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गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ

१११-षष्ठी तथा सप्तमीके विविध व्रत

२२२ संक्षिप्त गरुडपुराण [ आचार-

नैवेद्य अर्पितकर 'ॐ नमो वासुदेवाय' इस मन्त्रका एक सौ आठ बार जप करना चाहिये।

तत्पश्चात् स्वाहायुक्त अष्टाक्षर-मन्त्र (ॐ नमो वासुदेवाय)-से घृतसहित चावल तथा तिलकी आहुति प्रदान करनी चाहिये।

व्रती पहले दिन कमलपुष्पसे भगवान् हरिके दोनों चरणोंका पूजन करे। दूसरे दिन बिल्वपत्रसे उनके जानु (जंघा)-प्रदेशकी पूजाकर तीसरे दिन गन्धसे नाभिदेशकी पूजा करे। चौथे दिन बिल्वपत्र तथा जवापुष्पसे उनके स्कन्धभागका पूजन करके पाँचवें दिन मालतीके पुष्पोंसे उनके शिरोभागका पूजन करना चाहिये। व्रती भूमिपर ही शयन करे और उक्त पाँच दिनोंतक क्रमशः पहले दिन गोमय, दूसरे दिन गोमूत्र, तीसरे दिन दही, चौथे दिन दुग्ध और पाँचवें दिन घृत—इन पाँचों पदार्थोंसे निर्मित पञ्चगव्यका प्राशन रात्रिमें करे। ऐसा व्रत करनेवाला व्रती भोग और मोक्ष दोनोंका अधिकारी हो जाता है।

कृष्ण एवं शुक्ल दोनों पक्षोंकी एकादशीका व्रत हमेशा करना चाहिये। यह व्रत उस समस्त पापसमूहका विनाश करता है, जो प्राणीको नरक देनेवाला है। यह व्रतीको सभी अभीष्ट फल प्रदान करता है और अन्त समयमें उसे विष्णुलोक भी दे देता है।

पहले दिन शुद्ध एकादशी, दूसरे दिन शुद्ध द्वादशी तथा द्वादशीकी निशा (रात्रि)-के अन्तमें अर्थात् तीसरे दिन त्रयोदशी हो तो ऐसी एकादशी तिथिमें सदा श्रीहरिका संनिधान रहता है। यदि दशमी और एकादशी तिथि एक ही दिन होती है तो इसमें असुरोंका निवास रहता है। अतः यह एकादशी व्रतके लिये उपयुक्त नहीं मानी जाती। एकादशीको उपवासकर द्वादशीमें पारणा करनी चाहिये। सूतक (वंशमें किसीकी उत्पत्ति) और मृतक (वंशमें किसीके मरण)-की स्थितिसे होनेवाले अशौचकालमें भी यह व्रत करना चाहिये।

हे मुने! यदि चतुर्दशी और प्रतिपदा तिथि पूर्व तिथिसे विद्ध है तो इन तिथियोंमें भी उपवास करना चाहिये।

प्रतिपदासे मिश्रित पौर्णमासी और अमावास्या तिथि, तृतीयासे मिश्रित द्वितीया तिथि, चतुर्थीसे संगत तृतीया तिथि, तृतीयासे युक्त चतुर्थी तिथिको उपवास करे। षष्ठीसे असंयुक्त पञ्चमी तिथि और षष्ठीसे युक्त सप्तमी तिथिको उपवास किया जाना चाहिये।
(अध्याय १२३)

शिवरात्रिव्रतकथा तथा व्रत-विधान

**ब्रह्माजीने कहा—**अब मैं शिवरात्रिव्रत और उस कथाका वर्णन करूँगा, जो व्रत करनेवालोंकी समस्त अभीष्ट कामनाओंको पूर्ण करनेमें समर्थ है। जैसे पूर्वकालमें पार्वती ने भगवान् महेश्वर शिवसे इस परमश्रेष्ठ व्रतको सुननेकी इच्छा की थी और सुना था, वैसे ही आप भी सुनें।

**भगवान् महेश्वरने कहा—**हे गौरि! माघ और फाल्गुन-मासके मध्यमें जो कृष्णा चतुर्दशी होती है, उस चतुर्दशी तिथिमें उपवास तथा जागरण करनेसे और भगवान् रुद्रकी पूजा करनेसे पूजित रुद्र भुक्ति और मुक्ति दोनों प्रदान करते हैं। जिस प्रकार द्वादशी तिथिको विष्णुकी पूजा होती है, उसी प्रकार कामनासे युक्त होकर इस चतुर्दशी तिथिमें महादेव हरकी पूजा करनी चाहिये। उपवाससहित विधि-विधानसे पूजित शिव विष्णुके समान भक्तको नरकभोगसे बचाते हैं। शिवरात्रिव्रतकी कथा इस प्रकार है—

बहुत पहले अर्बुद देशमें एक सुन्दरसेन नामक

काण्ड ] शिवरात्रिव्रतकथा तथा व्रत-विधान २२३


पापात्मा निषाद राजा रहता था। वह एक बार अपने कुत्तोंको साथ लेकर आखेट करनेके लिये वनमें गया, किंतु दैववशात् उस पर्वतीय वनप्रान्तमें उसको कोई भी मृगादि जीव आखेटरूपमें प्राप्त नहीं हो सका। भूख-प्याससे पीड़ित वह रात्रिमें जलाशय और तडागोंके तटपर अवस्थित वृक्ष-लताओंके झुरमुटोंमें भटकता हुआ जागता ही रह गया। वहींपर उसे एक शिवलिंगका दर्शन हुआ। अतः उसने अपने शरीरकी रक्षाके लिये एक वृक्षकी शरण ली और निढाल होकर वहीं गिर गया, किंतु उसकी जानकारीके बिना शिवलिंगपर वृक्षके पत्ते गिर पड़े। उसने उन पत्तोंको हटाकर जलसे उस शिवलिंगके ऊपर स्थित धूलिको दूर करनेके लिये शिवलिंगको प्रक्षालित किया। प्रमादवश उसी समय शिवलिंगके पास ही उसके हाथसे एक बाण छूटकर भूमिपर गिर गया। अतः घुटनोंको भूमिपर टेककर एक हाथसे शिवलिंगको स्पर्श करते हुए उसने उस बाणको उठा लिया। इस प्रकार उस व्याधके द्वारा रात्रि-जागरण, शिवलिंगका स्नान, स्पर्श और पूजन भी हो गया।

प्रातःकाल होनेपर वह व्याध अपने घर चला गया और पत्नीके द्वारा दिये गये भोजनको ग्रहणकर क्षुधासे निवृत्त हुआ। यथोचित समयपर उसकी मृत्यु हुई तो यमराजके दूत उसको पाशमें बाँधकर जब यमलोक ले जाने लगे, तब मेरे गणोंने उन यमदूतोंको युद्धमें जीतकर व्याधको उसके पाशसे मुक्त करा दिया। अतः अपने कुत्तोंके साथ निष्पाप होकर वह व्याध मेरा पार्षद बन गया।

इस प्रकार प्राणीके द्वारा अज्ञानवश अथवा ज्ञानपूर्वक किये गये पुण्य अक्षय ही होते हैं। उपासकको चाहिये कि त्रयोदशी तिथिमें शिवका पूजन करे तथा व्रतका नियम ग्रहण करते हुए इस प्रकार प्रार्थना करे—

प्रातर्देव चतुर्दश्यां जागरिष्याम्यहं निशि।
पूजां दानं तपो होमं करिष्याम्यात्मशक्तितः॥
चतुर्दश्यां निराहारो भूत्वा शम्भो परेऽहनि।
भोक्ष्येऽहं भुक्तिमुक्त्यर्थं शरणं मे भवेश्वर॥
(१२४।१२-१३)

हे देव! मैं रात्रिभर जागरण करूँगा। प्रातः चतुर्दशी तिथिमें यथासामर्थ्य आपकी पूजा, दान और हवन भी करूँगा। हे शम्भो! चतुर्दशी तिथिमें निराहार रहकर दूसरे दिन भोजन करूँगा। हे महादेव! भुक्ति और मुक्तिकी प्राप्तिके लिये मैं आपकी शरणमें हूँ।

व्रतीको पञ्चामृतसे महादेवको स्नान कराकर 'ॐ नमो नमः शिवाय' इस मन्त्रसे उनकी पूजा करनी चाहिये। तदनन्तर घृतसमन्वित तिल, तण्डुल एवं व्रीहिसे निर्मित चरुकी आहुति अग्निमें देकर पूर्णाहुति करे। व्रती गीतवाद्यके साथ सत्कथाओंका श्रवण करे। उसके बाद वह अर्धरात्रि, तीसरे प्रहर और चौथे प्रहरमें पुनः उनकी पूजाकर मूलमन्त्रका जप करे। तत्पश्चात् प्रातःकाल आ जानेपर उनके सामने इस प्रकार क्षमा-प्रार्थना करे—

अविघ्नेन व्रतं देव त्वत्प्रसादान्मयार्चितम्।
क्षमस्व जगतां नाथ त्रैलोक्याधिपते हर॥
यन्मयाद्य कृतं पुण्यं यद्द्रव्यस्य निवेदितम्।
त्वत्प्रसादान्मया देव व्रतमद्य समापितम्॥
प्रसन्नो भव मे श्रीमन् गृहं प्रति च गम्यताम्।
त्वदालोकनमात्रेण पवित्रोऽस्मि न संशयः॥
(१२४।१७-१९)

हे देव! हे नाथ! हे त्रैलोक्याधिपति स्वामिन् शिव! आपकी कृपासे मैं व्रतको निर्विघ्न सम्पन्न कर सका हूँ और आपकी यह पूजा भी पूर्ण हो सकी है। आप मुझे क्षमा करें। हे देव! मैंने जो कुछ आज पुण्य किया है, भगवान् रुद्रको जो कुछ निवेदित किया है, वह सब आपकी कृपासे ही