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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

by महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद

Source: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished759 pages

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५५५

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प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५५५
न्यायकदली
नास्तीति प्रतीतिः । अभावविशिष्टभूतलग्रहणस्याभावप्रतीतिहेतुत्वे च (भावग्रहणे)
तदभावग्रहणे तदभावविशिष्टभूतलग्रहणम्, तदभावविशिष्टाद् भूतलग्रहणाच्चाभावग्रहणमिति
स्वयमेव स्वस्य कारणमभ्युपगतं स्यात् । तस्मादभावव्यतिरिक्ता प्रतियोगिसंसर्गव्यतिरेकिणी
भूतलस्य त्यापि काचिदेकाकित्यावस्थाभ्युपगन्तव्या, यस्याः प्रतीतावभावप्रतीतिः स्यात्,
सैवास्माकं नास्तीति व्यवहारं प्रवर्तयतीति । तदप्ययुक्तम्, भूतस्वरूपग्रहणस्यैवाभाव-
प्रतीतिहेतुत्वात् । न च सद्वितीयग्रहणेऽप्येतत्प्रतीतिप्रसङ्गः, भूतलग्रहणवदभावेन्द्रियसन्नि-
कर्षोऽप्यभावग्रहणसामग्री, कण्टकादिसद्भावे तदभावो नास्तीति विषयेन्द्रियसन्निकर्षाभावात्
सत्यपि भूतलग्रहणे नाभावप्रतीतिः । न हि चक्षुरालोकादिकमुपलम्भकारणमस्तीति यद्यत्र
नास्ति तदपि तत्र प्रतीयते । तदेवं सिद्धोऽभावः ।
प्रतीति को भूतल में कण्टकाभाव की प्रतीति का कारण मानें, तो यही निष्कर्ष
निकलेगा कि 'भूतल में कण्टकाभाव के ग्रहण से ही कण्टकाभाव से युक्त भूतल
का ग्रहण होता है' एवं 'कण्टकाभावविशिष्ट भूतल के ग्रहण से ही भूतल में
कण्टकाभाव का ग्रहण होता है' इन दोनों का इस अनिष्टापत्ति में पर्यवसान होगा
कि 'वस्तु स्वयं ही अपना कारण है' । तस्मात् आप (अभाव को स्वतन्त्र पदार्थ
माननेवाले) को भी भूतल की कोई ऐसी 'एकाकी अवस्था' माननी ही होगी, जो
कण्टकाभावादि स्वरूप न हो, एवं भूतल में कण्टक रूप प्रतियोगी की सत्त्व दशा
में न रहे, जिससे भूतल में कण्टकाभाव का व्यवहार हो सके । भूतल की वही
एकाकी अवस्था भूतल में कण्टकाभाव के व्यवहार का कारण होगी' (इसके लिए
अभाव को स्वतन्त्र पदार्थ मानने की आवश्यकता नहीं है । (उ.) यह भी ठीक
नहीं है, क्योंकि केवल भूतल का ग्रहण ही भूतल में होनेवाले कण्टकाभावादि के
प्रत्ययों का कारण है । (प्र.) तो फिर जिस समय भूतल में कण्टकादि दूसरी
वस्तुओं का प्रत्यय होता है, उस समय कण्टकाभावादि की प्रतीतियाँ क्यों नहीं
होतीं ? (उ.) चूँकि भूतल में कण्टकाभाव के प्रत्यक्ष (ग्रहण) के लिए जिस कारण
समूह की अपेक्षा है, उसमें भूतल ग्रहण की तरह कण्टकाभाव के साथ इन्द्रिय का
सन्निकर्ष भी निविष्ट है । भूतल में जिस समय कण्टक की सत्ता रहती है, उस
समय कण्टकाभाव रूप विषय नहीं रहता है । अतः उस समय कण्टकाभाव रूप
विषय के साथ इन्द्रिय का सन्निकर्ष सम्भव नहीं है । (भूतल में कण्टक की सत्त्व
दशा में) भूतल का प्रत्यक्ष रहने पर भी, कण्टकाभाव का प्रत्यक्ष नहीं होता है ।
यह तो सम्भव नहीं है कि प्रकाश एवं चक्षु प्रभृति प्रत्यक्ष के कारण विद्यमान हैं,
केवल इसीलिए जो जहाँ नहीं भी है, उसका भी वहाँ प्रत्यक्ष हो । इस प्रकार यह
सिद्ध है कि अभाव नाम का स्वतन्त्र पदार्थ अवश्य है ।

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५५६ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमानेऽभावान्तर्भाव-
न्यायकन्दली
स च चतुर्व्यूहः-प्रागभावः, प्रध्वंसाभावः, इतरेतराभावः, अत्यन्ताभावश्चेति ।
प्रागुत्पत्तेः कारणेषु कार्यस्याभावः प्रागभावः, तत्र प्राक् कार्योत्पत्तेः पूर्वमभावो
विशेषस्य प्रागभावः स चानादिरप्यनित्यः, कार्योत्पादेन तस्य विनाशात्, अविनाशे च
कार्यस्योत्पत्त्यभावात् । कः प्रागभावस्य विनाशः ? वस्तुत्पाद एव । निवृत्ते वस्तुनि
प्रागभावोपलब्धिप्रसङ्ग इति चेत् ? वस्तुयद् वस्त्ववयवानामारब्धकार्याणां प्रागभावविनाश-
लक्षणत्वात् ।
उत्पन्नस्य स्वरूपप्रच्युतिः प्रध्वंसाभावः । स चोत्पत्तिमदानप्यविनाशी, भावस्य
पुनरनुपलम्भात् । प्रागभूतस्य पश्चाद्भाव उत्पादः, प्रध्वंसस्य कः
(१) प्रागभाव, (२) प्रध्वंसाभाव, (३) इतरेतराभाव (अन्योन्याभाव या भेद) और
(४) अत्यन्ताभाव, अभाव के ये चार भेद हैं ।
(१) उत्पत्ति से पहले (समवायि) कारणों में कार्य का जो अभाव रहता है,
वही प्रागभाव है (प्रागभाव शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार है कि) 'प्राक्' अर्थात्
कार्य की उत्पत्ति से पहले 'अभाव' अर्थात् कार्य रूप 'विशेष' का अभाव ही
'प्रागभाव' है । यह अनादि होने पर भी विनाशशील है, यदि प्रागभाव को
अविनाशी मानें तो कार्य की उत्पत्ति ही न हो सकेगी। अतः (प्रतियोगिभूत) कार्य
की उत्पत्ति से उसका विनाश मानना आवश्यक है । (प्र.) प्रागभाव का विनाश
कौन-सी वस्तु है ? (उ.) प्रतियोगिभूत वस्तु की उत्पत्ति ही उसके प्रागभाव का
विनाश है । (प्र.) तो फिर उस वस्तु के विनष्ट हो जाने पर उस वस्तु के
प्रागभाव की फिर से उपलब्धि होनी चाहिए ? (उ.) (प्रागभाव के विनाश को
प्रतियोगी का उत्पत्ति स्वरूप मानने पर भी यह आपत्ति) नहीं है; क्योंकि प्रागभाव
का विनाश जिस प्रकार प्रागभाव के प्रतियोगी रूप वस्तु का उत्पत्ति रूप है, उसी
प्रकार उस वस्तु के कारणीभूत उन अवयवों के स्वरूप भी हैं, जिन अवयवों से
कार्य की उत्पत्ति हो चुकी है ।
(२) उत्पन्न हुए कार्य का अपने स्वरूप से हटना ही (उसका) 'प्रध्वंसाभाव'
है । यह अभाव उत्पत्तिशील होने पर भी विनाशशील नहीं है; क्योंकि विनष्ट हुए
भाव व्यक्ति की फिर कभी उपलब्धि नहीं होती है । (प्र.) पहले से जिसका प्रागभाव
रहता है, बाद में उसकी सत्ता ही उस वस्तु की उत्पत्ति कहलाती है; किन्तु प्रध्वंस
का प्रागभाव कौन-सी वस्तु है? (उ.) प्रध्वंस¹ के प्रतियोगिभूत वस्तु की सत्ता ही

  1. अर्थात् जिसकी उत्पत्ति होगी, उसका यदि प्रागभाव मानना आवश्यक हो तो प्रध्वंस का
    भी प्रागभाव मानना आवश्यक होगा; क्योंकि वह भी उत्पत्तिशील है । अतः प्रश्न उठता है
    कि प्रध्वंस का प्रागभाव क्या है ?

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५५७

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प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५५७
न्यायकन्दली
प्रागभावः ? यस्यार्थस्य यः प्रध्वंसः, तस्यार्थस्य स्वरूपस्थितिरेव तत्प्रध्वंसस्य प्रागभावः ।
यथा वस्तूत्पत्तिरेव तत्प्रागभावस्य विनाशः, तथा प्रध्वंसोत्पत्तिरेव तत्प्रागभावस्य विनाशः।
यदसद्भूतं तस्य कथमभाव इति न परिचोद्यम्, कारणसामर्थ्यस्यापर्य्यनुयोज्यत्वात् ।
गव्यश्वाभावोऽश्वे च गोरभाव इतरेतराभावः । स च सर्वत्रैको नित्य एव,
पिण्डविनाशोऽपि सामान्यवत् पिण्डान्तरे प्रत्यभिज्ञानात् । यथा सामान्यमदृष्टवशादुप-
जायमानेनैव पिण्डेन सह सम्बद्ध्यते, नित्यत्वं च स्वभावसिद्धम्, तथेतरतराभावोऽपि ।
इयांस्तु विशेषः-पिण्डग्रहणमात्रेण सामान्यग्रहणम्, इतरेतराभावग्रहणं तु प्रतियोगिसापेक्षम्,
पररूपनिरूपणीयत्वात् ।
अत्यन्ताभावो यदसतः प्रतिषेध इति । इतरेतराभाव एवात्यन्ताभाव
इति चेत् ? अहो राजमार्ग एव भ्रमः ? इतरेतराभावो हि स्वरूपसिद्धयोरेव
उस प्रध्वंस का प्रागभाव है । जिस प्रकार प्रतियोगिभूत वस्तु की उत्पत्ति ही उसके
प्रागभाव का विनाश है,उसी प्रकार प्रध्वंस की उत्पत्ति ही उसके प्रागभाव का
विनाश है । यह अभियोग करना युक्त नहीं है कि (प्र.) जो (प्रागभाव) स्वयं
अभाव स्वरूप है, उसका अभाव कैसे निष्पन्न होगा ? (उ.) क्योंकि कारणों का
सामर्थ्य सभी अभियोगों से बाहर है ।
(२) गो में अश्व का अभाव और अश्व में गो का जो अभाव है, वही
'इतरेतराभाव' है । वह समवाय की तरह अपने सभी आश्रयों में एक ही है,
और नित्य भी है; क्योंकि आश्रयीभूत एक वस्तु के विनष्ट हो जाने पर भी उसी
प्रकार की दूसरी वस्तु में उसका भान होता है । जैसे कि (घटत्व) सामान्य के
आश्रयीभूत एक घट का नाश हो जाने पर भी दूसरे घट में उसका प्रत्यभिज्ञान
होता है । एवं जिस प्रकार घटादि वस्तुओं के उत्पन्न होते ही अदृष्ट रूप
कारणवश सामान्य उनके साथ सम्बद्ध हो जाता है । एवं जिस प्रकार सामान्य में
नित्यत्व स्वभावतः प्राप्त है । उसी प्रकार ये सभी बातें इतरेतराभाव (अन्योन्याभाव
या भेद) में भी समझनी चाहिए । (सामान्य और इतरेतराभाव इन दोनों में उक्त
सादृश्यों के रहते हुए भी) इतना अन्तर है कि केवल आश्रय का ज्ञान होते ही
सामान्य का ज्ञान हो जाता है; किन्तु इतरेतराभाव को समझने के लिए (उसके
आश्रय के अतिरिक्त) उसके प्रतियोगी के ज्ञान की भी अपेक्षा होती है; क्योंकि
सभी अभाव को समझने के लिए प्रतियोगी रूप दूसरी वस्तु के ज्ञान की अपेक्षा
होती है ।
सर्वथा अविद्यमान वस्तु का जो निषेध वही 'अत्यन्ताभाव' है । (प्र.) अत्यन्ताभाव
इतरेतराभाव से भिन्न कोई वस्तु नहीं हैं । (उ.) यह तो राजमार्ग में ही भूल होने
जैसी बात है; क्योंकि जहाँ प्रतियोगी और अनुयोगी दोनों की सत्ता रहती है, किन्तु
परस्पर एक के तादात्म्य का दूसरे में निषेध किया जाता है, वहाँ इतरेतराभाव माना
जाता है ।किसी सिद्ध आश्रय में सर्वथा अविद्यमान, किन्तु केवल बुद्धि में आरोपित

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५५८ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमानेऽवयव-
प्रशस्तपादभाष्यम्
तथैवैतिह्यमप्यवितथमाप्तोपदेश एवेति !
पञ्चावयवेन वाक्येन स्वनिश्चितार्थप्रतिपादनं परार्थानु-
इसी प्रकार 'ऐतिह्य' भी सत्य अर्थ का बोधक एवं आप्त से उच्च-
रित शब्द प्रमाण ही है (फलतः अनुमान ही है) ।
अपने निश्चित अर्थ को दूसरे को समझाने के लिए (प्रसिद्ध) पाँच
अवयव (पञ्चावयव) वाक्यों का प्रयोग ही 'परार्थानुमान' है । (अर्थात्)
न्यायकन्दली
गवाश्वयोरितरेतरात्मताप्रतिषेधः । अत्यन्ताभावे तु सर्वथा असद्भूतस्यैव बुद्ध्यावारोपितस्य
देशकालानवच्छिन्नः प्रतिषेधः । यथा षट्पदार्थेभ्यो नान्यत् प्रमेयमस्तीति । यदि
चात्यन्ताभावो नेष्यते, षडेव पदार्था इत्ययं नियमो दुर्घटः स्यात् ।
ऐतिह्यमप्यवितथमाप्तोपदेश एव 'इति ह' इति निपातसमुदाय उपदेशपारम्पर्ये
वर्तते, तत्रायं स्वार्थिकः ष्यञ्प्रत्ययः, ऐतिह्यमिति ।
वितथमैतिह्यं तावत् प्रमाणमेव न भवति । अवितथमाप्तोपदेश एव । आप्तोप-
देशश्चानुमानम् । तस्मादवितथमैतिह्यमनुमानान्न व्यतिरिच्यत इत्यभिप्रायः ।
परार्थानुमानव्युत्पादनायाह-पञ्चावयवेन वाक्येन स्वनिश्चितार्थ-
प्रतिपादनं परार्थानुमानमिति । प्रतिपादनीयस्यार्थस्य यावति शब्दसमूहे
प्रतीतिः पर्यवस्यति, तस्य पञ्चभागाः समूहापेक्षयावयवा इत्युच्यन्ते । स्वयं
साध्यानन्तरीयकतवेन निश्चितोऽर्थः स्वनिश्चितार्थः, साध्याविनाभूतं लिङ्गम्।
वस्तु का 'इस आश्रय में यह कभी किसी भी प्रदेश में नहीं है' इस प्रकार का
प्रतिषेध ही अत्यन्ताभाव है । जैसे द्रव्यादि छः पदार्थों से अतिरिक्त कोई वस्तु नहीं
है (इस प्रकार का प्रतिषेध अत्यन्ताभाव रूप है) यदि अत्यन्ताभाव न मानें तो
'पदार्थ छः ही हैं' इस प्रकार का अवधारण कठिन होगा ।
'ऐतिह्यमप्यवितथमाप्तोपदेश एव' इस वाक्य में प्रयुक्त 'ऐतिह्य' शब्द 'इति ह'
इन दोनों निपातों से स्वार्थ में 'ष्यञ्' प्रत्यय से निष्पन्न होता है । ये दोनों निपात
'परम्परा से प्राप्त उपदेश' रूप अर्थ के बोधक हैं ।
अभिप्राय यह है कि जो 'ऐतिह्य' रूप वचन (या उपदेश) असत्य है, वह तो
प्रमाण ही नहीं है । जो ऐतिह्य प्रमा ज्ञान का उत्पादक है, वह आप्तवचन को
छोड़कर और कुछ भी नहीं है । (यह उपपादन कर चुके हैं कि) आप्तोपदेश
अनुमान से भिन्न कोई प्रमाण नहीं है । अतः ऐतिह्य भी अनुमान से भिन्न कोई
प्रमाण नहीं है ।
'पञ्चावयवेन वाक्येन स्वनिश्चितार्थप्रतिपादनं परार्थानुमानम्' यह वाक्य
परार्थानुमान को समझाने के लिए कहा गया है । अभीष्ट अर्थ की प्रतीति जिन
शब्दों के समूह से सम्पन्न होती है, उसके पाँच खण्ड होते हैं । वाक्य के वे ही पाँच
खण्ड वाक्यसमूह की अपेक्षा (अर्थात् उक्त समूह को अवयवी मानकर) उसके अवयव
कहलाते हैं । 'स्वयं साध्यानान्तरीयकतवेन निश्चितोऽर्थः स्वनिश्चितार्थः' इस व्युत्पत्ति के

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५५९

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प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५५९
न्यायकन्दली
तस्य पञ्चावयवेन वाक्येन प्रतिपादनं तत्प्रतिपत्तिजननसमर्थपञ्चावयववाक्यप्रयोगः
परार्थानुमानम् । पञ्चावयवं हि वाक्यं यावत्सु रूपेषु लिङ्गस्य साध्याविनाभावः
परिसमाप्यते तावद्रूपं लिङ्गं प्रतिपादयति । तत्प्रतिपादिताच्च लिङ्गात् साध्यसिद्धिः । न
वाक्यमेव साध्यं बोधयति, तस्य शाब्दत्वप्रसङ्गात् । तस्मादविनाभूतलिङ्गाभिधायकवाक्यप्रयोग
एव परार्थानुमानमुच्यते ।
अपरे तु यत्परः शब्दः स शब्दार्थः, वाक्यं च साध्यपरम्, तत्प्रतिपादनार्थमस्य प्रयोगात् ।
लिङ्गप्रतिपादनं त्ववान्तरव्यापारः, वचनमात्रेण विप्रतिपन्नस्य साध्यप्रतीतैरभावादिति वदन्त
एवं व्याचक्षते-स्वनिश्चितार्थः साध्यः, तस्य लिङ्गप्रतिपादनमेवावान्तरव्यापारीकृत्य पञ्चाव-
यवेन वाक्येन प्रतिपादनं तत्प्रतिपादकवाक्यप्रयोगः परार्थानुमानमिति ।
स्वोक्तं विवृणोति-पञ्चावयवेनैवेत्यादिना । द्व्यवयवमेव वाक्य-
अनुसार साध्य की व्याप्ति से युक्त वस्तु ही (प्रकृत वाक्य में प्रयुक्त) 'स्वनिश्चित'
शब्द का अर्थ है । उस (स्वनिश्चित अर्थ रूप साध्यव्याप्त हेतु) का पञ्चावयव
वाक्य के द्वारा जो 'प्रतिपादन' अर्थात् साध्य की व्याप्ति से युक्त हेतुविषयक बोध
के उत्पादन में क्षम पञ्चावयव वाक्य का प्रयोग, वही 'परार्थानुमान' है । जिन
धर्मों के द्वारा हेतु में साध्य की व्याप्ति पूर्ण रूप से समझी जाती है, उन धर्मों से
युक्त हेतु का ही प्रतिपादन पञ्चावयव वाक्य से होता है । पञ्चावयव वाक्य के
द्वारा प्रतिपादित उक्त हेतु से ही साध्य का बोध (अनुमिति) होता है, साक्षात्
पञ्चावयव वाक्य से साध्य की अनुमिति नहीं होती है, यदि ऐसी बात हो तो
साध्य का उक्त बोध अनुमिति न होकर शाब्दबोध हो जाएगा । अतः साध्य की
व्याप्ति से युक्त हेतु के बोधक पञ्चावयव वाक्यों के प्रयोग को ही 'परार्थानुमान'
कहा जाता है ।
दूसरे सम्प्रदाय के कुछ लोग कहते हैं कि जिस विषय को समझाने के लिए
जिस शब्द का प्रयोग किया जाता है, वही विषय उस शब्द का अर्थ होता है ।
पञ्चावयव वाक्य साध्य को समझाने के लिए ही प्रयुक्त होता है, अतः साध्य ही
पञ्चावयव वाक्य रूप शब्द का प्रतिपाद्य अर्थ है । चूँकि केवल पञ्चावयव रूप
वाक्य के प्रयोग से भ्रान्त व्यक्ति को साध्य का बोध नहीं होता है, अतः मध्यवर्ती
व्यापार के रूप में (साध्यव्याप्य हेतु का ज्ञान) आवश्यक होता है । ये लोग प्रकृत
वाक्य की व्याख्या इस प्रकार करते हैं कि साध्य ही प्रकृत 'स्वनिश्चितार्थ' शब्द से
अभिप्रेत है । इसी 'साध्य' का प्रतिपादन पञ्चावयव वाक्य से (मुख्यतः ) होता है।
इतना अवश्य है कि इस काम के लिए उसे साध्यव्याप्यहेतुज्ञान को बीच का
व्यापार मानना पड़ता है । अतः साध्य के ज्ञापक पञ्चावयव वाक्यों का प्रयोग ही
'परार्थानुमान' है ।
'पञ्चावयवेनैव वाक्येन' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा भाष्यकार ने 'पञ्चावयवेन
वाक्येन' इत्यादि अपनी ही पङ्क्ति की व्याख्या की है । किसी सम्प्रदाय के लोग

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५६० न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमानेऽवयव-
प्रशस्तपादभाष्यम्
मानम् । पञ्चावयवेनैव वाक्येन संशयितविपर्यस्ताव्युत्पन्नानां परेषां स्वनिश्चि-
तार्थप्रतिपादनं परार्थानुमानं विज्ञेयम् ।
अपने निश्चित अर्थविषयक संशय या विपर्यय अथवा अव्युत्पत्ति से युक्त
पुरुषों को पञ्चावयव वाक्य के द्वारा ही उस अर्थ को समझाने के लिए
उक्त (अपने निश्चित) अर्थ का (पञ्चावयव वाक्य के द्वारा) प्रतिपादन
ही 'परार्थानुमान' समझना चाहिए ।
न्यायकन्दली
मित्येके । त्र्यवयवमित्यपरे । तत्प्रतिषेधार्थमेवकारकरणम्-पञ्चावयवेनैवेति । प्रतिपाद्येऽर्थे
यस्य संशयोऽस्ति स संशयितः, यस्य विपर्ययज्ञानं स विपरीत:, यस्य न संशयो न विपर्ययः
किन्तु स्वज्ञानमात्रं सोऽव्युत्पन्नः, त्रयोऽपि ते प्रतिपादनार्हाः, तत्त्वप्रतीतिविरहात् ।
यो यानि पदानि समुदितानि प्रयुङ्क्ते, स तत्पदार्थसंसर्गप्रतिपादनाभि-
प्रायवानिति सामान्येन स्वात्मनि नियमे प्रतीते पश्चात् पदसमूहप्रयोगाद् वक्तुस्त-
त्पदार्थसंसर्गप्रतिपादनाभिप्रायत्वावगतिद्वारेण पदेभ्यो वाक्यार्थानुमानं न तु पदार्थे-
भ्यस्तत्प्रतीतिः । न हि पदार्थों नाम प्रमाणान्तरमस्ति मीमांसकानाम् । नापि
वाक्यार्थप्रतिपादनाय पदैः प्रत्येकमभिधीयमानानां पदार्थानां वाक्यार्थप्रतिपादन-
दो ही अवयव मानते हैं । अन्य सम्प्रदाय के लोग तीन अवयव मानते हैं । इन
दोनों मतों का खण्डन करने के लिए ही 'एवकार' से युक्त 'पञ्चावयवेनैव' यह
वाक्य लिखा गया है । प्रतिपादन के लिए अभिप्रेत अर्थ में जिसे संशय रहता है,
वही पुरुष प्रकृत में 'संशयित' शब्द का अर्थ है । एवं जिसे उक्त अर्थ का विपर्यय
रहता है, वही व्यक्ति विपरीत (या 'विपर्यस्त' शब्द का अर्थ) है । जिस पुरुष को
प्रकृत अर्थ का न संशय ही है, न विपर्यय ही, केवल स्वज्ञान ही है, वही पुरुष
प्रकृत में अव्युत्पन्न शब्द का अर्थ है । इन तीन प्रकार के पुरुषों को ही विषयों का
समझना उचित है; क्योंकि इन्हें साध्य का तत्त्व ज्ञात नहीं रहता है ।
'जो पुरुष जिन अनेक पदों का साथ-साथ प्रयोग करता है, उसका
यह अभिप्राय भी अवश्य ही रहता है कि उनमें से प्रत्येक पद का अर्थ
परस्पर सम्बद्ध होकर ज्ञात हो । अपने स्वयं इस नियम को समझने के बाद
ही पदसमूह (रूप) वाक्य के प्रयोग से वक्ता का यह अभिप्राय ज्ञात होता
है कि वाक्य में प्रयुक्त प्रत्येक पद के अर्थ परस्पर सम्बद्ध होकर ज्ञात हों ।
वक्ता के इस अभिप्रायविषयक ज्ञान के द्वारा पदों से ही वाक्यार्थ का ज्ञान
होता है, पद के अर्थों से वाक्यार्थ की प्रतीति नहीं होती है; क्योंकि मीमांसकों
के मत में भी पदार्थ नाम का कोई प्रमाण नहीं है। यह कहना भी सम्भव
नहीं है कि (प्र.) वाक्य में प्रयुक्त प्रत्येक पद के द्वारा उपस्थित सभी

प्रकरणम्] भाषाानुवादसहितम् ५६९

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प्रकरणम्] भाषाानुवादसहितम् ५६९
न्यायकन्दली
शक्तिराविर्भवति, प्रमेयप्रतीतिमात्रव्यापारस्य प्रमाणस्य प्रमेयशक्त्याधायकत्वाभावात् ।
तस्मात् पदार्था वाक्यार्थं प्रतिपादयन्तो लिङ्गत्वेन वा प्रतिपादयेयुरन्यथानुपपत्त्या वा,
उभयथाऽप्यशाब्दो वाक्यार्थः स्यात् ।
ननु किं पदानि प्रत्येकमेकैकमर्थं प्रतिपादयन्ति वाक्यार्थस्य लिङ्गम् ? किं वा
परस्परान्वितं स्वार्थं बोधयन्ति ? अत्रैके तावदाहुः-व्युत्पत्त्यपेक्षया पदानामर्थप्रतिपादनम् ।
व्युत्पत्तिश्च गामानय गां बधानेत्यादिषु वृद्धव्यवहारेषु क्रियान्वितेषु कारकेषु, कारका-
न्वितायां वा क्रियायाम्, न स्वरूपमात्रे । अतः परस्परान्विता एव पदार्थाः पदैः प्रति-
पाद्यन्त इति ।
अत्र निरूप्यते-यदि गामानयेत्यादिवाक्ये गामिति पदेनैवानयेत्य-
र्थान्वितः स्वार्थोऽभिहितस्तदानयेतिपदं व्यर्थम्, उक्तार्थत्वात् । आनयेतिपदेना-
नयनार्थेऽभिहिते सत्यानयनार्थान्वितः स्वार्थो गोपदेनाभिधीयते, तेनानयेति पदस्य
अर्थों में उन पदों से वाक्यार्थविषयक विशिष्ट बोध के लिए एक विशेष प्रकार की
शक्ति उत्पन्न होती है । (उ.) क्योंकि प्रमाण का इतना ही काम है कि वह प्रमेय के
ज्ञान को उत्पन्न करे, उसमें यह सामार्थ्य नहीं है कि प्रमेय में अपने ज्ञान को उत्पन्न
करने की शक्ति को भी उत्पन्न करे । तस्मात् पदों के अर्थ लिङ्ग बनकर वाक्यार्थ
का प्रतिपादन करें या अन्यानुपपत्ति के द्वारा दोनों ही प्रकार से यह निश्चित है
कि (इस पक्ष में) शब्द के द्वारा वाक्यार्थ की उपस्थिति नहीं मानी जा सकती ।
(प्र.) (वाक्य में प्रयुक्त) प्रत्येक पद अलग-अलग अपने-अपने अर्थों का
प्रतिपादन करते हुए वाक्यार्थ के ज्ञापक हेतु हैं ? अथवा वे पद परस्पर अन्वित
होकर वाक्यार्थविषयक ज्ञान को उत्पन्न करते हैं ? इस प्रसङ्ग में एक सम्प्रदाय के
(अन्विताभिधानवादी) लोगों का कहना है कि व्युत्पत्ति (शक्ति या अभिधावृत्ति) के
सहारे ही पदों से अर्थ का प्रतिपादन होता है । यह व्युत्पत्ति 'गामानय, गां बन्धय'
इत्यादि स्थलों में वृद्धों के व्यवहार से गृहीत होती देखी जाती है । वृद्ध के इन
व्यवहारों से क्रियाओं के साथ अन्वित कारकों में या कारकों के साथ अन्वित
क्रियाओं में ही पदों की शक्ति (व्युत्पत्ति) गृहीत होती है, केवल कारकों में या
केवल क्रियाओं में नहीं । अतः परस्पर अन्वित अर्थ ही पदों के द्वारा प्रतिपादित
होते हैं । (अर्थात् इतरान्वित स्वार्थ में ही पदों की शक्ति है, केवल स्वार्थ में नहीं)।
इस प्रसङ्ग में हम (अभिहितान्वयवादी) लोग यह विचार करते हैं कि यदि
'गामानय' इस वाक्य में प्रयुक्त केवल 'गाम्' यह पद ही आनयन रूप अर्थ में अन्वित
गो रूप अपने अर्थ को समझाता है, तो फिर 'आनय' पद के प्रयोग का क्या प्रयोजन ?
उसका आनयन रूप अर्थ तो 'गाम्' पद से ही कथित हो जाता है। (प्र.) 'आनय'
पद से आनयन रूप अर्थ के कथित होने के बाद ही आनयन रूप अर्थ में अन्वित
गो रूप के स्वार्थ का प्रतिपादन 'गो' शब्द से होता है, अतः उक्त वाक्य में 'आनय'

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५६२ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमानेऽवयव-
न्यायकन्दली
न वैयर्थ्यमिति चेत् ? तर्ह्यानयेति पदं केवलं स्वार्थमात्रमाचक्षाणमनन्विता-
भिधायि प्राप्तम् । यथा चेदमनन्वितार्थं तथा पदान्तरमपि स्यादिति दत्तजलाञ्जलि-
रन्विताभिधानवादः । यदानयेति पदेनापि पूर्वपदाभिहितेनार्थेनान्वितः स्वार्थोऽ-
भिधीयते, तदा यावत् पूर्वपदं स्वार्थं नाभिधत्ते तावदुत्तरपदस्य पूर्वपदार्थान्वित-
स्वार्थाभिधानं नास्ति । यावच्चोत्तरपदं स्वार्थं नाभिधत्ते, तावत् पूर्वपदस्यो-
त्तरपदार्थान्वितस्वार्थप्रतिपादनं न भवतीत्यन्योन्याश्रयत्वम् । अथ मन्यसे-
प्रथमं पदानि केवलं पदार्थं स्मारयन्ति, पश्चादितरेतरस्मारितेनार्थेनान्वितं
स्वार्थमभिदधतीति, ततो नेतरेतराश्रयत्वम् । तदप्यसारम्, सर्वदैव हि पदान्य-
न्वितेन पदार्थेन सह गृहीतसाहचर्याणि नानन्वितं केवलं पदार्थमात्रं स्मारयितु-
मीशते, यथानुभवं स्मरणस्य प्रवृत्तेः । वृद्धव्यवहारेष्वन्वयव्यतिरेकाभ्यां गो-
पद का प्रयोग व्यर्थ नहीं है । (उ.) तो फिर इससे यह निष्कर्ष निकला कि
'आनय' पद से (दूसरे अर्थ में अनन्वित) केवल 'आनयन' रूप स्वार्थ का ही बोध
होता है । अतः यह कहना सुलभ हो जाएगा कि जिस प्रकार 'आनय' पद से
केवल (इतरानन्वित) स्वार्थ का बोध होता है, उसी प्रकार गो प्रभृति अन्य पदों से
भी केवल स्वार्थ का बोध हो सकता है, इस प्रकार तो अन्विताभिधान को
जलाञ्जलि ही मिल जाएगी । इस पर यदि यह कहें कि (प्र.) पूर्वपद (गाम् इस
पद) से अभिहित अर्थ के साथ अन्वित ही आनयन रूप अर्थ का अभिधान
आनयन पद से होता है । (उ.) तो यह भी मानना पड़ेगा कि जब तक 'आनय'
रूप उत्तर पद से आनयन रूप अर्थ का अभिधान नहीं होता है, तब तक 'गाम्'
इस पूर्वपद से उत्तरपद के अर्थ में अन्वित स्वार्थ का बोध नहीं हो सकता । इस
प्रकार इस पक्ष में अन्योन्याश्रय दोष अनिवार्य है ।
यदि यह मानते हों कि (प्र.) पहले पदों से उनके केवल (इतरानन्वित) अर्थों
का ही स्मरण होता है, उसके बाद स्मरण किये गये अर्थों में से एक-दूसरे के साथ
अन्वित अपने अर्थ का प्रतिपादन पद ही करते हैं । अतः उक्त अन्योन्याश्रय दोष
नहीं है । (उ.) इस उत्तर में भी कुछ सार नहीं है; क्योंकि (आपके मत से) दूसरे
अर्थ के साथ अनन्वित केवल अपने अर्थ का पद से स्मरण हो ही नहीं सकता;
क्योंकि दूसरे पदों के अर्थों के साथ अन्वित अपने अर्थों के साथ ही सभी पदों का
सामानाधिकरण्य गृहीत है । एवं अनुभव के अनुरूप ही स्मृति की उत्पत्ति होती है ।
(प्र.) (इतरान्वित अर्थ में शक्ति मानने पर भी) पदों से (इतरानन्वित) केवल अर्थ
का स्मरण हो सकता है; क्योंकि वृद्धों के व्यवहारों के द्वारा गो शब्द का ककुदादि से
युक्त अर्थों के साथ ही अन्वय और व्यतिरेक गृहीत है, उसके साथ अन्वित होनेवाले
आनयनादि क्रियाओं के साथ या दण्डादि करणों के साथ नहीं; क्योंकि ककुदादि से युक्त
अर्थ में ही उन क्रियाओं या करणादि के न रहने पर भी (दूसरी क्रियाओं या करणादि

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५६३

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प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५६३
न्यायकदली
शब्दस्य ककुदादिमदर्थे नियमो गृहीतो न क्रियाकरणादिष्विति तेषां प्रत्येकं
व्यभिचारेऽपि गोशब्दस्य प्रयोगदर्शनात् । तेनायं गोशब्दः श्रूयमाणोऽभ्यासपाटवाद-
व्यभिचरितसाहचर्यं ककुदादिमदर्थमात्रं स्मारयति, न क्रियाकरणादीनीति चेत्?
एवं तर्हि यस्य शब्दस्य यत्रार्थे साहचर्यनियमो गृह्यते तत्रैव तस्याभिधायकत्वं
नान्यत्रेत्यन्विताभिधानेऽपि समानम् । न च स्मरणमनुमानवत् साह-
चर्यनियममपेक्ष्य प्रवर्तत इत्यपि सुप्रतीतम्, तद्धि संस्कारमात्रनिबन्धनं प्रति-
योगिमात्रदर्शनादपि भवति । तथा हि-धूमदर्शनादग्निरिव रसबत्यादिप्रदेशोऽपि
स्मर्यते, तद् यदि गोशब्दः सहभावप्रतीतिमात्रेणैव गोपिण्डं स्मारयति, गोपिण्ड-
प्रतियोगिनोऽपि पदार्थान् कदाचित् स्मारयेत् । नियमेन तु गोपिण्डमेव स्मार-
यंस्तद्विषयं वाचकत्वमेवावलम्बते, तथासत्येव नियमसम्भवात् । किञ्च यथा
वाक्ये पदानामन्विताभिधानं तथा पदेऽपि प्रकृतिप्रत्ययोरन्विताभिधानमिच्छन्ति
के साथ अन्वित होनेवाले) ककुदादि से युक्त अर्थ को समझाने के लिए गो शब्द
का प्रयोग देखा जाता है । इस प्रकार सुना गया यह गो शब्द बार-बार प्रयुक्त होने
से प्राप्त पटुता के कारण ककुदादि से युक्त जिस अर्थ के साथ उसका व्यभिचार
कभी उपलब्ध नहीं होता है, केवल उसी अर्थ का स्मरण करा सकता है, क्रियाओं
का या करणादि अर्थों का नहीं; क्योंकि उनके साथ गो शब्द का कभी प्रयोग होता
है, कभी नहीं । (उ.) तब तो समान रूप से अन्विताभिधानवादी की ही तरह
यह कहिए कि "जिस अर्थ को समझाने के जिस शब्द का प्रयोग नियम से
होता है, केवल उसी अर्थ में उस शब्द की शक्ति है"। दूसरी बात यह है कि जिस
प्रकार अनुमान के द्वारा उसी अर्थ का ग्रहण होता है, जिसका साहचर्य हेतु में
नियमतः गृहीत होता है । उस प्रकार स्मृति को साहचर्य नियम की अपेक्षा
नहीं होती है; क्योंकि वह तो केवल संस्कार से उत्पन्न होनेवाली वस्तु है, अतः
साहचर्य के किसी एक सम्बन्धी को देखने पर भी उत्पन्न हो सकती है । जैसे कि धूम
के देखने से वह्नि का स्मरण होता है, उसी तरह वह्नि के आश्रय महानसादि प्रदेशों
का भी स्मरण होता है । इस प्रकार गो शब्द से ककुदादि से युक्त गो रूप अर्थ
का स्मरण यदि इसलिए मानेंगे कि गो शब्द का सामानाधिकरण्य उक्त गो रूप
अर्थ के साथ है, तो फिर गो शब्द से कदाचित् (वह्नि के आश्रयीभूत महानसादि
की तरह) गो के आश्रयीभूत गोष्ठादि का भी स्मरण हो सकता है । गो पद से
नियमतः गोपिण्ड का ही स्मरण हो, इसके लिए किसी भी दूसरी रीति से गो
पिण्ड में गो शब्द की शक्ति को ही हेतु मानना पड़ेगा; क्योंकि उस नियम की
उपपत्ति किसी दूसरी रीति से सम्भव नहीं है । दूसरी यह भी बात है कि जिस
प्रकार वाक्य में प्रयुक्त प्रत्येक पद की शक्ति दूसरे अर्थ में अन्वित स्वार्थ में ही मानने
की इच्छा आप लोगों की है, उसी प्रकार यह भी आप लोगों का अभिप्रेत होगा कि
पद के शरीर में प्रयुक्त होनेवाले प्रकृति और प्रत्यय रूप दोनों अंशों में से प्रत्येक

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५६४ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमानेऽवयव-
न्यायकन्दली
भवन्तः, ताभ्यां चेत् परस्परान्वितः स्वार्थोऽभिहितः कस्तदन्यः पदार्थो यः पदेन पश्चात्
स्मर्यते ? तदेतदास्तां नन्नाटकपक्षपतितं वचः ।
प्रकृतमनुसरामः-अस्त्वेवं पदानामर्थप्रतिपादनम्, इदं तु न सङ्गच्छते परार्थानुमान-
मिति । लिङ्गं तज्जनितं वा ज्ञानमनुमानम् । न च लिङ्गस्य ज्ञानस्य च परार्थत्वम् ।
अनुमानवाचकस्य शब्दस्य परार्थत्वादुमानं परार्थमुच्यते चेत् प्रत्यक्षवाचकस्यापि शब्दस्य
परार्थत्वात् प्रत्यक्षमपि परार्थमुच्येत ? तदुक्तम्-
ज्ञानाद् वा ज्ञानहेतोर्वा नान्यस्यास्त्यनुमानता ।
तयोश्च न परार्थत्वं प्रसिद्धं लोकवेदयोः ॥
वचनस्य परार्थत्वादुमानपरार्थता ।
प्रत्यक्षस्यापि परार्थ्यं तद्द्वारं किं न कल्प्यते ॥ इति !
दूसरे अर्थ के साथ अन्वित ही अपने स्वार्थ का अभिधायक होगा । यदि प्रकृति
और प्रत्यय ये दोनों ही एक-दूसरे के साथ अन्वित अपने अर्थ का प्रतिपादन कर
ही देते हैं, तो फिर कौन-सा विलक्षण अर्थ समझने को अवशिष्ट रहता है,
जिसका स्मरण पीछे पद के द्वारा होता है ? व्यर्थ बातों की यह प्रक्रिया अब यहीं
तक रहे ।
अब फिर प्रकृत विषय का अनुसरण करते हैं । (प्र.) मान लिया कि पदों से
अर्थों का प्रतिपादन उसी (अभिहितान्वयवादियों की) रीति से होता है; किन्तु यह
समझ में नहीं आता कि अनुमान 'परार्थ' किस प्रकार है ? क्योंकि हेतु या
पञ्चावयववाक्य जनित हेतु का ज्ञान इन दोनो में से ही कोई 'अनुमान' है । इनमें
से न लिङ्ग ही परार्थ है, न लिङ्ग का ज्ञान ही । यदि यह कहें कि (उ.) उक्त लिङ्ग
या लिङ्ग ज्ञान के वाचक (पञ्चावयव के) शब्द चूँकि परार्थ हैं (अर्थात् दूसरे को
समझाने के लिए प्रयुक्त होते हैं), अतः हेतु या हेतुज्ञान रूप अनुमान को भी
परार्थ कहा जाता है । (प्र.) तो फिर प्रत्यक्ष के अभिधायक शब्द का भी प्रयोग
तो दूसरे को समझाने के लिए ही किया जाता है । अतः प्रत्यक्ष भी 'परार्थ'
होगा । जैसा कहा गया है कि-
(१) हेतु का ज्ञान या हेतु इन दोनों से भिन्न कोई अनुमान नहीं हो सकता ।
इन दोनों की परार्थता न लोक में प्रसिद्ध है, न वेद में ही ।
(२) यदि हेतु के ज्ञापक या हेतु ज्ञान के अभिलापक वाक्य दूसरों को
समझाने के लिए प्रयुक्त होते हैं, इस हेतु से लिङ्ग या लिङ्गज्ञान रूप अनुमान परार्थ
हैं, तो फिर प्रत्यक्ष प्रमाण के बोधक वाक्य भी तो दूसरों को समझाने के लिए ही प्रयुक्त
होते हैं, इस हेतु से (अनुमान की तरह) प्रत्यक्ष को भी परार्थ क्यों नहीं मानते ?

प्रकरणम्] भाषाानुवादसहितम् ५६५

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प्रकरणम्] भाषाानुवादसहितम् ५६५
प्रशस्तपादभाष्यम्
अवयवाः पुनः प्रतिज्ञापदेशनिदर्शनानुसन्धानप्रत्याम्नायाः ।
ये अवयव १. प्रतिज्ञा, २. अपदेश (हेतु), ३. निदर्शन (उदाहरण),
४. अनुसन्धान (उपनय) और ५. प्रत्याम्नाय (निगमन) भेद से पाँच
प्रकार के हैं ।
न्यायकन्दली
अत्र समाधिः-न शब्दस्य परार्थत्वात् तद्द्वारमनुमानपारार्थ्यमिति वदामः, अपि तु
यत् परार्थं पञ्चावयवं वाक्यं तल्लिङ्गप्रतीतिद्वारेणानुमितिहेतुत्यादनुमानमिति ब्रूमः ।
नन्वेवमपि लिङ्गप्रतिपादकस्य प्रत्यक्षस्यानुमानतावतारप्रसङ्गः ? न प्रसङ्गस्तत्र लौकिकशब्द-
प्रयोगाभावात् ।
पञ्चावयवं वाक्यमित्युक्तम् । के पुनस्ते पञ्चावयवाः ? तत्राह-
अवयवाः पुनः प्रतिज्ञापदेशनिदर्शनानुसन्धानप्रत्याम्नायाः । पुनःशब्दो
वाक्यालङ्कारे, तत्र तेषां मध्येऽनुमेयोद्देशोऽविरोधी प्रतिज्ञा । एतत् स्वयमेव
विवृणोति-प्रतिपिपादयिषितेत्यादिना । प्रतिपादयितुमिष्टो यो धर्मस्तेन
(उ.) इस प्रसङ्ग में हम लोगों का यह समाधान है कि इस युक्ति से हम
अनुमान को परार्थ नहीं मानते कि सामान्यतः सभी शब्द दूसरों को समझाने के
लिए ही प्रयुक्त होते हैं, अतः अपने उपस्थापक या ज्ञापक पञ्चावयववाक्य रूप
शब्द के द्वारा हेतु वा हेतु ज्ञान रूप अनुमान भी परार्थ है; किन्तु (हम लोगों का
यह कहना है कि) चूँकि परार्थ (दूसरों को समझाने के लिए प्रयुक्त) जो
पञ्चावयव वाक्य वह अपने द्वारा उपस्थित उपयुक्त हेतु के द्वारा या अपने से
उत्पन्न हेतु के ज्ञान द्वारा ही अनुमिति का कारण है, अतः अनुमान परार्थ है ।
(प्र.) इस प्रकार तो जहाँ हेतु का ज्ञान प्रत्यक्ष के ज्ञापक शब्द के द्वारा उत्पन्न
होगा, वहाँ प्रत्यक्ष प्रमाण भी (परार्थ) अनुमान होगा ? (उ.) यह आपत्ति नहीं है;
क्योंकि ऐसे स्थलों में कहीं भी शब्दों का प्रयोग लोक में नहीं देखा जाता है ।
यह कहा गया है कि परार्थानुमान के उत्पादक महावाक्य के पाँच अवयव हैं; किन्तु
वे पाँच अवयव कौन-कौन हैं ? इस प्रश्न का समाधान 'अवयवाः पुनः प्रतिज्ञापदेश-
निदर्शनानुसन्धानप्रत्याम्नायाः' इस वाक्य के द्वारा किया गया है । इस वाक्य में 'पुनः'
शब्द का प्रयोग केवल वाक्य को अलङ्कृत करने के लिए है । 'तत्र' अर्थात् उन पाँचों
अवयवों में प्रतिज्ञा का यह लक्षण किया गया है, 'अनुमेयोद्देशोऽविरोधी प्रतिज्ञा' ।
'प्रतिपिपादयिषित' इत्यादि ग्रन्थ के द्वारा प्रतिज्ञा के उस (अपने) लक्षण वाक्य की ही

पादन पक्ष में अभिप्रेत हो उस धर्म (साध्य) से युक्त धर्मी (पक्ष) ही अनुमेय

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५६६ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमानेऽवयव-
प्रशस्तपादभाष्यम्
तत्रानुमेयोद्देशोऽविरोधी प्रतिज्ञा। प्रतिपिपादयिषितधर्मविशिष्टस्य धर्मिणोऽपदेश-
विषयमापादयितुमुद्देशमात्रं प्रतिज्ञा।
इनमें 'अनुमेय' का अर्थात् अनुमान के लिए अभिप्रेत विषय का
प्रतिपादक वह वाक्य ही 'प्रतिज्ञा' है, जिसका और किसी भी प्रमाण से
विरोध न रहे । (विशदार्थ यह है कि) जिस धर्म (साध्य) का प्रति-
पादन पक्ष में अभिप्रेत हो उस धर्म (साध्य) से युक्त धर्मी (पक्ष) ही अनुमेय
है। (साध्य से युक्त उस) धर्मी (पक्ष) में हेतु के सम्बन्ध को दिखलाने के
लिए प्रयुक्त (साध्य से युक्त पक्ष का बोधक) वाक्य ही 'प्रतिज्ञा' है ।
न्यायकन्दली
विशिष्टो धर्मी अनुमेयः पक्ष इति कथ्यते । तस्य यदुद्देशमात्रं सङ्कीर्तनमात्रं साधनरहितं सा
प्रतिज्ञेति । यथोपविशन्ति सन्तः –
"वचनस्य प्रतिज्ञात्वं तदर्थस्य च पक्षता" इति ।
यदि हेतुरहितमुद्देशमात्रं प्रतिज्ञा नैव तस्याः साध्यसिद्धिरस्तीति असाधनाङ्गत्वात्र
प्रयोगमर्हति । यथा वदन्ति तथागताः -
शक्तस्य सूचकं हेतुर्वचोऽशक्तमपि स्वयम् ।
साध्याभिधानात् पक्षोक्तिः पारम्पर्येण नाप्यलम् ॥ इति ।
तत्राह-अपदेशविषयमापादयितुमिति । अपदेशो हेतुस्तस्य विषय-
माश्रयमापादयितुं प्रतिपादयितुं प्रतिज्ञाने¹, (न) खलु यत्र क्वचन साध्यसाधनाय
व्याख्या भाष्यकार स्वयं करते हैं। जिस धर्म (वस्तु) का प्रतिपादन (पञ्चावयव
वाक्य के प्रयोक्ता को) अभिप्रेत हो उस धर्म से युक्त धर्मी ही 'अनुमेय' या 'पक्ष'
कहलाता है । उसका जो 'उद्देशमात्र' केवल कथन अर्थात् हेतु वाक्य के सान्निध्य
से रहित वाक्य का प्रयोग ही 'प्रतिज्ञा' है । जैसा कि विद्वानों का कहना है कि
"उक्त वाक्य ही प्रतिज्ञा है और प्रतिज्ञा वाक्य के द्वारा कथित अर्थ ही पक्ष है" ।
(प्र.) यदि हेतु वाक्य से सर्वथा असम्बद्ध केवल पक्ष का बोधक वाक्य ही प्रतिज्ञा
है, तो फिर साध्य-सिद्धि का उपयोगी अङ्ग न होने से उसका प्रयोग ही उचित नहीं
है । जैसा कि तथागत के अनुयायियों का कहना है कि-हेतु ही साध्य का ज्ञापक है ।
(केवल प्रतिज्ञारूप) वचन में साध्य को समझाने का सामर्थ्य नहीं है, अतः परम्परा
से साध्य को उपस्थित करने के कारण भी प्रतिज्ञा अनुमान का अङ्ग नहीं है । इसी
आक्षेप के समाधान के लिए 'अपदेशविषयमापादयितुम्' यह वाक्य लिखा गया है ।
'अपदेश' शब्द का अर्थ है 'हेतु', उसका 'विषय', अर्थात् आश्रय के 'आपादन' के लिए

  1. मुद्रित पुस्तक में यहाँ न्यायकन्दली का पाठ है-'अपदेशी हेतुः, तस्य विषयमाश्रयमा-
    पादयितुं प्रतिज्ञाने यत्र क्वचन साध्यसाधनाय हेतुः प्रयुज्यते तस्य सिद्धत्वात्,
    अपि च कस्मिंश्चिद्धर्मिणि प्रतिनियते" । इसमें 'यत्र क्वचन' इत्यादि उत्तर वाक्य में

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ५६७

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प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ५६७
न्यायकन्दली
हेतुः प्रयुज्यते, तस्य सिद्धत्वात्; अपि तु कस्मिंश्चिद्धर्मिणि प्रतिनियते, तस्मिन्नुपन्यस्य-
माने निराश्रयो हेतुर्न प्रवर्तेत । तस्याप्रवृत्तौ न साध्यसिद्धिस्ततः प्रतिज्ञया धर्मिग्राहकं
प्रमाणमुपदर्शयन्त्या हेतोराश्रयो धर्मी सन्निधाप्यते, इत्याश्रयोपदर्शनद्वारेण हेतुं प्रवर्तयन्ती
प्रतिज्ञा साध्यसिद्धेरङ्गम् । तथा च न्यायभाष्यम्-"असत्यां प्रतिज्ञायामनाश्रया हेत्वादयो न
प्रवर्तेरन्" इति । उपनयादेव हेतोराश्रयः प्रतीयेत इति चेत्, न, असति प्रतिज्ञावचने
तस्याप्यप्रवृत्तेः । उपनयः साधनस्य पक्षधर्मतालक्षणं सामर्थ्यमुपदर्शयति । न प्रत्येतुः प्रथम-
मेव साधनं प्रत्याकाङ्क्षा, किन्तु साध्ये, तस्य प्रधानत्वात् । आकाङ्क्षिते साध्ये
अर्थात् प्रतिपादन के लिए ही प्रतिज्ञा वाक्य का उपयोग है । अभिप्राय यह है कि जिस
किसी आश्रय में साध्य के साधन के लिए हेतु का प्रयोग नहीं होता; क्योंकि
सामान्यतः किसी स्थान में साध्य तो सिद्ध है ही, अतः किसी विशेष
धर्मी में साध्यसिद्धि के लिए ही हेतु का प्रयोग होता है । (जहाँ पहले से साध्य सिद्ध
नहीं है और वहाँ साध्य का साधन इष्ट है) वह (विशेष प्रकार का धर्मी )
यदि प्रतिपादित न हो तो फिर बिना आश्रय (विषय) के होने के कारण हेतु की
प्रवृत्ति ही नहीं होगी । हेतु की प्रवृत्ति के बिना साध्य की सिद्धि भी न हो सकेगी ।
अतः प्रतिज्ञा पक्षरूप धर्मी के ज्ञापक प्रमाण को उपस्थित करती हुई हेतु के
आश्रयरूप धर्मी को उसके समीप ले आती है । इस आश्रय के प्रदर्शन के द्वारा ही
हेतु की प्रवृत्ति में निमित्त होने के कारण प्रतिज्ञा भी साध्य-सिद्धि का उपयोगी
अङ्ग है । जैसा कि न्यायभाष्यकार ने कहा है कि 'यदि प्रतिज्ञा न रहे तो फिर हेतु
प्रभृति अवयवों की प्रवृत्ति ही न हो सकेगी' (प्र.) उपनय से ही हेतु के उस
आश्रय (विषय) की प्रतीति होगी ? (उ.) प्रतिज्ञा के न रहने पर उपनय की भी
प्रवृत्ति नहीं हो सकती; क्योंकि हेतु के पक्षधर्मता-रूप सामर्थ्य का प्रदर्शन ही
उपनय का काम है; किन्तु साध्य के प्रधान होने के कारण ज्ञाता पुरुष को पहले
साध्य के प्रसङ्ग में ही जिज्ञासा होती है, साधन के सामर्थ्य के प्रसङ्ग में नहीं ।
एक 'न'-कार का रहना आवश्यक है । एवं पूर्ववाक्य के अन्त में भी 'प्रतिज्ञाया उपयोगः'
इस अर्थ को समझाने के लिए भी कोई शब्द चाहिए । प्रकृत ग्रन्थ में जो 'प्रतिज्ञाने' शब्द
है, उसका भी कुछ ठीक अर्थ नहीं बैठता है । अतः यह तय करना पड़ा कि 'प्रतिज्ञाने'
इस पद में 'ए'कार प्रमाद से लिखा गया है । अवशिष्ट 'प्रतिज्ञान' भी एक शब्द नहीं है;
किन्तु 'प्रतिज्ञा' और 'न' ये दो अलग शब्द हैं । जिनमें पहला पहले वाक्य के अन्त में
और दूसरा दूसरे वाक्य के आदि में मान लिया गया है । तदनुसार प्रकृत पाठ इस प्रकार
निष्पन्न होता है- 'अपदेशो हेतुः, तस्य विषयमाश्रयमापादयितुं प्रतिज्ञा । न खलु यत्र
क्वचन साध्यसाधनाय हेतुः प्रयुज्यते, तस्य सिद्धत्वात् । अपि तु कस्मिंश्चिद्धर्मिणि
प्रतिनियते'' । इसी पाठ के अनुसार अनुवाद किया गया है ।

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५६८ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमानेऽवयव-
न्यायकन्दली
तत्सिद्धयर्थं पश्चात् साधनमाकाङ्क्षते तदनु साधनसामर्थ्यमिति प्रथमं साध्य-
वचनमेवोपत्तिष्ठते, न पुनरग्रत एव साधनसामर्थ्यमुच्यते, तस्य तदानीमनपेक्षितत्वात् ।
प्रतिपिपादयिषितेन धर्मेण विशिष्टो धर्मेति विप्रतिषिद्धमिदम्, अप्रतीतस्यावि-
शेषकत्वादिति चेत् ? सत्यम्, अप्रतीतं विशेषणं न भवति, प्रतीतस्तु साध्यो धर्मः सपक्षे
विप्रतिपन्नं प्रति ज्ञापनाय धर्मिविशेषणतया प्रतिज्ञायते । अत एव धर्मिणः पक्षता
वास्तवी, तस्य स्वरूपेण सिद्धस्यापि प्रतिपाद्यधर्मविशिष्टत्वेनाप्रसिद्धस्य तेन रूपेण आपाद्य-
मानत्वसम्भवात् । पक्षधर्मतापि हेतोरित्थमेव, यदि केवलमेवानित्यत्वं साध्यते, भवेच्छब्द-
धर्मस्य कृतकत्वस्यापक्षधर्मता, शब्द एव त्वनित्ये साध्ये नायं दोषः । यदाहुराचार्याः -
साध्य की आकाङ्क्षा निवृत्त हो जाने पर फिर साध्य की सिद्धि के लिए
साधन और उसके प्रसङ्ग में आकाङ्क्षा जागती है, बाद में साधन के (पक्षधर्मतादि)
सामर्थ्य के प्रसङ्ग में आकाङ्क्षा उठती है । अतः पहले प्रतिज्ञारूप साध्य
वचन की ही उपस्थिति उचित होती है । यह नहीं होता कि पहले (उपनय के
द्वारा) साधन के सामर्थ्य का ही प्रदर्शन हो; क्योंकि उस समय उसकी अपेक्षा ही
नहीं है ।
(प्र.) धर्मी का यह लक्षण ठीक नहीं मालूम पड़ता कि जिस धर्म का प्रतिपादन
इष्ट हो, उस धर्मरूप विशेषण से युक्त ही 'धर्मी' (या पक्ष) है; क्योंकि ये दोनों
बातें परस्पर विरोधी हैं कि एक ही वस्तु प्रतिपादन के लिए अभीष्ट भी हो एवं
वही (अप्रतिपादित) वस्तु विशेषण भी हो; क्योंकि विशेषण के लिए यह आवश्यक
है कि वह पहले से ज्ञात हो (पहले से ज्ञात वस्तु कभी प्रतिपाद्य नहीं हो सकती)।
(उ.) यह ठीक है कि विशेषण को (स्व से युक्त धर्मी के ज्ञान से) पहले ज्ञात
होना ही चाहिए; किन्तु प्रकृत में भी तो साध्यरूप धर्म पहले से सपक्ष (दृष्टान्त) में
ज्ञात ही रहता है । सपक्ष में ज्ञात साध्य के प्रसङ्ग में जिस पुरुष को पक्ष में
विप्रतिपत्ति है उसे समझाने के लिए ही साध्यरूप विशेषण से युक्त धर्मी का निर्देश
प्रतिज्ञा वाक्य के द्वारा किया जाता है । चूँकि (पर्वतत्वादि) अपने स्वरूप से सिद्ध
रहने पर भी प्रतिपाद्य (वह्नि प्रभृति) साध्यरूप धर्म से युक्त होकर वह पहले से
प्रसिद्ध नहीं है, अतः उस रूप से पक्ष का प्रतिपादन सम्भव है । इसी कारण धर्मी
का पक्ष होना (धर्मी की पक्षता) वास्तविक है (काल्पनिक नहीं) । इसी प्रकार हेतु
की पक्षधर्मता भी ठीक ही है; क्योंकि ('शब्दोऽनित्यः कृतकत्वाद् घटादिवत् इत्यादि
स्थलों में) यदि केवल अनित्यत्व का ही साधन करें तो शब्द में रहनेवाले कृतकत्व
में पक्षधर्मता नहीं रह सकेगी; किन्तु अनित्यत्व से युक्त को ही यदि साध्य मान
लेते हैं, तो फिर उक्त (कृतकत्व हेतु में अपक्षधर्मत्वरूप) दोष की आपत्ति नहीं
होती है । जैसा कि आचार्यों ने कहा है कि-

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ५६:

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प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ५६:
न्यायकन्दली
स एव चोभयात्मायं गम्यो गमक एव च ।
असिद्धेनैकदेशेन गम्यः सिद्धो न बोधकः ॥ इति ।
प्रतिज्ञाया उदाहरणमाह-द्रव्यं वायुरिति । यो वायुं प्रतिपद्यमानोऽपि तस्य द्रव्यत्वं न
प्रतिपद्यते, तं प्रति साधयितुमिष्टेन द्रव्यत्वेन विशिष्टस्य वायोरभिधानं प्रतिज्ञा क्रियते-
द्रव्यं वायुरिति । अविरोधिग्रहणस्य तात्पर्यं कथयति-अविरोधिग्रहणात् प्रत्यक्षानुमाना-
भ्युपगतशास्त्रस्ववचनविरोधिन्नो निरस्ता भवन्तीति । वादिना साधयितुमभिप्रेतोऽर्थः
साध्य इत्युच्यते । प्रत्यक्षादिविरुद्धोऽपि कदाचिदनेन भ्रमात् साधयितुमिष्यते, तद् यद्यविशेषेणा-
नुमेयोद्देशः प्रतिज्ञेत्येतावन्मात्रमुच्येत, प्रत्यक्षादिविरुद्धमपि वचनं प्रतिज्ञा स्यात् । न चेयं
प्रतिज्ञा, तदर्थस्य साधयितुमशक्यत्वात्, अतोऽविरोधिग्रहणं कृतम् । न विद्यते प्रत्यक्षादि-
धर्मी के दो भेद हैं, पहला है साध्यरूप धर्म से युक्त, जो पक्ष कहलाता है ।
दूसरा है केवल धर्मी, जो 'धर्मी' ही कहलाता है । इनमें पहला (पहले से सिद्ध न
होने के कारण) 'गम्य' है अर्थात् साध्य है । दूसरा 'गमक' अर्थात् (अपने ज्ञान
के द्वारा अथवा पक्षधर्मता सम्पादन के द्वारा) 'गमक' अर्थात् साध्य ज्ञान का
कारण है । अर्थात् धर्मी के दो स्वरूप हैं, एक साध्य से सम्बद्धवाला, दूसरा केवल
अपने स्वरूपवाला, इनमें पहले स्वरूप से वह 'गम्य' अर्थात् साध्य है (क्योंकि उस
रूप से पहले वह सिद्ध नहीं है), दूसरे स्वरूप से वह 'गमक' अर्थात् स्वज्ञान के
द्वारा अथवा पक्षधर्मता सम्पादन के द्वारा साधक है ।
'द्रव्यं वायुः' इस वाक्य के द्वारा प्रतिज्ञा का उदाहरण कहा गया है । जो व्यक्ति
वायु को समझता है; किन्तु उसे द्रव्य नहीं समझता, उसको वायु में द्रव्यत्व
को समझाना अभिप्रेत है । उसके लिए द्रव्यत्व से युक्त वायु को समझाने के
लिए 'द्रव्यं वायुः' ऐसी प्रतिज्ञा की जाती है। 'अविरोधिग्रहणात्प्रत्यक्षानुमानाभ्युपगतस्व-
शास्त्रस्ववचनविरोधिन्नो निरस्ता भवन्ति' इस वाक्य के द्वारा (प्रतिज्ञा के लक्षण
वाक्य में) 'अविरोधि' शब्द के प्रयोग का हेतु दिखलाया गया है । वादी को
जिस वस्तु का साधन अभिप्रेत होता है, उसे 'साध्य' कहते हैं । ऐसे भी
वादी हैं जो भ्रान्ति से वशीभूत होकर प्रत्यक्षादि प्रमाणों से बाधित अर्थों के
साधन के लिए भी प्रवृत्त हो जाते हैं । ऐसी स्थिति में यदि सामान्य रूप
से 'अनुमेयोद्देशः प्रतिज्ञा' (अर्थात् अनुमेय के बोधक सभी वाक्य प्रतिज्ञा हैं) ऐसा
ही प्रतिज्ञा का लक्षण किया जाय, तो प्रत्यक्षादि प्रमाणों से विरुद्ध ('वह्निरनुष्णः'
इत्यादि) वाक्य भी प्रतिज्ञा हो जायेंगे; किन्तु उस प्रकार के वाक्य प्रतिज्ञा नहीं हैं;
क्योंकि उनके द्वारा कथित विषय का साधन सम्भव नहीं है । अतः ऐसे वाक्यों में
प्रतिज्ञात्व के निराकरण के लिए ही भाष्यकार ने प्रतिज्ञा लक्षण में 'अविरोधि'

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५७० न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमानेऽवयव-
प्रशस्तपादभाष्यम्
यथा द्रव्यं वायुरिति । अविरोधिग्रहणात् प्रत्यक्षानुमानाभ्युपगतस्व-
शास्त्रस्ववचनविरोधिनो निरस्ता भवन्ति । यथाऽनुष्णोऽग्निरिति प्रत्यक्ष-
जैसे 'द्रव्यं वायुः' इत्यादि वाक्य । (प्रतिज्ञा के लक्षणवाक्य में)
'अविरोधि' पद के देने से १. प्रत्यक्षविरुद्ध, २. अनुमानविरुद्ध,
३. आगमविरुद्ध, ४. स्वशास्त्रविरोधी एवं ५. स्ववचनविरोधी उक्त प्रकार
के वाक्यों में प्रतिज्ञा लक्षण की अतिव्याप्ति का निवारण होता है ।
(इनमें) प्रत्यक्षविरोधी वाक्य का उदाहरण है- 'अनुष्णोऽग्निः' ।
न्यायकन्दली
विरोधो यस्यानुमेयोद्देशस्य असावप्रत्यक्षादिविरोधस्तस्य वचनं प्रतिज्ञा, यस्य तद्विरोधोऽस्ति
न सा प्रतिज्ञेत्यर्थः । किमनेनोक्तं भवति ? न वाद्यभिप्रायमात्रेण साध्यता; किन्तु यत्
साधनमर्हति तत् साध्यम्, स एव पक्षस्तदितरः पक्षाभास इति ।
प्रत्यक्षादिविरोधोदाहरणं यथा-अनुष्णोऽग्निरिति । अनुष्ण इत्युष्णस्पर्शप्रतिषेधोऽयम्,।
अवगतं च प्रतिषिध्यते नानवगतम् । न चोष्णत्वस्य वह्नेरन्यत्रोपलम्भसम्भवः, वह्नावपि
तस्य प्रतीतिर्नानुमानिकी, प्रत्यक्षाभावे अनुमानस्याप्रवृत्तेः। प्रत्यक्षप्रतीतस्य च प्रतिषेधे
पद का उपादान किया है । 'अनुमेयोद्देशोऽविरोधी प्रतिज्ञा' प्रतिज्ञा के इस लक्षण
वाक्य में प्रयुक्त 'अविरोधि' पद का विवरण इस प्रकार है कि 'न विद्यते
(प्रत्यक्षादि) विरोधो यस्यानुमेयोद्देशस्यासावप्रत्यक्षादिविरोधी, तस्य वचनं प्रतिज्ञा' ।
तदनुसार उक्त वाक्य का यह अर्थ है कि जिस 'अनुमेयोद्देश' में प्रत्यक्षादि प्रमाणों
का विरोध न रहे उसके बोधक वाक्य ही प्रतिज्ञा हैं । अर्थात् जिस अनुमेयोद्देश में
प्रत्यक्षादि प्रमाणों का विरोध रहे उसका बोधक वाक्य प्रतिज्ञा नहीं है । (प्र.)
इससे क्या निष्पन्न हुआ ? (उ.) यही कि साधन के लिए वादी के अभिप्रेत होने
से ही कोई विषय साध्य नहीं हो जाता । साध्य वही है जिसका साधन करना
सम्भव हो, वही साध्य पक्ष भी है, तद्भिन्न को अर्थात् प्रत्यक्षादि विरोध के कारण
जिसका साधन सम्भव न हो उसे 'पक्षाभास' कहते हैं ।
'अनुष्णो वह्निः' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा प्रत्यक्षादि प्रमाणों के विरोधी प्रतिज्ञा-
वाक्यों के उदाहरण दिखलाये गये हैं । प्रकृत में 'अनुष्ण' शब्द उष्ण स्पर्श के प्रतिषेध
का बोधक है (उष्णस्पर्श विरोधी शीतस्पर्श का नहीं) । ज्ञात वस्तु का ही प्रतिषेध
भी किया जाता है, अज्ञात वस्तु का नहीं । एवं उष्णता की प्रतीति वह्नि को छोड़ और कहीं
सम्भव नहीं है । वह्नि में उष्णता की प्रतीति अनुमान से तब तक नहीं हो सकती, जब
तक वह्नि में उष्णता को प्रत्यक्षवेद्य न मान लिया जाय; क्योंकि बिना प्रत्यक्ष के अनुमान
की प्रवृत्ति नहीं होती है । प्रत्यक्ष के द्वारा ज्ञात होने योग्य वस्तु के प्रतिषेध के

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ५७१

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प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ५७१
न्यायकदली
प्रत्यक्षप्रामाण्याभ्युपगमेन प्रवर्त्तमानं प्रतिषेधानुमानं तद्विपरीतवृत्ति तेनैव बाध्यते,
विषयापहारात् । को विषयस्यापहारः ? तद्विपरीतार्थप्रवेदनम्, तस्मिन् सत्यनुमानस्य किं
भवति ? उत्पत्त्यभावः, प्रथमप्रवृत्तेनाबाधितविषयप्रत्यक्षेण वह्नेरुष्णत्वे प्रतिपादिते
तत्प्रतीत्यवरुद्धे च तस्यानुष्णत्वप्रतीतिर्न भवति । हेतोरप्ययमेव बाधो
यदयमनुष्णत्वप्रतिपादनाय प्रयुक्तः, तत्प्रतीतिं न करोति, प्रत्यक्षविरोधात् । यथोक्तम्-
वैपरीत्यपरिच्छेदे नावकाशः परस्य तु ।
मूले तस्य ह्यनुत्पन्ने पूर्वेण विषयो हतः ॥ इति ।
बाधाविनाभावयोर्विरोधादविनाभूतस्य बाधानुपपत्तिरिति चेत् ? यदि
त्रैरूप्यमविनाभावोऽभिमतः ? तदास्त्येवाविनाभूतस्य बाधः, यथानुष्णोऽग्निः
लिए उस प्रत्यक्ष का प्रामाण्य स्वीकार कर ही लिया जाता है, अतः उक्त स्वीकृति
से प्रवृत्त होनेवाले वह्नि में उष्णता के प्रतिषेध का अनुमान उस प्रत्यक्ष से ही
बाधित हो जाता है, जो प्रकृत प्रतिषेध के विरोधी उष्णता का ज्ञापक है; क्योंकि
इस प्रत्यक्ष के द्वारा अनुमान के विषयरूपी उष्णता के प्रतिषेध का अपहरण कर
लिया जाता है । (प्र.) विषय का यह 'अपहरण' क्या वस्तु है ? (उ.) प्रकृत
अनुमान के द्वारा ज्ञाप्य विषय के विरोधी विषय का ज्ञापन ही प्रकृत में विषय का
अपहरण है । (प्र.) इस विषयापहरण से अनुमान के ऊपर क्या प्रभाव पड़ता है
? (उ.) यही कि उसकी उत्पत्ति ही नहीं हो पाती; किन्तु उष्णता के बोधक प्रत्यक्ष
की प्रवृत्ति अनुष्णत्व के अनुमान से पहले होती है, उसका विषय उष्णत्व किसी
दूसरे प्रमाण से बाधित भी नहीं है, अतः इस प्रत्यक्ष के द्वारा जब वह्नि में उष्णता
की प्रतिपत्ति हो जाती है, उसके बाद उस प्रत्यक्ष के द्वारा ज्ञात वह्नि में अनुष्णता
की प्रतीति नहीं होती है । हेतु में बाध की प्रतीति का भी यही रहस्य है कि वह्नि
में अनुष्णत्व को समझाने के लिए प्रयुक्त होने पर भी इस प्रत्यक्षविरोध के कारण
वह्नि में उष्णता की प्रतीति का उत्पादन नहीं कर सकता ।
जैसा कहा गया है कि विपरीत (अभाव) विषयक निश्चय के उत्पन्न हो जाने
पर उसके विरोधी के ज्ञान का अवकाश नहीं रह जाता, क्योंकि उसके उत्पन्न
होने के पहले ही पहले के प्रमाण से उसके विषय का अपहरण हो जाता है ।
(प्र.) साध्य की व्याप्ति और साध्य का अभाव ये दोनों परस्पर विरोधी हैं,
अतः साध्य का व्याप्य हेतु कभी बाधित नहीं हो सकता । (उ.) व्याप्ति या अविनाभाव
को यदि हेतु में (पक्षसत्त्व, सपक्षसत्त्व और विपक्षासत्त्व इन) तीनों रूपों का रहना समझें,
तो फिर इन तीनों रूपों के रहने पर भी हेतु में 'बाध' रह ही सकता है; क्योंकि
'अग्निरनुष्णः कृतकत्वात्' इस स्थल में कृतकत्व रूप हेतु में उक्त तीनों रूप हैं ।

पादनम् ? योग्यताविरहश्च दूषणमभिमतम् ? तदा कर्मकरणयोरप्यस्ति दोषः ।

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५७२ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमानेऽवयव-
प्रशस्तपादभाष्यम्
विरोधी, घनमम्बरमित्यनुमानविरोधी, ब्राह्मणेन सुरा पेयेत्यागम-
अनुमानविरोधी प्रतिज्ञावाक्य का उदाहरण है— 'घनमम्बरम्' । 'ब्राह्मणेन
सुरा पेया' यह वाक्य आगमप्रमाण से विरुद्ध है; वैशेषिकशास्त्र को मानने-
न्यायकन्दली
कृतकत्वादित्यस्यैव । अबाधितविषयत्वे सति त्रैरूप्यमविनाभाव इत्यभिप्रायेणोच्यते—
अविनाभूतस्य नास्ति बाधेति, तदोमित्युच्यते; किन्त्वबाधितविषयत्वमेव रूपं कथितुं
प्रत्यक्षबाधविरोधग्रहणं कृतम् ।
प्रत्यक्षविरोधः किं पक्षस्य दोषः ? किं वा हेतोः ? न पक्षस्य, धर्मिणस्तदवस्थ्यात् ।
नापि हेतोः, स्वविषये तस्य सामर्थ्यात्, विषयान्तरे सर्वस्यैवासामर्थ्यात्; किन्तु प्रतिपा-
दयितुरिदं दूषणम्, योऽविषये साधनं प्रयुङ्क्ते । यदि प्रतिज्ञातार्थप्रतीतियोग्यताविरहस्तत्प्रति-
पादनम् ? योग्यताविरहश्च दूषणमभिमतम् ? तदा कर्मकरणयोरप्यस्ति दोषः ।
घनमम्बरमित्यनुमानविरोधी । येन प्रमाणेनाकाशमवगतं तेनैवाकाशस्य नित्यत्वं निरवय-
वत्वं च प्रतिपादितम्, अतो निबिडावयवमम्बरमिति प्रतिज्ञा धर्मिग्राहकानुमानविरुद्धा ।
(क्योंकि कृतकत्व वह्नि में है और वायु में भी है एवं आकाश में नहीं है) और
अग्निरूप पक्ष में अनुष्णत्वरूप साध्य का अभाव स्वरूप बाध भी है । यदि जो हेतु
बाधित न होकर पक्षसत्त्वादि तीनों रूपों से युक्त हो उस हेतु को ही साध्य का
व्याप्य या अविनाभूत मानकर यह कहते हों कि व्याप्ति से युक्त हेतु कभी बाधित
नहीं हो सकता, तो हम इसके उत्तर में 'हाँ' कहेंगे (अर्थात् इस प्रकार का हेतु
कभी बाधित नहीं होता); किन्तु व्याप्ति के लिए जिस अबाधितत्व या
अबाधितविषयत्व को आप प्रयोजक मानते हैं, हेतु में उस अबाधितविषयत्व की
सत्ता की आवश्यकता को समझाने के लिए ही प्रतिज्ञा-लक्षण में 'अविरोधि' पद
का उपादान किया गया है ।
यह 'प्रत्यक्ष विरोध' किसका दोष है ? पक्ष का या हेतु का ? पक्ष का दोष
तो वह हो नहीं सकता; क्योंकि पक्ष तो ज्यों का त्यों रहता है । हेतु का भी वह
दोष नहीं हो सकता; क्योंकि अपने (व्यापक) साध्य रूप विषय के ज्ञापन की
क्षमता तो उसमें है ही ? दूसरे हेतु के साध्य को समझाने की क्षमता तो किसी भी
हेतु में नहीं होती । अतः यह प्रत्यक्षादि विरोध रूप दोष वस्तुतः प्रयोग करनेवाले
पुरुष का है, जो ऐसे साध्य के ज्ञापन के लिए ऐसे हेतु का प्रयोग करता है, जिस
साध्य के ज्ञापन की क्षमता जिस हेतु में नहीं होती है ।
'घनमम्बरमित्यनुमानविरोधी' जिस प्रमाण से आकाश के अस्तित्व का ज्ञान
होता है, उसी प्रमाण से उसमें नित्यत्व एवं अवयवशून्यत्व भी निश्चित है, अतः
'आकाश के अवयव घन हैं, अर्थात् परस्पर निविड़ संयोग से युक्त हैं' यह प्रतिज्ञा
आकाशरूप धर्मी के ज्ञापक अनुमान के ही विरुद्ध है ।

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५७३

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प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५७३
प्रशस्तपादभाष्यम्
विरोधी, वैशेषिकस्य सत्कार्यमिति ब्रुवतः स्वशास्त्रविरोधी, न शब्दोऽर्थ-
प्रत्यायक इति स्ववचनविरोधी ।
वाले यदि 'सत्कार्यम्' इस प्रतिज्ञावाक्य का प्रयोग करें तो वह स्वशास्त्र-
विरोधी प्रतिज्ञा होगी । यदि कोई इस प्रतिज्ञा वाक्य का प्रयोग करे कि
'शब्दो नार्थप्रत्यायकः', तो यह स्ववचनविरोधी प्रतिज्ञा होगी ।
न्यायकन्दली
ब्राह्मणेन सुरा पेयेत्यागमविरोधी । ब्राह्मणेन सुरा पीता पापसाधनं न भवतीति
प्रतिज्ञार्थः । अत्र क्षीरमुदाहरणम्, क्षीरस्य च पापसाधनत्वाभावः श्रुतिस्मृत्यागमैकसम-
धिगम्यः । येनैवागमेन क्षीरपानस्य पापसाधनत्वाभावः प्रतिपादितः, तेनैव सुरापानस्य
पापसाधनत्वं प्रतिपादितमिति ब्राह्मणेन सुरा पेयेति प्रतिज्ञाया दृष्टान्तग्राहकप्रमाणविरोधः ।
वैशेषिकस्यापि प्रागुत्पत्तेः सत्कार्यमिति ब्रुवतः स्वशास्त्रविरोधी । वैशेषिको हि
वैशेषिकशास्त्रप्रामाण्याभ्युपगमेन वादादिषु प्रवर्तते । तस्य 'प्रागुत्पादात् सत् कार्यम्' इति
ब्रुवतः प्रतिज्ञायाः शास्त्रेण विरोधः, वैशेषिकशास्त्रे 'असदुत्पद्यते' इति प्रतिपादनात् ।
शब्दो नार्थप्रत्यायक इति स्ववचनविरोधी । यदि शब्दस्यार्थप्रत्यायकत्वं नास्ति,
तदा 'शब्दो नार्थं प्रतिपादयति' इत्यस्यार्थस्य प्रतिपादनाय शब्दप्रयोगोऽनुपपन्नः ।
'ब्राह्मणेन सुरा पेयेत्यागमविरोधी' । 'ब्राह्मणेन सुरा पेया' इस प्रतिज्ञा वाक्य
का यह अर्थ है कि ब्राह्मण के द्वारा पी गयी सुरा (मद्य) पाप का कारण नहीं
होती । इसका उदाहरण है- (दूध (अर्थात् जिस प्रकार ब्राह्मण से पान किया गया
दूध पाप का कारण नहीं है, उसी प्रकार ब्राह्मण से पान किया गया मद्य भी पाप
का कारण नहीं है) । 'दूध स्वपान के द्वारा पाप का साधन नहीं है' यह केवल
श्रुति एवं स्मृति रूप 'आगम प्रमाण' से ही समझा जा सकता है । आगम के द्वारा
ही 'दूध का पीना पाप का कारण नहीं है' यह कहा गया है एवं आगम (शब्द)
प्रमाण से ही यह निश्चित है कि 'सुरापान पाप का साधन है'। इस प्रकार 'ब्राह्मण
को सुरापान करना चाहिए' यह प्रतिज्ञा दुग्धपान रूप अपने दृष्टान्त के ज्ञापक
प्रमाण का विरोधी है ।
'वैशेषिकस्यापि प्रागुत्पत्तेः सत्कार्यमिति ब्रुवतः स्वशास्त्रविरोधी' वैशेषिकदर्शन
के अनुयायी वैशेषिकदर्शनरूप शास्त्र को प्रमाण मानकर ही वादादि कथाओं में
प्रवृत्त होते हैं । वे यदि इस प्रतिज्ञावाक्य का प्रयोग करें कि 'कार्य अपनी उत्पत्ति
के पहले भी विद्यमान ही रहता है' तो उनकी यह प्रतिज्ञा वैशेषिकदर्शनरूप अपने
शास्त्र के ही विरुद्ध होगी; क्योंकि वैशेषिकदर्शन में यह प्रतिपादन किया गया है
कि 'पहले से अविद्यमान कार्य की ही उत्पत्ति होती है' ।
'शब्दो नार्थप्रत्यायक इति स्ववचनविरोधी' शब्द से यदि अर्थ का बोध ही नहीं
होता है, तो फिर 'शब्द अर्थबोध का कारण नहीं है' इस अर्थ को समझाने के

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५७४ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमानेऽवयव-
न्यायकन्दली
अथैतदर्थः शब्दः प्रयुज्यते ? तदभ्युपगतं शब्दस्यार्थप्रतिपादकत्वमिति प्रतिज्ञायाः
स्ववचनविरोधः ।
प्रत्यक्षानावगतवस्तुतत्त्वान्वाख्यानं शास्त्रम् । तद्विरोधः प्रत्यक्षानुमानविरोध एव,
तथा तद्भावभावित्वानुमानसंसमधिगम्यं शब्दस्यार्थप्रत्ययाकत्वं प्रतिषेधयतोऽनुमानविरुद्धैव
प्रतिज्ञा, कस्मात् स्वशास्त्रवचनविरोधयोः पृथगभिधानम् ? अत्रोच्यते-प्रमाणाभासमूलमपि
शास्त्रं भवति शाक्यादीनाम्, अत्र बौद्धस्य 'सर्वमक्षणिकम्' इति प्रतिजानतः
स्वशास्त्रविरोध एव, न प्रमाणविरोधः । स्ववचनम् (अपि) कदाचिदप्रमाणमूलमपि
स्यात्, अतस्तद्विरोधो न प्रमाणविरोधः, किन्तु स्ववचनविरोध एव ।
लिए 'शब्दो नार्थप्रत्यायकः' इस वाक्य का भी प्रयोग करना उचित नहीं होगा ।
यदि उक्त अर्थ को समझाने के लिए उक्त वाक्य का प्रयोग वादी करते हैं, तो
फिर वादी शब्द को अर्थबोध का कारण स्वयं मान ही लेते हैं । इस प्रकार उक्त
प्रतिज्ञा स्ववचन-विरोधी है (क्योंकि वादी अपने अभीष्ट अर्थ को समझाने के लिए
शब्दों का प्रयोग भी करें और शब्द को अर्थप्रत्यायक भी न मानें, ये दोनों बातें
नहीं हो सकतीं) ।
(प्र.) प्रत्यक्ष और अनुमान के द्वारा निर्णीत तत्त्व का ही 'अन्वाख्यान' अर्थात्
पश्चात् कथन तो 'शास्त्र' है, अतः शास्त्र का विरोध वस्तुतः प्रत्यक्ष और अनुमान
का ही विरोध है । एवं शब्द में अर्थबोध की कारणता इस अनुमान के द्वारा ही
निश्चित होती है कि "चूँकि शब्दप्रयोग के 'भाव' अर्थात् सत्ता के कारण ही
अर्थबोध की सत्ता देखी जाती है, अतः 'शब्द ही अर्थ का बोधक है' सुतरां शब्द
में अर्थबोध का निषेध करनेवाले पुरुष की 'शब्दो नार्थप्रत्यायकः' यह प्रतिज्ञा भी
वस्तुतः अनुमान के ही विरुद्ध है" । (इस प्रकार स्वशास्त्रविरोध और स्ववचन-
विरोध ये दोनों ही प्रत्यक्षविरोध या अनुमानविरोध में ही अन्तर्भूत हो जाते हैं)
उनका अलग से परिगणन क्यों ? (उ.) इस आक्षेप के उत्तर में हम लोग कहते
हैं कि सभी शास्त्र प्रमाणमूलक ही नहीं होते, ऐसे भी शास्त्र हैं जिनका अनुमोदन
प्रमाण से नहीं किया जा सकता, जैसे कि बौद्धों के आगम हैं । अतः बौद्ध यदि
'सभी वस्तुयें अक्षणिक हैं' इस आशय के प्रतिज्ञावाक्य का प्रयोग करें तो वह
प्रतिज्ञा प्रत्यक्ष या अनुमान प्रमाण के विरुद्ध नहीं होगी; किन्तु उसमें 'स्वशास्त्र-
विरोध' ही होगा । इसी प्रकार स्ववचन भी कभी-कभी अप्रमाणमूलक होता है,
ऐसे स्थलों की प्रतिज्ञा में प्रमाणविरोध तो होगा नहीं, स्ववचन-विरोध ही होगा
(अतः स्वशास्त्रविरोध और स्ववचनविरोध का अलग से उल्लेख किया गया है) ।