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गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ

३४- दानधर्मका निरूपण एवं विभिन्न देवताओंकी उपासना

काण्ड ] देव-प्रतिष्ठाकी सामान्य विधि [ ८१


पश्चिम आदि दिशाओंमें आसीन ऋत्विजोंसे करवाना चाहिये। इस हवन-कर्ममें एक-एक सहस्र आहुतिका विधान है और इन आहुतियोंमें वेदोंके आदि मन्त्रों, देवताके नाम-मन्त्रों, अपनी शाखाके विहित मन्त्रों, गायत्री-मन्त्रके साथ यथाविधान व्याहृति एवं प्रणवका प्रयोग करना चाहिये। साथ ही यह भावना करनी चाहिये कि हम इन आहुतियोंको देवताके शिरोभाग, मध्यभाग तथा पादभाग आदिमें समर्पित कर रहे हैं और स्वयंको देवमय समझना चाहिये।

इस प्रकार होम-विधिको सम्पन्न करके देशिक (आचार्य)-को चाहिये कि वह देव-विग्रहमें मन्त्रोंका न्यास करे। यथा— ‘ॐ अग्निमीळे०’ मन्त्रका देवके दोनों चरणोंमें, ‘ॐ इषेत्वेति०’ मन्त्रका दोनों गुल्फोंमें, ‘ॐ अग्न आयाहि०’ मन्त्रसे देवकी दोनों जंघाओंमें, ‘ॐ शं नो देवी०’ मन्त्रका दोनों जानुओंमें, ‘ॐ बृहद्रथन्तर०’ मन्त्रका दोनों ऊरुओंमें न्यास विहित है। देवके उदर भागमें भी इसी प्रकार न्यास करना चाहिये। तदनन्तर ‘ॐ दीर्घायुष्ट्वाय०’ मन्त्रका देवके हृदयमें, ‘ॐ श्रीश्चते०’ मन्त्रका गलेमें, ‘ॐ त्रातारमिन्द्र०’ मन्त्रका वक्षःस्थलमें, ‘ॐ त्र्यम्बक०’ मन्त्रका दोनों नेत्रोंमें तथा ‘ॐ मूर्द्धा भव०’ मन्त्रका मस्तकमें न्यास करके विहित लग्नमुहूर्तमें हवन करे।

इसके पश्चात् ‘ॐ उत्तिष्ठ ब्रह्मणस्पते०’ मन्त्रसे देवमूर्तिका उत्थापन करके मन्त्रवेत्ता आचार्य ‘देवस्य त्वा०’ मन्त्रसे मूर्तिका स्पर्श करते हुए वेदोक्त पुण्याहवाचनके साथ देवप्रासादकी प्रदक्षिणा करे। इसके अनन्तर विविध रत्न, विविध धातु, लौहद्रव्य एवं विधानके अनुसार अनेक प्रकारके सिद्धबीजोंके साथ दिक्पाल आदि देवताओंकी प्रदक्षिणा विहित है। इसके अनन्तर यथास्थान प्रधान देवप्रतिमाकी प्रतिष्ठा होनी चाहिये।

देवमूर्तिको मन्दिरके मुख्य गर्भभागमें स्थापित नहीं करना चाहिये और न उस गर्भका परित्याग करके अन्यत्र ही उसकी स्थापना होनी चाहिये, अपितु गर्भभागका कुछ मध्यभाग छोड़कर उसे स्थापित करनेसे दोषका परिहार हो जाता है। अतः तिलके कणमात्र परिमाणमें मूर्तिको उत्तरकी ओर कुछ बढ़ा लेना चाहिये।

‘ॐ स्थिरो भव’, ‘शिवो भव’, ‘प्रजाभ्यश्च नमो नमः’, ‘देवस्य त्वा सवितुः०’ आदि मन्त्रोंसे गुरु देवमूर्तिका यथाविधि विन्यास एवं अभिमन्त्रण करे। साथ ही सुप्रतिष्ठित देवप्रतिमाको यथाविधान सम्पातकलशके जलसे ही स्नान कराना चाहिये।

तदनन्तर धूप-दीप, अन्य सुगन्धित पदार्थ तथा नैवेद्यसे उस देवप्रतिमाकी विधिवत् पूजा करके अर्घ्य प्रदान करे और प्रणाम निवेदन करके क्षमा-प्रार्थना करे।

उसके बाद अपनी शक्तिके अनुसार यजमान ऋत्विजोंको पात्र, वस्त्र एवं उपवस्त्र, छत्र, सुन्दर बहुमूल्य अँगूठी तथा दक्षिणा देकर संतुष्ट करे। तदनन्तर सावधान होकर यजमान चतुर्थी होम करे। सौ आहुतियोंको देकर अन्तमें वह पूर्णाहुति प्रदान करे।

इसके बाद आचार्य मण्डपसे बाहर आकर दिक्पालोंको बलि प्रदान करके पुष्प लेकर ‘क्षमस्व’ इस वाक्यसे उन देवोंका विसर्जन कर दे।

इस प्रकार यज्ञ पूर्ण होनेके पश्चात् आचार्यको कपिला धेनु, चामर, मुकुट, कुण्डल, छत्र, केयूर, कटिसूत्र, व्यजन (पंखा), वस्त्रादि वस्तुएँ, ग्राम तथा साज-सज्जापूर्ण सुन्दर भवन प्रदान करना चाहिये। तदनन्तर आचार्य तथा अन्य सहयोगीजनोंके लिये सुन्दर विशाल भोजका आयोजन कराकर सबको संतुष्ट करना चाहिये। ऐसा करनेसे यजमान कृतार्थ हो जाता है और वास्तुदेवकी प्रसन्नतासे उसे मुक्ति प्राप्त हो जाती है। (अध्याय ४८)

८२संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

वर्ण एवं आश्रमधर्मोंका निरूपण

ब्रह्माजीने कहा— हे व्यासजी महाराज! स्वायम्भुव मनु आदि शास्त्रकारोंके द्वारा पूज्य तथा सृष्टि, स्थिति और प्रलय करनेवाले भगवान् हरिकी पूजा ब्राह्मणादि चारों वर्ण अपने-अपने धर्मके अनुसार करते हैं। मैं पृथक्-पृथक् रूपसे उनके धर्मोंको कह रहा हूँ। आप उसे सुनें।

हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! यजन, याजन, दान, प्रतिग्रह, अध्ययन और अध्यापन—ये छः कर्म ब्राह्मणके धर्म हैं। दान, अध्ययन तथा यज्ञ—ये क्षत्रिय एवं वैश्यके साधारण धर्म हैं। इसके अतिरिक्त दण्ड क्षत्रियके लिये और कृषि करना वैश्यके लिये विशेष धर्म स्वीकार किया गया है।

ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य—इन तीनों द्विजातियोंकी सेवा करना शूद्रोंका धर्म है। शिल्पकारी उनकी आजीविका है। धर्मानुसार वे पाकयज्ञ-संस्थाका निर्वहन भी कर सकते हैं।

भिक्षाचरण, गुरु-शुश्रूषा, स्वाध्याय, संध्या तथा अग्नि-कार्य—ये ब्रह्मचारियोंके धर्म हैं।

चारों आश्रमोंके दो भेद माने गये हैं। इसके अनुसार ब्रह्मचारीके उपकुर्वाण तथा नैष्ठिक—ये दो भेद हैं। जो द्विज विधिवत् वेदादिका अध्ययन करके गृहस्थाश्रममें प्रविष्ट हो जाता है वह उपकुर्वाण है। जो मृत्युपर्यन्त गुरुकुलमें निवास करते हुए वेदाध्ययन करते रहते हैं—ब्रह्मतत्पर होते हैं, उन्हें नैष्ठिक ब्रह्मचारीके नामसे जानना चाहिये।

हे द्विजश्रेष्ठ! अग्निकार्य, अतिथिसेवा, यज्ञ-दान और देवार्चन—ये सभी गृहस्थोंके संक्षिप्त धर्म हैं। गृहस्थके साधक और उदासीन दो प्रकार हैं। जो गृहस्थ परिवारके भरण-पोषणमें लगा रहता है, वह साधक है। जो गृहस्थ पितृऋण, देवऋण और ऋषिऋण—इन तीनोंसे मुक्त होकर पत्नी-धनादिका भी त्याग करके एकाकी धर्माचरण करता हुआ विचरण करता रहता है, वह उदासीन गृहस्थ है। उसीको मौक्षिक भी कहते हैं।

भूमिशयन, फल-मूलका आहार, वेदाध्ययन, तप और अपनी सम्पत्तिका यथाधिकार यथोचित विभाग—ये सभी वानप्रस्थके धर्म हैं। जो वानप्रस्थ अरण्यमें तपश्चरण करता है, देवार्चन और उन्हें आहुति प्रदान करता है तथा स्वाध्यायमें सदैव अनुरक्त रहता है, वह वानप्रस्थ तापसोत्तम कहा जाता है। ऐसे ही जो वानप्रस्थ तपके द्वारा शरीरको अत्यन्त क्षीण करके ईश्वरके ध्यानमें सदा निमग्न रहता है, वह वानप्रस्थाश्रममें रहता हुआ भी संन्यासीके रूपमें जाना जाता है।

जो भिक्षु (संन्यासाश्रमी) नित्य योगाभ्यासमें अनुरक्त होकर ब्रह्मकी प्राप्तिके लिये प्रयासरत एवं जितेन्द्रिय बना रहता है, उसको पारमेष्ठिक संन्यासी कहते हैं। जो सदैव आत्मतत्त्वानुसंधानमें प्रेम रखनेवाले हैं, नित्य तृप्त हैं, जो संयम-नियमसे रहते हैं, ऐसे महामुनि योगी भिक्षु कहे जाते हैं। भिक्षाचरण, वेदाध्ययन, मौनावलम्बन, तप, ध्यान, सम्यक्-ज्ञान और वैराग्य—ये भिक्षुक (संन्यासाश्रमी)-के सामान्य धर्म माने गये हैं।

पारमेष्ठिक संन्यासी तीन प्रकारके हैं—ज्ञानसंन्यासी, वेदसंन्यासी एवं कर्मसंन्यासी। योगीके भी तीन प्रकार हैं—जिन्हें भौतिक, (क्षत्र) एवं अन्त्याश्रमी योगी कहते हैं। ये तीनों योगमूर्तिस्वरूप परमात्माका आश्रयकर स्थित रहते हैं।

इन योगियोंकी पृथक्-पृथक् ब्रह्मभावनाएँ होती हैं। प्रथम प्रकारकी ब्रह्मभावना भौतिक योगीमें रहती है। दूसरी (मोक्ष) भावना क्षत्र योगीमें रहती है, इसीको अक्षर भावना कहते हैं। तीसरी भावनाको