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गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ

११४- अशोकाष्टमी, महानवमी तथा नवमीके अन्य व्रत और ऋष्येकादशीव्रत-माहात्म्य

काण्ड ] भीमा-एकादशीव्रत एवं माहात्म्य तथा पूजन-विधि २२५

विष्णुमण्डल-पूजाविधि

ब्रह्माजीने कहा—जिस पूजाको करनेसे लोग परमगतिको प्राप्त हो गये हैं, मैं उसी भुक्ति एवं मुक्ति देनेमें समर्थ श्रेष्ठ पूजाका विधिवत् वर्णन करूँगा।

व्रतीको सर्वप्रथम एक सामान्य पूजामण्डलका निर्माण कर द्वारदेशसे उसमें पूजा प्रारम्भ करनी चाहिये। मण्डलके द्वारदेशमें धाता, विधाता और महानदी गङ्गा, यमुनाकी पूजा करनी चाहिये। तदनन्तर द्वारदेशपर ही श्री, दण्ड, प्रचण्ड और वास्तुपुरुषकी पूजाकर मध्यभागमें आधारशक्ति, कूर्मदेव एवं अनन्तका पूजन करे। इसके बाद पूजक पृथिवी, धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य, अधर्म, अज्ञान, अवैराग्य, अनैश्वर्यकी पूजा कन्द, नाल, पद्म, कर्णिका तथा केसरादि भागोंपर करे। तदनन्तर सत्त्व, रजस् और तमस् गुणोंकी पूजा करके उस व्रतीको यथाविहित स्थानपर सूर्यादि ग्रहमण्डलोंकी और विमलादि शक्तियोंकी भी पूजा करनी चाहिये।

इसके बाद मण्डलके कोणभागमें दुर्गा, गणेश, सरस्वती और क्षेत्रपाल देवोंकी तथा आसन और मूर्तिकी पूजा कर व्रती भगवान् वासुदेव और बलभद्रका स्मरण करता हुआ महात्मा अनिरुद्ध तथा नारायणकी पूजा करे। वह उनके हृदयादि सम्पूर्ण अङ्ग, शंख, चक्र तथा गदादि आयुधकी पूजाकर श्री, पुष्टि, गरुड, गुरु और परम गुरुकी पूजा करे। तदनन्तर उसे इन्द्रादि आठों दिक्पालकी पूजा उनकी ही दिशाओंमें करके अधोभागमें नाग तथा ऊर्ध्वभागमें ब्रह्माकी पूजा करनी चाहिये। आगमशास्त्रमें निर्दिष्ट विधिके अनुसार विष्वक्सेन देवकी पूजा ईशानकोणमें करके उस मण्डलकी पूजाको पूर्ण करना चाहिये।

जो मनुष्य इस विधिके अनुसार एक बार भी भगवान् विष्णुकी पूजा करता है, उस महात्माका पुनर्जन्म इस संसारमें नहीं होता। पुण्डरीकाक्ष गदाधर भगवान् विष्णु एवं ब्रह्माकी पूजा करनेसे पुनः जन्म नहीं होता। (अध्याय १२६)


भीमा-एकादशीव्रत एवं माहात्म्य तथा पूजन-विधि

ब्रह्माजीने कहा—प्राचीनकालमें माघमासके शुक्लपक्षमें हस्तनक्षत्रसे युक्त एक एकादशीका व्रत भीमने किया था। इसलिये इस एकादशीको भीमा-एकादशी कहा जाता है। यह आश्चर्य है कि मात्र इसी एकादशीका व्रत करनेसे भीमसेन पितृऋणसे मुक्त हो गये थे।

प्राणियोंके पुण्योंकी अभिवृद्धि करनेवाली भीमा-द्वादशी तिथि भीमसेनके नामसे ही प्रसिद्ध भी है। यह तिथि तो बिना हस्तनक्षत्रके संयोगसे ही ब्रह्महत्यादि पापोंका विनाश कर देती है।

यह द्वादशी तिथि महापापोंको तो वैसे ही नष्ट कर देती है, जैसे कुमार्गगामी राजासे राज्य, कुपुत्रसे कुल, दुष्टपत्नीसे पति, अधर्मसे धर्म, कुमन्त्रीसे राजा, अज्ञानसे ज्ञान, अशौचसे शौच, अश्रद्धासे श्राद्ध, असत्यसे सत्य, उष्णतासे शीतलता, अनाचारसे सम्पत्ति, कहनेमात्रसे दान, विस्मय करनेसे तप, अशिक्षासे पुत्र, दूर चली जानेसे गौ, क्रोधसे शान्ति, नहीं बढ़ानेसे धन, ज्ञानसे अविद्या और निष्कामतासे फल विनष्ट हो जाते हैं। उसी प्रकार पापनाशके लिये द्वादशी तिथि शुभ कही गयी है।

ब्रह्महत्या, सुरापान, सुवर्ण-चोरी तथा गुरुपत्नी-गमन—ये महापातक मनुष्यमें यदि एक साथ उत्पन्न हो जायें तो इनको त्रिपुष्कर तीर्थ भी नष्ट नहीं कर सकते हैं (किंतु यह द्वादशी उस समस्त पापसमूहको

२२६ संक्षिप्त गरुडपुराण [ आचार-

नष्ट कर देती है)। नैमिषक्षेत्र, कुरुक्षेत्र, प्रभासक्षेत्र, कालिन्दी (यमुना), गङ्गा तथा सभी तीर्थ भी एकादशीके समान नहीं हैं। कोई भी दान, जप, होम या अन्य पुण्य इसके तुल्य नहीं है। यदि एक ओर पृथिवीके दानका सत्कर्म रखकर दूसरी ओर भगवान् हरिकी इस पवित्र एकादशी तिथिकी तुलना की जाय तो भी यही एक महापुण्यशालिनी एकादशी तिथि सर्वश्रेष्ठ सिद्ध होगी।

इस व्रतमें भगवान् वराहदेवकी स्वर्णप्रतिमा बनाकर नये ताम्रपात्रमें घटके ऊपर स्थापित करना चाहिये। तदनन्तर ब्राह्मणजन समस्त विश्वके बीजभूत विष्णुदेवकी उस प्रतिमाको श्वेत वस्त्रसे आच्छादितकर स्वर्णनिर्मित दीपादिक उपचारोंसे प्रयत्नपूर्वक उनकी पूजा करे।

'ॐ वराहाय नमः' इस मन्त्रसे उन विष्णुके चरणकमलोंकी पूजाकर 'ॐ क्रोडाकृतये नमः' इस मन्त्रसे उनके कटिप्रदेशका पूजन करे। तदनन्तर 'ॐ गम्भीरघोषाय नमः' इस मन्त्रसे उनकी नाभिकी पूजा कर 'ॐ श्रीवत्सधारिणे नमः' इस मन्त्रसे उनके वक्षःस्थलका पूजन करे। उसके बाद 'ॐ सहस्रशिरसे नमः' इस मन्त्रसे उन विष्णुभगवान्‌की भुजाओंकी पूजा करके भक्तको 'ॐ सर्वेश्वराय नमः' इस मन्त्रसे उन देवके ग्रीवाभागकी पूजा करनी चाहिये। तदनन्तर व्रती 'ॐ सर्वात्मने नमः' इस मन्त्रसे मुखकी और 'ॐ प्रभवाय नमः' इस मन्त्रसे हरिके ललाटभागकी पूजाकर 'ॐ शतमयूखाय नमः' इस मन्त्रसे उन चक्रधारी हरिकी केशराशिकी विधिवत् पूजा करनी चाहिये।

इस प्रकार भगवान् विष्णुकी विधिपूर्वक पूजाको समाप्तकर व्रती रात्रिमें जागरण करते हुए भगवान् हरिके माहात्म्यको प्रतिपादित करनेवाले पुराणकी कथाका श्रवण करे। तदनन्तर प्रातःकाल स्वर्णनिर्मित वराह-सहित सपरिवार भगवान्‌की उस मूर्तिको अपेक्षा रखनेवाले ब्राह्मणको दे करके पारणा करे।

इस विधि-विधानसे व्रत करनेसे मनुष्य पुनः माताके गर्भसे उत्पन्न होकर स्तनका दूध नहीं पान करता है अर्थात् वह पुनर्जन्मसे मुक्त हो जाता है। इस पुण्यशालिनी एकादशीका व्रत करनेसे प्राणीको पितृ, गुरु एवं देव—इन तीनों ऋणोंसे मुक्ति प्राप्त हो जाती है। यह व्रत सभी व्रतोंका आदि स्थान है। इस व्रतको करके मनुष्य अपने समस्त मनोवाञ्छित फलोंको प्राप्त करनेमें सफल रहता है।

(अध्याय १२७)


व्रतपरिभाषा तथा व्रतमें पालन करनेयोग्य नियम और अन्य ज्ञातव्य बातें

ब्रह्माजीने कहा— हे व्यास! जिन व्रतोंको करनेसे नारायण संतुष्ट होकर सब कुछ प्रदान करते हैं, उन व्रतोंको मैं कहूँगा। शास्त्रके द्वारा वर्णित नियम-पालन व्रत कहलाता है और वही तप है। व्रतीके कुछ सामान्य नियम इस प्रकार हैं—

व्रतीको नित्य तीनों संध्याओंमें स्नान करना चाहिये। उसे जितेन्द्रिय होकर भूमिपर शयन करना चाहिये। स्त्री, शूद्र और पतितजनोंके साथ बातचीत करना उसके लिये वर्जित है। वह पवित्र बना रहे और प्रतिदिन हवन करे।

सुकृत करनेवाले मनुष्यको चाहिये कि वह नियमोंका पालन करे। (व्रताचरणके पूर्व) क्षौर न कराना चाहे तो दुगुना व्रत करना चाहिये।

व्रतीके लिये कांस्यपात्र, उड़द, मसूर, चना,