गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
२४८- सपिण्डीकरण-श्राद्धमें प्रेतपिण्डके मेलनका विधान, पितरोंकी प्रसन्नताका फल, पञ्चक-मरण तथा शान्तिविधान, पुत्तलिकादाह, प्रेत-श्राद्धमें त्याज्य अठारह पदार्थ, मलिनषोडशी, मध्यमषोडशी तथा उत्तमषोडशी श्राद्ध, शवयात्रा-विधान
| ५६० | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ धर्मकाण्ड- |
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भवन पड़ता है, जिसका विस्तार पचीस योजन है। उसकी ऊँचाई दस योजन है। वह लोहेकी परिखाके द्वारा चारों ओरसे घिरा हुआ एक महादिव्य भवन है। इसमें आने-जानेके लिये सैकड़ों गलियाँ हैं और सैकड़ों पताकाओंसे यह सुशोभित रहता है। सैकड़ों दीपक इस भवनमें प्रज्वलित रहते हैं। बंदीजनोंके द्वारा गाये-बजाये गीत और वाद्य-यन्त्रोंकी ध्वनियोंसे यह भवन गुञ्जायमान रहता है। चित्रगुप्तके इस भवनको सुन्दरतम चित्रोंसे सजाया गया है। इस भवनमें मुक्तामणयोंसे निर्मित, परम विस्मयकारी एक दिव्य आसन है, जिसके ऊपर बैठकर चित्रगुप्त मनुष्यों अथवा अन्य प्राणियोंकी आयु-गणना करते हैं। किसीके पुण्य और पापके प्रति कभी उनमें मोह नहीं होता है। जिसने जबतक जो कुछ अर्जित किया है, वे उसको जानते हैं; वे अठारह दोषोंसे रहित जीवद्वारा किये गये कर्मको लिखते हैं।
चित्रगुप्तके भवनसे पूर्व ज्वरका बहुत बड़ा भवन है। उनके भवनसे दक्षिण शूल और लताविस्फोटकके भवन हैं। पश्चिममें कालपाश, अजीर्ण तथा अरुचिके भवन हैं। मध्य पीठके उत्तरमें विसूचिका, ईशानकोणमें शिरोऽर्त्ति, आग्नेयकोणमें मूकता, नैर्ऋत्यकोणमें अतिसार, वायव्यकोणमें दाहसंज्ञक रोगका घर है। चित्रगुप्त इन सभीसे नित्य परिवृत रहते हैं।
हे तार्क्ष्य ! कोई भी प्राणी जो कुछ कर्म करता है, वह सब कुछ चित्रगुप्त लिखते हैं। धर्मराजके भवनके द्वारपर रात-दिन दूतगण उपस्थित रहते हैं। यमदूतोंके महापाशसे बँधे पापी और नीच व्यक्ति मुद्गरोंसे मार खाते हैं। वहाँ नाना प्रकारके पूर्वकृत पापकर्मोंसे युक्त मनुष्योंको विभिन्न धारदार अस्त्र-शस्त्रों तथा अनेक यन्त्रोंसे मारा जाता है। पापियोंको दहकते हुए अंगारोंके द्वारा घेर दिया जाता है। पूर्वकर्मोंके अनुसार लौह-पिण्डके समान वे उसीमें दग्ध किये जाते हैं। अन्य बहुत-से पापियोंको पृथ्वीपर पटक करके कुल्हाड़ेसे उन्हें काटा जाता है। पूर्वकर्मके फलानुसार वे चिल्लाते हुए दिखायी देते हैं। कुछ पापियोंको गुड़पाक और कुछको तैलपाकमें डालकर पकाया जाता है। इस प्रकार उन यमदूतोंसे पापियोंको अत्यधिक कष्ट भोगना पड़ता है। अन्य पापी उन अत्यन्त निर्दयी दूतोंसे बार-बार क्षमादानकी प्रार्थना करते हैं; पर यमदूत उनकी एक नहीं सुनते हैं।
हे तार्क्ष्य ! इस प्रकार पापियोंके लिये कर्मानुसार बहुत-से नरक कहे गये हैं। (अध्याय ३३)
इष्टापूर्तकर्मकी महिमा तथा और्ध्वदैहिक कृत्य, दस पिण्डदानसे आतिवाहिक शरीरके निर्माणकी प्रक्रिया, एकादशाहादि श्राद्धका विधान, शय्यादानकी महिमा एवं सपिण्डीकरण-श्राद्धका स्वरूप
श्रीकृष्णने कहा— हे गरुड ! शास्त्रके अनुसार धर्म और अधर्मका जो लक्षण किया गया है, उसको तुम सुनो।
प्राणियोंके आगे-आगे उनका सत्कर्म और दुष्कर्म दौड़ता है। विद्वानोंने कृत (सत्य)-युगमें तप, त्रेतायुगमें ज्ञान, द्वापरमें यज्ञ और दान तथा कलियुगमें एकमात्र दानकी प्रशंसा की है। मनीषियोंने उत्तम प्रकृतिवाले गृहस्थजनोंके लिये इस धर्मको स्वीकार किया है कि वे यथाशक्ति इष्टापूर्तकर्म* करें, उसके करनेसे उन्हें पातक नहीं
* तालाब, कुआँ आदि खुदवाना तथा देवालय, औषधालय आदि बनवाना 'इष्टापूर्तकर्म' है।
प्रेतकल्प ] इष्टापूर्तकर्मकी महिमा तथा और्ध्वदैहिक कृत्य [ ५६१
होता। जो मनुष्य वृक्षारोपण करता है, गुफा, कुआँ और जलाशय खुदवाता है, उसको यममार्गमें चलते समय अत्यधिक सुखकी प्राप्ति होती है। जो लोग ठंडकसे पीड़ित ब्राह्मणको तापनेके लिये अग्नि प्रदान करते हैं, वे सभी कामनाओंको पूर्ण करके अतिशीतल यमलोकके मार्गमें अग्नि तापते हुए सुखपूर्वक जाते हैं। जिस मनुष्यने पृथ्वीका दान दिया है, उसने मानो स्वर्ण, मणि-मुक्तादि बहुमूल्य रत्न, वस्त्र और आभूषणादिका सम्पूर्ण दान दे दिया। इस पृथ्वीपर मानव जो कुछ दानमें देते हैं, वे सब दिये गये पदार्थ यमलोकके महापथमें उनके समीप उपस्थित रहते हैं। पुत्र विधिपूर्वक अपने मृत पिताके लिये नाना प्रकारके जिन सुन्दर भोज्य-पदार्थोंका दान देता है, वे सभी पिताको प्राप्त होते हैं।
आत्मा (शरीर) ही पुत्रके रूपमें प्रकट होता है। वह पुत्र यमलोकमें पिताका रक्षक है। घोर नरकसे पिताका उद्धार वही करता है, इसलिये उसको पुत्र कहा जाता है। अतः पुत्रको पिताके लिये आजीवन श्राद्ध करना चाहिये, तभी वह अतिवाहात्मक प्रेतरूप पिता पुत्रद्वारा दानमें दिये गये पदार्थोंके भोगोंसे सुख प्राप्त करता है। दग्ध हुए प्रेतके निमित्त परिजनोंके द्वारा जो जलाञ्जलि दी जाती है, उससे प्रसन्न होकर वह प्रेत यमलोकमें जाता है। प्रेतकी संतुष्टिके लिये तीन दिनतक रात्रिमें एक चौराहेपर रस्सी बाँधकर तीन लकड़ियोंके द्वारा बनायी गयी तिगोड़ियाके ऊपर कच्ची मिट्टीके पात्रमें दूध भरकर रखना चाहिये। हे पक्षिन्! वायुभूत वह प्रेत मृत्युके दिनसे लेकर तीन दिनतक आकाशमें स्थित उस दूधका पान करता है। दाहसे चौथे दिन अस्थि-संचयका कार्य करना चाहिये<sup>१</sup>। उसके बाद जलाञ्जलि प्रदान करे, किंतु इन जलाञ्जलियोंको पूर्वाह्न, मध्याह्न, अपराह्न तथा उनकी संधिकालोंमें न दे, बल्कि दिनके प्रथम प्रहरके बीत जानेपर दे। नदीमें पुत्रके द्वारा जलाञ्जलि दिये जानेके पश्चात् सभी सगोत्री, हितैषी और बन्धु-बान्धव-स्वजातियों तथा परजातियोंके साथ जलदान करें। किसी भी कारण शीघ्रतावश मुख्य अधिकारी पुत्रके जलाञ्जलि देनेके पूर्व ही जलाञ्जलि नहीं देनी चाहिये। जब स्त्रियाँ श्मशानभूमिसे वापस हो जायँ तभी लोकाचार किया जाय।
शूद्रकी मृत्यु हो जानेपर जो ब्राह्मण उसकी चिताके लिये लकड़ी लेकर जाता है अथवा उसके पीछे-पीछे चलता है, वह तीन रात्रियोंतक अशुद्ध रहता है। तीन रात्रियोंके पश्चात् समुद्रमें मिलनेवाली गङ्गा आदि पवित्र नदीके तटपर पहुँचकर वह स्नान करे। तदनन्तर सौ प्राणायाम करके गोघृतका प्राशन करे, तब उसकी शुद्धि होती है। शूद्र सभी वर्णोंके शवोंका अनुगमन कर उन्हें जलाञ्जलि दे सकता है, वैश्य तीन वर्णों (ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य)-के शवोंका अनुगमन कर उन्हें जलाञ्जलि दे सकता है, क्षत्रिय दो वर्णों (ब्राह्मण और क्षत्रिय)-के शवोंका अनुगमन कर उन्हें जलाञ्जलि दे सकता है और ब्राह्मण केवल अपने ही वर्णके शवका अनुगमन कर उसे जलाञ्जलि दे सकता है।<sup>२</sup> हे काश्यप! जलाञ्जलि देनेके पश्चात् दन्तधावन करना
१-अस्थि-संचयनके विषयमें संवर्त-वचनके अनुसार—
(क) प्रथमेऽह्नि तृतीये वा सप्तमे नवमे तथा। अस्थिसञ्चयनं कार्यं दिने तद्गोत्रजैः सह॥
(ख) अपरेद्युस्तृतीये वा दाहानन्तरमेव वा।
प्रथम दिन, तृतीय, सप्तम अथवा नवम दिन या दाहके पश्चात् ही चिताको जलसे शान्त करके अपने गोत्रवालोंके साथ अस्थि-संचयन करना चाहिये।
२-इसका तात्पर्य यह है कि इस व्यवस्थाके अनुसार शवका अनुगमन करनेमें किसी विशेष प्रकारकी अशुचिता एवं उसकी शुद्धिके लिये किसी विशेष प्रायश्चित्तकी आवश्यकता नहीं होती। किसी तरहके आपत्कालमें अथवा लोकसंग्रहकी दृष्टिसे या अन्य किसी सहायकके अनुपलब्ध होनेपर जिस किसी भी जातिके शवकी अन्त्येष्टिके लिये यथोचित सहयोग सबको ही करना चाहिये और ऐसा करनेपर शास्त्रीय व्यवस्थाके अनुसार अशुचिताके निराकरणके लिये यथाविधान प्रायश्चित्त भी कर लेना चाहिये।
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चाहिये। सभी सगोत्री नौ दिनोंतक दन्तधावनका परित्याग कर देते हैं तथा यथाविधान नौ दिनतक जलाञ्जलि देनेके लिये जलाशयपर जाते हैं। विद्वानोंका कहना है कि जो भी मनुष्य जिस स्थान, मार्ग अथवा घरमें मृत्युको प्राप्त करता है, उसको वहाँसे श्मशानभूमिके अतिरिक्त कहीं अन्यत्र नहीं ले जाना चाहिये। दाह-संस्कारके पश्चात् स्त्रियोंको आगे-आगे चलना चाहिये। उनके पीछे-पीछे अन्य व्यक्तियोंके समूहको चलना चाहिये। वहाँसे आनेके बाद उन सभीको एक पत्थरके ऊपर बैठकर आचमन करना चाहिये। तत्पश्चात् वे पूर्णपात्रमें रखी गयी यव, सरसों और दूर्वाका दर्शन करें, नीमकी पत्तियोंका प्राशन करें तथा तेल लगाकर स्नान करें। सगोत्रियोंमें जिनके यहाँ मृत्यु हुई है, उनका भोजन नहीं करना चाहिये। अपने घरका अन्न नहीं खाना चाहिये और न ही खिलाना चाहिये। भोजन करनेमें मृत्पात्रका प्रयोग करना चाहिये एवं उस उच्छिष्ट पात्रको ऊपर मुख करके ही एकान्त स्थानमें रख देना चाहिये। मृतकके गुणोंका कीर्तन करे, 'यमगाथा' का पाठ करे और पूर्वजन्ममें संचित शुभाशुभका चिन्तन करे।
वह मृत प्राणी वायुरूप धारण करके इधर-उधर भटकता है और वायुरूप होनेसे ऊपरकी ओर जाता है। वह प्राप्त हुए शरीरके द्वारा ही अपने पुण्य और पापके फलोंका भोग करता है। दशाह-कर्म करनेसे मृत मनुष्यके लिये शरीरका निर्माण होता है। नवक एवं षोडश श्राद्ध करनेसे जीव उस शरीरमें प्रवेश करता है। भूमिपर तिल और कुशका निक्षेप करनेपर वह कुटी धातुमयी हो जाती है। मरणासन्न प्राणीके मुखमें पञ्चरत्न डाल देनेसे जीव ऊपरकी ओर चल देता है। यदि ऐसा नहीं होता है तो जीवको शरीर नहीं मिल पाता अर्थात् वह इधर-उधर भटकता रहता है। इसलिये आदरपूर्वक भूमिपर तिल और दर्भको बिछाना चाहिये।
जीव जहाँ-कहीं भी पशु या स्थावरयोनिमें जन्म लेता है, जहाँ वह रहता है, वहींपर उसके उद्देश्यसे दी गयी श्राद्धीय वस्तु पहुँच जाती है। जिस प्रकार धनुर्धारीके द्वारा लक्ष्यवेधके लिये छोड़ा गया बाण उसी लक्ष्यको प्राप्त करता है, जो उसको अभीष्ट है; उसी प्रकार जिसके निमित्त श्राद्ध किया जाता है, वह उसीके पास पहुँच जाता है। जबतक मृतकके सूक्ष्म शरीरका निर्माण नहीं होता है, तबतक किये गये श्राद्धोंसे उसकी संतुष्टि नहीं होती है। भूख-प्याससे व्यथित होकर वायुमण्डलमें इधर-उधर चक्कर काटता हुआ वह जीवात्मा, दशाहके श्राद्धसे संतृप्त होता है। जिस मृतकका पिण्डदान नहीं हुआ है, वह आकाशमें भटकता ही रहता है। वह क्रमशः—तीन दिन जल, तीन दिन अग्नि, तीन दिन आकाश और एक दिन (अपने प्रिय जनोंके ममतावश) अपने घरमें निवास करता है। अग्निमें शरीरके भस्म हो जानेपर प्रेतात्माको जलसे ही तृप्त करना चाहिये। इसके बाद जलसे ही उसकी तेल-स्नानकी क्रिया पूर्ण करे तथा घरमें पूआ और कृशर अन्नसे श्राद्ध करे। मृत्युके पहले, तीसरे, पाँचवें, सातवें, नवें अथवा ग्यारहवें दिन जो श्राद्ध होता है, उसको नवक श्राद्ध कहा जाता है। गृहद्वार, श्मशान, तीर्थ या देवालय अथवा जहाँ-कहीं भी प्रथम पिण्डदान दिया जाता है, वहींपर अन्य सभी पिण्डदान करने चाहिये। एकादशाहके दिन जिस श्राद्धको करनेका विधान है, उसको सामान्य श्राद्ध कहा गया है। ब्राह्मणादि चारों वर्णोंकी शरीर-शुद्धिके लिये स्नान ही एकमात्र साधन है। एकादशाह-संस्कारके पूर्ण हो जानेके पश्चात् पुनः स्नान करके शुद्ध होना चाहिये। अनन्तर शय्यादान करना चाहिये, क्योंकि