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गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ

२३३- विविध दानादि कर्मोंका फल प्रेतको प्राप्त होना, पददानका माहात्म्य, जीवको अवान्तर-देहकी प्राप्तिका क्रम

५१४संक्षिप्त गरुडपुराण[ धर्मकाण्ड-

इस संसारमें पूर्वार्जित सुकृत और दुष्कृत कर्मोंका फल भोगकर अपने कर्मके अनुसार ही किसी व्याधिका जन्म होता है और अपने द्वारा किये गये कर्मोंके आधारपर निमित्तमात्र बनकर कोई व्याधि उत्पन्न होती है। जिसकी जिस निमित्तसे मृत्यु निश्चित है, वह निमित्त किये गये कर्मोंके अनुसार उसे अवश्य प्राप्त हो जाता है।

जीवात्मा कर्मभोगके कारण जब अपने वर्तमान शरीरका परित्याग करता है, तब भूमिको गोबरसे लीपकर उसके ऊपर तिल और कुशासन बिछाकर उसीपर उसे लिटा दे। तदनन्तर उस प्राणीके मुखमें सुवर्ण डाले और उसके समीप तुलसीका वृक्ष एवं शालग्रामकी शिलाको भी लाकर रखे। तत्पश्चात् यथाविधान विभिन्न सूक्तोंका पाठ करना चाहिये, क्योंकि ऐसा करनेसे मनुष्यकी मृत्यु मुक्तिदायक होती है। उसके बाद मरे हुए प्राणीके शरीरगत विभिन्न स्थानोंमें सोनेकी शलाकाओंको रखनेका विधान है, जिसके अनुसार क्रमशः एक शलाका मुख, एक-एक शलाका नाकके दोनों छिद्र, दो-दो शलाकाएँ नेत्र और कान, एक शलाका लिङ्ग तथा एक शलाका उसके ब्रह्माण्डमें रखनी चाहिये। उसके दोनों हाथ एवं कण्ठभागमें तुलसी रखें। उसके शवको दो वस्त्रोंसे आच्छादित करके कुंकुम और अक्षतसे पूजन करना चाहिये। तदनन्तर उसको पुष्पोंकी मालासे विभूषित करके उसे बन्धु-बान्धवों तथा पुत्र, पुरवासियोंके साथ अन्य द्वारसे ले जाय। उस समय अपने बान्धवोंके साथ पुत्रको मरे हुए पिताके शवको कन्धेपर रखकर स्वयं ले जाना चाहिये।

श्मशान देशमें पहुँचकर पुत्र, पूर्वाभिमुख या उत्तराभिमुख वहाँकी उस भूमिपर चिताका निर्माण कराये, जो पहलेसे जली न हो। उस चितामें चन्दन, तुलसी और पलाश आदिकी लकड़ीका प्रयोग करना चाहिये।

जब मरणासन्न व्यक्तिकी इन्द्रियोंका समूह व्याकुल हो उठता है, चेतन शरीर जब जडीभूत हो जाता है, उस समय प्राण शरीरको छोड़कर यमराजके दूतोंके साथ चल देते हैं। उस समय मृतकको दिव्य-दृष्टि प्राप्त होती है, जिसके द्वारा वह समस्त संसारको देखता है। जब मृतकके प्राण कण्ठमें आकर अटक जाते हैं, उस कालमें उस आतुर व्यक्तिका रूप बड़ा बीभत्स और कठोर हो जाता है। कोई मरता हुआ प्राणी मुखसे फेन उगलता है, किसीका मुख लाला (लार)-से भर जाता है। उस समय जो प्राणी दुरात्मा होते हैं, उन्हें यमदूत अपने पाशबन्धनोंसे जकड़कर मारते हैं। जो सुकृती हैं, उनको स्वर्गके पार्षद अपने लोकको सुखपूर्वक ले जाते हैं। यमलोकके दुर्गम मार्गमें पापियोंको दुःख झेलते हुए जाना पड़ता है।

यमराज अपने लोकमें शङ्ख, चक्र तथा गदा आदिसे विभूषित चतुर्भुज रूप धारण कर पुण्यकर्म करनेवाले साधु पुरुषोंके साथ मित्रवत् आचरण करते हैं। वे सभी पापियोंको संनिकट बुलाकर उन्हें अपने दण्डसे तर्जना देते हैं। वह यमराज प्रलयकालीन मेघके समान गर्जना करनेवाला है। अञ्जनगिरिके सदृश उसका कृष्णवर्ण है। वह एक बहुत बड़े भैंसेपर सवार रहता है। अत्यन्त साहस करके ही लोग उसकी ओर अपना ध्यान केन्द्रित करते हैं। वह विद्युत्‌के तेजके समान विद्यमान है। उसके शरीरका विस्तार तीन योजन है। वह महाक्रोधी एवं अत्यन्त भयंकर है। भीमकाय दुराकृति यमराज अपने हाथमें लोहेका दण्ड और पाश धारण करता है। उसके मुख तथा नेत्रोंको देखनेसे ही पापियोंके मनमें भय उत्पन्न हो उठता है। इस प्रकारका महाभयानक यमराज जब पापियोंको दिखायी पड़ता है, तब हाहाकार करता हुआ

प्रेतकल्प ] मरनेके समय तथा मृत्युके अनन्तर किये जानेवाले कर्म ५१५


अंगुष्ठमात्रका मृत पुरुष अपने घरकी ओर देखता हुआ यमदूतोंके द्वारा ले जाया जाता है।

प्राणोंसे मुक्त शरीर चेष्टाहीन हो जाता है। उसको देखनेसे मनमें घृणा उत्पन्न होने लगती है। वह तुरंत अस्पृश्य एवं दुर्गन्धयुक्त और सभी प्रकारसे निन्दित हो जाता है। यह शरीर अन्तमें कीट, विष्ठा या राखमें परिवर्तित हो जाता है। हे तार्क्ष्य! क्षणभरमें विध्वंस होनेवाले इस शरीरपर कौन ऐसा होगा जो गर्व करेगा। इस असत् शरीरसे होनेवाले वित्तका दान, आदरपूर्वक वाणी, कीर्ति, धर्म, आयु और परोपकार यही सारभूत है। यमलोक ले जाते हुए यमदूत प्राणीको बार-बार नरकका तीव्र भय दिखाते हुए डाँटकर यह कहते हैं कि हे दुष्टात्मन्! तू शीघ्र चल। तुझे यमराजके घर जाना है। शीघ्र ही हम सब तुझे 'कुम्भीपाक' नामक नरकमें ले चलेंगे। उस समय इस प्रकारकी वाणी और बन्धु-बान्धवोंका रुदन सुनकर ऊँचे स्वरमें हा-हा करके विलाप करता हुआ वह मृतक यमदूतोंके द्वारा यमलोक पहुँचाया जाता है।

हे गरुड! एकादशाहके दिन उचित स्थानपर श्राद्ध करना चाहिये। प्राणोत्क्रमणसे लेकर क्रमशः छः पिण्डदान करने चाहिये। उन पिण्डोंका दान यथाक्रम मृतस्थान, द्वार, चत्वर (चौराहा), विश्राम-स्थल, काष्ठचयन (चिता) और अस्थिचयनके स्थानपर करना चाहिये। हे पक्षिन्! इन छः पिण्डोंकी परिकल्पनाका कारण तुम सुनो।

हे तार्क्ष्य! जिस स्थानमें मनुष्य मरता है, उस स्थानपर मृतकके नामसे 'शव' नामका पिण्ड दिया जाता है। उस पिण्डदानको देनेसे गृहके वास्तुदेवता प्रसन्न हो जाते हैं और उससे भूमि तथा भूमिके अधिष्ठातृ देवता प्रसन्न होते हैं। द्वारपर जो दूसरा पिण्डदान दिया जाता है, उसका नाम 'पान्थ' है। उसे देनेसे द्वारस्थ गृहदेवता प्रसन्न होते हैं। चौराहेपर 'खेचर' नामक पिण्डदान होता है। इस पिण्डदानको देनेसे भूत आदि देवयोनियाँ बाधा नहीं करतीं। विश्राम-स्थलपर होनेवाला पिण्डदान 'भूत' संज्ञक है। इसको देनेसे पिशाच, राक्षस और यक्ष आदि जो अन्य दिग्वासी योनियाँ हैं, वे जलाये जाने योग्य उस मृतक शरीरको अयोग्य नहीं बनातीं। हे खगेश्वर! चिता-स्थलपर पिण्डदान देनेसे प्रेतत्वकी उत्पत्ति होती है। एक मतमें चितापर दिये जानेवाले पिण्डदानका नाम साधक है और प्रेतकल्पके विद्वानोंने इस श्राद्धको प्रेतके नामसे अभिहित किया है। चितामें पिण्डदानके बाद ही 'प्रेत' नामसे पिण्डदान देना चाहिये। इस प्रकार इन पाँचों पिण्डोंसे शव आहुतिके योग्य होता है अन्यथा पूर्वोक्त उपघातक होते हैं।

प्राणोत्क्रमणके स्थानपर पहला पिण्डदान देना चाहिये। उसके बाद दूसरा पिण्डदान आधे मार्गमें और तीसरा चितापर देना चाहिये। पहले पिण्डमें विधाता, दूसरेमें गरुडध्वज तथा तीसरेमें यमदूत—इस प्रकारका प्रयोग कहा गया है। तीसरा पिण्डदान देते ही मृत व्यक्ति शरीरके दोषोंसे मुक्त हो जाता है।

इसके बाद चिता प्रज्वलित करनेके लिये वेदिका निर्माण करके उसका उल्लेखन, उद्धरण और अभ्युक्षण आदि करके विधिपूर्वक अग्नि-स्थापन करके पुष्प और अक्षतसे क्रव्याद नामके अग्निदेवकी पूजा करके यह प्रार्थना करनी चाहिये—

त्वं भूतकृज्जगद्योने त्वं लोकपरिपालकः ॥
उपसंहारदस्तस्मादेनं स्वर्गं मृतं नय।
(१५।४४-४५)

'हे क्रव्याद अग्निदेव! आप महाभूततत्त्वोंसे बने हुए इस जगत्के कारण, पालनहार एवं संहारक हैं। अतः इस मृत व्यक्तिको आप स्वर्ग पहुँचायें।'

इस प्रकार क्रव्याद नामक अग्निदेवकी विधिवत्