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गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ

१३६- मूत्राघात-निदान

२७२ संक्षिप्त गरुडपुराण [ आचार-

मनुष्यों तथा दुःशीलोंकी भूमि अर्थात् एकमात्र मदिरा ही अनेक मुखवाली दुर्गंतिकी आचार्य है। मदकी तीसरी अवस्थामें पहुँचकर मनुष्य निश्चेष्ट होता हुआ मौन होकर सोया रहता है। वह पापात्मा मरनेसे भी अधिक बुरी दशामें पहुँच जाता है। मद्यमें आसक्त मनुष्य धर्म-अधर्म, सुख-दुःख, मान-अपमान, हित-अहित, शोक-मोहकी अनुभूतिसे रहित हो जाता है। वह शोक, मोहादिसे समन्वित रहता है। ऐसा प्राणी उन्माद-भ्रम और मूर्च्छामें सदैव विद्यमान होता है और अन्ततोगत्वा मिर्गीके रोगीके समान भूमिमें गिरकर छटपटाता रहता है। जो व्यक्ति बलवान् हैं, समुचित भोजन करते हैं या यथाशक्ति प्रचुरमात्रामें भोजन करके पचा जाते हैं, उनमें मद नहीं होता है। यह मदात्ययरोग वात-पित्त तथा कफके प्रकुपित होनेके कारण उत्पन्न हुए अन्य सभी दोषोंसे होता है।

इस प्रकार वातिक, पैत्तिक, श्लैष्मिक और सन्निपातिक नामसे यह मदात्यय चार प्रकारका होता है। मोह, हृदयवेदना, पुरीषभेद, निरन्तर तृषा, कफ, पित्तज्वर, अरुचि, हृदयमें विबन्धता, अन्धकार, खाँसी, श्वास, निद्रा न आना, पसीना, विष्टम्भता, सूजन, चित्तविभ्रम, स्वप्नदर्शनसे घबड़ाहट, मना करनेपर भी बोलते रहना आदि—ये सब मदात्ययके सामान्य लक्षण हैं।

पित्तदोषके कारण मदात्यय होनेपर प्राणी दाहज्वर, स्वेद, मोह, प्यास, अतिसार और विभ्रमके कारण उपद्रवसे ग्रस्त होता है। श्लेष्मज मदात्ययरोगमें रोगी वमन, हल्लास (धड़कन), निद्रा तथा अग्निमान्द्यके कारण उदरकी गुरुताके दोषसे संत्रस्त रहता है। सन्निपातिक दोषवाले मदात्ययमें पूर्वकथित सभी लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं। यह सब जानकर जिस प्राणीकी अभिरुचि सहसा मद्यपानमें हो जाती है तो उसमें ध्वंसक और शोषक—ये वातज व्याधियाँ हो जाती हैं। ये कष्टसाध्य होती हैं और विशेषकर दुर्बल मनुष्यको होती हैं।

ध्वंसकमें कफकी प्रवृत्ति, कण्ठशोष, अतिनिद्रा, शब्दका न सहना होते हैं, विक्षय (शोषक)-रोगमें चित्तविक्षेप, अङ्गमें पीड़ा, हृदय तथा कण्ठमें रोग, सम्मोह, खाँसी, तृष्णा, वमन तथा ज्वर होते हैं। अतः जो व्यक्ति जितेन्द्रिय हो, वह इन सभी बातोंपर विधिवत् पहले विचार करे। तदनन्तर वह मद्यके दोषसे अपनेको दूर कर ले। इसीमें उसका कल्याण है। मद्यसे दूर रहनेवाला शारीरिक तथा उन्माद आदि मानसिक विकारोंसे कभी कष्ट नहीं पाता है।

रजोगुण, तमोगुणकी प्रधानतावाले मोहजन्य दोष तथा असंयमित आहार करनेवाले प्राणीको मद, मूर्च्छा और संन्यास नामक तीन प्रकारके रोग होते हैं। यथा—शरीरमें इनका प्रकोप होनेपर ये तीनों रोग रस, रक्त और चेतनाके ही स्रोतोंके निरोध हो जानेसे होते हैं। इनमें मदसे मूर्च्छा और मूर्च्छासे संन्यास उत्तरोत्तर बलवान् होते हैं।

मदात्ययरोग मद, वात, पित्त, कफ तथा सन्निपातके दोषोंसे तो होता ही है, किंतु रक्त, मद्य और विषके कारण भी यह शरीरमें उत्पन्न हो जाता है। शरीरमें शक्तिकी अनन्तता न होनेके कारण जब शक्ति क्षीण हो जाती है तो प्राणी अपनी शक्तिका आभासमात्र करता है। उसकी चित्तवृत्तियाँ चञ्चल हो उठती हैं। वह छल-कपटके व्यवहारसे घिरा रहता है।

वातज मद्यसे मनुष्यका शरीर रूक्ष-श्याम और अरुण-वर्णका हो जाता है। पित्तज मद्यसे प्राणी क्रोधी हो उठता है। उसके शरीरका वर्ण लाल और पीला हो जाता है। वह कलहमें अभिरुचि लेता है। कफोत्पादक मदात्ययमें रोगी जब सोता है तो उसे स्वप्न दिखायी देते हैं। स्वप्नमें असम्बद्ध,

काण्ड ] मदात्यय-निदान २७३


अनर्गल प्रलाप करता है। उसकी चित्तवृत्तियाँ किसी विशेष ध्यानमें एकाग्र होकर अनुरक्त रहती हैं। सभी दोषोंके कारण उत्पन्न होनेवाले सन्निपातजनित मदमें प्राणीका वर्ण रक्त हो जाता है और उसके शरीरमें स्तम्भन होने लगता है, जिसके कारण उसके अङ्ग-अङ्ग शिथिल हो जाते हैं।

इस मदात्ययरोगमें तो प्राणीके शरीरमें पित्तदोष सर्वप्रथम ही प्रकट हो जाता है। उसकी समस्त शारीरिक चेष्टाएँ विकृत हो जाती हैं। उसे तृष्णा, स्वरभंग तथा अज्ञानकी अवस्था प्राप्त होती है। उसको सद्-ज्ञान नहीं रह जाता है। विषज मदमें शरीरमें कम्पन होता है। वह गहन निद्रामें सोता है और उसको इस मदात्ययरोगमें अत्यधिक थकानकी अनुभूति होती है।

मनुष्यको शरीरके अंदर विद्यमान रक्त, मज्जादिमें उभरे हुए वात-पित्त तथा कफजनित दोषोंके लक्षणोंको देखकर यथापेक्षित वातज, पित्तज, कफज या सन्निपातज मदात्ययका निर्धारण करना चाहिये और उसी रोगके अनुसार चिकित्सा भी करनी चाहिये। यथा—वातज, मदात्यय (मूर्च्छा) होनेपर सामान्यतः रोगी आकाशको लाल-नीला अथवा काला रंग देखता हुआ अपनेको अन्धकारमें पहुँचा हुआ मूर्च्छित मानता है। शीघ्र मूर्च्छा टूटनेपर वह हृदयकी पीड़ा—कम्पन तथा भ्रमसे संतप्त रहता है।

जो व्यक्ति वातिक मदात्ययदोषसे ग्रस्त होता है उसे खाँसी आती है और कान्ति पीली एवं लाल रंगकी हो जाती है। वह अधिकतर मूर्च्छामें ही रहता है। पित्तात्मक दोषकी सामान्यतः परिणतिमें रोगीको आकाश रक्त अथवा पीतवर्णका प्रतीत होता है और अन्तमें उसे अन्धकार-ही-अन्धकार दिखायी देता है। उस समय उसको विशेष प्रकारका ज्ञान प्राप्त होता है। उसके शरीरसे पसीना निकलता है। वह शरीरमें उत्पन्न हुए दाह, तृष्णा तथा तापसे पीड़ित हो उठता है। कफसे संश्लिष्ट होनेपर रोगीको एक छिन्न-भिन्न होती हुई नीली-पीली आभा दिखायी देती है। उसके लाल, पीले और नीले नेत्रोंमें व्याकुलता छायी रहती है। कफज मूर्च्छामें रोगी आकाशको मेघोंसे आच्छन्न देखता हुआ मूर्च्छित हो जाता है। उसे गहन निद्रा आती है, इसलिये उसकी नींद बहुत देरके बाद टूटती है। होशमें आनेपर उसके हृदयमें धड़कन होती है और प्राण सूखते हुए प्रतीत होते हैं। उक्त दोषके कारण उत्पन्न हुए भारीपन और आलस्यके वशीभूत हुए अङ्गोंसे उसको ऐसी अनुभूति होती है, जैसे शरीर राजधर्मसे अनुप्राणित पुरुषों (सिपाहियों)-के द्वारा प्रताड़ित किया गया है। इन सभी दोषोंका प्रभाव जब एक साथ शरीरपर पड़ता है तो सन्निपातकी अवस्था आ जाती है। उस कालके मदात्ययमें प्राणीका सम्पूर्ण शरीर (अपस्मार) मिर्गी के रोगसे ग्रस्त हुएके समान पृथ्वीपर गिर पड़ता है। अपस्मारमें रोगीकी चेष्टा बीभत्स हो जाती है और इसमें नहीं होती है।

वातादिक दोषोंके वेग समाप्त होनेके कारण उत्पन्न मदात्ययकी मूर्च्छा और अन्य उपद्रवोंसे ग्रस्त प्राणियोंके कष्टोंका उपशमन बिना औषधिक उपचारके ही संयमित रहनेसे स्वयमेव हो जाता है। परंतु संन्यासका रोग औषधके बिना शान्त नहीं होता। इस मदात्ययकालमें वाचिक, शारीरिक तथा मानसिक चेष्टाओंके दबावमें निर्बल प्राणी स्वयं प्राणाघात ही करते हैं। जिससे वे मरे हुएके समान काष्ठवत् हो जाते हैं। यदि उनकी चिकित्सा शीघ्र नहीं की जाती है तो वे अविलम्ब ही मर जाते हैं।


१-अ०हृ०नि०अ० ६। २-सु०उ०तं०अ० ४६, अ०हृ०नि०अ० ६ ।

२७४संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

ग्राहादिक हिंसक जलचरोंसे भरे हुए अथाह जलराशियाले समुद्रके समान इस संन्यास मदात्ययरोगके सागरमें डूब रहे प्राणीकी शीघ्र ही रक्षा करनी चाहिये। उसमें मद, मान, रोष, संतोष आदि विभिन्न प्रवृत्तियाँ होती हैं। उन्हीं प्रवृत्तियोंके द्वारा वह यहाँ-वहाँसे उचित और अनुचितका विचार करके यथापेक्षित कार्यमें सामान्य विधिका प्रयोग करता है, किंतु अयुक्तिपूर्वक मद्यपानसे प्रभावित दशामें ऐसा सम्भव नहीं है। उसे कर्तव्याकर्तव्यका ज्ञान नष्ट हो जाता है। (अध्याय १५५)

अर्श ( बवासीर )-निदान

धन्वन्तरिजीने कहा—हे सुश्रुत ! अब मैं अर्श (बवासीर) नामक रोगके निदानका विषय बताऊँगा।

प्राणियोंके मांसमें जो कीलक सदा उत्पन्न होते हैं, वे कीलक गुदाके द्वारका अवरोध करते हैं, इसलिये उन्हें अर्श कहा जाता है। वात-पित्त तथा कफजन्य दोष शरीरमें स्थित त्वक्, मांस और मेदको दूषित करके अपानवायुके मार्गमें अनेक आकृतियोंवाले मांसांकुरोंको जन्म देता है, उन अंकुरोंको अर्श माना गया है। जो अर्श शरीरके साथ ही उत्पन्न होता है, उसे 'सहज' और जो जन्म लेनेके बाद उत्पन्न होता है, उसे 'जन्मान्तरोत्थान' कहते हैं। इस दृष्टिसे अर्शके दो भेद हुए। प्रकारान्तरसे इसके दो भेद और हैं—एक शुष्क (वादी बवासीर) और दूसरा है स्रावी (खूनी बवासीर)। गुदा नामक स्थानका आश्रय लेकर अवस्थित रहनेवाली शुष्क अग्रभागसे युक्त परस्पर भिन्न नाड़ियोंका स्थान है। गुदाभागका परिमाण साढ़े पाँच अंगुलका होता है। उसीमें नीचेकी ओर साढ़े तीन अंगुलके भागमें ये रोग स्थित रहते हैं। उनमें एक नाड़ी बालोंको जन्म देनेवाली शक्तिका सञ्चार करती है और एक नाड़ी आँतके मध्यभागसे होकर नीचेकी ओर आती है। यही आमाशयसे निकलनेवाले मलको लाकर गुदामार्गसे बाहर करती है। उसी विसर्जन कार्यके कारण उसे विसर्जनी नाड़ीके नामसे अभिहित किया गया है। उस विसर्जनी नाड़ीके बाह्यभाग अर्थात् गुदाके मुख-द्वारके बाह्यभागमें एक अंगुलका जो स्थान है, उसीमें इन मांसांकुरोंका जन्म होता है। उसके बाद डेढ़ अंगुलके परिमाणभागमें गुदौष्ठके परे रोमवती त्वचा है, जिसपर रोम नहीं उत्पन्न होते हैं। वहींपर सहोत्थ अर्शका कारण विद्यमान रहता है, जो बाल्यकालमें उपतप्त अर्थात् सहोत्थ दोषको उत्पन्न करनेकी सामर्थ्यसे युक्त हो जाता है।

प्राणियोंमें इस अर्शरोगका बीज तो माता-पिताके कुपथ्यसे उत्पन्न होता है। देवताओंके प्रकुपित होनेपर तो यही दूसरे रूपसे सान्निपातिक दोषका भी बीज बन जाता है। प्राणियोंमें इस प्रकारके जो कुल (वंश)-क्रमागत रोग होते हैं, वे सभी असाध्य माने गये हैं। सहजोत्थ अर्श तो विशेषरूपसे देखनेमें दुःसाध्य, अन्तर्मुखी, पाण्डुवर्ण सन्निहित और भयंकर उपद्रव मचानेमें समर्थ होते हैं। शरीरके वात-पित्त तथा सन्निपातदोषके अनुसार इनको वातिक, पैत्तिक, श्लेष्मिक, संसर्गज, त्रिदोषज तथा रक्तज रूपमें नियोजित किया जा सकता है। अर्थात् इन सहजोत्थ अर्श दोषके यही छः प्रकार हैं।

इनमेंसे शुष्क अर्श वात और कफसे होते हैं और आर्द्र अर्श रक्त एवं पित्तसे होते हैं। उसके दोषके प्रकोपका कारण तो पहले ही कहा जा चुका है। इसके अतिरिक्त उदरस्थ अग्निमान्द्य तथा


१-प्रवाहिणी, संवरणी और विसर्जनी।
२-च०चि०अ० १४, सु०नि०अ० २, अ०हृ०नि०अ० ७।