गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
२७२- भद्रा तथा मित्रविन्दाद्वारा श्रीकृष्णकी भार्या बननेकी कथा
काण्ड ] देवताओंद्वारा नारायणकी स्तुति ६११
मुझे प्रदान करें। इस प्रकार स्तुति कर वरुण हाथ जोड़कर वहीं स्थित हो गये। इसके बाद देवर्षि नारदने हरिकी स्तुति की।
नारदने कहा— हे विष्णो! मेरे लिये आपके नामके श्रवण तथा कीर्तनके अतिरिक्त अन्य कोई स्वादुयुक्त तत्त्व नहीं है इसलिये आप मुझे पवित्र करें। मेरी जिह्वाके अग्रभागमें आपका नाम सदा विद्यमान रहे। जिसकी जिह्वामें हरिनाम नहीं है वह मनुष्यरूपमें गदहा ही है। हे देव! मैं आपके स्वरूपको नहीं जानता, मुझपर आप कृपा करें। इस प्रकार नारद स्तुति कर देवाधिदेवके सामने स्थित हो गये। अनन्तर महात्मा भृगु स्तुति करने लगे।
भृगुने कहा— गरुड-जैसे आसनपर आसीन होनेवाले हे देव! आपके लिये कौन-सा आसन शेष रह जाता है। कौस्तुभ-जैसा आभूषण धारण करनेवाले आपके लिये और कौन-सा भूषण रह जाता है। लक्ष्मी जिनकी पत्नी हों उनको और क्या प्राप्तव्य रह जाता है। हे वागीश! आप वाणीके ईश हैं फिर आपके विषयमें क्या कहना? इस प्रकार भगवान् हरिकी स्तुति कर भृगु मौन हो गये। इसके बाद अग्निने पुरुषोत्तमकी स्तुति की।
अग्निने कहा— जिसके तेजसे मैं तेजस्वी और आज्यसिक्त हव्यका वहन करता हूँ। जिसके तेजसे मैं उदरमें प्रविष्ट होकर पूर्णशक्तिसम्पन्न हो अन्नका परिपाक करता हूँ इसलिये मैं आपके सद्गुणोंको कैसे जान सकता हूँ?
प्रसूतिने कहा— जिसके नामके अर्थका विचार करनेमें भी मुनिगण मोहमग्न हो जाते हैं और सदा जिससे देवगण भी भयभीत रहते हैं, मान्धाता, ध्रुव, नारद, भृगु, वैवस्वत आदि जिसकी प्रेमसे स्तुति करते हैं ऐसे हितचिन्तक आप विष्णुको मैं प्रणाम करता हूँ।
हे खगेश्वर ! प्रसूतिने इस प्रकार स्तुति कर मौन धारण कर लिया। तदनन्तर ब्रह्मनन्दन वसिष्ठने विनयसे अवनत होकर स्तुति करना प्रारम्भ किया।
वसिष्ठने कहा— विधाता पुरुषको नमस्कार है, असत्-स्वरूपको नष्ट करनेवाले देवको पुनः-पुनः नमस्कार है। हे नाथ! मैं आपके चरणकमलोंमें सदा नतमस्तक हूँ। हे भगवन्! हे वासुदेव! मेरी सदा रक्षा करें। इस प्रकार स्तुति करके वसिष्ठ मौन हो गये। इसके बाद ब्रह्माके पुत्र महर्षि मरीचि तथा अत्रिने अतिशय भक्तिके साथ स्तुति करते हुए नारायणको प्रसन्न किया।
तदनन्तर स्तवन करते हुए महर्षि अंगिराने कहा— हे नाथ! मैं आपके अनन्त-बाहु, अनन्त-चक्षु और अनन्त मस्तक सम्पन्न विराट् स्वरूपको देखनेमें असमर्थ हूँ। आपका यह स्वरूप हजारों-हजार मुकुटोंसे अलंकृत है। अतिशय मूल्यवान् अनेक अलंकारोंसे सुशोभित ऐसे अनन्तपार-स्वरूपकी स्तुति करनेमें भी मैं असमर्थ हूँ।
हे खगेश्वर! इस प्रकार अंगिराने स्तुति कर मौन धारण किया। इसके बाद पुलस्त्य स्तुति करनेके लिये उद्यत हुए।
पुलस्त्यने कहा— हे भगवन्! आप अपने उपासकोंके लिये जैसा मङ्गलकारी स्वरूप धारण करते हैं, उसी भुवनमङ्गल स्वरूपका दर्शन मुझे भी करायें। ऐसे रूपवाले आपको नमस्कार है। आप नरकसे रक्षा करनेवाले हैं। हे देव! मैं आपके गुणोंका वर्णन करनेमें समर्थ नहीं हूँ। हे भगवन्! मेरी रक्षा करें।
इस प्रकार स्तुति कर पुलस्त्यजी मौन हो गये। इसके अनन्तर पुलह स्तुति करने लगे।
पुलहने कहा— हे भगवन्! महापुरुषोंका कथन है कि निष्काम तथा रूपरहित भगवान्को समर्पित स्नान, उत्तम वस्त्र, दूध, फल, पुष्प, भोज्य पदार्थ तथा आराधन आदि सब व्यर्थ ही हैं तो फिर ऐसे निष्काम आपको ये सब अर्पित न करके मैं निष्काम बुद्धिसे आपको प्रणाम समर्पित करता हूँ। हे वैकुण्ठनाथ! आपके स्तवनकी शक्ति मुझमें नहीं है।
इस प्रकार स्तुति कर पुलह मौन हो गये। इसके बाद क्रतु स्तुति करने लगे।
क्रतुने कहा— हे भगवन्! प्राणोंके निकलते
६१२ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ ब्रह्म-
समय आपके नाम ही संसारजन्य दुःखोंके विनाशक हैं। जो अनेक जन्मोंके पापको सहसा विनष्ट कर निर्मल मुक्ति प्रदान करते हैं, मैं उन नामशक्तिकी शरणमें हूँ।
हे विष्णो! जो आपकी भक्ति करनेमें असमर्थ हैं और केवल आपका नाममात्र लेते हैं, वे भी मुक्तिको प्राप्त करते हैं फिर जो भक्तिपूर्वक आपका स्मरण करते हैं, उनके विषयमें तो कहना ही क्या!
ये भक्त्या विवशा विष्णो नाममात्रैकजल्पकाः ।
तेऽपि मुक्तिं प्रयान्त्याशु किमुत ध्यायिनः सदा ॥
(७। ६४)
इस प्रकार स्तुति करके क्रतु भी मौन हो गये तब वैवस्वत मनुने स्तुतिसे नारायणको प्रसन्न किया।
विश्वामित्रने स्तुति करते हुए कहा— हे भगवन्! मैंने आपके चरणकमलोंका न तो ध्यान किया और न नित्य संध्योपासना ही की। ज्ञानरूपी द्वारके किवाड़को खोलनेमें दक्ष धर्मका उपार्जन भी मैंने नहीं किया। अन्तःकरणमें व्याप्त मलके विनाश करनेमें अत्यन्त कुशल आपकी कथा भी मैंने कानोंसे नहीं सुनी, इसलिये हे देव! मुझ अनाथकी आप सदा रक्षा करें—
न ध्याते चरणाम्बुजे भगवतो संध्यापि नानुष्ठिता
ज्ञानद्वारकपाटपाटनपटुर्धर्मोऽपि नोपार्जितः ।
अन्तर्व्यासमलाभिघातकरणे पट्वी श्रुता ते कथा
नो देव श्रवणेन पाहि भगवन् मामत्रितुल्यं सदा ॥
(७।७१)
—इस प्रकार स्तुति कर महामुनि विश्वामित्र हाथ जोड़कर खड़े हो गये।
हे खगेश्वर ! क्रतुके बाद मित्रने जगत्के कारण नारायणकी स्तुति करना आरम्भ किया।
**मित्रने कहा—**संसारके बन्धनको विनष्ट करनेवाले हे देव! आप प्राणियोंको संसारसे मुक्ति दिलानेवाले हैं तथा कल्याणके निधान हैं, मैं अज्ञानी हूँ, आपके चरणारविन्दोंको मैं प्रणाम करता हूँ। आप भगवान् वासुदेव ही अपने विषयमें जानते हैं। आपके यथार्थ स्वरूपको न मैं जानता हूँ न अग्नि तथा न ब्रह्मा-विष्णु-महेश—ये तीनों देवता, न मुनीन्द्र ही जानते हैं; परम भागवत भी आपके स्वरूपको नहीं जान सकते तो अन्यकी बात ही क्या है? हे परात्पर स्वामी! आप मेरी नित्य रक्षा करें।
हे खग! इस प्रकार हरिकी स्तुति कर मित्र मौन हो गये, उसके बाद ताराने स्तुति करना प्रारम्भ किया।
**ताराने कहा—**हे विष्णो! अनन्य-भावसे जो आपके प्रति दृढ़ भक्ति करते हैं, आपके लिये जो सभी कर्मोंको त्याग देते हैं और अपने स्वजनों तथा बान्धवोंका परित्याग कर देते हैं, आपकी कथाको सुनकर जो दूसरेको सुनाते हैं और कहते हैं, इस प्रकारके ये साधुगण सभीके प्रति आसक्तिसे रहित हो जाते हैं। हे प्रभो! जैसे आप उन साधुगणों—भक्तोंकी रक्षा करते हैं वैसे ही मेरी भी सदा रक्षा करें।
**निर्ऋतिने कहा—**योगपूर्वक आपके प्रति समर्पित जन भक्तिसे परम गतिको प्राप्त कर लेते हैं। भक्त श्रद्धाभावसे की गयी सेवासे, सांसारिक विषयोंकी अनासक्ति और चित्तका निग्रह करनेसे विष्णुके परमपदको प्राप्त करते हैं, इसलिये हे प्रभो! दयापूर्वक उनके समान मेरी भी रक्षा करें।
तदनन्तर भगवान्के पार्षद वायुपुत्र महाभाग विष्वक्सेनने हरिकी स्तुति करना प्रारम्भ किया।
**विष्वक्सेनने कहा—**पूर्णानन्दस्वरूप भगवान् कृष्ण यदि सदा मोक्ष प्रदान करनेवाले हैं, यदि मेरी अपरोक्ष साधनरूपा परम भक्ति है और गुरुसे लेकर ब्रह्माण्डके साधुओंके प्रति यदि मेरी निष्कपट भक्ति है साथ ही तुलसी आदिके प्रति यदि मेरी प्रीति है और इनका सदा मुझे स्मरण है तो निश्चित ही मुझे आपका आशीर्वाद प्राप्त होगा, इसमें संदेह नहीं है।
इस प्रकार स्तुति कर महाभाग विष्वक्सेन चुप हो गये।