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गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ

१४८- ज्वर, अतिसार आदि रोगोंका उपचार

काण्ड ]वैद्यकशास्त्रकी परिभाषा३०७

हे सुश्रुत! सभी रोगोंके ज्ञान एवं मनुष्यादि समस्त प्राणियोंकी आयुवृद्धिके लिये मैंने आत्रेय मुनिद्वारा कथित उनके निदानको भली प्रकारसे बतला दिया है। अतः उसी प्रकारसे सभी रोगोंका विचार करके चिकित्सकको तत्सम्बन्धित रोगकी चिकित्सा करनी चाहिये।

मधु, घृत और गुड़से संयुक्त त्रिफला (हरीतकी, आमलकी और बहेड़ा)-चूर्ण सभी रोगोंका विनाशक है। त्रिफला-चूर्णको यदि केवल जलके साथ नित्य-प्रातः प्रयोगमें लाया जाय, तब भी वह सभी रोगोंका नाश करनेवाला होता है। शतावरी, गुडूची, चित्रक और विडंगके साथ भी प्रयुक्त त्रिफला सभी रोगोंको विनष्ट कर देती है। शतावरी, गुडूची, अग्निमन्थ, चित्रा, सोंठ, मूसली, बला, पुनर्नवा, बृहती, निर्गुण्डी, निम्बपत्र, भृंगराज, आँवला तथा वासक अथवा उसके ही रससे सात बार या एक बार भावित त्रिफला सभी रोगोंका निवारक है। पूर्वोक्त कही गयी औषधियोंकी जैसी प्राप्ति हो, उसी प्रकारसे उनके द्वारा तैयार चूर्ण, मोदक, वटी, घृत, तेल अथवा क्वाथ भी सर्वरोगहर्ता है। उनकी आनुपातिक मात्रा एक पल, आधा पल, एक कर्ष अथवा आधा कर्ष रोगीके लिये उपादेय मानी गयी है।

(अध्याय १६७)

वैद्यकशास्त्रकी परिभाषा

धन्वन्तरिजीने कहा—हे सुश्रुत! प्राणियोंके जीवनकी रक्षाके कारणस्वरूप, समस्त रोग-विनाशक, सिद्ध, औषधीय योगसारका संक्षेपमें वर्णन कर रहा हूँ, उसे आप सुनें।

वर्षा-ऋतुमें कसैले, कटु, तिक्त और रूक्षादि गुणोंवाले खाद्य-पदार्थोंके सेवनसे, चिंता, मैथुन, व्यायाम, भय, शोक, रात्रि-जागरण करने तथा उच्च स्वरमें बोलनेसे, अधिक भार-वहन तथा सामर्थ्यसे अधिक शारीरिक शक्तिका प्रयोग करनेसे एवं भोजनके पाचनकालमें और संध्यासमयमें प्राणियोंके शरीरकी वायु कुपित हो जाती है।

ग्रीष्म और वर्षा-ऋतुके मध्याह्नकालमें उष्ण, अम्ल, लवण, क्षार, कटु एवं अजीर्ण भोजन, तेज धूप, अग्नि-संताप, मद्यपान तथा क्रोधावेगका अवरोध करनेसे प्राणियोंका पित्त प्रकुपित होता है। यह दोष ग्रीष्मकालकी अर्द्ध रात्रियोंमें भी हो सकता है।

वसन्त-ऋतुमें स्वादिष्ट, अम्ल, लवण, स्निग्ध, भारी और शीतल भोजनका अधिक प्रयोग, नवान्न, चिकने पदार्थ तथा दलदलवाले स्थानोंमें विचरण, मांसादि सेवन, सहसा व्यायामसे विरक्ति, दिनमें शयन, शय्या और आसनादिक सुखोपभोग प्राप्त करनेसे और भोजनके अन्तमें प्राणियोंका कफ संक्षुब्ध हो उठता है।

शारीरिक कर्कशता, संकोच, सूचिकाभेद पीड़ा, विष्टम्भ, अनिद्रा, रोमाञ्च, स्तम्भ, शुष्कता, श्यामलत्व, अङ्ग-विभ्रंश, बलहानि और परिश्रमजन्य थकान आदिके उपद्रव वात-दोषके लक्षण हैं। अतः उन सभी उपद्रवोंसे समन्वित रोगको वातात्मक रोग कहना चाहिये।

दाह, पैरमें जलन, पसीना, क्रोध, परिश्रम, कटु, अम्ल, शव-समान दुर्गन्ध, स्वेदराहित्य, मूर्च्छा, अत्यन्त तृष्णा, भ्रम, हल्दीके समान पीला और हरा रंग होना—ऐसे लक्षणोंवाला मनुष्य पित्त-दोषसे समन्वित माना जाता है।

शरीरमें स्निग्धता, माधुर्य, बन्धनके समान पीड़ा होना, निश्चेष्टता, तृप्ति, संघात, शोथ, शीतलताकी अनुभूति, भारीपन, मलाधिक्य, खुजली और अधिक निद्रा—ये सब लक्षण कफसे उत्पन्न होते हैं।

३०८संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

कारण, लक्षण और संसर्गसे रोगको पहचानना चाहिये। जो रोग वात, पित्तादि दोषोंमेंसे किन्हीं दो दोषोंसे उत्पन्न हो, वह द्विदोषज रोग कहलाता है और जिस रोगमें सभी वात, पित्त तथा कफजन्य दोषोंके लक्षण व्यक्त हों, उसे त्रिलिंग या संनिपातिक रोग कहा जाता है।

प्राणियोंका यह शरीर दोष, धातु तथा मलका आधार कहा जाता है। उन सभीका शरीरमें समत्व भावसे रहना आरोग्य या निरोगता है। उनमें कमी और वृद्धि रोगका कारण है। वसा, रक्त, मांस, मेदा, अस्थि, मज्जा तथा शुक्र—ये सात धातुएँ हैं। वात, पित्त तथा कफ—ये तीन दोष हैं और विष्ठा तथा मूत्र आदि मल कहे जाते हैं।

वायु शीतल, रूक्ष, लघु, सूक्ष्म, स्वरविहीन, स्थिर तथा बली होता है। पित्त अम्ल (खट्टा), कटु (तीक्ष्ण), उष्ण और पङ्किल रोगोंका कारण है। कफ मधुर, लवण, स्निग्ध, भारी तथा अधिक चिकना होता है।

वायु शरीरमें गुदाभाग और कटिप्रदेशका आश्रय लेता है। पित्त पक्वाशयमें स्थित रहता है और कफका आश्रय-स्थान आमाशय, कण्ठ तथा मस्तकका संधि-भाग है।

कटु, तिक्त और कसैले पदार्थोंका सेवन करनेसे वायु प्रकुपित होता है। कटु, अम्ल तथा लवण पित्तको स्वादिष्ट, उष्ण और लवण पदार्थ कफको प्रकुपित करते हैं। अतः इन सभीका विपर्यय शरीरमें उन दोषोंकी शान्तिके लिये ही प्रयुक्त होना चाहिये। यथापेक्षित अपने-अपने स्थानपर प्रयुक्त सुखके कारणभूत पदार्थ रोगियोंके रोगका उपशमन करते हैं।

मधुर भोज्य पदार्थ नेत्रशक्ति, रस और धातुके अभिवर्धक हैं। अम्लमिश्रित होनेपर वे ही मन और हृदयकी संतृप्ति, जठराग्निका उद्दीपन तथा पाचनशक्तिको प्रबल बनाते हैं। तिक्त पदार्थ अग्निके उद्दीपक, ज्वर, तृष्णा-विनाशक, शोधन और शोषण करनेवाले हैं। कषाय पदार्थ पित्तवर्धक, स्तम्भक, कण्ठग्रहादि दोष-विनाशक तथा शरीर-शोषक होते हैं।

जो द्रव्य-पदार्थ प्राणियोंके शरीरमें स्थित रस और वीर्यको विशेष रूपसे परिपक्व करनेका आधार होता है, वह उत्तम माना गया है। रस-परिपाकके मध्य स्थायी रूपसे स्थित वह पदार्थ यथाशीघ्र ही अन्य सभी द्रव्योंका भी आश्रय बन जाता है। शीतलता, उष्णता और लवणताके गुणोंको धारण करनेवाला पदार्थ वीर्य अथवा शक्ति ही है।

रस-परिपाक दो प्रकारका होता है। एक है मधुर और दूसरा है कटु।

वैद्य, औषधि, रोगी तथा परिचारक (रोगीकी सेवा करनेवाला)—की सम्पत्ति—ये चार चिकित्साके अङ्ग हैं। इन चारोंकी उत्तमता होनेपर रोग यथाशीघ्र दूर हो जाता है और इनके विपरीत हो जानेपर तो रोगकी असिद्धि ही होती है।

देश, काल, रोगीकी आयु, शरीरमें अग्निका बलाबल, प्रकृति, त्रिदोषों (कफ-पित्त और वायु)—का साम्य-वैषम्य, रोगीका स्वभाव, औषधि, रोगीके शरीरका सत्त्व, सहनशक्ति तथा रोगका भलीभाँति विवेचन करके ही विद्वान् चिकित्सकोंको चिकित्सा-कार्यमें प्रवृत्त होना चाहिये।

अधिक जलाशय तथा पर्वतोंवाला देश अनूप कहलाता है। यह देश कफ तथा वायुको प्रकुपित करता है। वनाच्छादित अथवा अन्यान्य शिखर तथा शाखाओंवाला देश रक्त-पित्तज दोषोंका जनक है। इन सभी लक्षणोंसे जो देश समन्वित होता है, वह सामान्य देश कहा गया है। मनुष्य सोलह वर्षपर्यन्त बालक, सत्तर वर्षतक मध्यम (युवा एवं प्रौढ़) और सत्तर वर्षके पश्चात् वृद्ध कहा जाता है।

काण्ड ] वैद्यकशास्त्रकी परिभाषा ३०९

प्रायः कफ, पित्त और वायु जैसा क्रम दिया गया है, वैसे ही शरीरमें ये उद्दीप्त होते हैं। शरीरके शक्तिहीन होनेपर अथवा विशेष वृद्धावस्थाके आ जानेपर रोगी क्षारक्रिया, अग्निचिकित्सा और शल्यकर्म-रहित होता है। कृशकाय रोगीका बृंहण, स्थूल शरीरवाले रोगीका कर्षण और मध्य शरीरवाले रोगीका रक्षण-कार्य करना चाहिये। शरीरके ये ही तीन भेद माने गये हैं। चिकित्सा-कार्यमें इस त्रिविध क्षमताका विवेचन भी अपेक्षित होता है।

स्थिरता, व्यायाम और संतोष-धारण करनेकी प्रवृत्तिसे रोगीके बलको समझना चाहिये। जो मनुष्य विकार-रहित, उत्साह-सम्पन्न तथा महासाहसिक होता है, वह बलवान् माना गया है। जिस प्राणीके खान-पान भी प्रकृतिके विरुद्ध हैं, यदि वे रोगीके शरीरमें आनेवाले कलके सुखकी कल्पनाको साकार करते हैं तो उसको प्रकृतिकी साम्यावस्था कहा जाता है।

कफजन्य पदार्थोंका भक्षण करनेसे गर्भिणी स्त्रीके गर्भसे कफ-रोगसे युक्त संतान ही उत्पन्न होती है। इसी प्रकार वातजनक तथा पित्तोत्पादक पदार्थोंसे भी होता है, किंतु हितैषी भोजन करनेसे समान धातुवाली संतानका जन्म होता है।

कृशकाय, रूक्ष, अल्पकेश, चञ्चलचित्त तथा स्वप्नमें बहुत बोलनेवाला व्यक्ति वात-प्रकृतिवाला होता है। असमयमें ही जिसका बाल सफेद हो गया हो, गौर वर्णवाला, स्वेद एवं क्रोधयुक्त, बुद्धिमान् और स्वप्नमें भी तेज देखनेवाला मनुष्य पित्त-प्रकृतिसे समन्वित कहा गया है। स्थिरचित्त, सूक्ष्मस्वर, प्रसन्न, स्निग्धकेश तथा स्वप्नमें जल और पत्थर देखनेवाला पुरुष कफ-प्रकृतिसे सम्बन्धित होता है। मिश्रित लक्षणोंके होनेपर प्राणीको द्विदोषज तथा त्रिदोषज मानना चाहिये। प्राणीमें उक्त दोषोंका इतर भाव होनेपर जिस दोषके अधिक लक्षण दिखायी देते हों, उसीके अनुसार उसकी प्रकृतिका निर्धारण होता है।

मन्द, तीक्ष्ण, विषम और सम—ये वात-पित्त आदिकी चार अवस्थाएँ हैं। कफ, पित्त तथा वायुकी अधिकता और समतासे जठराग्नि भी भिन्न प्रकारकी हो जाती है। शरीरमें सदैव जठराग्निकी समताकी रक्षा करनी चाहिये। विषम स्थिति आनेपर वातनिग्रह करना चाहिये। तीक्ष्णावस्था होनेपर पित्त-दोषका प्रतीकार और मन्दावस्थामें कफका शोधन आवश्यक माना गया है।

सभी रोगोंकी उत्पत्तिके कारण अजीर्ण और मन्दाग्नि-दोष हैं। आम, अम्ल, रस तथा विष्टम्भ—ये चार उसके लक्षण हैं। आम-दोष होनेपर विषूचिका, हृदयरोग और आलस्यादिके उपद्रव होते हैं। ऐसा विकार होनेपर वच, कटुफल और लवणमिश्रित जलपान कराकर रोगीको वमन कराना चाहिये। अम्ल-दोष होनेपर प्राणीमें शुक्रका अभाव, भ्रम, मूर्च्छा और तृष्णा आदिके दोष जन्म लेते हैं। इस अवस्थामें अग्निपर बिना पकाया हुआ शीतल जल, वायुका सेवन रोगीके लिये अपेक्षित है। रस-दोष होनेपर शरीरभंग, शिरोजाड्य तथा भोजनकी अनिच्छा आदिसे सम्बन्धित उपद्रव होते हैं। इस दोषके होनेपर दिनमें निद्रा और उपवासका परित्याग करना चाहिये। विष्टम्भ-दोष होनेपर शूल, गुल्म, अरुचि और मलमूत्रजनित उपद्रव होते हैं। इस दोषकी वृद्धि होनेपर स्वेदन-क्रिया तथा लवणमिश्रित जलपान करनेका विधान है।

आम, अम्ल और विष्टब्धके लक्षणोंका जन्म क्रमशः—कफ, पित्त तथा वायु-दोषके कारण होता है। विद्वान् व्यक्तिको इन दोषोंके होनेपर हींग, त्रिकटु (शुण्ठी, पिप्पली और मरिच) एवं सेंधा नमकका लेप उदरभागपर करके उसका निवारण करना चाहिये। दिनमें सोनेसे सभी प्रकारके अजीर्ण रोगोंका विनाश होता है। अहितकर अन्नोंका प्रयोग करनेसे शरीरमें उनके रोग-समूहोंकी

३१०संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

उत्पत्ति होती है; अतएव अहितकर अन्नका सदैव परित्याग करना चाहिये।

केवल उष्ण जल अथवा मधु (माक्षिकभस्म)-के साथ उष्ण जलका पान करनेसे रोगीकी पाचन-क्रिया शुद्ध रहती है। बंसांकुर, दही और मछलीसे प्रायः दूधका विरोध होता है। बिल्व, शोणा (श्योनाक), गम्भारी (श्रीपर्णी), पाटला (पाढर) और अग्निमन्थ—इन पाँच वृक्षोंके मूल संग्रहको आयुर्वेदमें 'पञ्चमूल' कहा गया है। ये पञ्चमूल मन्दाग्निको तीव्र करनेवाले, कफ और वातके दोषका विनाश करनेवाले हैं। शालपर्णी (एकाङ्गी नामक औषधि), पृश्निपर्णी (पेठवन), दो प्रकारकी बृहती (भटकटैया) तथा गोक्षुर (गोखरू)—इन पाँचोंको 'लघुपञ्चमूल' कहा जाता है। यह औषधि वात-पित्त-विनाशक तथा ओजवर्धक है। इन दोनों पञ्चमूलोंका संग्रह होनेपर दशमूल औषधिका निर्माण होता है। यह औषधि संनिपातिक ज्वरका विनाश करनेमें समर्थ होती है। खाँसी, श्वास, तन्द्रा और पार्श्वशूल-रोगमें यह अधिक लाभकारी होती है। इन सभी औषधियोंको तेल और घृतमें परिपक्व करके केशरोगका निवारण किया जा सकता है।

क्वाथसे चौगुना पानी पात्रमें भरकर उसको आगपर पकाना चाहिये। जब वह चतुर्थांश पानी रह जाय, तब उस क्वाथके समान मात्रामें स्नेहिल द्रव्य—पदार्थका पाक तैयार करे। यह स्नेहपाक* दूधसे भी तैयार किया जाता है। अतः उस क्वाथमें दूधकी मात्रा समान होनी चाहिये। कल्क बनानेके लिये स्नेहकी मात्रासे औषधिकी मात्रा चतुर्थांश ही होती है। पाक समान मात्रामें औषधियोंको लेकर तैयार होता है। वस्ति-पाक और पाय-पाकमें भी जलकी मात्रा और विधि समान ही होती है। अभ्यङ्ग अर्थात् शरीरमें मालिश करनेके लिये तैयार किया गया पाक खर तथा नस्यके लिये मृदु होना अपेक्षित है।

अन्यान्य दोषोंसे सदैव सुरक्षित रखनेके लिये चिन्तनीय स्थूल कर्मेन्द्रियोंके बीच प्राणीकी जो प्रकृति अपनी बलवत्ताके साथ विद्यमान रहती है, उसीको आरोग्य कहते हैं। अतः प्राणीको आयुष्मान् बने रहनेके लिये तत्सम्बन्धित आचरण करना चाहिये। जो मनुष्य अपनी इन्द्रियोंके द्वारा स्वास्थ्य-विपरीत पदार्थोंको ग्रहण करता है, वह मृत्युका पात्र बन जाता है। जो चिकित्सक, मित्र और गुरुके साथ द्वेष करनेवाला तथा शत्रुस्नेही होता है, जिसके गुल्फ, जानु, ललाट, हनु (ठोढ़ी) और गण्डस्थल भ्रष्ट तथा स्थानच्युत हो जाते हैं, वह व्यक्ति कुछ ही कालमें अपने प्राणोंका परित्याग कर देता है।

जिस रोगी मनुष्यकी बायीं आँख बैठ गयी हो, जिह्वाका वर्ण श्याम पड़ गया हो, नासिका-भाग विकारयुक्त हो गया हो, दोनों ओष्ठ स्थानच्युत और कृष्णवर्णके हो गये हों तथा मुख भी कृष्णवर्णका हो गया हो तो चिकित्सकको चाहिये कि उसका परित्याग कर दे; क्योंकि उसकी मृत्यु संनिकट ही होती है। (अध्याय १६८)


* आयुर्वेदमें स्नेहपाकके तीन प्रकार बताये गये हैं—मृदु, मध्यम और खर।
तत्र स्नेहौषधिविवेकेमात्रं यत्र भेषजं मृदुः।
मधूच्छिष्टमिव विशदमविलेपि यत्र भेषजं स मध्यम। वृष्णमवसन्नमपिद्विशदं चिक्कणं च पत्र भेषजं स खरः॥
स्नेहपाकोऽथ कल्के स्यान्मृदुरङ्गुलिलेपिनि। न गृह्णात्यङ्गुलिं मध्यः शीर्यमाणः खरः स्मृतः॥
जब स्नेहकार्तमें प्रयुक्त औषधि पकाते-पकाते यह सिद्ध हो जाय कि यह पक गयी है अर्थात् औषधि कलछीसे लगने लगे तो उसको मृदु-पाक कहते हैं। जब वह कल्क मोमके समान कड़ाहीमें फैल जाय और कलछीमें चिपके नहीं, तब वह मध्यम-पाक कहा जाता है। जब कल्क कठिन और कुछ चिकना हो जाता है तो उसको खर-पाक कहते हैं। इसके अतिरिक्त अन्य लोगोंका विचार है कि जब कल्क अँगुलीपर चिपके और उसमें नरमी हो तो वह मृदु-पाक है। जो कल्क अँगुलीपर न चिपके और नरम हो, वह मध्यम तथा जो कल्क पककर कठिन हो जाय, वह खर होता है।