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गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ

१५१- मधुर, अम्ल और तिक्त आदि द्रव्योंका वर्ग तथा उनका औषधीय उपयोग

३१८ संक्षिप्त गरुडपुराण [ आचार-

निसोथका चूर्ण घृतके साथ पान करनेके योग्य है, क्योंकि यह उदावर्त-रोगका विनाश करता है। त्रिवृत, हरीतकी और काली तुलसीकी पत्तीका मिश्रित चूर्ण स्नुहीक्षीर अर्थात् सेहुँड़के दूधसे भावित करके उससे बनायी गयी वटीका गोमूत्रके साथ पान करनेसे अनाह-रोग नष्ट हो जाता है। त्र्यूषण (सोंठ, पिप्पली और काली मिर्च), त्रिफला (हरीतकी, आँवला तथा बहेड़ा), धनिया, विडंग, चव्य (गजपिप्पली) तथा चित्रक (चित्ता) नामक औषधियोंके चूर्णको कल्कसे सिद्ध घृत वातगुल्म-रोगका विनाशक है।

दुग्धमें प्रयुक्त सोंठके चूर्णका अनुपान हृदयगत पीड़ाका नाश करता है। काला नमक तथा उसका आधा भाग हरीतकी-चूर्ण घृतमें मिलाकर पान करनेसे भी यह रोग दूर हो जाता है। कणा (पिप्पली), पाषाणभेदी (पथरचट्टा)-के रसमें शिलाजीतका चूर्ण मिलाकर उसको चावलके जल और गुड़के साथ पान करनेसे मूत्रकृच्छ्ररोगी रोग-विमुक्त हो जाता है। गिलोय, सोंठ, आँवला, अश्वगन्धा और त्रिकण्टक (गोखरू)-का अनुपान वातरोगी, शूलग्रस्त तथा मूत्रकृच्छ्रके रोगीको करना चाहिये। शर्करा अथवा मिश्रीके साथ समान भागमें प्रयुक्त यवक्षार सभी प्रकारके कृच्छ्ररोगोंका विनाशक है अथवा मधुके साथ निदिग्धिका (इलायची)-का रस पान करनेसे भी सब प्रकारके कृच्छ्ररोग विनष्ट हो जाते हैं।

त्रिफला-कल्कके साथ प्रयोगमें लाये गये सेंधा नमकको भी मूत्राघातका विनाशक माना गया है। मूत्रमें अवरोध होनेपर कर्पूरका चूर्ण लिंगमें प्रविष्ट करना चाहिये। मधुके साथ प्रयुक्त आँवलेका रस सभी प्रकारके मेहरोगोंको विनष्ट करनेवाला है। त्रिफला, देवदारु, दारुहल्दी और कमलमूलका क्वाथ भी मधुके साथ पान करनेसे वह प्रमेहरोगको दूर करता है।

शरीरकी पुष्टि चाहनेवाले व्यक्तिको अनिद्रा, मैथुन, व्यायाम तथा चिंताका परित्याग कर देना चाहिये। ऐसा करनेसे शरीर धीरे-धीरे पुष्ट होने लगता है। यव और साँवाँ खानेवाला प्राणी स्थूल हो जाता है। मधुके साथ जल पीनेसे भी प्राणीके शरीरमें स्थूलता आ जाती है। उष्ण अन्न अथवा माँडयुक्त चावलका भोजन करनेसे शरीर कृश हो जाता है। गजपिप्पली, जीरा, त्रिकटु, हींग, काला नमक तथा आँवलाचूर्ण-समन्वित सत्तूको मधुके साथ पान करनेसे मेदा-विकारका नाश और अग्निका उद्दीपन होता है।

चौगुने जल और दोगुने गोमूत्रमें चित्रक नामक औषधिका कल्क पाक करके उसके द्वारा उदररोगीको एक प्रस्थ घृत सिद्ध करना चाहिये। तदनन्तर वह दूधके साथ उस घृतका पान करे। ऐसा करनेसे उसकी जठराग्नि उद्दीप्त हो उठती है। अनुपानमें दूधके साथ क्रमशः एक-एक पिप्पलीकी अभिवृद्धि करते हुए रोगी दस दिनतक उसका सेवन करे, पुनः उसी क्रमसे एक-एक पिप्पलीको घटाते हुए बीसवें दिन मात्र एक पिप्पलीका सेवन करे तो उससे भी उस रोगीकी जठराग्नि प्रबल हो जाती है। पुनर्नवाके क्वाथ एवं कल्कसे सिद्ध किया गया घृत शोथ-रोगका विनाश करनेमें समर्थ होता है। शोथ-रोगीको गोमूत्र या गोदुग्धके साथ पिप्पली अथवा गुड़के साथ समान भागमें हरीतकी या सोंठका सेवन करना चाहिये।

मनुष्य बला नामक औषधिके रसमें सिद्ध दूधके साथ एरण्ड-तेलका पान करके आध्मान तथा शूलजनित पीड़ासे युक्त आन्त्रवृद्धिके रोगपर विजय प्राप्त कर सकता है। अग्निशोधित अरुचक अर्थात् एरण्ड-तेलसे सिद्ध पथ्या (हरीतकी)-का कल्क, काला नमक एवं सेंधा नमकसे समन्वित

काण्ड ] नाडीव्रण, कुष्ठ आदि रोगोंकी चिकित्सा ३१९


होकर, अन्त्रवृद्धिरोगका विनाशक श्रेष्ठतम योग है।

निर्गुण्डीकी* जड़का नस्य लेनेसे गण्डमालाका रोग नष्ट हो जाता है। स्नुही (सेहुँड़) तथा गण्डारी (कचनार)-वृक्षकी छालका स्वेद अर्बुद-रोगके सभी भेदोंको विनष्ट करनेमें समर्थ होता है। हस्तिकर्ण अर्थात् एरण्ड तथा पलाशपत्रके रसका लेप करनेसे गलगण्ड-रोग नष्ट होता है। धत्तूर, एरण्ड, निर्गुण्डी, पुनर्नवा, सहिजन तथा सरसोंका मिश्रित लेप पुराने एवं अत्यन्त दुःखदायी श्लीपद (पीलपाँव)-रोगको दूर करता है। शोभा (हल्दी), अञ्जनक (साँहजना)-वृक्षकी छाल समुद्रफेन तथा हींगका योग विद्रधि नामक रोगका विनाशक है।

मधुके साथ शरपुंखा (शरफोंका) नामक औषधि सभी प्रकारके व्रणोंमें लेप करनेके योग्य होती है अथवा नीमकी पत्तीका लेप भी शोथ तथा व्रणोंको सुखा देता है। त्रिफला, खदिर, दारुहल्दी तथा वटवृक्षकी छाल या फलके योगसे बना लेप व्रणशोधक है। यष्टि, मधु (मुलेठी) और घीको गरमकर मधुके साथ व्रणमें लेप करनेसे आगन्तु-व्रण नष्ट हो जाता है।

प्राणीमें पित्त-रक्त-दोषजन्य गरमी होनेपर वैद्यको शीत-क्रिया करनी चाहिये। शरीरके कोष्ठमें रक्त-सञ्चार बाधित होनेपर बाँसके अंकुरकी छाल, एरण्ड-बीज तथा गोखरूका क्वाथ मधु, सेंधा नमक तथा हींग मिलाकर पान करनेसे ठीक हो जाता है। ऐसी विकृति होनेपर उससे मुक्त होनेके लिये यव, काली मिर्च तथा कुलथीके रसका पान अथवा सेंधा नमकके साथ भूना हुआ अन्न या यवागूका पान करना चाहिये।

करञ्ज अरिष्ट (रीठा) तथा निर्गुण्डीका रस व्रणोंके कीटाणुओंको नष्ट कर देता है। त्रिफलाचूर्णसे युक्त गुग्गुलवटी विबन्ध-रोगको दूर करती है। यह व्रणशोषक और शोधक है। दूर्वारस या कम्पिल्लक (कपीला) अथवा दारुहल्दीके कल्कसे सिद्ध तेल व्रणमें लगानेकी श्रेष्ठ औषधि है।

(अध्याय १७०)


नाडीव्रण, कुष्ठ आदि रोगोंकी चिकित्सा

धन्वन्तरिजीने कहा—हे सुश्रुत! अब आप नाडीव्रण आदि दोषोंकी चिकित्साका श्रवण करें।

नाडी (नाड़ी)-को शस्त्रसे भलीभाँति काटकर व्रण-चिकित्साके समान उसकी चिकित्सा करनी चाहिये। गुग्गुल, त्रिफला तथा त्रिकटुको समान भागमें लेकर सिद्ध किये गये घृतसे नाड़ीमें हुए विकृत व्रण, शूल और भगन्दर नामक रोगपर विजय प्राप्त की जा सकती है। निर्गुण्डीके रससे सिद्ध तेल नाड़ी-दोष तथा व्रणको दूर करता है। पामा नामक रोगके उपभेदोंमें यह औषधि पान, अञ्जन और नस्य-विधिसे प्रयोगमें लानेपर गुणकारी होती है। तीन भाग गुग्गुल, पाँच भाग त्रिफला तथा एक भाग काली तुलसीकी पत्तीसे बनायी गयी गुटिकाएँ शोथ, गुल्म, अर्श और भगन्दर-रोगसे ग्रसित रोगियोंके लिये हितकारिणी होती हैं।

उपदंश-रोगमें शिश्नके मध्यमें रक्तकी शुद्धि-हेतु शिरावेध करे तथा शिश्न नष्ट न होवे, अतः उसे पकनेसे प्रयत्नपूर्वक रक्षा करे। गुग्गुल, खदिर, परवल, नीमका फल और गिलोयका क्वाथ पीनेसे उपदंश-दोष समाप्त हो जाता है। एक कड़ाहेमें त्रिफलाको जलाकर स्याही-जैसी राख बनाकर मधुसे प्रयोग करनेपर लाभ होता है। त्रिफला,


* निर्गुण्डी (मेउड़ी या मेढ़की)