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गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ

२०८- अच्युतस्तोत्र

काण्ड ] विष्णुभक्तिका माहात्म्य ४२१

पुत्र-पौत्रादिक संतान तथा अन्यान्य कर्मसम्पादनसे भी भगवान् हरि संतुष्ट नहीं होते। विमुक्तजनोंके लिये भी हरिका ऐक्य श्रीहरिकी आराधनासे ही प्राप्त होता है; क्योंकि श्रीहरिकी आराधना ही ऐक्यभावका मूल है।
(अध्याय २२९)


विष्णुभक्तिका माहात्म्य

सूतजीने कहा— सभी शास्त्रोंका अवलोकन करके तथा पुनः-पुनः विचार करके यह एक ही निष्कर्ष निकलता है कि मनुष्यको सदैव भगवान् नारायणका ध्यान करना चाहिये—

आलोक्य सर्वशास्त्राणि विचार्य च पुनः पुनः।
इदमेकं सुनिष्पन्नं ध्येयो नारायणः सदा॥
( २३०।१)

जो व्यक्ति एकनिष्ठ होकर नित्य उस नारायणका ध्यान करता है, उसके लिये नाना प्रकारके दान, विभिन्न तीर्थोंका परिभ्रमण, तपस्या और यज्ञोंका सम्पादन करनेसे क्या प्रयोजन? अर्थात् श्रीमन्नारायणका ध्यान सर्वोत्कृष्ट है।

छियासठ हजार तीर्थ भगवान् नारायणके प्रणामकी सोलहवीं कलाकी भी बराबरी नहीं कर सकते। समस्त प्रायश्चित्त और जितने भी तप-कर्म हैं, इन सभीमें भगवान् कृष्णका स्मरण ही सर्वश्रेष्ठ है, ऐसा समझना चाहिये। जिस पुरुषकी अनुरक्ति सदैव पापकर्ममें रहती है, उसके लिये एकमात्र श्रेष्ठतम प्रायश्चित्त भगवान् हरिका स्मरण है।

जो प्राणी एक मुहूर्तभर भी निरालस्य होकर नारायणका ध्यान कर लेता है, वह स्वर्ग प्राप्त करता है, फिर नारायणमें अनन्य-परायण भक्तके विषयमें क्या कहा जाय—

मुहूर्तमपि यो ध्यायेन्नारायणमतन्द्रितः।
सोऽपि स्वर्गतिमाप्नोति किं पुनस्तत्परायणः॥
(२३०।६)

जो मनुष्य योगपरायण है अथवा योगसिद्ध है, उसकी चित्तवृत्ति जागते, स्वप्न देखते तथा सुषुप्तावस्थामें भगवान् अच्युतके ही आश्रित होती है। उठते, गिरते, रोते, बैठते, खाते, जागते भगवान् गोविन्द माधव विष्णुका स्मरण करना चाहिये।

अपने-अपने कर्ममें संलग्न रहते हुए भगवान् जनार्दन हरिमें ही चित्तको अनुरक्त रखना चाहिये, ऐसा शास्त्रका कथन है। अन्य बहुत-सी बातोंको कहनेसे क्या लाभ—

स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः कुर्याच्चित्तं जनार्दने।
एषा शास्त्रानुसारोक्तिः किमन्यैर्बहुभाषितैः॥
( २३०।९)

ध्यान ही परम धर्म है, ध्यान ही परम तप है, ध्यान ही परम शुद्धि है, अतः मनुष्यको (भगवद्) ध्यानपरायण होना चाहिये। विष्णुके ध्यानसे बढ़कर अन्य कोई ध्यान नहीं है, उपवाससे बढ़कर अन्य कोई तपस्या नहीं है, अतः भगवान् वासुदेवके चिन्तनको ही अपना प्रधान कर्म मानना चाहिये। इस लोक और परलोकमें प्राणीके लिये जो कुछ दुर्लभ है, जो अपने मनसे भी सोचा नहीं जा सकता, वह सब बिना माँगे ही ध्यानमात्र करनेसे मधुसूदन प्रदान कर देते हैं।

यज्ञ आदि उत्तम कर्म करते समय प्रमादवश स्खलनसे जो न्यूनता होती है, वह विष्णुके स्मरणमात्रसे सम्पूर्णतामें परिवर्तित हो जाती है, ऐसा श्रुतिवचन है—

प्रमादात् कुर्वतां कर्म प्रच्यवेताध्वरेषु यत्।
स्मरणादेव तद्विष्णोः सम्पूर्णं स्यादिति श्रुतिः॥
( २३०।१३)

पापकर्म करनेवालोंकी शुद्धिका ध्यानके समान

४२२संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

अन्य कोई साधन नहीं है। यह ध्यान पुनर्जन्म देनेवाले कारणोंको भस्म करनेवाली योगाग्नि है। समाधि (ध्यानयोग)-से सम्पन्न योगी योगाग्निसे तत्काल अपने समस्त कर्मोंको नष्ट करके इसी जन्ममें मुक्ति प्राप्त कर लेता है। वायुके सहयोगसे ऊँचे उठनेवाली ज्वालासे युक्त अग्नि जैसे अपने आश्रय कक्ष (कमरे)-को जलाकर भस्म कर देती है, वैसे ही योगी (ध्यानयोगी)-के चित्तमें स्थित श्रीविष्णु योगीके समस्त पापोंको भस्म कर देते हैं। जैसे अग्निके संयोगसे सोना मलरहित हो जाता है, वैसे ही मनुष्योंका मल भगवान् वासुदेवके सांनिध्यसे विनष्ट हो जाता है।

हजारों बार गङ्गास्नान तथा करोड़ों बार पुष्कर नामक तीर्थमें स्नान करनेसे जो पाप नष्ट होता है, वह हरिका मात्र स्मरण करनेसे नष्ट हो जाता है। हजारों प्राणायाम करनेसे जो पाप नष्ट होता है, वही पाप क्षणमात्र भगवान् हरिका ध्यान करनेसे निश्चित ही नष्ट हो जाता है। जिस मनुष्यके हृदयमें भगवान् केशव विराजमान हैं, उसके मानसपर उन दुष्ट उक्तियों तथा पाखण्डका प्रभाव नहीं पड़ता, जो कलिके प्रभावसे प्रवृत्त हैं। जिस समय हरिका स्मरण किया जाता है, वही तिथि, वही दिन, वही रात्रि, वही योग, वही चन्द्रबल और वही लग्न सर्वश्रेष्ठ है। जिस मुहूर्त या क्षणमें वासुदेवका चिन्तन नहीं होता, वह मुहूर्त या क्षण हानिका समय है। वह अत्यन्त व्यर्थ है। वह किसी भी प्रकारके लाभसे रहित होनेके कारण मूर्खता एवं मूकता (गूँगेपन)-का समय है।

जिसके हृदयमें भगवान् गोविन्द विद्यमान हैं, उसके लिये कलियुग भी सत्ययुग ही है। इसके विपरीत जिसके हृदयमें अच्युत भगवान् गोविन्दका वास नहीं है, उसके लिये तो सत्ययुग भी कलियुग ही है। जिसका चित्त आगे और पीछे, चलते तथा बैठते, सदैव भगवान् गोविन्दमें रमा हुआ है, वह व्यक्ति सदा ही कृतकृत्य है—

कलौ कृतयुगं तस्य कलिस्तस्य कृते युगे।
हृदये यस्य गोविन्दो यस्य चेतसि नाच्युतः॥
यस्याग्रतस्तथा पृष्ठे गच्छतस्तिष्ठतोऽपि वा।
गोविन्दे नियतं चेतः कृतकृत्यः सदैव सः॥

<div align="right">(२३०। २३-२४)</div>

हे मैत्रेय! जप, होम एवं पूजा आदिके द्वारा जिसका मन वासुदेव श्रीकृष्णकी आराधनामें अनुरक्त है, उसके लिये इन्द्र आदिका पद विघ्नके समान है।

जिन्होंने श्रीकेशवके चरणोंमें अपने मनको अर्पित कर दिया है, वे गृहस्थाश्रमका परित्याग बिना किये ही, कठिन तपश्चर्या बिना किये ही पौरुषी (पुरुषोत्तम परब्रह्मकी शक्ति) मायाके जालको काट डालते हैं।

गोविन्द दामोदरका हृदयमें वास रहनेपर मनुष्य क्रोधियोंके प्रति क्षमा, मूर्खोके प्रति दया और धर्ममें संलग्न प्राणियोंके प्रति प्रसन्नता प्रकट करते हैं—

क्षमां कुर्वन्ति क्रुद्धेषु दयां मूर्खेषु मानवाः।
मुदं च धर्मशीलेषु गोविन्दे हृदयस्थिते॥

<div align="right">(२३०। २७)</div>

स्नान-दान आदि कर्मोंमें तथा विशेष रूपसे सभी प्रकारके दुष्कर्मोंका प्रायश्चित्त करते समय भगवान् नारायणका ध्यान करना चाहिये।

जिनके हृदयमें नीलकमलके समान सुन्दर श्यामवर्ण भगवान् हरि विराजमान रहते हैं, उन्हींको वास्तविक लाभ और जय प्राप्त होते हैं। उनका पराभव कैसे हो सकता है—

लाभस्तेषां जयस्तेषां कुतस्तेषां पराभवः।
येषामिन्दीवरश्यामो हृदयस्थो जनार्दनः॥

<div align="right">(२३०। २९)</div>

हरिमें समर्पित चित्तवाले कीड़े-मकोड़े, पक्षी आदि जीव-जन्तुओंकी भी ऊर्ध्व (उत्तम) गति

काण्ड ] विष्णुभक्तिका माहात्म्य ४२३


होती है। फिर ज्ञानसम्पन्न मनुष्योंकी गतिके विषयमें कहना ही क्या—
कीटपक्षिगणानां च हरौ संन्यस्तचेतसाम्।
ऊर्ध्व्वा ह्येव गतिश्चास्ति किं पुनर्ज्ञानिनां नृणाम्॥
(२३०।३०)

भगवान् वासुदेवरूपी वृक्षकी छाया न तो अधिक शीतल होती है और न अधिक तापकारक होती है। नरकके द्वारका शमन करनेवाली (नरकमें जानेसे रोकने-वाली) इस छायाका सेवन क्यों नहीं किया जाय—
वासुदेवतरुच्छाया नातिशीतातितापदा।
नरकद्वारशमनी सा किमर्थं न सेव्यते॥
(२३०।३१)

हे मित्र! भगवान् मधुसूदनको अपने हृदयमें अहर्निश प्रतिष्ठित रखनेवाले प्राणीका विनाश करनेमें न तो महाक्रोधी दुर्वासाका शाप समर्थ है और न तो देवराज इन्द्रका शासन ही समर्थ है—
न च दुर्वाससः शापो राज्यं चापि शचीपतेः।
हन्तुं समर्थं हि सखे हृत्कृते मधुसूदने॥
(२३०।३२)

बोलते हुए, रुकते हुए अथवा इच्छानुसार अन्य कार्य करते हुए भी यदि भगवद्विषयक चिन्तन निरन्तर बना रहे तो धारणा (ध्येयपर चित्तकी स्थिरता)-को सिद्ध हुआ मानना चाहिये—
वदतस्तिष्ठतोऽन्यद्वा स्वेच्छया कर्म कुर्वतः।
नापयाति यदा चिन्ता सिद्धां मन्येत धारणाम्॥
(२३०।३३)

सूर्यमण्डलके मध्य विराजमान रहनेवाले, कमलासनपर सुशोभित, केयूर*, मकराकृतकुण्डल और मुकुटसे अलंकृत, दिव्य हारसे युक्त, मनोहारिणी सुन्दर स्वर्णिम आभासे युक्त शरीरवाले, शंख-चक्रधारी भगवान् विष्णुका सदैव ध्यान करना चाहिये—
ध्येयः सदा सवितृमण्डलमध्यवर्ती
नारायणः सरसिजासनसंनिविष्टः।
केयूरवान् मकरकुण्डलवान् किरीटी
हारी हिरण्मयवपुर्धृतशङ्खचक्रः॥
(२३०।३४)

इस संसारमें भगवान्‌के ध्यानके समान अन्य कोई पवित्र कार्य नहीं है। श्रीविष्णुके ध्यानमें ही सदा निरत रहनेवाला मनुष्य चाण्डालका भी अन्न खाते हुए इस संसारके पापसे संलिप्त नहीं होता, क्योंकि ऐसा मनुष्य अपने स्वत्वको भगवान्‌में लीन कर देनेसे भगवन्मय हो जाता है, अतएव उसकी भेददृष्टि पूरी तरह निर्मूल हो जाती है।

प्राणीका चित्त सदा सांसारिक विषयवासनाओंके भोगमें जिस प्रकार अनुरक्त रहता है, यदि उसी प्रकार नारायणमें ही अनुरक्त हो तो इस संसारके बन्धनसे क्यों नहीं विमुक्त हो सकता—
सदा चित्तं समासक्तं जन्तोर्विषयगोचरे।
यदि नारायणेऽप्येवं को न मुच्येत बन्धनात्॥
(२३०।३६)

सूतजीने फिर कहा—हे शौनक! सर्वदा जिसके चित्तमें भगवान् विष्णुकी भक्ति विद्यमान रहती है, वह प्रतिक्षण श्रीविष्णुको ही नमन करता रहता है। इस स्थितिमें वह हरिकृपासे अपनेको पापके समुद्रसे तार लेता है।

वही ज्ञान है जिस ज्ञानका विषय गोविन्द हों, वही कथा है जिस कथामें केशवकी लीला हो, वही कर्म है जो प्रभुके निमित्त किया जाय; अन्य बहुत-सी बातोंको कहनेसे क्या लाभ? जो जिह्वा हरिकी स्तुति करती है वही जिह्वा है, जो चित्त श्रीहरिको समर्पित है वही चित्त है तथा भगवान्‌की पूजा करनेमें जो हाथ लगे हुए हैं वे ही वास्तविक हाथ हैं—


* बाँहके मूलमें पहना जानेवाला आभूषण, इसे अङ्गद, बिजायट, बाजूबंद आदि भी कहते हैं।

४२४संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

तज्ज्ञानं यत्र गोविन्दः सा कथा यत्र केशवः।
तत्कर्म यत् तदर्थाय किमन्यैर्बहुभाषितैः॥
सा जिह्वा या हरिं स्तौति तच्चित्तं यत् तदर्पितम्।
तावेव केवलौ श्लाघ्यौ यौ तत्पूजाकरौ करौ॥
(२३०।३८-३९)

मस्तकका फल है भगवान्‌को नतमस्तक होकर प्रणाम करना, हाथका फल है भगवान्‌की पूजा करना, मनका फल है उनके गुण और कर्मका चिन्तन करना तथा वाणीका फल है गोविन्दके गुणोंका कीर्तन करना—
प्रणाममीशस्य शिरःफलं विदु-
स्तदर्चनं पाणिफलं दिवौकसः।
मनःफलं तद्गुणकर्मचिन्तनं
वचस्तु गोविन्दगुणस्तुतिः फलम्॥
(२३०।४०)

मनुष्यके पापकर्मकी जो राशि सुमेरु और मन्दराचलके समान विशाल हो गयी हो, वह सम्पूर्ण पापराशि भी भगवान् केशवका स्मरणमात्र करनेसे ही विनष्ट हो जाती है—
मेरुमन्दरमात्रोऽपि राशिः पापस्य कर्मणः।
केशवस्मरणादेव तस्य सर्वं विनश्यति॥
(२३०।४१)

श्रीविष्णुपरायण भक्त अनासक्त-भावसे यदि अपने सभी कर्मोंको श्रीविष्णुके चरणोंमें समर्पित करता है तो उसके कर्म साधु हों या असाधु बन्धनकारक नहीं होते। हे प्रभो! सुर, असुर, मनुष्य, तिर्यक्, स्थावर आदि भेदोंमें विभक्त तृणसे लेकर ब्रह्मापर्यन्त समस्त जगत् आपकी ही मायासे मोहित है।

जिनमें मन लगा देनेसे प्राणी नरकमें नहीं जाता और जिनके चिन्तन-सुखकी तुलनामें स्वर्गकी प्राप्ति विषके समान है तथा ब्रह्मलोककी कामना भी अत्यल्प होनेके कारण किसी भी प्रकार मनमें प्रवेश नहीं पाती, जो अव्यय भगवान् जड बुद्धिवाले मनुष्योंके चित्तमें स्थित होकर उन्हें मुक्ति प्रदान कर देते हैं, उन अच्युतका कीर्तन करनेपर यदि उनमें प्राणीका विलय हो जाता है तो इसमें आश्चर्यकी क्या बात है* ?

दुःख-सागरको पार करनेके लिये यज्ञ, जप, स्नान और विष्णुका ध्यान तथा पूजन करना चाहिये।

राष्ट्रका आश्रय राजा, बालकका आश्रय पिता और समस्त प्राणियोंका आश्रय धर्म है; किंतु सभीके आश्रय श्रीहरि ही हैं—
राष्ट्रस्य शरणं राजा पितरो बालकस्य च।
धर्मश्च सर्वमर्त्यानां सर्वस्य शरणं हरिः॥
(२३०।४६)

हे मुनिवर! जो लोग जगत्‌के कारणस्वरूप सनातन भगवान् वासुदेवको नमन करते हैं, उनसे अधिक श्रेष्ठ पुण्यवान् कोई तीर्थ नहीं है। निरालस्य होकर गोविन्दका ध्यान करते हुए उन्हींको समर्पित स्वाध्याय आदि कर्म करना चाहिये। भगवद्भक्त व्यक्ति चाहे शूद्र हो अथवा निषाद हो या चाण्डाल हो, उसे द्विजातियोंके समान ही माननेवाला व्यक्ति नरकमें नहीं जाता। जैसे धनप्राप्तिकी अभिलाषासे धनवान् व्यक्तिकी सदैव सम्मानपूर्वक स्तुति की जाती है, वैसे ही जगत्स्रष्टा श्रीविष्णुकी स्तुति-पूजा आदि की जाय तो क्यों नहीं इस संसारके बन्धनसे मुक्ति हो सकती है ?

जिस प्रकार वनमें लगी हुई अग्नि गीले ईंधनको जलाकर राख कर देती है, उसी प्रकार योगियोंके हृदयमें स्थित भगवान् विष्णु उनके समस्त पापोंको विनष्ट कर देते हैं। जैसे चारों ओरसे लगी हुई


* यस्मिन् न्यस्तमतिर्न याति नरकं स्वर्गोऽपि यच्चिन्तने विघ्नो यत्र न वा विशेत् कथमपि ब्राह्मोऽपि लोकोऽल्पकः।
मुक्तिं चेतसि संस्थितो जडधियां पुंसां ददात्यव्ययः किं चित्रं यदयं प्रयाति विलयं तत्राच्युते कीर्तिते॥ (२३०।४४)

काण्ड ] नृसिंहस्तोत्र तथा उसकी महिमा ४२५


अग्निकी ज्वालासे घिरे हुए पर्वतका आश्रय मृग आदि पशु एवं पक्षी नहीं लेते, वैसे ही सभी पाप योगाभ्यासमें लगे हुए मनुष्यका आश्रय नहीं ग्रहण करते। उन विष्णुके प्रति जिसका विश्वास जितना अधिक दृढ़ होता है, उसको उतनी ही अधिक सिद्धि प्राप्त होती है।

भगवान् कृष्णके ऐसे प्रभावका आकलन कर शत्रुभावसे उन गोविन्दका स्मरण करता हुआ दमघोषका पुत्र शिशुपाल भगवान्‌में लीन हो गया। यदि कोई मनुष्य भक्तिभावसे विष्णुपरायण है, तो उसके विषयमें क्या कहना? उसकी मुक्ति तो पहलेसे ही सुनिश्चित हो जाती है—

विद्वेषादपि गोविन्दं दमघोषात्मजः स्मरन्।
शिशुपालो गतस्तत्त्वं किं पुनस्तत्परायणः॥

<p align="right">(२३०।५४)</p> <p align="right">(अध्याय २३०)</p>

नृसिंहस्तोत्र तथा उसकी महिमा

सूतजीने कहा—हे शौनक! अब मैं भगवान् शिवद्वारा कही गयी नारसिंहस्तुति (नृसिंहस्तोत्र)-का वर्णन करूँगा।

प्राचीन कालकी बात है, एक बार सभी मातृगणोंने भगवान् शंकरसे कहा कि हे भगवन्! हम सब आपकी कृपासे देव, असुर और मनुष्य आदि जो इस संसारमें प्राणी हैं, उन सबको खायेंगे। हम सभीको आप इसके लिये आज्ञा प्रदान करें।

शंकरजीने कहा—हे मातृकाओ! आप सबके द्वारा संसारकी समस्त प्रजाकी रक्षा होनी चाहिये। इसलिये इस महाभयंकर पापसे आप लोग अपने-अपने मनको शीघ्र वापस कर लें।

भगवान् शंकरके द्वारा ऐसा कहे जानेपर भी मातृकाएँ उनके वचनका अनादर करते हुए त्रिभुवनके समस्त चराचर प्राणियोंको खानेके लिये जुट गयीं। मातृकाओंके द्वारा त्रैलोक्यका भक्षण करते देखकर भगवान् शिवने नृसिंहरूप उन श्रीविष्णुदेवका इस रूपमें ध्यान किया—जो आदि-अन्तसे रहित एवं समस्त चराचर जगत्के कारण हैं, विद्युत्के समान लपलपाती हुई जिनकी जिह्वा है, जिनके बड़े-बड़े महाभयंकर दाँत हैं, जिनकी ग्रीवा देदीप्यमान केसरसे* सुशोभित है, जो रत्नजटित अङ्गद एवं मुकुटसे सुशोभित हैं। जिनका शिरोभाग सोनेके समान दिखायी देनेवाली जटाओंसे युक्त है, जिनके कटिप्रदेशमें सोनेकी करधनी है, जो नीलकमलके समान श्यामवर्णके हैं, जो रत्नखचित पायल धारण किये हुए हैं। जिनके तेजसे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड व्याप्त है। जिनका शरीर आवर्ताकार रोमसमूहसे युक्त है और जो देव श्रेष्ठतम पुष्पोंसे गूँथी गयी एक विशाल मालाको धारण किये हुए हैं। इस तरह भगवान् रुद्रने भक्तिपूर्वक जिस रूपमें नारायणका ध्यान किया था, उसी रूपमें ध्यान करनेमात्रसे नृसिंहदेव श्रीविष्णुने उन्हें अपना दर्शन दिया। यह रूप देवताओंके द्वारा भी दुर्निरीक्ष्य था।

शिवने देवेश नृसिंहको प्रणाम करके उन्हें तुष्ट किया और वे इस प्रकार उनकी स्तुति करने लगे। शंकरजीने कहा—

नमस्तेऽस्तु जगन्नाथ नरसिंहवपुर्धर।
दैत्येश्वरेन्द्रसंहारिनखशुक्तिविराजित ॥
नखमण्डलसंभिन्नहेमपिङ्गलविग्रह ।
नमोऽस्तु पद्मनाभाय शोभनाय जगद्गुरो।
कल्पान्ताम्भोदनिर्घोष सूर्यकोटिसमप्रभ॥
सहस्रयमसंत्रास सहस्रेन्द्रपराक्रम।
सहस्रधनदस्फीत सहस्रचरणात्मक॥


* सिंहकी ग्रीवाके ऊपरी भागके केशसमूहको 'केसर' कहते हैं।