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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

by महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद

Source: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished759 pages

About this granth

The Prashastapada Bhashya (प्रशस्तपादभाष्यम्), also titled Padarthadharmasangraha, is the most influential early work of the Vaisheshika school. Rather than glossing Kanada's sutras one by one, it sets out the system as a whole, examining the shared and distinct properties of the six categories: substance, quality, action, universal, particularity and inherence. Later Vaisheshika and Nyaya-Vaisheshika writing builds on it.

This edition is the first volume of the Ganganatha Jha Granthamala of Sampurnanand Sanskrit University, Varanasi. It prints the Bhashya with Shridhara Bhatta's classic Nyayakandali commentary and an introduction by Vice-Chancellor Dr. Mandan Mishra; Pt. Durgadhar Jha Sharma edited it and added a Hindi commentary. The scanned copy is the second edition of 1997.

The Hindi notes take up questions such as variant sutra numbering, the status of absence as a category, the qualities of earth, atomic combination, and fallacies of reason. It is a standard aid for advanced students of Indian philosophy.

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ११

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प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ११
न्यायकन्दली
रविशेषात् । वक्तृप्रामाण्यानुसरणन्तु स्वरूपविपर्य्यासहेतोर्दोषस्याभावावगमाय । प्रत्यक्ष इव
स्वकारणशुद्धेरनुगमो विपर्य्यासशङ्कानिरासार्थ इत्येषा दिक् । विस्तरस्त्वद्वयसिद्धौ द्रष्टव्यः ।
ननु कार्य्येऽर्थे शब्दस्य प्रामाण्यं न स्वरूपे, वृद्धव्यवहारेष्वन्वयव्यति-
रेकाभ्यां कार्य्यान्वितेषु पदानां शक्त्यवगमात् । अतो वेदान्तानां न स्वरूपपरतेति
दोनों शब्दों के सामर्थ्य में कोई अन्तर नहीं है । (प्रमात्व के) स्वरूप के
विपर्य्यासरूप अप्रमात्व के प्रयोजक दोषों के अभाव को जानने के लिए ही लौकिक
वाक्यों में वक्ता के प्रामाण्य का अनुसन्धान किया जाता है । जैसे प्रत्यक्ष में स्वरूप
विपर्य्यास, अर्थात् अप्रमात्व की शङ्का को हटाने के लिए उसके कारणों की शुद्धि
का अनुसन्धान किया जाता है । यह केवल इस विषय का दिग्दर्शन मात्र है,
इसका विशेष विचार हमारे 'अद्वयसिद्धि' नामक ग्रन्थ में देखना चाहिए ।
(प्र.) कोई (प्रभाकर) कहते हैं कि कार्य्यत्वविशिष्ट अर्थ में ही शब्द की शक्ति है ।
'स्वरूप' अर्थात् कार्य्यत्व से असम्बद्ध केवल अर्थ में ही नहीं । क्योंकि अन्वय और
व्यतिरेक से वृद्धों से व्यवहृत कार्य्यत्वविशिष्ट अर्थ में ही शक्ति गृहीत होती है¹ । अतः
वेदान्त वाक्य भी स्वरूप अर्थात् कार्य्यत्व से असम्बद्ध अर्थ के बोधक नहीं हैं² ।
साधकतम करण नहीं है। एवं यथार्थानुभव से उत्पन्न स्मृति अप्रमा न होती हुई भी
प्रमाणजन्य न होने के कारण प्रमा नहीं है । जिस यथार्थानुभव से उत्पन्न होने के कारण
जिस स्मृति में प्रमात्व की सम्भावना है, उस यथार्थ पूर्वानुभव का करण उस
स्मृतिविषय-विषयक उसी यथार्थानुभव को उत्पन्न करने के कारण तज्जनित स्मृति की
उत्पत्ति के समय में ज्ञातज्ञापक हो जाता है सुतरां उससे स्मृति में प्रमात्व की सम्भावना
नहीं है । तस्मात् उक्त स्मृति में अयथार्थभिन्नत्वप्रयुक्त कदाचित् प्रमात्व का गौण व्यवहार हो
भी,तथापि उसके करण में प्रमाणत्व के व्यवहार की सम्भावना नहीं है ।

  1. शब्द की शक्ति को ग्रहण करने की स्वाभाविक रीति यह है कि जिस स्थल में एक व्यक्ति
    दूसरे व्यक्ति से कहता है कि 'गामानय', अर्थात् गाय ले आओ, अथवा गां बन्धय अर्थात्
    गाय को बाँध दो । तब वह व्यक्ति गाय ले आता है या बाँध देता है । अगर उस स्थान
    पर कोई ऐसा व्यक्ति खड़ा रहता है जिसे 'आनय' या 'बन्धय' रूप क्रियापद के अर्थ का
    ज्ञान है; किन्तु उस क्रिया के कर्म के बोधक 'गाम्' इस पद के अर्थ का ज्ञान नहीं है, वह
    व्यक्ति अनायास ही जिस व्यक्ति को लाया या बाँधा गया देखता है, उस व्यक्ति को गोपद
    का अर्थ समझ लेता है । तब फिर दूसरे समय आनयनादि कार्यों को छोड़कर केवल
    'गो' प्रभृति अर्थों में गोपद की शक्ति कैसे गृहीत हो सकती है ?
  2. अर्थात् जिस "अशरीरम्" इत्यादि वेदान्तवाक्य को आत्यन्तिक दुःखनिवृत्तिरूप मोक्ष
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१२ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ मङ्गलाचरण-
न्यायकन्दली
चेत्, वान्तमिदम्, स्वरूपपरस्यापि वाक्यस्य लोके प्रयोगदर्शनात् । यथा परिणामसुरसाम्रं,
परिणतिविरसञ्च पनसामिति । अत्रापि प्रवृत्तिनिवृत्त्योरुपदेशः, एवं हि वाक्यार्थः परिणाम-
सुरसाम्रं भक्षय, परिणतिविरसञ्च मा भक्षयेति । न, वैयर्थ्यात् । सुरसत्वप्रतीत्यैव स्वयम-
भिलाषात् पुरुषः प्रवर्त्तते, विरसत्वप्रतीत्यैव द्वेषान्निवर्त्तते । का तत्र वस्तुसामर्थ्य-
भाविन्युपदेशापेक्षा, अप्राप्ते हि शास्त्रमर्थवद्भवति । अथ प्रवृत्तिनिवृत्त्योरभिसन्धानेनास्य
वाक्यस्य प्रयोगात् तादर्थ्यमिति चेत्, अस्ति प्रवृत्तिनिवृत्त्यर्थता, किन्तु जनकतान्न तु
प्रतिपादकत्वेन । यस्माद् भूतार्थविषय एव प्रामाण्यम् । यदि तु प्रवृत्तिनिवृत्त्योरभिसन्धानेन
वाक्यप्रयोगात् तयोःप्रतीयमानयोरपि शाब्दता, आम्रभक्षणोत्तरकालीना तृप्तिर्धातुसाम्यञ्च
(उ.) किन्तु यह कथन भी सारशून्य है, क्योंकि 'स्वरूप' कार्यत्व से असम्बद्ध अर्थ
के बोधक वाक्य से भी लोक में अर्थ-बोध देखा जाता है । जैसे
"परिणतिसुरसाम्रम्, परिणतिविरसञ्च पनसम्" (आम परिणाम में सुखद है और
कटहल परिणाम में दुःखद है) इत्यादि वाक्यों से अर्थ-बोध होता है । (प्र.) यहाँ
पर भी प्रवृत्ति और निवृत्ति ही वक्ता के उन वाक्यों से अभीष्ट है, तदनुसार
उन दोनों वाक्यों का अर्थ यह है कि "आम खाओ, क्योंकि वह परिणाम में सुख
देनेवाला है,और कटहल मत खाओ, क्योंकि वह अन्त में दुःख देनेवाला है" ।
(उ.) नहीं, यह कल्पना व्यर्थ है । वाक्यों को प्रवृत्त्यर्थक या निवृत्त्यर्थक न मानने
पर भी आम में परिणामतः सुख देने की कारणता का ज्ञान ही पुरुष को आम
खाने में प्रवृत्त करेगा । एवं कटहल में परिणामतः दुःख देने की कारणता का
ज्ञान ही पुरुष को कटहल खाने से निवृत्त करेगा । फिर वस्तुओं के सामर्थ्य से ही
उत्पन्न होनेवाली प्रवृत्तियों एवं निवृत्तियों में उपदेश की आवश्यकता ही क्या है ?
क्योंकि और सभी प्रमाणों से अज्ञात वस्तु को समझाना ही शास्त्र (शब्द) का
असाधारण प्रयोजन है । (प्र.) "लोग आम खाने में प्रवृत्त हों और कटहल खाने
में नहीं" यह मन में रखकर ही वक्ता उन वाक्यों का प्रयोग करते हैं, अतः
प्रवृत्ति और निवृत्ति दोनों उन वाक्यों के अर्थ हैं । (उ.) यह ठीक है कि उन
वाक्यों से प्रवृत्ति और निवृत्ति होती है किन्तु इससे केवल यही सिद्ध होता है कि
वे वाक्य क्रमशः प्रवृत्ति और निवृत्ति के कारण हैं । इससे यह सिद्ध नहीं होता है
कि वे दोनों उन दोनों वाक्यों के प्रतिपाद्य भी हैं । क्योंकि निष्पन्न अर्थों में ही
शब्दों की शक्ति है । (अगर प्रवृत्ति और निवृत्ति के अभिप्राय से उन वाक्यों का
प्रयोग किया गया है, केवल इसीलिए प्रवृत्ति और निवृत्ति को उन वाक्यों का अर्थ
मान लिया जाय तो) आम के खाने से जो तृप्ति होती है या शरीर का उपकार
होता है, उनकी प्रतिपादकता भी उस वाक्य में माननी पड़ेगी । (किसी प्रकार की
में प्रमाण माना है, उसका भी वह निष्पन्न अर्थ नहीं है। उसका भी धार्य्यत्वविशिष्ट कोई
दूसरा ही अर्थ है। जिससे कि आपकी इच्छा पूर्ण नहीं होगी ।

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ९३

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प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ९३
न्यायकन्दली
वाक्यार्थी स्याताम्, प्रत्यक्षस्य च काञ्चिदर्थक्रियामभिसन्धायोपलिप्सिते विषये
प्रवृत्तस्यार्थक्रिया प्रमेया स्यात् । जनकत्वेन प्रवृत्तिपरत्वं वेदान्तानामपि विद्यते, तेभ्यः
स्वरूपप्रतीतौ ध्यानाभ्यासादिप्रवृत्तस्य विगतविविधविकल्पविशदात्मज्ञानोदये सत्यपवर्गस्य
भावात्। न चेदमावश्यकं यत्प्रवृत्तिनिवृत्त्यवधिकः प्रमाणव्यापार इति, तयोः पुरुषेच्छाप्रति-
बद्धयोरनुत्पादेऽपि वस्तुपरिच्छेदमात्रेणापेक्षाबुद्धेः पर्य्यवसानात् । न च कार्यान्वित एवार्थे
पदानां शक्तिः, अनन्वितेऽपि व्युत्पत्तिदर्शनात् । यथेह प्रभिन्नकमलोदरे मधूनि मधुकरः पिबतीति
वर्त्तमानापदेशे प्रसिद्धेतरपदार्थोऽप्रसिद्धमधुकरपदार्थस्तु यं मधुपानकर्त्तारं पश्यति तं मधुकर-
वाच्यत्वेन प्रत्येति । अत्राप्यस्ति पारम्पर्येण कार्यान्वयो वाक्यप्रयोक्तुः, वृद्धव्यवहारे कार्यान्वित-
पदार्थे मधुकरपदस्य व्युत्पत्तिभावादिति चेत् ? न, अनिश्चयात् । वाक्यप्रयोक्तुः किं
कारणता से ही अगर प्रतिपादकता मान ली जाय तो) मन में किसी कार्यविशेष
की इच्छा से उत्पन्न तंन्प्रयोजकीभूत किसी विषय के प्रत्यक्ष का वह विशेष कार्य
प्रमेय होगा । कारणत्व रहने से ही अगर प्रतिपादकत्व मान लिया जाय तो फिर
वेदान्त-वाक्य भी प्रवृत्ति के वाचक ही हैं । क्योंकि उनसे भी स्वरूप अर्थविषयक
बोध के बाद ध्यान, अभ्यासादि में प्रवृत्त पुरुष को अनेक प्रकार के विकल्पों से
रहित आत्मा के यथार्थज्ञान के उदय से अपवर्ग की प्राप्ति अवश्य होती है । यह
आवश्यक नहीं है कि (शब्द) प्रमाण के व्यापार की अवधि प्रवृत्ति और निवृत्ति ये
ही दो मानी जाएँ । क्योंकि पुरुष की इच्छा से नियमतः प्रवृत्ति और निवृत्ति की
उत्पत्ति न होने पर भी वस्तुओं का 'परिच्छेद' अर्थात् इष्टसाधनत्वादि का परिचय
देकर के ही अपेक्षा-बुद्धि चरितार्थ हो जाती है¹ ।
यह भी नियम नहीं है कि कार्य में अन्वित अर्थों में ही शब्दों की शक्ति है;
क्योंकि कार्य में अनन्वित अर्थों में भी शब्दों की शक्ति देखने में आती है। जैसे "प्रभिन्न-
कमलोदरे मधूनि मधुकरः पिबति" (अर्थात् फूले कमल के बीच "मधुकर" मधु
को पीता है) इत्यादि वाक्य के 'मधुकर' शब्द से जिस व्यक्ति को पहले से (उक्त वृद्ध-
व्यवहार की रीति से) 'मधुकर' पद के अर्थ का ज्ञान नहीं भी है, वह भी वर्त्तमान-
कालिक उस मधुपान क्रिया में रत भ्रमर को 'मधुकर' शब्द का वाच्य समझ लेता
है । (प्र.) बोद्धा को कार्यान्वित अर्थ में शक्ति गृहीत न होने पर भी वक्ता को तो
कार्य में अन्वित अर्थ में ही शक्ति गृहीत है, क्योंकि उसका शक्तिज्ञान वृद्धव्यवहार-
मूलक ही है । अतः साक्षात् न सही, परम्परा से मधुकर शब्द की शक्ति कार्यत्व-
विशिष्ट अर्थ में ही है । (उ.) यह आक्षेप भी अनिश्चय के कारण असङ्गत है;

  1. पहले प्रमाण से यथार्थ ज्ञान की उत्पत्ति होती है । तदनन्तर उस ज्ञात
    ईप्सित विषय की इच्छा उत्पन्न होती है, अथवा द्वेष उत्पन्न होता है। ईप्सित
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१४ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ मङ्गलाचरण-
न्यायकन्दली
वृद्धव्यवहारात् कार्यान्वितेऽर्थे व्युत्पत्तिरभूत् ? किमुत प्रसिद्धपदसामानाधिकरण्येनोपदेशाद्वा
स्वरूपेऽर्थ इति निश्चयो नास्ति, इदमप्रथमताया अभावात् । किञ्च प्रयोक्तुरन्विते व्युत्पत्तिः
श्रोतुश्चानन्विते, अन्यव्युत्पत्त्याऽन्यो न शब्दार्थं प्रत्येति, ततश्च मधुकरशब्दस्यानन्वितार्थत्व-
मन्वितार्थत्वञ्च पुरुषभेदेनेत्यर्द्धवैशसमापतितम् । क्रियाकाङ्क्षानिबन्धनः पदार्थानामन्योन्य-
सम्बन्धो नाख्यातपदरहितेषु वेदान्तवाक्येषु भवितुमर्हतीति चेत् ? न तावत्सर्वत्र क्रियाया
अभावः, यत्र तु नास्ति तत्रोपसंसर्गपरतया पदैरभिहितानां पदार्थानामेव योग्यतासन्निधिमता-
मन्योन्याकाङ्क्षानिबन्धनः सम्बन्धः । तथा च 'काञ्च्यामिदानीं त्रिभुवनतिलको राजा' इत्याद्यपि
क्योंकि वाक्य के प्रयोक्ता को वृद्ध-व्यवहार से कार्यत्वविशिष्ट अर्थ में शक्ति गृहीत
हुई थी, या प्रसिद्धपद के सामानाधिकरण्य के उपदेश से 'स्वरूप' अर्थात् कार्यत्व से
असम्बद्ध अर्थ में ही शक्ति गृहीत हुई थी, इसका कोई निश्चय नहीं है । यह नियम
भी नहीं है कि वृद्ध-व्यवहार से ही उस परम्परा में शक्ति गृहीत हुई है और उसके पश्चात्
प्रसिद्धपद के सामानाधिकरण्य से या उपदेश से । अगर यह मान भी लें कि वहाँ
वक्ता को वृद्ध-व्यवहार से कार्यत्वविशिष्ट अर्थ में ही शक्ति गृहीत हुई है, तब भी
यह मानना ही पड़ेगा कि उक्त स्थल में बोद्धा को कार्यत्व से अनन्वित केवल स्वरूप
में ही शक्ति गृहीत होती है । अतः इस वाक्य के 'मधुकर' शब्द की इस प्रकार
कार्यत्व विशिष्ट अर्थ में एवं कार्यत्व से असम्बद्ध केवल स्वरूपार्थ में, दोनों जगह
शक्ति की कल्पना करनी पड़ेगी । क्योंकि एक व्यक्ति के शक्ति-ज्ञान से दूसरे व्यक्ति
को शाब्दबोध नहीं होता है । तस्मात् इस पक्ष में अर्द्धजरतीय न्याय हो जायगा ।
(प्र.) पदार्थों का परस्पर सम्बन्ध क्रिया की आकाङ्क्षा से होता है । वेदान्तवाक्यों
में क्रियापद नहीं रहते, अतः वे परस्पर असम्बद्ध होने के कारण निराकाङ्क्ष हैं,
फलतः अर्थ के बोधक न होने के कारण प्रमाण भी नहीं हैं । (उ.) यह भी ठीक
नहीं है, क्योंकि पहले तो यही असत्य है कि वेदान्तों में क्रियापद नहीं रहते ।
क्योंकि 'अशरीरम्' इत्यादि क्रियापद से युक्त वेदान्त का उल्लेख कर चुके हैं ।
दूसरी बात है कि यह नियम ही ठीक नहीं है कि वाक्यों का परस्पर सम्बन्ध क्रिया की
आकाङ्क्षा से ही उत्पन्न होता है। अतः जहाँ क्रियापद नहीं है, वहाँ भी पदों में परस्पर
सम्बद्ध रूप से कथित आकाङ्क्षा, योग्यता और संनिधि से युक्त पदार्थों में ही
आकाङ्क्षामूलक परस्पर सम्बन्ध है । क्योंकि "काञ्च्यामिदानीं त्रिभुवनतिलको राजा"
वस्तुओं में जीव प्रवृत्त होता है, अथवा अनिष्टसाधनत्व के अनुसन्धान से उत्पन्न द्वेष से
निवृत्त होता है । फलतः यथार्थ ज्ञान से उत्पन्न इच्छा और द्वेष इन दोनों से ही
क्रमशः प्रवृत्ति और निवृत्ति होती है । अगर ज्ञान के बाद किसी प्रतिबन्ध के कारण
इष्टसाधनत्व या अनिष्टसाधनत्व का अनुसन्धान न हुआ तो फिर प्रवृत्ति और निवृत्ति की
भी उत्पत्ति नहीं होती । किन्तु इससे ऐसा नहीं कह सकते कि उस शब्द से ज्ञान उत्पन्न ही
नहीं हुआ ।

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् १५

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प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् १५
॥ अथोद्देशपदार्थनिरूपणम् ॥
प्रशस्तपादभाष्यम्
द्रव्यगुणकर्म्मसामान्यविशेषसमवायानां षण्णां पदार्थानां साधर्म्यवैधर्म्यतत्त्व-
ज्ञानं निःश्रेयसहेतुः ।
१. द्रव्य २. गुण ३. कर्म्म ४. सामान्य ५. विशेष और ६. समवाय,
इन छः पदार्थों के साधर्म्य और वैधर्म्य का तत्त्वज्ञान निःश्रेयस अर्थात्
अपवर्ग का कारण है । एवं उक्त तत्त्वज्ञान का जनक यह ग्रन्थ भी
परम्परा से अपवर्ग का कारण है ।
न्यायकन्दली
वाक्यार्थो गम्यत एव। अथवा तत्र श्रुतप्रयुज्यमानाऽस्तिभवतिक्रियानिबन्धनो भविष्यतीति
यत्किञ्चिदेतत् ।
प्रकृतमनुसरामः । अत्र पदार्थधर्म्मज्ञानादेव पदार्थानामपि सङ्ग्रहो लभ्यते, स्वात-
न्त्र्येण धर्म्मिणां सङ्ग्रहाभावात् ।
ननु पदार्थधर्म्माणां सङ्ग्रहपरो ग्रन्थो महोदयहेतुरिति नोपपद्यते, शब्दानामर्थप्रतिपादन-
मन्तरेण कार्यान्तराभावादित्याशङ्क्य पदार्थधर्म्मप्रतीतिहेतोः सङ्ग्रहस्य पारम्पर्येण महोदय-
हेतुत्वं प्रतिपादयन्नाह--द्रव्यगुणेत्यादि ।
इत्यादि वाक्यों से भी अर्थ-बोध अवश्य होता है । (अगर यह आग्रह मान भी
लिया जाय कि क्रिया से ही पदों में परस्पराकाङ्क्षा होती है, तब भी) "अस्ति,
भवति" इत्यादि क्रियाओं का अध्याहार कर लिया जा सकता है । तस्मात् वेदान्त-
वाक्यों में अप्रामाण्य की कोई भी शङ्का नहीं है ।
अब हम फिर प्रकृत विषय का अनुसन्धान करते हैं । यहाँ 1पदार्थधर्म्म के
ज्ञान से पदार्थों के भी 'संग्रह' अर्थात् ज्ञान का लाभ होता है ।
पदार्थधर्म्म के यथार्थ ज्ञान का कारण ग्रन्थ (शब्दसमूह) महोदय अर्थात्
अपवर्ग का कारण नहीं हो सकता; क्योंकि शब्द में अपने अर्थों के प्रतिपादन को
छोड़कर दूसरे कामों के करने का सामर्थ्य नहीं है । यह शङ्का मन में रखकर
(अपवर्ग के कारण) पदार्थधर्म्म-विषयक यथार्थ ज्ञान के सम्पादक ग्रन्थ में (अपवर्ग
की साक्षात्कारणता सम्भव न होने पर भी) परम्परया (अपवर्ग की) कारणता का
प्रतिपादन करते हुए 'द्रव्यगुण' इत्यादि भाष्य को कहते हैं ।

  1. अभिप्राय यह है कि इस पुस्तक का नाम "पदार्थधर्म्संग्रह" है । 'संग्रह' शब्द का अर्थ
    सम्यक् ज्ञान या यथार्थज्ञान है । "प्रवक्ष्यते महोदयः" इत्यादि वाक्य से पदार्थधर्म्म के यथार्थज्ञान
    में 'महोदय' या अपवर्ग की कारणता कही गई है । आगे साधर्म्यवैधर्म्ययुक्त पदार्थ-ज्ञान में ही महोदय
    की कारणता कही गई है । अतः दोनों उक्तियों में सामञ्जस्य नहीं होता । इसी को मिटाने के लिए
    इस अभिप्राय से उपर्युक्त शब्द कहना पड़ा कि धर्म का ज्ञान धर्म्मिज्ञान के बिना असम्भव है ।
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१६ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ उद्देश-
न्यायकन्दली
यस्य वस्तुनो यो भावस्तत् तस्य तत्त्वम् । साधारणो धर्म्मः साधर्म्यम्, असाधारणो
धर्म्मो वैधर्म्यम् । साधर्म्यवैधर्म्य एव तत्त्वं साधर्म्यवैधर्म्यतत्त्वम्, तस्य ज्ञानं निःश्रेयसहेतुः।
विषयसम्भोगजं सुखं तावत् क्षणिकविनाशि दुःखबहुलं स्वर्गादिपदप्राप्यमपि सप्रक्षयं
सातिशयञ्च । तथा च कस्यचित् स्वर्गमात्रमपरस्य स्वर्गराज्यम् । अतस्तदपि सततं
प्रच्युतिशङ्कया परसमुत्कर्षोत्पाताच्च दुःखाक्रान्तं न निश्चितं श्रेयः । आत्यन्तिकी दुःख-
निवृत्तिरसहासंचेदननिखिलदुःखोपरमरूपत्वादपरावृत्तेश्च निश्चितं श्रेयः । तस्य कारणं द्रव्यादि-
स्वरूपज्ञानम्। एतेन तदप्युक्तं यदुक्तं मण्डनेन--विशेषगुणनिवृत्तिलक्षणा मुक्तिरुच्छेदपक्षान्न
जिस वस्तु का जो भाव है वही उसका तत्त्व है । (अनेक वस्तुओं में
रहनेवाले एक) साधारण धर्म को साधर्म्य कहते हैं । (प्रत्येक पदार्थ में ही
रहनेवाले) असाधारण धर्म को वैधर्म्य कहते हैं । साधर्म्य और वैधर्म्य रूप जो
तत्त्व है, वही इस साधर्म्यवैधर्म्यतत्त्व शब्द का अर्थ है। १ इसी का तत्त्वज्ञान
निःश्रेयस का कारण है । सांसारिक विषयों के उपभोग से होनेवाला सुख क्षणमात्र
में विनष्ट हो सकता है और अपनी अपेक्षा बहुत अधिक दुःखों से घिरा हुआ है ।
स्वर्गपद से व्यवहृत होनेवाला सुख भी विनाशशील है और न्यूनाधिक भावयुक्त
है । जैसे किसी को स्वर्ग मिलता है और किसी को उसका आधिपत्य (स्वराज्य) ।
अतः वह (स्वर्गरूप) सुख भी स्वर्ग से गिरने की आशङ्का से उत्पन्न दुःख और
दूसरे के उत्कर्ष से उत्पन्न क्षोभ से आक्रान्त होने के कारण निश्चित कल्याण
नहीं है । दुःखों की आत्यन्तिक निवृत्तिरूप मोक्ष असह्य होनेवाले दुःखों के
अत्यन्त विनाशरूप होने के कारण और इसलिए भी कि एक बार उस
अवस्था की प्राप्ति हो जाने पर फिर दुःख की अवस्था नहीं लौटती है, परम
कल्याणमय है, अतः जीवों को परम अभीष्ट है। उसका कारण द्रव्यादि पदार्थों
का तत्त्वज्ञान है । इसी से आचार्य मण्डन की यह उक्ति भी खण्डित हो
जाती है कि- "(आत्मा के) सभी विशेष गुणों का नाश ही मोक्ष है, यह पक्ष
ज्ञानस्वरूप आत्मा का अत्यन्त उच्छेद ही मुक्ति है" बौद्धों के इस उच्छेद-
अतः धर्मज्ञान में मुक्तिजनकता कहने से ही धर्मिसहित धर्मज्ञान में मुक्तिजनकता कथित
हो जाती है। तस्मात् कोई असामञ्जस्य नहीं है ।

  1. अभिप्राय यह है कि भाष्य में स्थित "साधर्म्यवैधर्म्यतत्त्वज्ञानम्" इस वाक्य का साधर्म्यञ्च
    वैधर्म्यञ्च साधर्म्यवैधर्म्ये, त एव तत्त्वं साधर्म्यवैधर्म्यतत्त्वम्" इस द्वन्द्वान्त कर्म्मधारय के बाद
    "तस्य ज्ञानम्" यह षष्ठी समास है । किन्तु उक्त द्वन्द्वान्त पद का 'तत्त्वम्' इस पद के
    साथ षष्ठीतत्पुरुष समास नहीं है, क्योंकि इससे साधर्म्यवैधर्म्यरूप तत्त्व के ज्ञान में
    मुक्तिजनकता सिद्ध न होकर उस साधर्म्यवैधर्म्य में रहनेवाले धर्मों के ज्ञान में ही
    मुक्तिजनकता कही जायगी, किन्तु यह असङ्गत है ।

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् १७

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प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् १७
न्यायकन्दली
भिद्यते" इति । विशेषगुणोच्छेदे हि सत्यात्मनः स्वरूपेणावस्थानं नोच्छेदः, नित्यत्वात् ।
न चायमपुरुषार्थः, समस्तदुःखोपरमस्य परमपुरुषार्थत्वात्, समस्तसुखाभावादपुरुषार्थत्व-
मिति चेत् ? न, सुखस्यापि क्षयितया बहुलप्रत्यनीकतया च साधनप्रार्थनाशतपरिक्लिष्ट-
तया च सदा दुःखक्रान्तस्य विषमिश्रस्येव मधुनो दुःखपक्षे निक्षेपात् । केषां
साधर्म्यवैधर्म्य- तत्त्वपरिज्ञानमपवर्गकारणमित्यपेक्षायां द्रव्यादीनामिति सम्बन्धः । द्रव्याणि
च, गुणाश्च, कर्म्माणि च, सामान्यञ्च, विशेषाश्च, समवायश्चेति विभागवचनानुसारेण
विग्रहः, उद्देशस्य विभागवचनेन समानविषयत्वात् । आदौ द्रव्यस्योद्देशः, सर्वाश्रयत्वेन
प्राधान्यात् । गुणानाञ्च कर्म्मापेक्षया भूयस्त्वाद् द्रव्यानन्तरमभिधानम्। नियमेन गुणानुविधा-
यित्वात् कर्म्मणां गुणानन्तरमुद्देशः । कर्म्मान्वितत्वात् सामान्यस्य कर्म्मानन्तरम-
भिधानम् । पञ्च पदार्थवृत्तेः समवायस्य सर्वशेषेणाभिधाने प्राप्ते विशेषाणां मध्ये कथनम् ।
पक्ष से भिन्न नहीं है । क्योंकि विशेष गुणों के नष्ट हो जाने पर आत्मा का अपने
स्वरूप में रहना आत्मा का नाश नहीं है । (और उसका नाश हो भी नहीं सकता
है, क्योंकि) वह नित्य है । यह आत्यन्तिक दुःखनिवृत्तिरूप मोक्ष जीवों का अकाम्य
भी नहीं है; क्योंकि यह दुःखों का अत्यन्त विनाशरूप है, अतः जीवों का परम
अभीष्ट है । (प्र.) यह (मोक्ष) सभी सुखों का भी निवृत्तिरूप होने के कारण जीवों
का काम्य नहीं है ? (उ.) नहीं, क्योंकि सुख भी विनाशशील अनेक विघ्नों से
ओतप्रोत, अनेक कठिन उपायों से उत्पन्न होने के कारण अनेक दुःखों से आक्रान्त
होने से त्याज्य ही है । जैसे विष से मिला हुआ मधु भी ग्राह्य नहीं होता । (प्र.)
किन पदार्थों के साधर्म्य और वैधर्म्यरूप तत्त्व का ज्ञान मोक्ष का कारण है ?
इस आकाङ्क्षा की पूर्ति के लिए "द्रव्यगुणकर्म्मसामान्यविशेषसमवायानां षण्णां
पदार्थानाम्" इस वाक्य का उपादान है । पदार्थों के विभागवाक्य के अनुसार
उक्त द्वन्द्वसमासान्त वाक्य का विग्रह "द्रव्याणि च, गुणाश्च, कर्माणि च,
सामान्यञ्च, विशेषाश्च, समवायश्च" इस प्रकार का है । क्योंकि 'उद्देश' वाक्य
में प्रयुक्त पदार्थबोधक पद की विभक्ति का वचन विभागवाक्य के अनुसार
होना चाहिए । द्रव्य सभी पदार्थों का आश्रय है, अतः सर्वप्रधान है । इस
कारण सबसे पहले है । गुण कर्म्म से संख्या में अधिक हैं, अतः द्रव्य के
बाद और कर्म्म से पहले गुणों का उल्लेख है । कर्म्म नियमतः गुणों के साथ ही
रहता है, अतः गुण के बाद कर्म्म का निरूपण है । कर्म्म के साथ रहने के कारण
कर्म्म के बाद सामान्य का निरूपण किया है । समवाय द्रव्यादि पाँचों पदार्थों में
रहता है, सुतरां उसका निरूपण सबसे पीछे होना उचित है । अतः सामान्य
निरूपण के बाद और समवाय से पहले बीच में 'विशेष' का निरूपण किया है ।

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१८ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ उद्देश-
प्रशस्तपादभाष्यम्
तच्चेश्वरचोदनाभिव्यक्ताद्धर्म्मादेव ।
उस 'निःश्रेयस' (या अपवर्ग) की प्राप्ति ईश्वर की विशेष प्रकार
की इच्छा से कार्य्य करने में उन्मुख हुए धर्म से ही होती है ।
न्यायकन्दली
अभावस्य पृथगनुपदेशो भावपारतन्त्र्यात्, न त्वभावात् । द्रव्याणामिति सम्बन्धे षष्ठी ।
अत्रापि साधर्म्यादिज्ञानस्य निःश्रेयसहेतुत्वे कथिते द्रव्यादिज्ञानस्य कथितम्,
साधर्म्यवैधर्म्ययोः स्वातन्त्र्येण ज्ञानाभावात् ।
"ननु यदि तत्त्वज्ञानं निःश्रेयसहेतुस्तर्हि धर्म्मो न कारणम् ? ततः सूत्रविरोधः -
"यतोऽभ्युदयनिःश्रेयससिद्धिः स धर्म्मः" इति, तत आह- "तच्चेश्वर-
चोदनाभिव्यक्ताद्धर्म्मादेवेति । तन्निःश्रेयसं धर्म्मादेव भवति, द्रव्यादितत्त्वज्ञानं तस्य
कारणत्वेन निःश्रेयससाधनमित्यभिप्रायः । तत्त्वतो ज्ञातेषु बाह्याध्यात्मिकेषु विषयेषु
दोषदर्शनाद्विरक्तस्य समीहानिवृत्तावात्मज्ञस्य तदर्थानि कर्म्माण्यकुर्व्वत-
स्तत्परित्यागसाधनानि च श्रुतिस्मृत्युदितान्यसङ्कल्पितफलान्युपाददानस्यात्मज्ञान-
अभावों को स्वतन्त्र रूप से न कहने का यह अभिप्राय नहीं है कि वे हैं ही नहीं,
न कहने का अभिप्राय केवल इतना ही है कि अभाव भावपरतन्त्र हैं । (अर्थात्
'द्रव्यगुणकर्मसामान्यविशेषसमवायानाम्' इस समस्त वाक्यघटक पदरूप) 'द्रव्याणाम्'
इत्यादि पदों में सम्बन्धसामान्य में षष्ठी विभक्ति है । "साधर्म्यवैधर्म्यतत्त्वज्ञानं
निःश्रेयसहेतुः" इस वाक्य से यद्यपि द्रव्यादि पदार्थों के साधर्म्य और वैधर्म्यरूप
तत्त्व के ज्ञान में ही मुक्ति की कारणता कही गयी है, तथापि द्रव्यादिविषयक ज्ञानों
में भी मुक्ति की कारणता उसी वाक्य से कथित हो जाती है, क्योंकि द्रव्यादि रूप
धर्मियों के ज्ञान के बिना उनके साधर्म्य और वैधर्म्यरूप तत्त्वों का ज्ञान असम्भव है ।
अगर मोक्ष का कारण (साधर्म्यवैधर्म्यरूप) तत्त्व का ज्ञान ही है, तो फिर
'धर्म' उसका कारण नहीं है । किन्तु ऐसा मान लेने पर सूत्र का विरोध होता है ।
क्योंकि सूत्रकार ने कहा है कि "यतोऽभ्युदयनिःश्रेयससिद्धिः स धर्मः" । इसी विरोध
को मिटाने के लिये भाष्यकार ने "तच्चेश्वरचोदनाभिव्यक्ताद्धर्म्मादेव" यह वाक्य
कहा है । अभिप्राय यह है कि 'तत्' अर्थात् 'मोक्ष', धर्म से ही (उत्पन्न) होता है ।
किन्तु द्रव्यादि तत्त्वज्ञान धर्म का कारण है, अतः परम्परा से मोक्ष का भी कारण
है । पदार्थों के यथार्थज्ञान से बाह्य और आभ्यन्तर सभी वस्तुओं में (ये सभी
दुःख के कारण हैं इस प्रकार की) दोष-बुद्धि उत्पन्न होती है । इस दोष-बुद्धि से
वैराग्य की उत्पत्ति होती है और वैराग्य से उस पुरुष की सारी अभिलाषायें निवृत्त
हो जाती हैं । फिर वह व्यक्ति अभिलाषाओं के पोषक सभी उपायस्वरूप कर्मों को
छोड़ देता है तथा अभिलाषा से पिण्ड छुड़ने वाले वेद व धर्मशास्त्रादि ग्रन्थों में कथित

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् १९

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प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् १९
न्यायकन्दली
मभ्यस्यतः प्रकृष्टविनिवर्त्तकधर्मोपचये सति परिपक्वात्मज्ञानस्यात्यन्तिकशरीरवियोगस्य
भावात् । दृष्टो विषयाणामहिकण्टकादीनां परित्यागो विशेषदोषदर्शनपूर्वकाभि-
सन्धिकृतनिवर्त्तकात्मविशेषगुणात् प्रयत्नात् । तेन शरीरादीनामात्यन्तिकः परित्यागो
विषयदोषदर्शनपूर्वकाभिसन्धिकृतनिवर्त्तकात्मविशेषगुणनिमित्तो विज्ञात इति मोक्षाधिकारे
वक्ष्यामः ।
धर्मोऽपि तावन्न निःश्रेयसं करोति यावदीश्वरेच्छया नानुगृह्यते । तेनेदमुक्तम्-
"ईश्वरचोदनाभिव्यक्ताद्धर्मादिवे"ति । चोद्यन्ते प्रेर्यन्ते स्वकार्येषु प्रवर्त्यन्तेऽनया भावा
इति चोदना ईश्वरचोदना ईश्वरेच्छाविशेषः । अभिव्यक्तिः कार्यारम्भं प्रत्याभिमुख्यम् ।
ईश्वरचोदनायाभिव्यक्तादीश्वरचोदनाभिव्यक्ताद् ईश्वरेच्छाविशेषेण कार्यारम्भाभिमुखीकृता-
द्धर्मादेव निःश्रेयसं भवतीति वाक्ययोजना । तच्चेति चकारो द्रव्यादिसाधर्म्यज्ञानेन सह
धर्मस्य निःश्रेयसहेतुत्वं समुच्चिनोति ।
निष्काम कर्मों का अनुष्ठान करता हुआ आत्म-ज्ञान का अभ्यास करता है । इन
आचरणों से निवृत्तिजनक धर्म की वृद्धि होने पर जब आत्मज्ञान परिपक्व हो
जाता है, तब उससे (आत्मा का ) शरीर के साथ अत्यन्त-वियोग (मोक्ष) की
उत्पत्ति होती है । यह देखा जाता है कि सर्प और कण्टकादि पदार्थों में पहले इस
प्रकार के दोष का ज्ञान होता है कि ये सभी दुःखजनक हैं । फिर उन्हें त्यागने की
इच्छा होती है । इस इच्छा से निवृत्तिजनक (निवर्त्तक) प्रयत्न की उत्पत्ति होती है ।
आत्मा के विशेषगुण इस प्रयत्न से जीव उन दुष्ट (सर्पादि) पदार्थों को छोड़ देता
है । यही बात हम मोक्ष-निरूपण में कहेंगे ।
धर्म भी तब तक अकेला मोक्ष का सम्पादन नहीं कर सकता, जब तक उसे
ईश्वर की इच्छा की सहायता न मिले । इसीलिए प्रशस्तपाद ने "तच्चेश्वर-
चोदनाभिव्यक्ताद्धर्मादेव" यह वाक्य लिखा है । "चोद्यन्ते स्वकार्येषु प्रेर्यन्तेऽनया
भावाः" इस व्युत्पत्ति के अनुसार जिस 'इच्छा' से (कारणरूप वस्तु अपने कार्यों
में उसके उत्पादन के लिए) प्रेरणा प्राप्त करे वही 'इच्छा' प्रकृत 'चोदना' शब्द का
अर्थ है । 'ईश्वरस्य चोदना' इस विग्रह के अनुसार 'ईश्वर की इच्छा' ही
'ईश्वरचोदना' शब्द का अर्थ है । प्रकृत 'अभिव्यक्ति' शब्द से कारणों की कार्य्य
करने की उन्मुखता इष्ट है । "ईश्वरचोदनाभिव्यक्तात्" यह पञ्चम्यन्त पद
"ईश्वरचोदनयाऽभिव्यक्तात्" इस तृतीया समास से बना है । उपर्युक्त व्युत्पत्तियों
के अनुसार 'तच्च' इत्यादि वाक्य का फलित अर्थ यह है कि ईश्वर के
इच्छाविशेष से कार्य्य के प्रति उन्मुख धर्म से ही 'मुक्ति' होती है । 'तच्च' इस
वाक्य में प्रयुक्त 'च' शब्द इस समुच्चय का बोधक है कि पदार्थों के साधर्म्यादिरूप
तत्त्वविषयक ज्ञान के साथ मिलकर ही धर्म में मोक्ष की साधनता है ।

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२० न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ उद्देश-
प्रशस्तपादभाष्यम्
अथ के द्रव्यादयः पदार्थाः, किञ्च तेषां साधर्म्यं वैधर्म्यञ्चेति ।
तत्र द्रव्याणि पृथिव्यप्तेजोवाय्वाकाशकालदिगात्ममनांसि सामान्यविशेष-
संज्ञोक्तानि नवैवेति । तद्व्यतिरेकेणान्यस्य संज्ञानभिधानात् ।
द्रव्यादि कौन-कौन पदार्थ हैं ? एवं उनके साधर्म्य और वैधर्म्य
क्या हैं ?
उन पदार्थों में १. पृथिवी २. जल ३. तेज ४. वायु ५. आकाश
६. काल ७. दिक् ८. आत्मा और ९. मन, ये नौ ही द्रव्य सूत्रकार के
द्वारा सामान्य (द्रव्यसंज्ञा) और विशेष (पृथिव्यादिसंज्ञा) संज्ञाओं से कहे
गये हैं । क्योंकि पदार्थों के उपदेश के लिये सर्वज्ञ महर्षि ने इन नवों
को छोड़कर और किसी द्रव्य का नाम नहीं लिया है ।
न्यायकन्दली
एवं षट्पदार्थज्ञानस्य पुरुषार्थोपायत्वं प्रतीत्य तेषां प्रत्येकं भेदजिज्ञासार्थं परिपृच्छति-
अथ के द्रव्यादय इति । कानि द्रव्याणि ? के गुणाः ? कानि कर्माणीत्यादि योजनी-
यम् । नावश्यं धर्मिणि ज्ञाते धर्मा ज्ञायन्त इति, तेन धर्मेषु पृथक् प्रश्नः - किञ्च
तेषामित्यादि । अत्रापि चः समुच्चये ।
उत्तरमाहः -तत्रेत्यादि । तेषु द्रव्यादिषु मध्ये, द्रव्याणि पृथिव्यादीनि,
सामान्यविशेषसंज्ञया सामान्यसंज्ञया द्रव्यसंज्ञया, विशेषसंज्ञया प्रत्येकमसा-
इस प्रकार द्रव्यादि छः पदार्थों में मुक्ति की कारणता को समझाकर, उन
पदार्थों में से प्रत्येक की जिज्ञासा के लिये प्रशस्तदेव 'अथ के द्रव्यादयः' इत्यादि
प्रश्नभाष्य लिखते हैं-
"अथ के द्रव्यादयः" इत्यादि प्रश्नभाष्य की व्याख्या 1 'द्रव्य कितने हैं ?'
'गुण कितने हैं ?' इत्यादि रीति से करनी चाहिए । धर्मी के ज्ञात हो जाने पर
यह आवश्यक नहीं है कि धर्म भी ज्ञात ही हो जाएँ । अतः "'किञ्च तेषाम्'"
इत्यादि से धर्म के विषय में अलग प्रश्न करते हैं । यहाँ भी 'च' शब्द समुच्चय
का ही बोधक है ।
(कथित दोनों प्रश्नों का समाधान क्रमशः करते हैं) 'तत्र' अर्थात् उन छः पदार्थों
में, 'द्रव्याणि' अर्थात् पृथिव्यादि नौ द्रव्य, "सामान्यविशेषसंज्ञाया" सामान्यसंज्ञा से अर्थात्
द्रव्य नाम से, विशेषसंज्ञा से अर्थात् पृथिव्यादि विशेष नामों से-पृथिवीत्व, जलत्व,

  1. अभिप्राय यह है कि द्रव्यादि भाग वाक्य के पहले का 'तत्र के द्रव्यादयः' ? इत्यादि
    प्रश्नवाक्य केवल यहाँ के लिये ही नहीं है, किन्तु गुणादि के विभाग वाक्यों

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २१

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प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २१
न्यायकन्दली
धारणसंज्ञया पृथिव्यप्तेजस्त्वादिरूपया उक्तानि सूत्रकारेण प्रतिपादितानि । किमेतावन्त्या-
होस्विदपराण्यपि सन्तीत्याह-नवैवेति । ननु नयानां लक्षणाभिधाने सामर्थ्यादपरेषामभावो
ज्ञातव्यः, व्यर्थं नवैवेति । न, नवसु लक्षितेषु किमपरेषामसत्त्वादुत सतामप्यनुपयोगित्वान्न
लक्षणं कृतमिति संशयो न निवर्त्तेत । लक्षणस्य व्यवहारमात्रसारतया समानासमानजातीय-
व्यवच्छेदमात्रसाधनत्वेन चान्याभावप्रतिपादनासामर्थ्यात्, तदर्थमवधारणं कृतम् । इदमेव
सामान्योद्दिष्टानां विशेषसंज्ञाभिधानं तन्त्रान्तरे विभाग इति निर्देश इति च कथ्यते ।
कथमेतदवगतं नवैवेति ? अत आह-तद्व्यतिरेकेणेत्यादि । तेभ्यो नवभ्यो व्यतिरेकेण
सर्वज्ञेन महर्षिणा सर्वार्थोपदेशाय प्रवृत्तेनान्यस्य संज्ञानभिधानात् ।
तमो नाम रूप-संख्या-परिमाण-पृथक्त्व-परत्वापरत्व-संयोग-विभागवद् द्रव्यान्तर-
मस्तीति चेत् ? अत्र कश्चिदाह-यदि तमो द्रव्यम्, रूपवद्द्रव्यस्य स्पर्शाव्यभि-
तेजस्त्वादि विशेषरूप से सूत्रकार ने द्रव्यों का प्रतिपादन किया है । (प्र.) नौ
प्रकार के द्रव्यों का लक्षण कह देने भर से सामर्थ्यवश यह ज्ञात हो ही जाएगा कि
नौ से अधिक द्रव्य नहीं हैं, (अवधारणार्थक) 'नवैव' शब्द का प्रयोग व्यर्थ है ।
(उ.) उक्त प्रश्न ठीक नहीं है, क्योंकि नौ द्रव्यों का केवल लक्षण कह देने भर से
यह सन्देह रह ही जाता है-'नौ द्रव्यों का ही लक्षण इसलिए किया गया है कि नौ
से अधिक द्रव्यों की सत्ता ही नहीं है ?' या "नौ से अधिक भी द्रव्य हैं, किन्तु
प्रकृत में उनका कोई उपयोग नहीं है । अतः केवल नौ ही (उपयोगी) द्रव्यों के
लक्षण कहे गये हैं ।" लक्ष्य का व्यवहार ही लक्षण का मुख्य प्रयोजन है । अतः
लक्षणवाक्य केवल (व्यवहार के लिए) अपने लक्ष्यों को उनके सजातीय और
विजातीय वस्तुओं के भिन्न रूप में केवल समझा सकते हैं । उनमें (अवधारणादि)
किसी और अर्थ को समझाने की क्षमता नहीं है । अतः (अवधारणार्थक) 'एव'
शब्दघटित 'नवैव' शब्द का प्रयोग (भाष्य में) है । सामान्य नामों से कहे हुए
पदार्थों का विशेष नामों से यह कथन है और शास्त्रों में 'विभाग' और 'निर्देश'
शब्द से कहा गया है । यह कैसे समझा गया है कि नौ से अधिक द्रव्य नहीं हैं ?
इसी प्रश्न का समाधान "तद्व्यतिरेकेणान्यस्य" इत्यादि सन्दर्भ से कहते हैं ।
अभिप्राय यह है कि सभी पदार्थों का उपदेश करने के लिये प्रवृत्त सर्वज्ञ महर्षि
(कणाद) ने इन नौ द्रव्यों से भिन्न किसी का भी उल्लेख द्रव्य नाम से नहीं किया है ।
(प्र.) रूप, संख्या, परिमाण, पृथक्त्व, परत्व, अपरत्व, संयोग 1 और विभाग,
के पहले भी 'के गुणाः' इत्यादि प्रश्न-वाक्यों का ऊह करना चाहिए । अन्यथा उत्तररूप
सभी विभागवाक्य बिना आकाङ्क्षा के ही कहे जाने के कारण उपेक्ष्य हो जायेंगे ।

  1. अभिप्राय यह है कि द्रव्य का सामान्यलक्षण गुण ही है । अन्धकार में कथित रूपादि आठ
    गुणों की उपलब्धि सार्वजनीन है । अतः वह द्रव्य अवश्य है, किन्तु कथित पृथिव्यादि नौ
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२२ न्यायकन्दलीसंवेलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ उद्देश-
न्यायकन्दली
चारात् स्पर्शवद्द्रव्यस्य महतः प्रतिघातधर्म्मत्वात् तमसि सञ्चरतः प्रतिबन्धः स्यात्, महा-
न्धकारे च भूगोलकस्येव तदवयवभूतानि खण्डावयविद्रव्याणि प्रतीयेरन्निति । तदयुक्तम्, यथा
प्रदीपाग्निर्गतैरवयवैरदृष्टवशादनुद्भूतस्पर्शमनिबिडावयवमप्रतीयमानखण्डावयविद्रव्यप्रविभाग-
मप्रतिघातिप्रभामण्डलमारभ्यते, तथा तमः परमाणुभिरपि तमो द्रव्यम् । तस्मादन्यथा समाधीयते
तमः परमाणवः स्पर्शवन्तस्तद्रहिता वा ? न तावत् स्पर्शवन्तः, स्पर्शवतस्तत्कार्य्यस्य
क्वचिदनुपलम्भात् । अदृष्टव्यापाराभावात् स्पर्शवद्द्रव्यानारम्भका इति चेत् ? रूपवन्तो वायु-
इन आठ गुणों से युक्त एवं इन नौ द्रव्यों से भिन्न 'तम' (अन्धकार) नाम का द्रव्य
है ? इस प्रश्न का समाधान (१) कोई यह देते हैं कि यह निश्चित है कि जहाँ
रूप रहे वहाँ स्पर्श भी अवश्य रहे । एवं स्पर्शवाले महान् द्रव्य का यह स्वभाव है
कि वह प्रतिघात करे । अगर अन्धकार (रूपयुक्त) द्रव्य है (फिर स्पर्शयुक्त भी
अवश्य ही है), तो उसका प्रतिघातधर्मक होना भी अनिवार्य है । अगर ऐसी
बात है तो अन्धकार में चलते हुए मनुष्य उससे टकरा कर अवश्य ही रुक जाते ।
(तस्मात् अन्धकार कोई द्रव्य नहीं है । अतः 'नवैव द्रव्याणि' यह अवधारण ठीक
है)। (२) (कोई यह दूसरा समाधान करते हैं कि जैसे) किसी महाभूखण्ड की
प्रतीति होने पर उसके अवयवों की भी प्रतीति अवश्य होती है । (वैसे ही)
अन्धकार अगर कोई महान् द्रव्य होता तो (उसकी प्रतीति की तरह) उसके
अवयवों की भी प्रतीति अवश्य होती । (किन्तु अन्धकार के अवयवों की प्रतीति
नहीं होती है), अतः अन्धकार कोई द्रव्य नहीं है और इसीलिए वह महान् भी
नहीं है । किन्तु ये दोनों ही समाधान असङ्गत हैं, क्योंकि जैसे प्रदीप से निकले हुए
तेज के अवयवों से अदृष्टवश अनुद्भूत स्पर्श से युक्त अनिबिड़ (पतले)
प्रभामण्डलरूप प्रकाश नाम के द्रव्य की उत्पत्ति होती है । एवं इस महान् द्रव्य के
अवयवों की उपलब्धि नहीं होती है और उस (आलोक) में चलते हुए मनुष्य की
गति रुकती भी नहीं है । इसी प्रकार अन्धकार के परमाणुओं से अन्धकार की
उत्पत्ति होगी । (इसमें अन्धकार के अवयवों की अनुपलब्धि और उससे मनुष्यों
का न टकराना, ये दोनों बाधक नहीं हो सकते) अतः इसका दूसरी रीति से समाधान
करना चाहिए। (समाधान के लिए यह पूछना है कि) (प्र.) अन्धकार के परमाणुओं
में स्पर्श है या नहीं ? (उ.) नहीं है, क्योंकि उनके किसी भी कार्य्य में स्पर्श की उपलब्धि
नहीं होती । (प्र.) अन्धकार के परमाणुओं में स्पर्श है, किन्तु उससे स्थूल अन्धकार
में अदृष्टरूप कारण के अभाव से स्पर्श की उत्पत्ति नहीं होती । अतः अन्धकार के
परमाणु स्वयं स्पर्शयुक्त होते हुए भी स्पर्शयुक्त स्थूल अन्धकार को उत्पन्न नहीं करते ।
द्रव्यों में से वह किसी में भी अन्तर्भूत नहीं है । क्योंकि गन्ध की उपलब्धि न होने से वह
पृथिवी नहीं है । स्पर्श की प्रतीति न होने के कारण वह जल, तेज और वायु भी नहीं
है । उसमें रूप का प्रत्यक्ष होता है, अतः वह आकाश, काल, दिक्, आत्मा और मन भी
नहीं है । इस प्रकार कथित नौ द्रव्यों में उसका अन्तर्भाव नहीं है (गुण प्रतीति के कारण
द्रव्य अवश्य ही है । तस्मात् 'तम' कोई दशवाँ स्वतन्त्र द्रव्य ही है । किन्तु तब "नवैव
द्रव्याणि" यह अवधारण असङ्गत हो जाता है ।

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २३

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प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २३
न्यायकन्दली
परमाणवोऽदृष्टव्यापारवैगुण्याद्रूपवत्कार्यं नारभन्त इति किं न कल्प्येत । किं वा न कल्पितमेत-
देकजातीयादेव परमाणोरदृष्टोपग्रहाच्चतुर्धा कार्याणि जायन्त इति । कार्यैकसमधिगम्याः
परमाणवो यथाकार्यमुन्नीयन्ते, न तद्विलक्षणाः, प्रमाणाभावादिति चेत् ? एवं तर्हि तामसाः
परमाणवोऽप्यस्पर्शवन्तः कथं तमोद्रव्यमारभेरन् ? अस्पर्शवत्तस्य कार्य्यद्रव्यानारम्भकत्वेना-
व्यभिचारोपलम्भात् । कार्य्यदर्शनात् तदनुगुणं कारणं कल्प्यते, न तु कारणवैगुण्येन दृष्टकार्य्य-
विपर्य्यासो युज्यत इति चेत्, न वयमन्धकारस्य प्रत्यर्थिनः, किन्त्वारम्भकानुपपत्तेर्नीलिममात्र-
प्रतीतेश्च द्रव्यमिदं न भवतीति ब्रूमः। तर्हि भासामभाव एवायं प्रतीयते ? न, तस्य नीलाकारेण
(किन्तु स्पर्शशून्य स्थूल अन्धकार को ही उत्पन्न करते हैं) । (उ.) अगर ऐसी बात
है तो फिर "वायु के परमाणुओं में रूप है, किन्तु अनुकूल अदृष्ट के न रहने से
स्थूल वायु में रूप की उत्पत्ति नहीं होती है" ऐसी कल्पना भी क्यों नहीं कर
लेते ? अथवा यही कल्पना क्यों नहीं करते कि किसी एकजातीय परमाणुओं से
ही पृथ्वी, जल, तेज और वायु ये चारों उत्पन्न होते हैं और अदृष्ट की विचित्रता
से इनमें परस्पर वैचित्र्य है । (प्र.) परमाणु प्रत्यक्ष-सिद्ध वस्तु नहीं हैं, किन्तु
पृथिव्यादि स्थूल कार्यों से ही उनका अनुमान होता है । स्थूल पृथिवी-जलादि द्रव्य
परस्पर भिन्नरूपों से प्रत्यक्ष होते हैं, अतः उनके मूल कारण परमाणुओं को भी
परस्पर विलक्षण मानना पड़ेगा । क्योंकि कार्य से समानजातीय कारण का
अनुमान होता है । (उ.) फिर स्पर्शशून्य रूप से प्रत्यक्ष होनेवाले अन्धकार के
परमाणुओं में स्पर्श की कल्पना कैसी ? तस्मात् (स्पर्शशून्य) अन्धकार का परमाणु
स्थूल अन्धकार को उत्पन्न कर ही नहीं सकता । क्योंकि यह अव्यभिचरित नियम
है कि स्पर्शविशिष्ट द्रव्य ही द्रव्य का उत्पादक होता है । (प्र.) कार्य्य जिस रूप में
देखे जाते हैं उनके अनुरूप कारणों की कल्पना की जाती है । यह तो नहीं होता
कि एक विशेष प्रकार के कारण की कल्पना कर ली जाए और उसके अनुरोध
से कार्य्यों को प्रत्यक्षसिद्ध अपने रूपोंसे भिन्न रूपों से माना जाए¹। (उ.) हम अन्धकार
के विरोधी नहीं हैं । (अर्थात् प्रत्यक्षसिद्ध अन्धकार की सत्ता तो हम मानते हैं) किन्तु
मेरा कहना है कि दृष्ट अन्धकार में स्पर्श की उपलब्धि नहीं होती । एवं कार्य
और कारण दोनों को समान गुण का ही होना उचित है । अतः अन्धकार के
मूलकारण परमाणु में स्पर्श नहीं है । 'एवं स्पर्शयुक्त द्रव्य ही द्रव्य का उत्पादक है'
इस नियम में कहीं व्यभिचार भी नहीं है । तस्मात् प्रत्यक्ष से सिद्ध अन्धकार 'द्रव्य'
नहीं है । किन्तु अन्धकार को द्रव्य मानना सम्भव न होने पर भी उसको केवल
तेज का अभाव ही मान लें, यह पक्ष भी ठीक नहीं है । क्योंकि नील रूप से ही अन्ध-

  1. अभिप्राय यह है कि अन्धकार के प्रत्यक्ष में नीलरूप का भान होता है, स्पर्श का नहीं ।
    अतः यह मानना पड़ेगा कि दृष्ट अन्धकार के मूलकारण परमाणुओं में रूप है, स्पर्श नहीं ।
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२४ न्यायकन्दलीसंवल्लितप्रशस्तपादभाष्यम् [ उद्देश-
न्यायकन्दली
प्रतिभासायोगात्, मध्यन्दिनेऽपि दूरगगनाभोगव्यापिनो नीलिम्नश्च प्रतीतेः । किञ्च
गृह्यमाणे प्रतियोगिनि संयुक्तविशेषणतया तदन्यप्रतिषेधमुखेनाभावो गृह्यते, न स्वतन्त्रः ।
तमसि च गृह्यमाणे नान्यस्य ग्रहणमस्ति । न च प्रतिषेधमुखः प्रत्ययः । तस्मान्नाभावोऽयम् ।
न चालोकादर्शनमात्रमेवैतत्, बहिर्मुखतया तम इति, छायेति च कृष्णाकारप्रतिभासनात् ।
तस्माद्रूपविशेषोऽयमत्यन्तं तेजोभावे सति सर्व्वतः समारोपितस्तम इति प्रतीयते । दिवा
चोर्ध्वं नयनगोलकस्य नीलिमावभास इति वक्ष्यामः । यदा तु नियतदेशाधिकरणो भासाम-
भावस्तदा तद्देशसमारोपिते नीलिम्नि छायेत्यवगमः । अत एव दीर्घा, ह्रस्वा, महती, अल्पीयसी
कार का प्रत्यक्ष होता है । (अभाव में किसी भी रूप की मुख्य प्रतीति नहीं हो
सकती) । एवं दिन में दोपहर को (सूर्य्य का पूर्ण प्रकाश रहते हुए भी
गगनमण्डलव्यापी नीलिमा की प्रतीति होती है । धर्म्मो की प्रतीति होने पर
(उस समय या किसी भी समय न रहनेवाले) उससे भिन्न वस्तु की 'स्वसंयुक्त-
विशेषणता' नाम के सम्बन्ध से प्रतिषेधरूप से प्रतीति ही अभाव-प्रतीति है¹ ।
किन्तु अन्धकार-ज्ञान के उत्पन्न होने पर प्रतियोगिरूप से किसी अन्य वस्तु
का ज्ञान नहीं होता । तस्मात् अन्धकार तेज का अभाव ही है । (प्र.) 'तेज'
का न देखना ही अन्धकार की प्रतीति है ? (उ.) नहीं, बाहर की तरफ "यह
अन्धकार है, यह छाया है" इत्यादि नीलाकार की प्रतीतियाँ होती हैं (तस्मात् तेज
की अप्रतीति ही 'तम' नहीं है ), अतः (अन्धकार नाम की) यह वस्तु 'रूप'
विशेष, है, जो तेज का अत्यन्ताभाव रहने पर सभी ओर 'समारोपित'
होकर 'तम' कहलाती है । दिन में भी ऊपर की तरफ (आकाशमण्डल में)
जो नीलिमा की प्रतीति होती है, वह नयनगोलक की ही नीलिमा है, यह हम
आगे कहेंगे । जब जिस नियत देशरूप अधिकरण में तेज का अत्यन्ताभाव
रहता है, उस देश में आरोपित नीलरूपाभिन्न तम 'छाया' कहलाती है । अत
एव "यह छाया बड़ी है या छोटी है, यहाँ अधिक छाया है वहाँ कम"
इत्यादि प्रतीतियाँ होती हैं । क्योंकि उन देशों में आरोपित नीलिमा की प्रतीति ही
परमाणुओं में रूप है, स्पर्श नहीं है । पृथिव्यादि द्रव्यों में रूप और स्पर्श को नियमित रूप
के साथ देखना, या स्पर्शयुक्त द्रव्य ही द्रव्य को उत्पन्न करते हैं, यह नियम स्पर्श से शून्य
अन्धकार के परमाणुओं में द्रव्यारम्भकत्व का बाधक नहीं हो सकता ।

  1. अभिप्राय यह है कि चक्षु के संयोग से जब भूतल का ज्ञान होता है और घट नहीं दिखाई
    देता, तभी भूतल में "यहाँ घट नहीं है" इस आकार की प्रतीति होती है । फलतः निषिद्ध
    रूप से घट की यह प्रतीति ही 'घटाभाव' प्रतीति है । उससे भिन्न स्वतन्त्र घटाभाव की
    कोई प्रतीति नहीं है । प्रत्यक्ष इन्द्रियसम्बन्धमूलक होता है । प्रकृत में वह सम्बन्ध
    'स्वसंयुक्तविशेषणता' नाम का है । 'स्व' शब्द से चक्षु, तत्संयुक्त भूतल, वहाँ विशेषण
    है-निषेधविशिष्ट घट ।

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २५

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प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २५
न्यायकन्दली
छायेत्यभिमानः, तद्देशव्यापिनो नीलिम्नः प्रतीतेः, अभावपक्षे च भावधर्म्माध्यारोपोऽपि
दुरुपपादः । तदुक्तम्-
न च भासामभावस्य तमस्त्वं वृद्धसम्मतम् ।
छायायाः कार्ष्ण्यमित्येवं पुराणे भृगुणश्रुतेः ॥
दूरासन्नप्रदेशादि महदल्पचलाचला ।
देहानुवर्त्तिनी छाया न वस्तुत्वाद्विना भवेत् ॥ इति ।
दुरुपपादश्च क्वचिच्छायायां कृष्णसर्पभ्रमः, चलतिप्रत्ययोऽपि गच्छत्यावरक-
द्रव्ये यत्र यत्र तेजसोऽभावस्तत्र तत्र रूपोपलब्धिकृतः । एवं परत्वादयोऽप्यन्यथा-
सिद्धाः । तत्र चालोकाभावव्यञ्जनीयरूपविशेषे तमस्यालोकानपेक्षस्यैव
तो अन्धकार की प्रतीति है¹? तम को अभावरूप मान लेने से तो नील 'रूप का
आरोप कठिन होगा, क्योंकि 'रूप' भाव का धर्म है (उसका आरोप भी अभाव में
नहीं हो सकता ।)
जैसा कहा है कि-(१) तेज के अभाव में अन्धकार का व्यवहार वृद्धों से
अनुमोदित नहीं है; क्योंकि पुराणों में कहा गया है कि छाया में पृथ्वी का कृष्ण
वर्ण वर्तमान है।
(२) छाया को भावस्वरूप माने बिना छाया देह के साथ चलती है, छाया
अभी बहुत दूर है, अब समीप आई, यह छाया बहुत बड़ी है, या यह बहुत छोटी
है, यह अब चल रही है और वह अब खड़ी हो गयी, इन प्रतीतियों की उपपत्ति
नहीं हो सकती ।
छाया में काले साँप का भ्रम तो बिलकुल ही असम्भव होगा। (प्र.) अन्धकार
को रूपविशेष मान लेने पर भी "अन्धकार चलता है", अन्धकार में गमन की
यह प्रतीति अनुपपन्न ही रहेगी । (उ.) इसमें कोई अनुपपत्ति नहीं है । क्योंकि
गमन की उक्त प्रतीति आलोक को ढँकनेवाले द्रव्य के चलने से जहाँ-जहाँ तेज का
अभाव हो जाता है, उन सभी जगहों में आरोपित रूप की उपलब्धि ही है । इसी
प्रकार अन्धकार में प्रतीत होनेवाले परत्वादि गुणों की प्रतीति की उपपत्ति भी
दूसरे प्रकार से की जा सकती है । (प्र.) रूपों का प्रत्यक्ष आलोक में ही चक्षु से
होता है, अन्धकार की प्रतीति आलोक के न रहने से ही चक्षु से होती है, अतः
अन्धकार 'नीलरूप' नहीं है । (उ.) यह आपत्ति भी व्यर्थ है; क्योंकि वस्तुओं के
स्वभाव के अनुसार ही कार्यकारणभाव की कल्पना की जाती है । अगर
आलोक न रहने से ही अन्धकार का प्रत्यक्ष चक्षु से होता है तो फिर
और रूपों के प्रत्यक्ष में आलोकसहकृत चक्षु को (ही) कारण मानते हुए भी
अन्धकारस्वरूप रूप के प्रत्यक्ष में आलोक से निरपेक्ष चक्षु को ही कारण मानना
पड़ेगा । जैसे कि आप घटाभावादि के प्रत्यक्ष में आलोकसहकृत चक्षु को कारण

  1. जैसे कि चलते हुए मनुष्यादि के शरीर से या स्थावर वृक्षादि से भूतल के जो अंश सौर
    तेज के संयोग से बच जाते हैं, उनमें ही 'छाया' की प्रतीति होती है । एवं शरीरादि
    आवरक द्रव्यों का परिमाण जितना होता है, उतने ही परिमाण के अनुसार वे देशों को
    आवृत करते हैं । तदनुसार ही अन्धकाररूप छाया की प्रतीतियाँ होती हैं ।

सूत्र का विरोध होगा, क्योंकि उसमें कहा है कि द्रव्य, गुण और कर्म्म इन तीनों

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२६ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ उद्देश-
प्रशस्तपादभाष्यम्
गुणाश्च रूपरसगन्धस्पर्शसंख्यापरिमाणपृथक्त्वसंयोगविभाग-
प त्वापरत्वबुद्धिसुखदुःखेच्छाद्वेषप्रयत्नाश्चेति कण्ठोक्ताः सप्तदश ।
स्वयं सूत्रकार के द्वारा कथित ये सत्रह गुण हैं-
१. रूप, २. रस, ३. गन्ध, ४. स्पर्श, ५. संख्या, ६. परिमाण,
७. पृथक्त्व, ८. संयोग, ९. विभाग, १०. परत्व, ११. अपरत्व,
१२. बुद्धि, १३. सुख, १४. दुःख, १५. इच्छा, १६. द्वेष और १७. प्रयत्न
न्यायकन्दली
चक्षुषः सामर्थ्यम्, तद्भावभावित्वात्; यथालोकाभाव एव तन्मते । नन्वेवं तर्हि
सूत्रविरोधः "द्रव्यगुणकर्म्मनिष्पत्तिवैधर्म्म्याद्भावाभावस्तमः" इति? न विरोधः, भाऽभावे
सति तमसः प्रतीतेर्भाभावस्तम इत्युक्तम् ।
ईश्वरोऽपि बुद्धिगुणत्वादात्मैव, न तु षड्गुणाधिकरणश्चतुर्दशगुणाधिकरणाद्
गुणभेदेन भिद्यते, मुक्तात्मभिर्व्यभिचारात् ।
गुणा रूपादयः कण्ठोक्ता सूत्रकारेण कथिता रूपरसेत्यादिना ।
मानते हुए भी तेज के अभावरूप अन्धकार के प्रत्यक्ष में आलोक से निरपेक्ष चक्षु
को ही कारण मानते हैं । (प्र.) अन्धकार को अगर तेज का अभाव न मानें तो
सूत्र का विरोध होगा, क्योंकि उसमें कहा है कि द्रव्य, गुण और कर्म्म इन तीनों
के उत्पत्तिक्रम से अन्धकार की उत्पत्ति का क्रम भिन्न है, अतः 'भा' अर्थात् तेज
का अभाव ही 'तम' है । (उ.) तेज का अभाव होने पर ही अन्धकार की प्रतीति
होती है, अतः सूत्रकार ने 'भाभावस्तमः' ऐसा औपचारिक प्रयोग किया है¹ ।
ईश्वर भी बुद्धियुक्त होने के कारण आत्मा ही है । बुद्धि प्रभृति छः गुणों से
युक्त परमात्मा चौदह गुणों से युक्त जीवात्मा से गुणभेद के कारण भिन्नजातीय
द्रव्य नहीं है; क्योंकि ऐसा (नियम) मानने पर मुक्त जीव में व्यभिचार होगा² ।
'गुणाः' अर्थात् रूपादि गुण 'कण्ठोक्ताः' अर्थात् सूत्रकार महर्षि कणाद के द्वारा "रूप-
रसगन्धस्पर्शाः, संख्याः, परिमाणानि, पृथक्त्वम्, संयोगविभागौ, परत्वापरत्वे, बुद्धयः

  1. 'आयुर्वै घृतम्,' 'लाङ्गलम्' 'जीवनम्' इत्यादि प्रयोग जैसे कारण और कार्य्य को एक
    समझकर लक्षणा के द्वारा होते हैं, वैसे ही प्रकृत में भी तेज के अभाव की प्रतीति के
    कारण में अन्धकार के अभेद का आरोप कर अन्धकार पद की 'भाभाव'में लक्षणा के
    द्वारा सूत्रकार ने 'भाभाव' अर्थात् तेज के अभाव को 'तम' कहा है ।
  2. अभिप्राय यह है कि पहले "नवैव द्रव्याणि" ऐसा अवधारणात्मक प्रयोग है ।
    किन्तु जीव और ईश्वर के परस्पर भिन्न द्रव्य होने के कारण द्रव्य दश हो

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २७

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प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २७
प्रशस्तपादभाष्यम्
चशब्दसमुच्चिताश्च गुरुत्वद्रवत्वस्नेहसंस्कारादृष्टशब्दाः सप्तैवेत्येवं चतु-
र्विंशतिर्गुणाः ।
एवं १. गुरुत्व, २. द्रवत्व, ३. स्नेह, ४. संस्कार, अदृष्ट- ५. धर्म्म
एवं ६. अधर्म्म और ७. शब्द, ये सात गुण सूत्रस्थ 'च' शब्द से
संग्राह्य हैं । इस प्रकार सब मिलाकर गुण चौबीस प्रकार के हैं ।
न्यायकन्दली
'च'शब्देनात्रानुक्ता गुणत्वेन लोके प्रसिद्धा गुरुत्वादयः सप्त समुच्चिताः ।
एवं चतुर्विंशतिरेव गुणाः । ये तु शौर्यौदार्यकारुण्यदाक्षिण्योौग्र्यादयः, तेऽत्रैवान्त-
र्भवन्ति । शौर्यं बलवतोऽपि परस्य पराजयाय प्रत्युत्साहः । स च प्रयत्नविशेष
एव । सततं सन्मार्गवर्तिनी बुद्धिरौदार्यम् । परदुःखप्रहाणेच्छा कारुण्यम् ।
सुखदुःखे, इच्छाद्वेषौ, प्रयत्नाश्च गुणाः " (१/१/६) इस सूत्र की रचना के द्वारा
रूपादि सत्रह गुण ही 'रूपादि' शब्दों के द्वारा स्पष्ट रूप से कहे गये हैं। जो गुण इस
सूत्र के द्वारा साक्षात् नहीं कहे गये हैं और लोक से गुणत्व के नाम से व्यवहृत
हैं, वे सूत्र के 'च' शब्द से सूचित किये गये हैं । इस प्रकार कण्ठोक्त १७ और
'च' शब्द से समुच्चित सात, दोनों को मिलाकर गुण चौबीस हैं । शौर्य, औदार्य,
कारुण्य, दाक्षिण्य, औग्र्य प्रभृति जितने भी गुणशब्द से लोक में व्यवहृत हैं, वे सभी
इन्हीं गुणों में अन्तर्भूत हो जाते हैं । अपने से अधिक बलशाली शत्रु को पराजित
करने के उत्साह को 'शौर्य' कहते हैं, जो वस्तुतः प्रयत्नविशेष ही है । बराबर
सन्मार्ग में रहनेवाली 'बुद्धि' ही औदार्य कही जाती है । दूसरों के दुःख को नाश
जाते हैं । आत्मस्वरूप से जीव और ईश्वर को एक द्रव्य नहीं मान सकते, क्योंकि जीव
में चौदह गुण हैं एवं ईश्वर में केवल छः । तस्मात् द्रव्यविभागवाक्य का 'आत्मा' शब्द
जीव या ईश्वर किसी एक का ही बोधक हो सकता है । जिससे कि उक्त अवधारण का
प्रयोग असङ्गत हो जाता है । इसी आक्षेप का समाधान "ईश्वरेऽपि" इत्यादि सन्दर्भ से
देते हैं ! समाधान ग्रन्थ का अभिप्राय है कि चौदह गुण जीव के लक्षण नहीं हैं, क्योंकि
इतने गुण मुक्त आत्माओं में नहीं रहते । आत्मा के सभी विशेष गुणों का अत्यन्त विनाश
ही मुक्ति है । तस्मात् मुक्त जीवों में संख्या, परिमाण, पृथक्त्व, संयोग, विभाग, परत्व
और अपरत्व ये सात सामान्य गुण ही रहेंगे, क्योंकि मुक्ति के समय बुद्धि, सुख, दुःख,
इच्छा, द्वेष, प्रयत्न और भावनाख्य संस्कार जीव के ये सात विशेष गुण नष्ट हो जाते
हैं । अतः द्रव्यविभागवाक्य का 'आत्मा' शब्द चौदह गुणों से युक्त केवल जीव का ही
बोधक नहीं है । किन्तु आत्मत्वजाति से युक्त द्रव्य का बोधक है । यह जाति बुद्धि से युक्त
जीव और ईश्वर दोनों में है, क्योंकि आत्मत्वरूप से दोनों अभिन्न हैं । अतः "नवैव
द्रव्याणि" यह अवधारण ठीक है ।

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२८ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ उद्देश-
प्रशस्तपादभाष्यम्
उत्क्षेपणापक्षेपणाकुञ्चनप्रसारणगमनानि पञ्चैव कर्माणि । गमनग्रहणाद्
भ्रमणरेचनस्यन्दनोर्ध्वज्वलनतिर्य्यक्पतननमनोन्नमनादयो गमनविशेषा न
जात्यन्तराणि ।
१. उत्क्षेपण, २. अपक्षेपण, ३. आकुञ्चन, ४. प्रसारण और
५. गमन ये पाँच ही कर्म हैं । गमन पद से यह कहना है कि भ्रमण,
रेचन, स्यन्दन, ऊर्ध्वज्वलन, तिर्य्यक्पतन, नमन और उन्नमन प्रभृति
कर्म्म भी गमनविशेष ही हैं, दूसरी जाति के नहीं ।
न्यायकन्दली
तत्त्वाभिनिवेशिनी बुद्धिर्दाक्षिण्यम् । औग्रयमात्मन्युत्कर्षप्रत्यय इत्येवमादिः । अदृष्टशब्देन
च धर्म्माधर्म्मयोरुपसङ्ग्रहः । संस्कार इति । स च वेगस्य भावनायाः स्थितिस्थापकस्य
चाभिधानम् । नन्वेवं तर्ह्याधिक्यम् ? न, संस्कारत्वजात्यपेक्षया वेगभावनास्थितिस्थापका-
नामेकत्वात् । एवं तर्हि न चतुर्विंशतित्वम् ? अदृष्टत्वजात्यपेक्षया धर्म्माधर्म्मयोरेकत्वात् । न,
अदृष्टत्वजात्यभावात् । निर्गुणेष्वपि गुणेष्वसाधारणधर्म्मयोगित्येनोपचाराच्चतुर्विंशतिरिति
व्यवहारः ।
कर्माणि विभजते-उत्क्षेपणेति । कियन्ति तानि ? तत्राह-पञ्चैवेति । ननु
भ्रमणादयोऽपि सन्ति ? कथं पञ्चैवेत्यवधारणमत आह-गमनग्रहणादिति ।
करने की 'इच्छा' ही कारुण्य है । यथार्थ वस्तु को ग्रहण करनेवाली 'बुद्धि' ही
दाक्षिण्य है । अपने में उत्कर्ष की बुद्धि ही औग्र्य है । 'अदृष्ट' शब्द से धर्म
और अधर्म-दोनों अभिप्रेत हैं । 'संस्कार' शब्द से वेग, भावना और
स्थितिस्थापक तीनों संग्राह्य हैं । (प्र.) इस प्रकार गुण तो चौबीस से अधिक हो
जायेंगे ? (उ.) नहीं, संस्कारत्व जाति है और इस रूप से वेगादि तीनों संस्कार
एक ही हैं । (प्र.) इस प्रकार भी गुण चौबीस ही नहीं होंगे, क्योंकि (वेगादि
की तरह) अदृष्टत्वजाति रूप से धर्म और अधर्म ये दोनों भी एक हो जाएँगे ?
(उ.) नहीं, क्योंकि अदृष्टत्व नाम की कोई जाति नहीं है । गुणों में गुण के न
रहने पर भी 'गुण चौबीस हैं' यह गौण व्यवहार होता है । जैसे कि पृथिवीत्वादि
नौ धर्मों के सम्बन्ध से "द्रव्य पृथिव्यादि भेद से नौ हैं" यह व्यवहार होता है,
उसी प्रकार रूपादिगत असाधारण धर्मस्वरूप रूपत्वादि चौबीस धर्मों के सम्बन्ध
से रूपादि गुणों में चौबीस संख्या का गौण व्यवहार होता है । (इससे रूपादि गुणों
में संख्या गुण की सत्ता की सम्भावना नहीं है ।)
"उत्क्षेपण" इत्यादि से कर्म पदार्थ का विभाग किया गया है । वे कितने हैं ?
इस प्रश्न का उत्तर है 'पञ्चैव', अर्थात् कर्म पाँच ही हैं । (प्र.) भ्रमणादि और

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २९

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प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २९
प्रशस्तपादभाष्यम्
सामान्यं द्विविधं परमपरञ्चानुवृत्तिप्रत्ययकारणम् । तत्र परं
सत्ता, महाविषयत्वात् । सा चानुवृत्तेरेव हेतुत्वात् सामान्यमेव ।
१. पर और २. अपर भेद से सामान्य दो प्रकार का है ।
वे 'अनुवृत्तिप्रत्यय' अर्थात् विभिन्न वस्तुओं में एक आकार की
प्रतीति के कारण हैं । उनमें 'सत्ता' पर सामान्य ही है, क्योंकि
वह 'महाविषय' अर्थात् और सभी सामान्यों से अधिक आश्रयों में
विद्यमान है । सत्ता केवल सामान्य ही है (विशेष नहीं), क्योंकि
वह केवल अनुवृत्तिप्रत्यय का ही कारण है, अर्थात् परस्पर भिन्न अपने
न्यायकन्दली
गमनग्रहणात् पञ्चैव कर्म्माणि । अत्रोपपत्तिमाह-भ्रमणरेचनस्यन्दनेत्यादि । यस्माद्
भ्रमणादयोऽपि गमनविशेषा गमनप्रभेदा न जात्यन्तराणि, तस्माद् गमनग्रहणेनैतेषामपि
ग्रहणात् पञ्चैवेत्यवधारणं सिद्ध्यतीत्यर्थः ।
सामान्यं कथयति-सामान्यं द्विविधमिति । द्वैविध्यमेव कथयति-परमपरं
चेति । चोऽवधारणे, परमपरमेवेत्यर्थः । तस्य रूपं कथयति- अनुवृत्ति-
प्रत्ययकारणमिति । अत्यन्तव्यावृत्तानां पिण्डानां यतः कारणादन्योन्यस्वरूपानु-
गमः प्रतीयते तत्सामान्यम् । किं तत्परं सामान्यमित्याह-परं सत्तेति ।
भी तो हैं ? फिर 'कर्म पाँच ही हैं' यह अवधारण असङ्गत है । इसी प्रश्न का
समाधान 'गमनग्रहणात्' इत्यादि से करते हैं । अर्थात् चूँकि गमनरूप कर्म का
ग्रहण किया गया है, इसलिए कर्म पाँच ही हैं । 'भ्रमणरेचन' इत्यादि से इसी में
युक्ति देते हैं । चूँकि भ्रमणादि गमनत्व जाति के ही हैं, दूसरी जाति के कर्म्म नहीं
हैं, अतः 'गमन' पद से भ्रमणादि कर्मों का भी संग्रह हो जाने से 'कर्म पाँच ही
हैं, यह अवधारणा ठीक है ।
"सामन्यं द्विविधम्" इत्यादि पङ्क्तियों से अब (अवसरप्राप्त) सामान्य का
निरूपण 'परमपरञ्च' इस वाक्य से करते हैं । (१) पर और (२) अपर, ये दो
प्रकार सामान्य के कहे गये हैं । इस वाक्य के 'च' शब्द से इस 'अवधारण' का
बोध होता है कि सामान्य के पर और अपर भेद से दो ही प्रकार हैं ।
'अनुवृत्तिप्रत्ययकारणम्' इत्यादि से सामान्य पदार्थ का लक्षण कहते हैं (अर्थात्)
अत्यन्त विभिन्न दो वस्तुओं में जिस एक वस्तु के रहने से एक आकार की प्रतीति
होती है, उसी को 'सामान्य' कहते हैं । वह 'पर' सामान्य कौन-सा है ?
१. जैसे कि एक घट दूसरे घट से भिन्न है, फिर भी उन दोनों में 'ये घट हैं'
एक आकार की प्रतीति होती है और पट में यह प्रतीति नहीं होती । इसका
कारण सभी घटों में घटत्व नाम के सामान्य का रहना ही है । एवं घट और

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३० न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ उद्देश-
प्रशस्तपादभाष्यम्
द्रव्यत्वाद्यपरम्, अल्पविषयत्वात् । तच्च व्यावृत्तेरपि हेतुत्वात् सामान्यं
सद्विशेषाख्यामपि लभते ।
आश्रयों में एकाकारप्रतीति को उत्पन्न करती है । किसी भी प्रकार की
व्यावृत्तिबुद्धि अर्थात् अपने विभिन्न आश्रयों में परस्पर भेदबुद्धि को
उत्पन्न नहीं करती । द्रव्यत्वादे सामान्य सत्ता की अपेक्षा थोड़े आश्रयों
में रहने के कारण 'अपर सामान्य' है । ये द्रव्यत्वादि अनुवृत्तिप्रत्यय
की तरह व्यावृत्तिप्रत्यय के भी कारण हैं, अतः वे सामान्य होते हुए
'विशेष' भी कहलाते हैं ।
न्यायकन्दली
अत्र युक्तिमाह-महाविषयत्वादिति । द्रव्यत्वाद्यपेक्षया बहुविषयत्वादित्यर्थः । सा
चानुवृत्तेरेव हेतुत्वात् सामान्यमेव । द्रव्यत्वादिकं तु स्वाश्रयस्य विजातीयेभ्योऽपि
व्यावृत्तेरपि हेतुत्वादिशेषोऽपि भवति । सत्ता तु स्वाश्रयस्यानुवृत्तेरेव हेतुस्तेन
सामान्यमेव । यद्यप्येषा सामान्यादिभ्यो व्यावर्तते तथापि न तेभ्यः
इस प्रश्न का समाधान 'परं सत्ता' इस वाक्य से देते हैं । सत्ता 'पर' सामान्य ही
क्यों है ? इसका हेतु 'महाविषयत्वात्' इस (पञ्चम्यन्त) पद से दिखलाया है ।
अर्थात् 'सत्ता' जाति द्रव्यत्वादि और जातियों से अधिक आश्रयों में रहती है ।
यह (सत्तारूप सामान्य) केवल अनुवृत्ति-बुद्धि (अनेक वस्तुओं में एकाकारता की
बुद्धि) का ही कारण है, अतः यह केवल 'सामान्य' ही है (विशेष नहीं) ।
द्रव्यत्वादिरूप सामान्य (विभिन्न द्रव्यों में एकाकारतारूप अनुवृत्तिबुद्धि की तरह)
अपने आश्रयीभूत द्रव्यादि में गुणादि से व्यावृत्तिबुद्धि, अर्थात् द्रव्य गुणादि से
भिन्न हैं, इस प्रकार की विभिन्नाकारता प्रतीति का भी कारण है, अतः द्रव्यत्वादि
जातियाँ 'विशेष'भी हैं । सत्ता तो अपने आश्रयीभूत द्रव्य, गुण और कर्म में "ये
सत् हैं" इस प्रकार के अनुवृत्तिप्रत्यय का ही कारण है (किसी भी व्यावृत्तिबुद्धि
का नहीं), अतः वह 'सामान्य' ही है । (प्र.) यद्यपि यह कह सकते हैं कि सत्ता
जाति सामान्यादि पदार्थों में नहीं है (क्योंकि उनमें कोई भी सामान्य नहीं है),
अतः 'सत्ता जाति' द्रव्य, गुण, और कर्म, इन तीनों में 'ये सत् हैं' इस
अनुवृत्तिबुद्धि की तरह (सत्ताजातियुक्त) द्रव्यादि पदार्थ (सत्ताशून्य) सामान्यादि
पदार्थों से भिन्न हैं, इस व्यावृत्तिबुद्धि के भी करण है । (इस युक्ति से सत्ता भी
द्रव्यत्वादि सामान्य की तरह 'विशेष' कहला सकती है) तथापि सामान्यादि पदार्थों
में भी भावत्व, अस्तित्वादि रूप सत्ता तो है ही, जिससे सामान्यादि पदार्थों में भी
"ये सत् हैं" इस प्रकार की प्रतीति होती है । अतः सामान्यादि में जातिरूप सत्ता
का सम्बन्ध न भी रहे, तथापि द्रव्यादि से सामान्यादि पदार्थों से भिन्नत्व प्रतीति का
पट दोनों परस्पर भिन्न होते हुए भी दोनों में 'ये द्रव्य हैं' । इस एक आकार की प्रतीति
होती है । इसका भी कारण घट और पट में द्रव्यत्व नामक सामान्य का रहना ही है ।