुव्रत ! इस विषयमें एक प्राचीन इतिहास है, जो पितामह भीष्म और युधिष्ठिरके संवादमें कहा गया था। मैं उसीको कहता हूँ, उसे सुन करके मनुष्य सुख प्राप्त करता है।

युधिष्ठिरने कहा—हे पितामह ! प्राणी किस कर्मफलसे प्रेत होता है ? उसकी कैसे और किस उपायसे मुक्ति होती है ? इस बातको आप मुझे बतानेकी कृपा करें, जिसको सुन करके मैं पुनः


१-पापकर्मरता ये वै पूर्वकर्मवशानुगाः। जायन्ते ते मृताः प्रेतास्ताञ्छृणुष्व वदाम्यहम् ॥
वापीकूपतडागांश्च आरामं सुरमन्दिरम् । प्रपां सद्म सुवृक्षांश्च तथा भोजनशालिकाः ॥
पितृपैतामहं धर्मं विक्रीणाति स पापभाक् । मृतः प्रेत्वमाप्नोति यावदाभूतसम्प्लवम् ॥
गोचरं ग्रामसीमां च तडागारामगह्वरम् । कर्षयन्ति च ये लोभात् प्रेतास्ते वै भवन्ति हि ॥ (२२। ३—६)
२- असंस्कृतप्रमीता ये विहिताचारवर्जिताः ॥
वृषोत्सर्गादिलुप्ताश्च लुप्तमासि कपिण्डकाः । यस्यानयति शूद्रोऽग्निं तृणकाष्ठहवींषि सः ॥
पतनात् पर्वतानां च भित्तिपातेन ये मृताः। रजस्वलादिदोषैश्च न च भूमौ मृताश्च ये ॥
अन्तरिक्षे मृता ये च विष्णुस्मरणवर्जिताः। सूतकैः श्वादिसम्पर्कैः प्रेतभावा इह क्षितौ ॥ (२२। ९—१२)
३-मातरं भगिनीं भार्यां स्नुषां दुहितरं तथा। अदुष्टदोषां त्यजति स प्रेतो जायते ध्रुवम् ॥
भ्रातृध्रुग्ब्रह्महा गोघ्नः सुरापो गुरुतल्पगः । हेमक्षौमहरस्तार्क्ष्य स वै प्रेतत्वमाप्नुयात् ॥
न्यासापहर्ता मित्रध्रुक् परदाररतस्तथा। विश्वासघाती क्रूरस्तु स प्रेतो जायते ध्रुवम् ॥
कुलमार्गांश्च संत्यज्य परधर्मरतस्तथा। विद्यावृत्तविहीनश्च स प्रेतो जायते ध्रुवम् ॥ (२२ । १४—१७)

प्रेतकल्प ] प्रेतयोनि दिलानेवाले निन्दित कर्म ५३१


भ्रमित न हो सकूँ।

भीष्मने कहा—हे वत्स! मनुष्यको जैसे प्रेतयोनि प्राप्त होती है, वह जैसे उस योनिसे मुक्त होता है, जैसे वह दुस्तर घोर नरकमें जाता है, नरकमें जाकर दुःख झेल रहे प्राणियोंको जिसका नाम, गुण, कीर्तन और श्रवण करनेसे मुक्ति प्राप्त होती है, वह सब मैं तुम्हें बता रहा हूँ।

हे पुत्र! ऐसा सुना जाता है कि प्राचीनकालमें एक ख्यातिलब्ध संतसक नामक सुव्रत तपस्वी ब्राह्मण वनमें रहता था। दयावान्, योगयुक्त, स्वाध्यायरत, अग्निहोत्री उस द्विजश्रेष्ठका समय सदैव यज्ञादिक धार्मिक कृत्योंमें बीतता था। परलोकका भय उसे बहुत था, अतः ब्रह्मचर्य, सत्य, शौचका पालन करते हुए और निर्मलचित्त होकर वह तपस्यामें संलग्न रहता था। श्रद्धापूर्वक गुरुके उपदेश, अतिथि-पूजन तथा आत्मतत्त्वके चिन्तनमें अनुरक्त वह तपस्वी सांसारिक द्वन्द्वोंसे रहित था। इस संसारको जीतनेकी इच्छासे योगाभ्यासमें सदैव अपनेको वह समर्पित रखता था। इस प्रकारका आचरण करते हुए उस जितेन्द्रिय मुमुक्षु ब्राह्मणको वनमें ही बहुत-से वर्ष बीत गये। एक दिन तपस्वी संतसकके मनमें तीर्थाटनकी इच्छा उत्पन्न हुई। उसने मनमें यह संकल्प किया कि अब मैं तीर्थोंके पवित्र जलसे इस शरीरको पवित्र बनाऊँगा, अनन्तर वह स्नान तथा जप-नमस्कारादि कृत्योंको सम्पन्न कर सूर्योदय होनेपर वह तीर्थ-यात्रापर निकल पड़ा।

चलते-चलते वह महातपस्वी ब्राह्मण मार्ग भूल गया। भ्रान्त मार्गमें चलते हुए उसे अत्यन्त भयानक पाँच प्रेत दिखायी पड़े। उस निर्जन वनमें विकृत शरीरवाले भयंकर प्रेतोंको देखकर ब्राह्मणका हृदय कुछ भयभीत हो उठा। अतः वहींपर खड़े होकर वह विस्फारित नेत्रोंसे उसी ओर देखता रहा। तत्पश्चात् ब्राह्मणने अपने भयको दूरकर धैर्यका सहारा लिया और मधुर भाषामें पूछा—'हे विकृत मुखवालो! तुम सब कौन हो? कैसा पापकर्म तुम लोगोंने किया है, जिसके फलस्वरूप तुम्हें यह विकृति प्राप्त हुई है? तुम सब कहाँ जानेका निश्चय कर रहे हो?'

प्रेतराजने कहा—हे द्विजश्रेष्ठ! हम सभीने अपने-अपने कर्मके कारण प्रेतयोनिको प्राप्त किया है। परद्रोहमें रत होनेके कारण हम पाप और मृत्युके वशमें हुए। नित्य भूख-प्याससे पीड़ित रहकर यह प्रेत-जीवन बिता रहे हैं। हम लोगोंकी वाणी उसी पापसे विनष्ट हुई है, शरीर कान्तिहीन हो गया है, हम संज्ञाहीन और विकृत चित्तवाले हो गये हैं। हे तात! हमें दिशाओं तथा विदिशाओंका कोई ज्ञान नहीं है। पाप-कर्मसे पिशाच बने हुए हम मूढ़ प्राणी कहाँ जा रहे हैं, इसका भी ज्ञान हमें नहीं है। हम लोगोंके न माता हैं और न पिता हैं। अपने कर्मोंके फलस्वरूप, अत्यन्त दुःखदायी यह प्रेतयोनि हम सभीको प्राप्त हुई है। हे ब्रह्मन्! आपके दर्शनसे हम लोग अत्यधिक प्रसन्न हैं। आप मुहूर्तभर रुकें। आपसे हम अपना सम्पूर्ण वृत्तान्त प्रारम्भसे कहेंगे। उनमेंसे एक प्रेतने कहा—

हे विप्रदेव! मेरा नाम पर्युषित है, यह दूसरा सूचीमुख है, तीसरा शीघ्रग, चौथा रोधक और पाँचवाँ लेखक है।

ब्राह्मणने कहा—हे प्रेत! प्राणीको कर्मफलानुसार प्रेतयोनि मिलती है यह तो ठीक बात है, पर अपने जो नाम तुम बताते हो, उसके प्राप्त होनेका क्या कारण है?

प्रेतराजने कहा—हे द्विजश्रेष्ठ! मैंने सदैव सुस्वादु भोजन किया और ब्राह्मणको बासी अन्न दिया है, इस कारण मेरा नाम पर्युषित (बासी) है। भूखे ब्राह्मणकी याचनाको सुनकर यह शीघ्र ही वहाँसे