गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
२१९- आसन्नमृत्यु-व्यक्तिके निमित्त किये जानेवाले प्रायश्चित्त, दस दान आदि विविध कर्म, मृत्युके बाद किये जानेवाले कर्म, षट्पिण्डदान, दाह-संस्कारसे पूर्व किये जानेवाले कर्म, दाह-संस्कारके बाद अस्थिसंचयनादि कर्म तथा गृहप्रवेशके समयके कर्म, दुर्मृत्युकी गति, नारायणबलिका विधान, पुत्तलदाहविधि तथा पञ्चक-मृत्युके कृत्य
प्रेतकल्प ] मरणासन्न व्यक्तिके कल्याणके लिये किये जानेवाले कर्म ४५५
चुरानेवाला कपाली होता है। मित्रकी हत्या करनेवाला उल्लू होता है। पिता आदि श्रेष्ठ जनोंकी निन्दा करनेसे प्राणी क्षयका रोगी होता है। असत्यवादी हकला कर बोलनेवाला और झूठी गवाही देनेवाला जलोदर-रोगसे पीड़ित रहता है।
विवाहमें विघ्न पैदा करनेवाला पापी मच्छरकी योनिमें जाता है। यदि कदाचित् उसे पुनः मनुष्यकी योनि प्राप्त भी होती है तो उसका ओठ कटा होता है। जो मनुष्य चतुष्पथपर मल-मूत्रका परित्याग करता है, वह वृषल (अपशूद्र) होता है। कन्याको दूषित करनेवाले प्राणीको मूत्रकृच्छ्र और नपुंसकताका विकार होता है। जो वेद बेचनेका अधर्म करता है, वह व्याघ्र होता है। अयाज्यका यज्ञ करानेवालेको सुअरकी योनि प्राप्त होती है। अभक्ष्य-भक्षण करनेवाला व्यक्ति बिलौटा और वनोंको जलानेवाला खद्योत (जुगनू) होता है। बासी एवं निषिद्ध भोजन करनेवालेको कृमि तथा मात्सर्य-दोषसे युक्त प्राणीको भ्रमरकी योनि मिलती है। घर आदिमें आग लगानेवाला कोढ़ी और अदत्तका आदान* करनेसे मनुष्य बैल होता है। गायोंकी चोरी करनेपर सर्प तथा अन्नकी चोरी करनेपर प्राणीको अजीर्ण रोग होता है। जलकी चोरी करनेपर मछली, दूधकी चोरी करनेसे बलाकिका और ब्राह्मणको दानमें बासी भोजन देनेसे कुबड़ेकी योनि प्राप्त होती है। हे पक्षिन्! जो मनुष्य फल चुराता है, उसकी संतति मर जाती है। बिना किसीको दिये अकेले भोजन करनेवाला व्यक्ति दूसरे जन्ममें संतानहीन होता है। संन्यासाश्रमका परित्याग करनेवाला (आरूढ़पतित) पिशाच होता है। जलकी चोरी करनेसे चातक और पुस्तककी चोरी करनेसे प्राणी जन्मान्ध होता है। ब्राह्मणोंको देनेकी प्रतिज्ञा करके जो नहीं देते हैं, उन्हें सियारकी योनि प्राप्त होती है। झूठी निन्दा करनेवाले लोगोंको कछुड़की योनिमें जाना पड़ता है। फल बेचनेवाला दूसरे जन्ममें भाग्यहीन होता है। जो ब्राह्मण शूद्रकन्यासे विवाह कर लेता है, वह भेड़ियेकी योनि प्राप्त करता है। अग्निको पैरसे स्पर्श करनेपर प्राणी बिलौटा और जीवोंका मांस खानेपर रोगी होता है। जो मनुष्य जलके स्रोतको विनष्ट करते हैं, वे मछली होते हैं। जो लोग भगवान् हरिकी कथा और साधुजनोंकी प्रशस्ति नहीं सुनते, उन मनुष्योंको कर्णमूल रोग होता है। जो व्यक्ति परायेके मुँहमें स्थित अन्नका अपहरण करता है, वह मन्दबुद्धि होता है।
जो देवपूजनमें प्रयुक्त होनेवाले पात्रादिक उपकरणोंका अपहारक है, उसे गण्डमाला-रोग होता है। दम्भके वशीभूत होकर जो प्राणी धर्माचरण करता है, उसको गजचर्मका रोग होता है। विश्वासघाती मनुष्यके शरीरमें शिरोऽर्ति-रोग होता है। शिवके धन और निर्माल्यका सेवन करनेवाला व्यक्ति शिश्नपीड़ासे ग्रसित रहता है। स्त्रियाँ पापकी भागिनी होती हैं और इन्हें उन्हीं जन्तुओंकी भार्या होना पड़ता है। उक्त कर्मोंके कुफलसे प्राप्त नरकका भोग करनेके बाद मनुष्य इन्हीं सब योनियोंमें प्रविष्ट होता है, ऐसा निश्चय समझना चाहिये।
हे खगपते! जिस प्रकार इस संसारमें नाना भाँतिके द्रव्य विद्यमान हैं, उसी प्रकार प्राणियोंकी विभिन्न जातियाँ भी हैं। वे सभी अपने-अपने विभिन्न कर्मोंके प्रतिफल-रूपमें सुख-दुःख एवं नाना योनियोंका भोग करते हैं। तात्पर्य यही है कि प्राणीको शुभ कर्म करनेसे शुभ फलकी प्राप्ति और अशुभ कर्म करनेसे अशुभ फलकी प्राप्ति होती है।
(अध्याय २)
* यदि कोई व्यक्ति किसी वस्तुको देना नहीं चाहे तब भी उसको उससे ले लेनेवाला अदत्तादान कहा जाता है।
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नरकोंका स्वरूप, नरकोंमें प्राप्त होनेवाली विविध यातनाएँ तथा नरकमें गिरानेवाले कर्म एवं जीवकी शुभाशुभ गति
श्रीसूतजीने कहा— पूछे गये अपने प्रश्नोंका सम्यक् उत्तर सुनकर पक्षिराज गरुड अतिशय आह्लादित हो भगवान् विष्णुसे नरकोंके स्वरूपको जाननेकी इच्छा प्रकट की।
गरुडने कहा— हे उपेन्द्र! आप मुझे उन नरकोंका स्वरूप और भेद बतायें, जिनमें जाकर पापीजन अत्यधिक दुःख भोगते हैं।
श्रीभगवान्ने कहा— हे अरुणके छोटे भाई गरुड! नरक तो हजारोंकी संख्यामें हैं। सभीको विस्तृत रूपमें बताना सम्भव नहीं है। अतः मैं मुख्य-मुख्य नरकोंको बता रहा हूँ।
हे पक्षिराज! तुम मुझसे यह जान लो कि 'रौरव' नामक नरक अन्य सभीकी अपेक्षा प्रधान है। झूठी गवाही देनेवाला और झूठ बोलनेवाला व्यक्ति रौरव नरकमें जाता है। इसका विस्तार दो हजार योजन है। जाँघभरकी गहराईमें वहाँ दुस्तर गड्ढा है। दहकते हुए अंगारोंसे भरा हुआ वह गड्ढा पृथ्वीके समान बराबर (समतल भूमि-जैसा) दीखता है। तीव्र अग्निसे वहाँकी भूमि भी तप्ताङ्गार-जैसी है। उसमें यमके दूत पापियोंको डाल देते हैं। उस जलती हुई अग्निसे संतप्त होकर पापी उसीमें इधर-उधर भागता है। उसके पैरमें छाले पड़ जाते हैं, जो फूटकर बहने लगते हैं। रात-दिन वह पापी वहाँ पैर उठा-उठाकर चलता है। इस प्रकार वह जब हजार योजन उस नरकका विस्तार पार कर लेता है, तब उसे पापकी शुद्धिके लिये उसी प्रकारके दूसरे नरकमें भेजा जाता है।
हे पक्षिन्! इस प्रकार मैंने तुम्हें रौरव नामक प्रथम नरककी बात बता दी। अब तुम 'महारौरव' नामक नरककी बात सुनो। यह नरक पाँच हजार योजनमें फैला हुआ है। वहाँकी भूमि ताँबेके समान वर्णवाली है। उसके नीचे अग्नि जलती रहती है। वह भूमि विद्युत्-प्रभाके समान कान्तिमान् है। देखनेमें वह पापीजनोंको महाभयंकर प्रतीत होती है। यमदूत पापी व्यक्तिके हाथ-पैर बाँधकर उसे उसीमें लुढ़का देते हैं और वह लुढ़कता हुआ उसमें चलता है। मार्गमें कौआ,
प्रेतकल्प ] नरकोंका स्वरूप ४५७
बगुला, भेड़िया, उलूक, मच्छर और बिच्छू आदि जीव-जन्तु क्रोधातुर होकर उसे खानेके लिये तत्पर रहते हैं। वह उस जलती हुई भूमि एवं भयंकर जीव-जन्तुओंके आक्रमणसे इतना संतप्त हो जाता है कि उसकी बुद्धि ही भ्रष्ट हो जाती है। वह घबड़ाकर चिल्लाने लगता है तथा बार-बार उस कष्टसे बेचैन हो उठता है। उसको वहाँ कहींपर भी शान्ति नहीं प्राप्त होती है। इस प्रकार उस नरकलोकके कष्टको भोगते हुए पापीके जब हजारों वर्ष बीत जाते हैं, तब कहीं जाकर मुक्ति प्राप्त होती है।
इसके बाद जो नरक है उसका नाम 'अतिशीत' है। वह स्वभावतः अत्यन्त शीतल है। महारौरव नरकके समान ही उसका भी विस्तार बहुत लंबा है। वह गहन अन्धकारसे व्याप्त रहता है। असह्य कष्ट देनेवाले यमदूतोंके द्वारा पापीजन लाकर यहाँ बाँध दिये जाते हैं। अतः वे एक-दूसरेका आलिंगन करके वहाँकी भयंकर ठंडकसे बचनेका प्रयास करते हैं। उनके दाँतोंमें कटकटाहट होने लगती है। हे पक्षिराज! उनका शरीर वहाँकी उस ठंडकसे काँपने लगता है। वहाँ भूख-प्यास बहुत अधिक लगती है। इसके अतिरिक्त भी अनेक कष्टोंका सामना उन्हें वहाँ करना पड़ता है। वहाँ हिमखण्डका वहन करनेवाली वायु चलती है, जो शरीरकी हड्डियोंको तोड़ देती है। वहाँके प्राणी भूखसे त्रस्त होकर मज्जा, रक्त और गल रही हड्डियोंको खाते हैं। परस्पर भेंट होनेपर वे सभी पापी एक-दूसरेका आलिंगन कर भ्रमण करते रहते हैं। इस प्रकार उस तमसावृत नरकमें मनुष्यको बहुत-से कष्ट झेलने पड़ते हैं।
हे पक्षिश्रेष्ठ! जो व्यक्ति अन्यान्य असंख्य पाप करता है, वह इस नरकके अतिरिक्त 'निकृन्तन' नामसे प्रसिद्ध दूसरे नरकमें जाता है। हे खगेन्द्र! वहाँ अनवरत कुम्भकारके चक्रके समान चक्र चलते रहते हैं, जिनके ऊपर पापीजनोंको खड़ा करके यमके अनुचरोंके द्वारा अँगुलीमें स्थित कालसूत्रसे उनके शरीरको पैरसे लेकर शिरोभागतक छेदा जाता है। फिर भी उनका प्राणान्त नहीं होता। इसमें शरीरके सैकड़ों भाग टूट-टूट कर छिन्न-भिन्न हो जाते हैं और पुनः इकट्ठे हो जाते हैं। इस प्रकार यमदूत पापकर्मियोंको वहाँ हजारों वर्षतक चक्कर लगवाते रहते हैं। जब सभी पापोंका विनाश हो जाता है, तब कहीं जाकर उन्हें उस नरकसे मुक्ति प्राप्त होती है।
'अप्रतिष्ठ' नामका एक अन्य नरक है। वहाँ जानेवाले प्राणी असह्य दुःखका भोग भोगते हैं। वहाँ पापकर्मियोंके दुःखके हेतुभूत चक्र और रहट
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लगे रहते हैं। जबतक हजारों वर्ष पूरे नहीं हो जाते, तबतक वह रुकता नहीं। जो लोग उस चक्रपर बाँधे जाते हैं, वे जलके घटकी भाँति उसपर घूमते रहते हैं। पुनः रक्तका वमन करते हुए उनकी आँतें मुखकी ओरसे बाहर आ जाती हैं और नेत्र आँतोंमें घुस जाते हैं। प्राणियोंको वहाँ जो दुःख प्राप्त होते हैं, वे बड़े ही कष्टकारी हैं।
हे गरुड! अब 'असिपत्रवन' नामक दूसरे नरकके विषयमें सुनो। यह नरक एक हजार योजनमें फैला हुआ है। इसकी सम्पूर्ण भूमि अग्निसे व्याप्त होनेके कारण अहर्निश जलती रहती है। इस भयंकर नरकमें सात-सात सूर्य अपनी सहस्र-सहस्र रश्मियोंके साथ सदैव तपते रहते हैं, जिनके संतापसे वहाँके पापी हर क्षण जलते ही रहते हैं। इसी नरकके मध्य एक चौथाई भागमें 'शीतस्निग्धपत्र' नामका वन है। हे पक्षिश्रेष्ठ! उसमें वृक्षोंसे टूटकर गिरे फल और पत्तोंके ढेर लगे रहते हैं। मांसाहारी बलवान् कुत्ते उसमें विचरण करते रहते हैं। वे बड़े-बड़े मुखवाले, बड़े-बड़े दाँतोंवाले तथा व्याघ्रकी तरह महाबलवान् हैं। अत्यन्त शीत एवं छायासे व्याप्त उस नरकको देखकर भूख-प्याससे पीडित प्राणी दुःखी होकर करुण क्रन्दन करते हुए वहाँ जाते हैं। तापसे तपती हुई पृथ्वीकी अग्निसे पापियोंके दोनों पैर जल जाते हैं, अत्यन्त शीतल वायु बहने लगती है, जिसके कारण उन पापियोंके ऊपर तलवारके समान तीक्ष्ण धारवाले पत्ते गिरते हैं। जलते हुए अग्नि-समूहसे युक्त भूमिमें पापीजन छिन्न-भिन्न होकर गिरते हैं। उसी समय वहाँके रहनेवाले कुत्तोंका आक्रमण भी उन पापियोंपर होने लगता है। शीघ्र ही वे कुत्ते रोते हुए उन पापियोंके शरीरके मांसको खण्ड-खण्ड करके खा जाते हैं।
हे तात! असिपत्रवन नामक नरकके विषयको मैंने बता दिया। अब तुम महाभयानक 'तप्तकुम्भ' नामवाले नरकका वर्णन मुझसे सुनो—इस नरकमें चारों ओर फैले हुए अत्यन्त गरम-गरम घड़े हैं। उनके चारों ओर अग्नि प्रज्वलित रहती है, वे उबलते हुए तेल और लौहके चूर्णसे भरे रहते हैं। पापियोंको ले जाकर उन्हींमें औंधे मुख डाल दिया जाता है। गलती हुई मज्जारूपी जलसे युक्त उसीमें फूटते हुए अङ्गोंवाले पापी काढ़ाके समान बना
प्रेतकल्प ] नरकोंका स्वरूप ४५९
दिये जाते हैं। तदनन्तर भयंकर यमदूत नुकीले हथियारोंसे उन पापियोंकी खोपड़ी, आँखों तथा हड्डियोंको छेद-छेदकर नष्ट करते हैं। गिद्ध बड़ी तेजीसे वहाँ आकर उनपर झपट्टा मारते हैं। उन उबलते हुए पापियोंको अपनी चोंचसे खींचते हैं और फिर उसीमें छोड़ देते हैं। उसके बाद यमदूत उन पापियोंके सिर, स्नायु, द्रवीभूत मांस, त्वचा आदिको जल्दी-जल्दी करछुलसे उसी तेलमें घुमाते हुए उन महापापियोंको काढ़ा बना डालते हैं।
हे पक्षिन् ! यह तप्तकुम्भ-जैसा है, इस बातको विस्तारपूर्वक मैंने तुम्हें बता दिया। सबसे पहले नरकको रौरव और दूसरे उसके बादवालेको महारौरव नरक कहा जाता है। तीसरे नरकका नाम अतिशीत एवं चौथेका नाम निकृन्तन है। पाँचवाँ नरक अप्रतिष्ठ, छठा असिपत्रवन एवं सातवाँ तप्तकुम्भ है। इस प्रकार ये सात प्रधान नरक हैं। अन्य भी बहुत-से नरक सुने जाते हैं, जिनमें पापी अपने कर्मोंके अनुसार जाते हैं। यथा—रोध, सूकर, ताल, तप्तकुम्भ, महाज्वाल, शबल, विमोहन, कृमि, कृमिभक्ष, लालाभक्ष, विषञ्जन, अधःशिर, पूयवह, रुधिरान्ध, विड्भुज, वैतरणी, असिपत्रवन, अग्निज्वाल, महाघोर, संदंश, अभोजन, तमस्, कालसूत्र, लौहतापी, अभिद, अप्रतिष्ठ तथा अवीचि आदि—ये सभी नरक यमके राज्यमें स्थित हैं। पापीजन पृथक्-पृथक् रूपसे उनमें जाकर गिरते हैं। रौरव आदि सभी नरकोंकी अवस्थिति इस पृथ्वीलोकसे नीचे मानी गयी है। जो मनुष्य गौकी हत्या, भ्रूणहत्या और आग लगानेका दुष्कर्म करता है, वह ‘रोध’ नामक नरकमें गिरता है। जो ब्रह्मघाती, मद्यपी तथा सोनेकी चोरी करता है, वह ‘सूकर’ नामके नरकमें गिरता है। क्षत्रिय और वैश्यकी हत्या करनेवाला ‘ताल’ नामक नरकमें जाता है।
जो मनुष्य ब्रह्महत्या एवं गुरुपत्नी तथा बहनके साथ सहवास करनेकी दुश्चेष्टा करता है, वह ‘तप्तकुम्भ’ नामक नरकमें जाता है। जो असत्य-सम्भाषण करनेवाले राजपुरुष हैं, उनको भी उक्त नरककी ही प्राप्ति होती है। जो प्राणी निषिद्ध पदार्थोंका विक्रेता, मदिराका व्यापारी है तथा स्वामिभक्त सेवकका परित्याग करता है, वह ‘तप्तलौह’ नामक नरकको प्राप्त करता है। जो व्यक्ति कन्या या पुत्रवधूके साथ सहवास करनेवाला है, जो वेद-विक्रेता और वेदनिन्दक है, वह अन्तमें ‘महाज्वाल’ नामक नरकका वासी होता है। जो गुरुका अपमान करता है, शब्दबाणसे उनपर प्रहार करता है तथा अगम्या स्त्रीके साथ मैथुन करता है, वह ‘शबल’ नामक नरकमें जाता है।
शौर्य-प्रदर्शनमें जो वीर मर्यादाका परित्याग करता है, वह ‘विमोहन’ नामक नरकमें गिरता है। जो दूसरेका अनिष्ट करता है, उसे ‘कृमिभक्ष’ नामक नरककी प्राप्ति होती है। देवता और ब्राह्मणसे द्वेष रखनेवाला प्राणी ‘लालाभक्ष’ नरकमें जाता है। जो परायी धरोहरका अपहर्ता है तथा जो
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सन्दंश, तप्तसूर्मि, वैतरणी, अन्धकूप, प्राणरोध और वज्रकण्टक-शाल्मली नरक
प्रेतकल्प ] नरकोंका स्वरूप ४६१
बाग-बगीचोंमें आग लगाता है, उसे 'विषञ्जन' नामक नरककी प्राप्ति होती है। जो मनुष्य असत्-पात्रसे दान लेता है तथा असत् प्रतिग्रह लेनेवाला, अयाज्ययाजक और जो नक्षत्रसे जीविकोपार्जन करता है, वह मनुष्य 'अधःशिर' नरकमें जाता है। जो मदिरा, मांस आदि पदार्थोंका विक्रेता है, वह 'पूयवह' नामक घोर नरकमें गिरता है। जो कुक्कुट, बिल्ली, सुअर, पक्षी, मृग, भेंड़को बाँधता है, वह भी उसी प्रकारके नरकमें जाता है। जो गृहदाही है, जो विषदाता है, जो कुण्डाशी है, जो सोमविक्रेता है, जो मद्यपी है, जो मांसभोजी है तथा जो पशुहन्ता है, वह व्यक्ति 'रुधिरान्ध' नामक नरकमें जाता है, ऐसा विद्वानोंका अभिमत है। एक ही पंक्तिमें बैठे हुए किसी प्राणीको धोखा देकर जो लोग विष खिला देते हैं, उन सभीको 'विद्भुज' नामक घोर नरक प्राप्त होता है। मधु निकालनेवाला मनुष्य 'वैतरणी' और क्रोधी 'मूत्रसंज्ञक' नामक नरकमें जाता है। अपवित्र और क्रोधी व्यक्ति 'असिपत्रवन' नामक नरकमें जाता है। मृगोंका शिकार करनेवाला व्याध 'अग्निज्वल' नामक नरकमें जाता है, जहाँ उसके शरीरको नोच-नोचकर कौवे खाते हैं।
यज्ञकर्ममें दीक्षित होनेपर जो व्रतका पालन नहीं करता, उसे उस पापसे 'संदंश' नरकमें जाना पड़ता है। यदि स्वप्नमें भी संन्यासी या ब्रह्मचारी स्खलित हो जाते हैं तो वे 'अभोजन' नामक नरकमें जाते हैं। जो लोग क्रोध और हर्षसे भरकर वर्णाश्रम-धर्मके विरुद्ध कर्म करते हैं, उन सबको नरकलोककी प्राप्ति होती है।
सबसे ऊपर भयंकर गर्मीसे संतप्त रौरव नामक नरक है। उसके नीचे अत्यन्त दुःखदायी महारौरव है। उस नरकसे नीचे शीतल और उस नरकके बाद नीचे 'तामस' नरक माना गया है। इसी प्रकार बताये गये क्रमसे अन्य नरक भी नीचे ही हैं।
इन नरकलोकोंके अतिरिक्त भी सैकड़ों नरक हैं, जिनमें पहुँचकर पापी प्रतिदिन पकता है, जलता है, गलता है, विदीर्ण होता है, चूर्ण किया जाता है, गीला होता है, क्वाथ बनाया जाता है, जलाया जाता है और कहीं वायुसे प्रताड़ित किया जाता है—ऐसे नरकोंमें एक दिन सौ वर्षके समान होता है। सभी नरकोंसे भोग भोगनेके बाद पापी तिर्यक्-योनिमें जाता है। तत्पश्चात् उसको कृमि, कीट, पतंग, स्थावर तथा एक खुरवाले गधेकी योनि प्राप्त होती है। तदनन्तर मनुष्य जंगली हाथी आदिकी योनियोंमें जाकर गौकी योनिमें पहुँचता है। हे गरुड! गधा, घोड़ा, खच्चर, गौर मृग, शरभ और चमरी—ये छः योनियाँ एक खुरवाली होती हैं। इनके अतिरिक्त बहुत-सी पापाचार-योनियाँ भी हैं, जिनमें जीवात्माको कष्ट भोगना पड़ता है। उन सभी योनियोंको पाकर प्राणी मनुष्य-योनिमें आता है और कुबड़ा, कुत्सित, वामन, चाण्डाल और पुल्कश आदि नर-योनियोंमें जाता है। अवशिष्ट पाप-पुण्यसे समन्वित जीव बार-बार गर्भमें जाता है और मृत्युको प्राप्त होता है। उन सभी पापोंके समाप्त हो जानेके बाद प्राणीको शूद्र, वैश्य तथा क्षत्रिय आदिकी आरोहिणी-योनि प्राप्त होती है। कभी-कभी वह सत्कर्मसे ब्राह्मण, देव और इन्द्रत्वके पदपर भी पहुँच जाता है।
हे गरुड! यमद्वारा निर्दिष्ट योनिमें पुण्यगति प्राप्त करनेमें जो प्राणी सफल हो जाते हैं, वे सुन्दर-सुन्दर गीत गाते, वाद्य बजाते और नृत्यादि करते हुए प्रसन्नचित्त गन्धर्वोंके साथ, अच्छे-से-अच्छे हार, नूपुर आदि नाना प्रकारके आभूषणोंसे युक्त, चन्दन आदिकी दिव्य सुगन्ध
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और पुष्पोंके हारसे सुवासित एवं अलंकृत चमचमाते हुए विमानमें स्वर्गलोकको जाते हैं। पुण्य-समाप्तिके पश्चात् जब वे वहाँसे पुनः पृथ्वीपर आते हैं तो राजा अथवा महात्माओंके घरमें जन्म लेकर सदाचारका पालन करते हैं। समस्त भोगोंको प्राप्त करके पुनः स्वर्गको प्राप्त करते हैं अन्यथा पहलेके समान आरोहिणी-योनिमें जन्म लेकर दुःख भोगते हैं।
मृत्युलोकमें जन्म लेनेवाले प्राणीका मरना तो निश्चित है। पापियोंका जीव अधोमार्गसे निकलता है। तदनन्तर पृथ्वीतत्त्वमें पृथ्वी, जलतत्त्वमें जल, तेजतत्त्वमें तेज, वायुतत्त्वमें वायु, आकाशतत्त्वमें आकाश तथा सर्वव्यापी मन चन्द्रमें जाकर विलीन हो जाता है। हे गरुड! शरीरमें काम, क्रोध एवं पञ्चेन्द्रियाँ हैं। इन सभीको शरीरमें रहनेवाले चोरकी संज्ञा दी गयी है। काम, क्रोध और अहंकार नामक विकार भी उसीमें रहनेवाले चोर हैं। उन सभीका नायक मन है। इस शरीरका संहार करनेवाला काल है, जो पाप और पुण्यसे जुड़ा रहता है। जिस प्रकार घरके जल जानेपर व्यक्ति अन्य घरकी शरण लेता है, उसी प्रकार पञ्चेन्द्रियोंसे युक्त जीव इन्द्रियाधिष्ठातृ देवताओंके साथ शरीरका परित्याग कर नये शरीरमें प्रविष्ट हो जाता है। शरीरमें रक्त-मज्जादि सात धातुओंसे युक्त यह षाट्कौशिक शरीर है। सभी प्राण, अपान आदि पञ्च वायु, मल-मूत्र, व्याधियाँ, पित्त, श्लेष्म, मज्जा, मांस, मेदा, अस्थि, शुक्र और स्नायु—ये सभी शरीरके साथ ही अग्निमें जलकर भस्म हो जाते हैं।
हे तार्क्ष्य ! प्राणियोंके विनाशको मैंने तुम्हें बता दिया। अब उनके इस शरीरका जन्म पुनः कैसे होता है, उसको मैं तुम्हें बता रहा हूँ।
यह शरीर नसोंसे आबद्ध, श्रोत्रादिक इन्द्रियोंसे युक्त और नवद्वारोंसे समन्वित है। यह सांसारिक विषय-वासनाओंके प्रभावसे व्याप्त, काम-क्रोधादि विकारसे समन्वित, राग-द्वेषसे परिपूर्ण तथा तृष्णा नामक भयंकर चोरसे युक्त है। यह लोभरूपी जालमें फँसा हुआ और मोहरूपी वस्त्रसे ढका हुआ है। यह मायासे भलीभाँति आबद्ध एवं लोभसे अधिष्ठित पुरके समान है। सभी प्राणियोंका शरीर इनसे व्याप्त है। जो लोग अपनी आत्माको नहीं जानते हैं, वे पशुओंके समान हैं।
हे गरुड! चौरासी लाख योनियाँ हैं और उद्भिज्ज (पृथ्वीमें अंकुरित होनेवाली वनस्पतियाँ), स्वेदज (पसीनेसे जन्म लेनेवाले जुएँ और लीख आदि कीट), अण्डज (पक्षी) तथा जरायुज (मनुष्य)-में यह सम्पूर्ण सृष्टि विभक्त है।
(अध्याय ३)
प्रेतकल्प ] आसन्नमृत्यु-व्यक्तिके निमित्त किये जानेवाले प्रायश्चित्त ४६३
आसन्नमृत्यु-व्यक्तिके निमित्त किये जानेवाले प्रायश्चित्त, दस दान आदि विविध कर्म, मृत्युके बाद किये जानेवाले कर्म, षट्पिण्डदान, दाह-संस्कारसे पूर्व किये जानेवाले कर्म, दाह-संस्कारके बाद अस्थिसंचयनादि कर्म तथा गृहप्रवेशके समयके कर्म, दुर्मृत्युकी गति, नारायण-बलिको विधान, पुत्तलदाहविधि तथा पञ्चक-मृत्युके कृत्य
श्रीकृष्णने कहा—हे गरुड! जानमें या अनजानमें मनुष्य जो भी पाप करते हैं, उन पापोंकी शुद्धिके लिये उन्हें प्रायश्चित्त करना चाहिये। जो विद्वान् है वह पहले पवित्र करनेवाले भस्म आदि दस स्नान करे और पापोंके प्रायश्चित्तके रूपमें शास्त्रोक्त कृच्छ्रादि व्रत अथवा तत्प्रतिनिधिभूत गोदानादि क्रिया करे। यदि मनुष्य उनमें अक्षमताके कारण सफल न हो रहा हो तो आधा ही सही, यदि आधा भी न हो तो उसका ही आधा सही और नहीं तो उस आधेका भी आधा उसे कुछ-न-कुछ प्रायश्चित्त अवश्य करना चाहिये। तत्पश्चात् यथासामर्थ्य दस प्रकारके दान देनेका विधान है, उसको सुनो।
गो, भूमि, तिल, हिरण्य, घृत, वस्त्र, धान्य, गुड़, रजत और लवण—ये दस दान हैं—
गोभूमितिलहिरण्याज्यवासोधान्यगुडास्तथा।
रजतं लवणं चैव दानानि दश वै विदुः॥ (४।४)
यमद्वारपर पहुँचनेके लिये जो मार्ग बताये गये हैं, वे अत्यन्त दुर्गन्धदायक मवादादि तथा रक्तादिसे परिव्याप्त हैं। अतः उस मार्गमें स्थित वैतरणी नदीको पार करनेके लिये वैतरणी गौका दान करना चाहिये। जो गौ सर्वाङ्गमें काली हो, जिसके स्तन भी काले हों, उसे वैतरणी गौ माना गया है*।
तिल, लोहा, स्वर्ण, कपास, लवण, सप्तधान्य, भूमि और गौ—ये पापसे शुद्धिके लिये पवित्रतामें एकसे बढ़कर एक हैं। इन आठ दानोंको महादान कहा जाता है। इनका दान उत्तम प्रकृतिवाले ब्राह्मणको ही देना चाहिये—
तिला लोहं हिरण्यं च कर्पासं लवणं तथा।
सप्तधान्यं क्षितिर्गाव एकैकं पावनं स्मृतम्॥
एतान्यष्टौ महादानान्युत्तमाय द्विजातये। (४।७-८)
अब पददानका वर्णन सुनो। छत्र, जूता, वस्त्र, अंगूठी, कमण्डलु, आसन, पात्र और भोज्यपदार्थ—ये आठ प्रकारके पद हैं—
छत्रोपानहवस्त्राणि मुद्रिका च कमण्डलुः।
आसनं भाजनं भोज्यं पदं चाष्टविधं स्मृतम्॥ (४।९)
* नदीं वैतरणीं तर्तुं दद्याद्वैतरणीं च गाम्। कृष्णस्तनी सकृष्णाङ्गी सा वै वैतरणी स्मृता॥ (४।६)
४६४ संक्षिप्त गरुडपुराण [ धर्मकाण्ड -
तिलपात्र, घृतपात्र, शय्या, उपस्कर तथा और
भी जो कुछ अपनेको इष्ट हो, वह सब देना
चाहिये। अश्व, रथ, भैंस, भोजन, वस्त्रका दान
ब्राह्मणोंको करना चाहिये। अन्य दान भी अपनी
शक्तिके अनुसार देना चाहिये।
हे पक्षिराज! इस पृथ्वीपर जिसने पापका
प्रायश्चित्त कर लिया है, वह दस प्रकारके दान भी
दे चुका है, वैतरणी गौ एवं अष्टदान कर चुका है,
तिलसे भरा पूर्ण पात्र, घीसे भरा हुआ पात्र,
शय्यादान और विधिवत् पददान करता है तो वह
नरकरूपी गर्भमें नहीं आता है अर्थात् उसका
पुनर्जन्म नहीं होता-
प्रायश्चित्तं कृतं येन दश दानान्यपि क्षितौ ॥
दानं गौर्वैतरण्याश्च दानान्यष्टौ तथापि वा ।
तिलपात्रं सर्पिःपात्रं शय्यादानं तथैव च ॥
पददानं च विधिवन्नासौ निरयगर्भकः ।
(४।१२-१४)
पण्डित लोग स्वतन्त्र रूपसे भी लवण दान
करनेकी इच्छा रखते हैं, क्योंकि यह लवण-रस
विष्णुके शरीरसे उत्पन्न हुआ है, इस पृथ्वीपर
मरणासन्न प्राणीके प्राण जब न निकल रहे हों तो
उस समय लवण-रसका दान उसके हाथसे दिलवाना
चाहिये; क्योंकि यह दान उसके लिये स्वर्गलोकके
द्वार खोल देता है। मनुष्य स्वयं जो कुछ दान देता
है, परलोकमें वह सब उसे प्राप्त होता है। वहाँ
उसके आगे रखा हुआ मिलता है। हे पक्षिन् !
जिसने यथाविधि अपने पापोंका प्रायश्चित्त कर
लिया है, वही पुरुष है। वही अपने पापोंको
भस्मसात् करके स्वर्गलोकमें सुखपूर्वक निवास
करता है।
हे खगराज ! गौका दूध अमृत है। इसलिये जो
मनुष्य दूध देनेवाली गौका दान देता है, वह
अमृतत्वको प्राप्त करता है। पहले कहे गये
तिलादिक आठ प्रकारके दान देकर प्राणी
गन्धर्वलोकमें निवास करता है। यमलोकका मार्ग
अत्यधिक भीषण तापसे युक्त है, अतः छत्रदान
करना चाहिये। छत्रदान करनेसे मार्गमें सुख प्रदान
करनेवाली छाया प्राप्त होती है। जो मनुष्य इस
जन्ममें पादुकाओंका दान देता है, वह 'असिपत्रवन' के
मार्गको घोड़ेपर सवार होकर सुखपूर्वक पार करता
है। भोजन और आसनका दान देनेसे प्राणीको
परलोकगमनके मार्गमें सुखका उपभोग प्राप्त होता
है। जलसे परिपूर्ण कमण्डलुका दान देनेवाला पुरुष
सुखपूर्वक परलोकगमन करता है।
यमराजके दूत महाक्रोधी और महाभयंकर हैं।
काले एवं पीले वर्णवाले उन दूतोंको देखनेमात्रसे
भय लगने लगता है। उदारतापूर्वक वस्त्र-
आभूषणादिका दान करनेसे वे यमदूत प्राणीको
कष्ट नहीं देते हैं। तिलसे भरे हुए पात्रका जो दान
ब्राह्मणको दिया जाता है, वह मनुष्यके मन, वाणी
और शरीरके द्वारा किये गये त्रिविध पापोंका
विनाश कर देता है। मनुष्य घृतपात्रका दान करनेसे
रुद्रलोक प्राप्त करता है। ब्राह्मणको सभी साधनोंसे
युक्त शय्याका दान करके मनुष्य स्वर्गलोकमें नाना
प्रकारकी अप्सराओंसे युक्त विमानमें चढ़कर साठ
हजार वर्षतक अमरावतीमें क्रीडा करके इन्द्रलोकके
बाद गिरकर पुनः इस पृथ्वीलोकमें आकर राजाका
पद प्राप्त करता है। जो मनुष्य काठी आदि
उपकरणोंसे सजे-धजे, दोषरहित जवान घोड़ेका
दान ब्राह्मणको देता है, उसको स्वर्गकी प्राप्ति
होती है। हे खगेश ! दानमें दिये गये इस घोड़ेके
शरीरमें जितने रोम होते हैं, उतने वर्ष (कालतक)
स्वर्गके लोकोंका भोग दानदाताको प्राप्त होता है।
प्राणी ब्राह्मणको सभी उपकरणोंसे युक्त चार घोड़ोंवाले
रथका दान दे करके राजसूय यज्ञका फल प्राप्त
करता है। यदि कोई व्यक्ति सुपात्र ब्राह्मणको