Skip to content
SarvaKosh
Back to the archive

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

by महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद

Source: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished759 pages

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४७५

Page 440Permalink

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४७५
प्रशस्तपादभाष्यम्
यज्ज्ञानमुत्पद्यते, तत् प्रत्यक्षं प्रमाणम्, प्रमेया द्रव्यादयः पदार्थाः,
प्रमातात्मा, प्रमितिर्गुणदोषमाध्यस्थ्यदर्शनमिति ।
एवं उन विषयों में उपादेयत्व या हेयत्व अथवा उपेक्षा की बुद्धि ही
प्रमिति है ।
न्यायकन्दली
न च तत् प्रत्यक्षम्, अनन्तरभाविनः शब्दस्यैव तदुत्पत्तौ साधकतमत्वादिन्द्रियस्यापि
तत्सहकारितामात्रत्वात् । तथापि पृष्टो व्यपदिशति-अनेन समाख्यातम्, न पुनरेव-
मभिधत्ते प्रत्यक्षो मया प्रतीत गौरयमिति, तस्य व्यवच्छेदार्थमुक्तमव्यपदेश्यमिति ।
प्रमितिर्गुणदोषमाध्यस्थ्यदर्शनम् । गुणदर्शनमुपादेयत्वज्ञानम्, दोषदर्शनं हेयत्व-
ज्ञानम्ः, माध्यस्थ्यदर्शनं न हेयं नोपादेयमिति ज्ञानं प्रमितिः, पदार्थस्वरूपबोधे सत्युप-
कारादिस्मरणात् । सुखसाधनत्वादिदिनिश्चये सत्युपादेयादिज्ञानं भवतु पदार्थस्वरूपबोध-
स्यैव फलं भवति, सुखस्मरणादीनामवान्तरव्यापारत्वात् । यथोक्तम्-
"अन्तराले तु यस्तत्र व्यापारः कारकस्य सः"॥ इति ।
प्रत्यक्षरूप नहीं है, क्योंकि शब्द ही उस प्रमा का 'साधकतम' करण है, इतना ही
विशेष है कि इन्द्रिय भी उस ज्ञान का सहकारिकारण है । इसीलिए पूछने पर वह
व्यक्ति यह कहता है कि 'उसने कहा है कि यह गो है' वह यह नहीं कहता, मैंने
प्रत्यक्ष के द्वारा देखा है कि 'यह गो है' ।
'प्रमितिर्गुणदोषमाध्यस्थ्यदर्शनम्' । 'यह ग्रहण के योग्य है' इस आकार का
(उपादेयत्व) ज्ञान ही 'गुणदर्शन' है । 'यह त्याग के योग्य है' इस प्रकार का
(हेयत्व) ज्ञान ही 'दोषदर्शन' है । 'न इसके लेने से कुछ होगा न छोड़ने से' इस
प्रकार का ज्ञान ही 'माध्यस्थ्यदर्शन' है । ये ज्ञान ही (विशिष्ट ज्ञानरूप प्रत्यक्ष
प्रमाण से उत्पन्न होनेवाली) प्रमितियाँ हैं, क्योंकि उक्त हेयत्व या उपादेयत्व का ज्ञान
पदार्थ के स्वरूप विषयक बोध (विशिष्टज्ञान) का ही फल है, सुख के स्मरण का
नहीं, क्योंकि सुखादि की स्मृतियाँ तो बीच के व्यापार हैं । (विशिष्ट ज्ञान से
हेयत्वादि ज्ञान के उत्पादन का यह क्रम है कि) पदार्थों के स्वरूप का ज्ञान
(विशिष्ट ज्ञान) होने पर उस ज्ञान के विषय में 'यह सुख (या दुःख) का साधन
है' इस आकार का निश्चय उत्पन्न होता है । इसके बाद उन विषयों में उपादेयत्व
(या हेयत्व) की बुद्धि उत्पन्न होती है । (उपादेयत्वादि का ज्ञान उक्त विशिष्ट ज्ञान
का ही फल है, सुखादि स्मरण का नहीं) । जैसा कि आचार्यों ने कहा है कि
(कार्य के लिए करण की प्रवृत्ति के बाद और कार्य की उत्पत्ति से पहिले इस)
मध्य में जो उत्पन्न होता है, वह तो कारक (करण) का (कार्योत्पादन में सहायक)
व्यापार है (स्वयं कारक नहीं है, अतः करण भी नहीं है) ।

Page 441Permalink

४७६ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे अनुमान-
प्रशस्तपादभाष्यम्
लिङ्गदर्शनात् सञ्जायमानं लैङ्गिकम् ।
हेतु के ज्ञान से उत्पन्न होनेवाला ज्ञान ही 'लैङ्गिक' ज्ञान (अनुमिति) है ।
न्यायकन्दली
अन्ये त्वेवमाहुः-यदर्थस्य सुखसाधनत्वज्ञानं तद् गुणदर्शनम्, उपादेयत्वज्ञानमपि तदेव ।
यद् दुःखसाधनत्वज्ञानं तद् दोषदर्शनं हेयत्वज्ञानमपि तदेव । यच्च न सुखसाधनं न च
दुःखसाधनमेतदिति ज्ञानं तन्माध्यस्थ्यं न हेयं नोपादेयमिति ज्ञानं प्रमितिः । पदार्थस्वरूपबोधे
सत्युपकारादिस्मरणात् सुखसाधनत्वादिविनिश्चये सत्युपादेयादिज्ञानं भवत् पदार्थस्वरूप-
बोधस्यैव फलं भवति, सुखस्मरणादीनामुपेक्षाज्ञानमपि तदेव । सर्वं चैतदभ्यासपाटवोपेतस्य
व्याप्तिस्मरणमनपेक्षमाणस्य वस्तुस्वरूपग्रहणामात्रादेवानुसंहितलिङ्गस्यापरोक्षावभासित-
योत्पादादभ्यासपाटवसहकारिणः प्रत्यक्षस्य फलमिति ।
लिङ्गदर्शनात् सञ्जायमानं लैङ्गिकम् । दर्शनशब्द उपलब्धिवचनो न
चाक्षुषप्रतीतिवचनः, अनुमितानुमानस्यापि सम्भवात् । लिङ्गदर्शनाल्लिङ्गविषयः
संस्कारो जायते; किन्त्वस्य न परिग्रहः, बुद्धयधिकारेण विशेषितत्वात् ।
संशब्देन सम्यगर्थवाचिना संशयविपर्ययस्मृतीनां व्युदासः । लिङ्गस्य
कुछ दूसरे लोग कहते हैं कि (घटादि) अर्थों का 'इससे सुख मिलता है' इस
आकार का जो (सुखसाधनत्व) का ज्ञान होता है, वही गुणदर्शन है, एवं
'उपादेयत्व का ज्ञान' भी वही है । एवं (कण्टकादि) विषयों का जो 'इससे दुःख
मिलता है, इस आकार का (दुःखसाधनत्व) का ज्ञान होता है, वही 'दोषदर्शन' है,
एवं 'हेयत्वज्ञान' भी वही है । हवा में उड़ते हुए (पत्ते प्रभृति) विषयों में जो
'इससे न सुख ही मिलेगा न दुःख ही' इस आकार का ज्ञान होता है, उसी को
'माध्यस्थ्य दर्शन' कहते हैं । (उपादेयत्वादि के) ये सभी ज्ञान चूँकि अपने विषयों
को अपरोक्षरूप से ही प्रकाशित करते हैं और इनकी उत्पत्ति में (अनुमिति के
प्रयोजक) लिङ्गदर्शन एवं व्याप्ति स्मरणादि की भी अपेक्षा नहीं होती है, अतः ये
(सविकल्पक) प्रत्यक्षरूप प्रत्यक्ष प्रमाण के ही फल हैं । इतना अवश्य है कि इन
ज्ञानों के उत्पन्न होने में अभ्यास जनित पटुता भी अपेक्षित होती है, अतः वह भी
उन प्रमितियों का सहकारिकारण है ।
'लिङ्गदर्शनात् सञ्जायमानं लैङ्गिकम्' इस वाक्य में प्रयुक्त 'दर्शन' शब्द का अर्थ
केवल चक्षु से उत्पन्न ज्ञान ही नहीं है, किन्तु सभी ज्ञान या उपलब्धि उसके अर्थ हैं,
क्योंकि अनुमान के द्वारा ज्ञात हेतु से भी अनुमान होता है (अर्थात् अनुमितानुमान
भी होता है) । यद्यपि (कथित) लिङ्गदर्शन से लिङ्गविषयक संस्कार भी उत्पन्न होता
है, (जिससे लिङ्ग की स्मृति उत्पन्न होती है, अतः उसमें अनुमिति का लक्षण अतिव्याप्त
हो जाएगा, किन्तु यह बुद्धि (अनुभव) का प्रकरण है, अतः 'प्रकरण' के द्वारा

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ४७७

Page 442Permalink

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ४७७
न्यायकन्दली
दर्शनाज्ज्ञानात् सम्यग् जायमानं लैङ्गिकमिति वाक्यार्थः । तस्य च ज्ञानस्य सम्यग्जातीयस्य
यथार्थपरिच्छेदकतयोत्पादः, सर्वधियां यथार्थपरिच्छेदकत्वस्य कुलधर्मत्वात् । संशय-
विपर्ययौ तावद्यथासावर्थो न तथा परिच्छिन्नः । स्मृतिरप्यर्थपरिच्छेदिका न भवति,
अनुभवपारतन्त्र्यादिति वक्ष्यामः । अन्ये तु विद्याधिकारेण संशयविपर्ययौ व्युदस्यन्ति ।
अनर्थजायाश्च स्मृत्युदासार्थं 'तद्धि द्रव्यादिषु पदार्थेषूत्पद्यते' इत्यावर्त्तयन्ति । तदयुक्तम्,
वाक्यलभ्येऽर्थे प्रकरणस्यानपेक्षणात्, अनर्थजत्वात्, स्मृतिव्युदासे चातीतानागतविषयस्य
लैङ्गिकज्ञानस्यापि व्युदासप्रसङ्गात् ।
'लिङ्गदर्शनात् संजायमानम्' के बाद 'ज्ञानम्' पद का अध्याहार स्वभावतः प्राप्त
है । (अतः संस्कार को ज्ञानरूप न होने के कारण अतिव्याप्ति दोष नहीं है) ।
('सञ्जायमानम्' इस पद में प्रयुक्त) 'सम्' शब्द 'सम्यक्' अर्थ में प्रयुक्त है, (अतः
'लिङ्गदर्शन से उत्पन्न 'सम्यक्' ज्ञान ही अनुमान है' ऐसा लक्षण निष्पन्न होने के
कारण) संशय, विपर्यय एवं स्मृति इन तीनों की अनुमान से व्यावृत्ति हो जाती
है; क्योंकि ये (ज्ञान होते हुए भी) सम्यग् ज्ञान अर्थात् यथार्थ ज्ञान नहीं हैं । सभी
सम्यग् ज्ञानों का यह स्वभाव है कि अपने विषयों को उनके यथार्थस्वरूप में
उपस्थित करें, चूँकि अपने विषयों को यथार्थरूप में उपस्थित करना सभी
(यथार्थ) ज्ञानों का मौलिक धर्म है । संशय और विपर्यय तो अपने विषयों को
उसी रूप में उपस्थित नहीं करते जो कि उनका यथार्थस्वरूप है । स्मृति के प्रसङ्ग
में हम आगे कहेंगे कि स्मृति चूँकि अनुभव के अधीन है, अतः वह अपने विषयों
की परिच्छेदिका नहीं है । (पूर्वानुभव ही स्मृति के विषयों का परिच्छेदक है ) ।
कोई कहते हैं कि यह विद्या (यथार्थ ज्ञान) का प्रकरण है, अतः प्रकरण के बल
से बुद्धि विद्यारूप ही होगी, इसी से संशय और विपर्यय इन दोनों की अनुमिति से
व्यावृत्ति हो जाएगी । स्मृति में अनुमिति लक्षण की अतिव्याप्ति के लिए वे लोग
(प्रत्यक्ष प्रकरण में पठित) 'तद्धि द्रव्यादिषु पदार्थेषूत्पद्यते' इस वाक्य की यहाँ
आवृत्ति करते हैं । अतः स्मृति अर्थजनित न होने के कारण अनुमिति के अन्तर्गत
नहीं आती । किन्तु ये (दोनों ही बातें) असङ्गत हैं, क्योंकि वाक्य के द्वारा जिस
अर्थ का लाभ हो सकता है, उसे प्रकरण की अपेक्षा नहीं होती । एवं अर्थजनित
न होने के कारण यदि स्मृति की व्यावृत्ति करें, तो फिर भूत और भविष्य
विषयक अनुमान की भी अनुमिति से व्यावृत्ति हो जायगी¹ ।

  1. अभिप्राय यह है कि संशय और विपर्यय में अनुमिति लक्षण की अतिव्याप्ति हटानी
    है । 'सञ्जायमानम्' पद घटक 'सम्' शब्द को सम्यगर्थक मान लेने से भी उक्त
Page 443Permalink

४७८ न्यायकन्दलीसंविलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे अनुमान-
प्रशस्तपादभाष्यम्
लिङ्गं पुनः-
यदनुमेयेन सम्बद्धं प्रसिद्धं च तदन्विते ।
तदभावे च नास्त्येव तल्लिङ्गमनुमापकम् ॥
जो अनुमिति में प्रधानरूप से विषय होनेवाली वस्तु के साथ
अर्थात् पक्ष के साथ सम्बद्ध हो (इसे पक्षसत्त्व कहते हैं), एवं
जो साध्यरूप धर्म से युक्त (दृष्टान्त) में यथार्थरूप से ज्ञात
हो (इसे सपक्षसत्त्व कहते हैं), साध्य का न रहना जिसमें निश्चित
न्यायकन्दली
लिङ्गस्य लक्षणमाह-लिङ्गं पुनरिति । अनुमेयः प्रतिपिपादयिषितधर्मविशिष्टो धर्मी,
तेन यत् सम्बद्धं तस्मिन् वर्तत इत्यर्थः । यथा विपक्षैकदेशे वर्तमानमपि च लिङ्गं
विपक्षवृत्ति भवति, एवं पक्षैकदेशे वर्तमानमनुमेयेन सम्बद्धमेव । ततश्चतुर्विधाः
परमाणवोऽनित्या गन्धवत्त्वादित्यस्यापि भागासिद्धस्य हेतुत्वं प्राप्नोतीति चेत् ? न,
वैधर्म्यात् । यः साध्यसाधनव्यावृत्तिविषयोऽर्थः, स विपक्षः । साध्यसाधनयोर्व्या-
वृत्तिर्न समुदितेभ्यः, किन्तु प्रत्येकमेव सम्भवतीति प्रत्येकमेव विपक्षता । पक्षस्तु
स भवति यत्र वादिना साध्यो धर्मः प्रतिपादयितुमिष्यते । न च वादिना
'लिङ्गं पुनः' इत्यादि ग्रन्थ के द्वारा 'लिङ्ग' का लक्षण कहा गया है । ('यदनुमेयेन'
इत्यादि वाक्य में प्रयुक्त) अनुमेय' शब्दका अर्थ वह 'धर्मी' है, जिसमें (अनुमान प्रयोग
करनेवाले को अपने अभीष्ट वस्तु अर्थात् साध्यरूप) धर्म का प्रतिपादन इष्ट हो ।
(फलतः प्रकृत में 'अनुमेय' शब्द से पक्ष अभिप्रेत है) 'तेन यत् सम्बद्धम्' उस (पक्ष)
में जो विद्यमान रहे (वह हेतु है) । (प्र.) जिस प्रकार विपक्षीभूत किसी एक वस्तु में
यदि (हेतु) रहता है, तो वह हेतु 'विपक्षवृत्ति' (हेत्वाभास) हो जाता है, उसी प्रकार
किसी एक पक्ष में भी यदि हेतु की सत्ता है, तो फिर वह हेतु 'अनुमेयसम्बद्ध' (पक्ष-
वृत्ति) होगा । (इस वस्तुस्थिति के अनुसार यदि कोई इस अनुमान का प्रयोग करे
कि) चारों प्रकार के (अर्थात् पृथिवी, जल, तेज और वायु इन चारों द्रव्यों के) पर-
माणु अनित्य हैं, क्योंकि उन सभी में गन्ध है, तो फिर इस अनुमान का उक्त गन्ध
दोनों अतिव्याप्तियाँ हट सकती हैं। एवं अनुमिति चूँकि विद्यारूप सम्यग्ज्ञान के प्रकरण में
पठित है, अतः लिङ्गदर्शन से उत्पन्न ज्ञान में सम्यक्त्व का लाभ प्रकरण से भी हो सकता
है । फलतः अनुमिति लक्षणघटक ज्ञान में सम्यक्त्व विशेषण देने से ही दोनों मतों में
संशय और विपर्यय में अतिव्याप्ति का वारण हो जाता है । यह सम्यक्त्व प्रथम पक्ष में
वाक्य लभ्य है, दूसरे पक्ष में प्रकरण लभ्य है। प्रकरण की अपेक्षा वाक्य बलवान् है ।
(देखिए बलाबलाधिकरण) । अतः प्रकरणापेक्षी द्वितीय पक्ष असङ्गत है ।

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४७९

Page 444Permalink

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४७९
न्यायकन्दली
पार्थिवपरमाणावेकस्मिन्ननित्यत्वं प्रतिपादयितुमिष्यते, किन्तु चतुर्ष्वपि परमाणुष्विति समुदि-
तानामेव पक्षत्वे स्थितेऽसिद्धवद् भागासिद्धस्यापि व्युदासः, अनुमेयसम्बन्धाभावात् । प्रसिद्धं
च तदन्वित इति । तदिति योग्यत्वात् साध्यधर्मः परामृश्यते । तदन्विते साध्यधर्मान्विते सपक्षे
प्रसिद्धं परिज्ञातमिति विरुद्धासाधारणयोर्व्यवच्छेदः । तदभावे च नास्त्येवेति । अत्रापि तदिति
हेतु भी पक्षवृत्ति होगा, क्योंकि उन चारों प्रकार के परमाणुओं में से एक पार्थिव
परमाणु में वह विद्यमान है, किन्तु वह हेतु तो भागासिद्ध हेत्वाभास है, (अतः
'हेतु' का वह 'अनुमेयसम्बद्धत्व' रूप लक्षण ठीक नहीं है) । (उ.) जिसमें साध्य
और हेतु दोनों का अभाव निश्चित हो वही 'विपक्ष' है । यह विपक्षता (विपक्षता-
वच्छेदकाश्रयीभूत) प्रत्येक विपक्ष व्यक्ति में है । (विक्षतावच्छेदकाश्रयीभूत) सभी
विपक्ष व्यक्ति समूह में ही नहीं, (अतः किसी भी विपक्ष व्यक्ति में रहनेवाला हेतु
विपक्षवृत्ति होने के कारण भागासिद्ध हेत्वाभास होता है) 'पक्ष' के प्रसङ्ग में सो
बात नहीं है, क्योंकि पक्ष वही है जिसमें वादी को साध्य सिद्धि की इच्छा हो,
प्रकृत में वादी की यह इच्छा नहीं है कि केवल पार्थिव परमाणु में ही अनित्यत्व
की सिद्धि करे, किन्तु वादी की यह इच्छा है कि चारों प्रकार के परमाणुओं में ही
अनित्यत्व की सिद्धि करे । तदनुसार उक्त चारों परमाणुओं का समूह ही पक्ष है,
तदन्तर्गत एक पार्थिव परमाणु नहीं, अतः जिस प्रकार पक्षाभिमत सभी वस्तुओं में
हेतु के न रहने से हेतु (हेतु नहीं रह जाता या) असिद्ध नाम का हेत्वाभास हो
जाता है, उसी प्रकार (पक्षान्तर्गत पार्थिव परमाणुरूप पक्ष में गन्धरूप हेतु के रहने
पर भी पक्षान्तर्गत जलादि के तीनों परमाणुओं में गन्ध के न रहने से वह हेतु न
होकर) भागासिद्ध नाम का हेत्वाभास ही होगा; क्योंकि उसमें पक्षान्तर्गत जलादि
परमाणुओं का सम्बन्ध न रहने के कारण पक्षान्तर्गत ही पार्थिव परमाणु का
सम्बन्ध रहते हुए भी अनुमेयस्वरूप चारों परमाणुओं के साथ सम्बन्ध नहीं है ।
इस प्रकार हेतु के लक्षण में 'अनुमेयेन सम्बद्धम्' इस विशेषण से स्पष्ट ही पक्ष में
कहीं भी न रहनेवाला हेतु स्वरूपासिद्ध या भागासिद्ध हेत्वाभास होगा ।
'प्रसिद्धञ्च तदन्विते' इस वाक्य में प्रयुक्त 'तत्' शब्द से साध्यरूप धर्म ही
गृहीत होता है, क्योंकि उसी का ग्रहण प्रकृत में उपयोगी है । 'तदन्विते' अर्थात्
साध्यरूप धर्म से युक्त अर्थात् 'सपक्ष' में 'प्रसिद्ध' अर्थात् अच्छी तरह से ज्ञात
(होना हेतु के लिए आवश्यक है) । (हेतु के इस सपक्षवृत्तित्व रूप लक्षण से)
विरुद्ध और असाधारण नाम के हेत्वाभासों में हेतुत्व का व्यवच्छेद होता है,
अर्थात् उनमें हेतु लक्षण की अतिव्याप्ति नहीं हो पाती ।
'तदभावे च नास्त्येव' इस वाक्य के 'तत्' शब्द से साध्यरूप धर्म का ही ग्रहण करना
चाहिए । (तदनुसार) इस वाक्य का यह अर्थ है कि साध्यरूप धर्म का अर्थात् साध्य का
अभाव जिन आश्रयों में रहे, उन सभी आश्रयों में जो कदापि न रहे वही (सपक्षवृत्ति

Page 445Permalink

४८० न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे अनुमान-
प्रशस्तपादभाष्यम्
विपरीतमतो यत् स्यादेकेन द्वितयेन वा।
विरुद्धासिद्धसन्दिग्धमलिङ्गं काश्यपोऽब्रवीत् ॥
यदनुमेयेनार्थेन देशविशेषे कालविशेषे वा सहचरितम-
हो, ऐसे आश्रयों में जो कदापि न रहे (इसे विपक्षासत्व कहते हैं), वही
(पक्षसत्व, सपक्षसत्व और विपक्षासत्य से युक्त) हेतु साध्य का ज्ञापक है ।
(सपक्षसत्वादि इन तीन) लक्षणों में से एक या दो लक्षणों से भी रहित हेतु
को काश्यप ने असिद्ध, विरुद्ध और सन्दिग्ध नाम का हेत्वाभास कहा है ।
(लिङ्ग के लक्षण बोधक कथित पहिले श्लोक का यह अभिप्राय हैं
कि) जो साध्य के साथ किसी समयविशेष में एवं देशविशेष में सम्बद्ध
न्यायकन्दली
साध्यधर्मस्यैव परामर्शः, तस्य साध्यधर्मस्याभावे नास्त्येव न पुनरेकदेशेऽस्त्यपीत्यनै-
कान्तिकव्यवच्छेदः । तल्लिङ्गमनुमापकम् अनुमेयस्य ज्ञापकम् ।
लिङ्गं व्याख्याय लिङ्गाभासं व्याचष्टे-विपरीतमतो यत् स्यादिति ।
अत उक्तलक्षणाल्लिङ्गाद् यदेकेन द्वितयेन लिङ्गलक्षणेन विपरीतं रहितं विरुद्ध-
मसिद्धं सन्दिग्धम्, तत् कश्यपात्मजोऽलिङ्गमनुमेयाप्रतिपादकमब्रवीत् । असिद्धमनुमेये
नास्ति, अनैकान्तिकं विपक्षाद्व्यावृत्तमित्यनयोरेकेन लिङ्गलक्षणेन विपरीतत्वम् ।
और पक्षवृत्ति) 'हेतु' है। उक्त वाक्य में प्रयुक्त 'एवं' शब्द के द्वारा यह सूचित
किया गया है कि ऐसे किसी भी आश्रय में हेतु को न रहना चाहिए जिसमें कि
साध्य न रहे । इस प्रकार इस विशेषण के द्वारा अनैकान्तिक नाम के हेत्वाभास में
हेतु लक्षण की अतिव्याप्ति का वारण होता है । 'तल्लिङ्गमनुमापकम्' (अर्थात् उक्त
पक्षवृत्तित्व, सपक्षवृत्तित्व और विपक्षावृत्तित्व इन) तीनों लक्षणों से युक्त हेतु ही
साध्य का ज्ञापक है ।
लिङ्ग के लक्षण के कहने के बाद अब 'विपरीतमतो यत् स्यात्' इत्यादि सन्दर्भ के
द्वारा लिङ्गाभास (हेत्वाभास) का लक्षण कहते हैं । 'अत' अर्थात् हेतु के कथित तीनों
लक्षणों में से हेतु के एक या दो लक्षणों से 'विपरीत' अर्थात् शून्य हेतु को 'काश्यप'
ने अर्थात् कश्यप के पुत्र ने क्रमशः विरुद्ध, असिद्ध और सन्दिग्ध नाम का 'अलिङ्ग'
(हेत्वाभास) कहा है, क्योंकि ये अनुमेय के ज्ञापक नहीं हैं । इनमें 'असिद्ध' नाम
का हेत्वाभास अनुमेय (पक्ष) में नहीं रहता, (अर्थात् उसमें पक्षवृत्तित्व रूप एक धर्म
का अभाव है), 'अनैकान्तिक' नाम का हेत्वाभास विपक्ष से अव्यावृत्त है, अर्थात् विपक्षा-
वृत्तित्वरूप हेतु के एक ही लक्षण से रहित होने के कारण हेत्वाभास है (इस प्रकार
असिद्ध और अनैकान्तिक ये दोनों हेतु के एक ही लक्षण से रहित होने के कारण

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४८१

Page 446Permalink

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४८१
प्रशस्तपादभाष्यम्
नुमेयधर्मान्विते चान्यत्र सर्वस्मिन्नेकदेशे वा प्रसिद्धमनुमेयविपरीते च सर्वस्मिन्
प्रमाणतोऽसदेव, तदप्रसिद्धार्थस्यानुमापकं लिङ्गं भवतीति ।
रहे, अनुमेयरूप धर्म के किसी (निश्चित) अधिकरण में या सभी अधिकरणों
में जिसकी सत्ता प्रमाण के द्वारा सिद्ध रहे, एवं साध्य के अभाव
के निर्णीत अधिकरण में जिसकी असत्ता भी प्रमाण के द्वारा निश्चित
ही हो, वही वस्तु पूर्व में अज्ञात साध्य के अनुमिति का लिङ्ग है ।
न्यायकन्दली
विरुद्धं सपक्षे नास्ति, विपक्षाद्व्यावृत्तमिति तस्य द्वितयेन लिङ्गलक्षणेन रहितत्वम् ।
यदनुमेयेन सम्बद्धमिति श्लोकार्थं विवृणोति-यदनुमेयेनेति । अनुमेयेनार्थेन साध्य-
धर्मिणा सह यद्देशविशेषे कालविशेषे वा सहचरितं सम्बद्धम्, अनुमेयधर्मान्विते चान्यत्र
सपक्षे सर्वस्मिन्नेकदेशे वा प्रसिद्धं प्रमाणेन प्रतीतम्, अनुमेयविपरीते च साध्यव्यावृत्ति-
विषये चार्थे सर्वस्मिन् प्रमाणतोऽसदेव तदप्रसिद्धार्थस्य साध्यधर्मिणोऽप्रतीतस्यार्थस्य
साध्यधर्मस्यानुमापकं लिङ्गं भवति । यावति देशे काले वा दृष्टान्तधर्मिणि लिङ्गस्य
साध्यधर्मेणाविनाभावो प्रदर्शितस्तावत्येव देशे काले वा साध्यधर्मिणि प्रतीयमानस्य
गमकमिति प्रतिपादनार्थमुक्तम्-देशविशेषे कालविशेषे वा सहचरितमिति । सर्वस-
पक्षव्यापकवत् सपक्षैकदेशवृत्तेरपि हेतुत्वार्थं सर्वस्मिन्नेकदेशे वा प्रसिद्धमित्युक्तम् । समस्त-
हेत्वाभास हैं) विरुद्ध नाम का हेत्वाभास सपक्ष में नहीं रहता और विपक्ष में रहता
है, अतः विरुद्ध सपक्षवृत्तित्व और विपक्षव्यावृत्तत्व हेतु के इन दोनों लक्षणों से
रहित हेत्वभास है ।
'यदनुमेयेनार्थेन' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा 'यदनुमेयेन सम्बद्धम्' इत्यादि श्लोक की
व्याख्या करते हैं । पहले से अज्ञात अर्थ स्वरूप साध्य (धर्म) की अनुमिति का जनक
वह 'लिङ्ग' है, जो अनुमेय अर्थ के साथ अर्थात् साध्य के धर्मी (पक्ष) के साथ किसी
देश विशेष में एवं कालविशेष में 'सहचरित' अर्थात् सम्बद्ध हो, एवं अनुमेय (साध्य)
रूप धर्म से युक्त (पक्ष से भिन्न) किसी आश्रयरूप सपक्ष के किसी एक देश में या उसके
सभी देशों में 'प्रसिद्ध' हो, अर्थात् प्रमाण के द्वारा निश्चित हो, एवं अनुमेय के
विपरीत अर्थात् साध्य का अभाव जिनमें निश्चित हो, उन सभी आश्रयों में प्रमाण
के द्वारा जिसकी असत्ता भी निश्चित ही हो (वही लिङ्ग है) । 'देशविशेषे कालविशेषे
वा सहचरितम्' यह वाक्य इस लिए लिखा गया है कि दृष्टान्तरूप धर्मी के जितने
देश में एवं जितने काल में हेतु का साध्यरूप धर्म के साथ 'अविनाभाव' (व्याप्ति)
देखा जाय, उन्हीं देशों में और उन्हीं कालों में साध्य के धर्मी (पक्ष) में जाते हुए
साध्य का वह हेतु ज्ञापक होता है । 'सर्वस्मिन्नेकदेशे वा प्रसिद्धम्' यह वाक्य इस

Page 447Permalink

४८२ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [गुणे अनुमान-
न्यायकन्दली
विपक्षव्यापकवद्विपक्षैकदेशवृत्तेरप्यहेतुत्वद्योतनार्थं सर्वस्मिन्नसन्नेवेति पदम् ।
केचित् प्रवाडुका एवं वदन्ति-नावश्यं प्रमाणसिद्धो वैधर्म्यदृष्टान्त एव द्रष्टव्यः,
'यत्रेदमपि नास्ति तत्रेदमपि नास्ति' इति वचनादपि साध्यव्यावृत्त्या साधनव्यावृत्ति-
प्रतीतिसम्भवात् । तथा च तेषां ग्रन्थः-
तस्माद् वैधर्म्यदृष्टान्तोऽनिष्टोऽवश्यमिहाश्रयः ।
तदभावेऽपि तन्नेति वचनादपि तद्गतेः ॥ इति ।
तन्निवृत्त्यर्थं प्रमाणत इति । साध्यविपरीते यत् प्रमाणतोऽसल्लिङ्गं न तु वाङ्मात्रेणेत्यर्थः ।
प्रमाणशून्यस्य वचनमात्रस्य सर्वत्र सम्भवे हेतुहेत्वाभासव्यवस्थानुपपत्तिप्रसङ्गः । अतिव्यापक-
मिदं लिङ्गलक्षणम्, प्रकरणसमे कालात्ययापदिष्टे च भावादिति चेत् ? अत्राह कश्चित्-
प्रकरणसमकालात्ययापदिष्टावनैकान्तिक एवान्तर्भवतः, संदिग्धविपक्षे साध्यधर्मिणि प्रकरण-
समस्य भावान्निश्चितविपक्षे च कालात्ययापदिष्टस्य वृत्तेः । यथा च प्रकरणसमः 'यतः प्रकरण-
लिए लिखा गया है कि जिस प्रकार सभी सपक्षों (दृष्टान्तों) में रहनेवाली वस्तु में
(साध्य के ज्ञापन करने का सामर्थ्यरूप) हेतुत्व है, उसी प्रकार कुछ ही सपक्षों में
रहनेवाली वस्तु में भी उक्त हेतुत्व है । 'सर्वस्मिन्नसदेव' यह वाक्य इसलिए दिया गया
है कि जिस प्रकार सभी विपक्षों में रहनेवाला पदार्थ भी साध्य का ज्ञापक हेतु नहीं
हो सकता, उसी प्रकार कुछ थोड़े से विपक्षों में रहनेवाला पदार्थ भी साध्य का
ज्ञापक हेतु नहीं हो सकता । किसी सम्प्रदाय के लोगों (बौद्धों) का कहना है कि
'वैधर्म्य दृष्टान्त में प्रमाण के द्वारा हेतु की असत्ता सिद्ध ही हो' यह कोई आवश्यक
नहीं है, क्योंकि 'जहाँ साध्य नहीं है, वहाँ हेतु भी नहीं है' इस प्रकार के साधारण
वाक्य से ही साध्य से शून्य सभी आश्रयों (सभी विपक्षों) में हेतु की असत्ता की
प्रतीति हो सकती है । जैसा कि उन लोगों का (उक्त सिद्धान्त का समर्थक) यह
वचन है कि "तस्मात् अनुमान के लिए वैधर्म्य दृष्टान्तरूप आश्रय (प्रयोजक) का
मानना आवश्यक नहीं है, क्योंकि 'जहाँ साध्य नहीं है, वहाँ हेतु भी नहीं है' इस
वाक्य से भी उस (साध्यशून्य आश्रय में हेतु के अभाव) की प्रतीति हो जाएगी"
इस सिद्धान्त के खण्डन के लिए ही प्रकृत वाक्य में 'प्रमाणतः' पद दिया गया है ।
अर्थात् विपक्ष में हेतु की असत्ता प्रमाण से ही सिद्ध होनी चाहिए, प्रमाणशून्य
केवल वचन मात्र के प्रयोग से प्रकृत में समाधान नहीं होगा, क्योंकि प्रमाणशून्य
वचनों का प्रयोग तो सभी जगह सम्भव है, इससे 'यह हेतु है और हेत्वाभास है'
इस प्रकार की व्यवस्था ही नहीं रह जाएगी । (प्र.) हेतु का यह लक्षण तो
'प्रकरणसम' और 'कालात्ययापदिष्ट' नाम के हेत्वाभासों में भी रहने के कारण
अतिव्यापक (अतिव्याप्त) है । इसके उत्तर में कोई कहते हैं कि (उ.) प्रकरणसम
और कालात्ययापदिष्ट इन दोनों का अन्तर्भाव भी 'अनैकान्तिक' नाम के हेत्वाभास
में ही हो जाता है, क्योंकि सन्दिग्धविपक्ष रूप साध्य के धर्मी में (अर्थात् पक्ष में)

प्रकरणम्] भाषाअनुवादसहितम् ४८३

Page 448Permalink

प्रकरणम्] भाषाअनुवादसहितम् ४८३
न्यायकन्दली
चिन्ता, स निर्णयार्थमुपदिष्टः प्रकरणसमः' प्रक्रियते प्रस्तूयत इति प्रकरणं पक्षप्रतिपक्षौ,
तयोश्चिन्ता विचारः, सा यत्कृता स निर्णयार्थमुपदिष्ट उभयपक्षसाम्यान्न प्रकरण-
साम्येऽन्यतरपक्षनिर्णयाय कल्पते । यथा नित्यः शब्दोऽनित्यधर्मानुपलब्धेः, अनित्यः शब्दो
नित्यधर्मानुपलब्धेरिति शब्दे नित्यानित्यधर्मयोरनुपलम्भाश्रित्यत्यसंशये सति तद्विचारोऽभूत्,
अन्यतरधर्मग्रहणे तत्तन्निश्चयाद् विचारस्याप्रवृत्तेः । तत्रानित्यधर्मानुपलम्भो नित्यत्व-
विनिश्चयार्थमुपदिष्टः, नित्यधर्मानुपलम्भोऽनित्यत्वविनिश्चयार्थमुपदिष्टः, नित्यधर्मानु-
पलम्भं प्रतिपक्षमप्रतिवर्तमानो न निर्णयाय कल्पते, तत्प्रतिबन्धात् । स चायं
सम्भवत्प्रतिपक्षे धर्मिणि वर्तमान एकस्मिन्नन्ते नियतो न भवतीत्यनै-
प्रकरणसम हेत्वाभास की सत्ता रहती है । एवं निश्चित विपक्ष में 'कालातया-
पदिष्ट' हेत्वाभास की सत्ता रहती है । अभिप्राय यह है कि (न्यायसूत्र में)
प्रकरणसम के लक्षण के लिए यह सूत्र निर्दिष्ट है कि 'यस्मात् प्रकरणचिन्ता स
निर्णयार्थमुपदिष्टः प्रकरणसमः ।' 'प्रक्रियते प्रस्तूयते इति प्रकरणम्' इस व्युत्पत्ति के
अनुसार उपस्थित किये जानेवाले पक्ष और प्रतिपक्ष ये दोनों ही इस सूत्र में प्रयुक्त
'प्रकरण' शब्द के अर्थ हैं ।'तयोश्चिन्ता प्रकरणचिन्ता' अर्थात् कथित पक्ष और
प्रतिपक्ष की जो 'चिन्ता' अर्थात् विचार, फलतः संशय जिससे उत्पन्न हो, उन दोनों
में से किसी एक पक्ष के निश्चय के लिए प्रयुक्त हेतु ही प्रकरणसम नाम का
हेत्वाभास है, क्योंकि वह हेतु दोनों पक्षों के साधन के लिए समान ही है, (अतः
प्रकरणसम है) । उन दोनों में से कोई एक हेतु एक पक्ष का निर्णायक नहीं हो
सकता । जैसे कि एक ने यह पक्ष उपस्थित किया कि 'शब्द नित्य है, क्योंकि
अनित्य वस्तुओं में रहनेवाले धर्मों की उपलब्धि शब्द में नहीं होती है । दूसरा
पक्ष उपस्थित हुआ कि 'शब्द अनित्य है', क्योंकि नित्य पदार्थों में रहनेवाले धर्म
की उपलब्धि उसमें नहीं होती । इस प्रकार नित्यों में रहनेवाले धर्म को ज्ञापन
करने का सामर्थ्य मान लिया जाय तो फिर साध्य के धर्मी पक्ष में साध्य के
अभाव रूप धर्मों एवं अनित्यों में रहनेवाले धर्मों की अनुपलब्धि से शब्द में
नित्यत्व और अनित्यत्व का संशय उपस्थित होगा । इस संशय के कारण
ही 'प्रकरण' का उक्त 'चिन्ता' रूप विचार उपस्थित होता है । उन दोनों में से
एक (नित्य या अनित्य) धर्म का निर्णय रूप विचार उपस्थित होता है । उन दोनों
में से एक (नित्य या अनित्य) धर्म का निर्णय हो जाने पर तो उक्त विचार की
प्रवृत्ति ही नहीं होगी । इन दोनों में शब्द में नित्यत्व के निश्चय के लिए अनित्य
धर्म के अनुपलब्धिरूप हेतु का प्रयोग होता है, एवं शब्द में अनित्यत्व के निश्चय
के लिए नित्यधर्मानुपलब्धिरूप हेतु का प्रयोग होता है । इनमें अनित्यधर्मानुपलब्धि
रूप हेतु नित्यधर्म के अनुपलब्धिरूप प्रतिपक्ष को पराजित नहीं कर सकता,
(इसी प्रकार नित्यधर्मानुपलब्धिरूप हेतु अनित्यधर्मानुपलब्धिरूप प्रतिपक्ष को भी
पराजित नहीं कर सकता), अतः शब्द में नित्यत्व या अनित्यत्व का निर्णय नहीं
हो सकता, क्योंकि दोनों ही अपने प्रतिपक्ष के द्वारा प्रतिहत हैं । अतः यह हेतु

प्रकरणसमेन स्वसामर्थ्यात् साध्यं साधयितव्यमेव । अथ न शक्नोति साधयितुं

Page 449Permalink

४८४ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे अनुमान-
न्यायकन्दली
कान्तिकः ! एवं कालात्ययापदिष्टोऽप्यनैकान्तिकः , प्रत्यक्षनिश्चितोष्णत्वे वह्नौ विपक्षे
कृतकत्वस्य भावात् । एतदयुक्तम् । यदि पक्षव्यापकत्वे सति सपक्षे सद्भावो विपक्षाच्च
व्यावृत्तिरित्येतावत्तैव हेतोर्गमकत्वम्, तदास्तु नाम साध्यधर्मिणि प्रतिपक्षसम्भावना, तथापि
प्रकरणसमेन स्वसामर्थ्यात् साध्यं साधयितव्यमेव । अथ न शक्नोति साधयितुं
प्रतिपक्षसंशयाक्रान्तत्वात् ? न तर्हि त्रैरूप्यमात्रेण गमकत्वमिति असत्प्रतिपक्षत्वमपि
रूपान्तरमास्थेयम्, सति प्रतिपक्षे हेतुत्वाभावादसति तद्भावात् । एवं कालात्ययापदिष्टेऽपि
वाच्यम् । यदि त्रैरूप्यमात्रेण लिङ्गत्वं कृतकत्वाद् वह्नावनुष्णत्वमस्त्येवेति कथमनैकान्ति-
कत्वम् ? अथ सत्यपि कृतकत्वे वह्नावनुष्णत्वं न भवति, प्रत्यक्षोष्णताप्रतीतेः,
तदा प्रत्यक्षाविरोधे सति प्रतिपादनं न तद्विरोध इत्यबाधितविषयत्वमपि रूपान्तरमनु-
(अर्थात् शब्द में नित्यत्व का साधक और अनित्यत्व का साधक हेतु) साध्य
संशयवाले पक्ष में विद्यमान होने के कारण 'एक अन्त' में, किसी एक कोटि के
निश्चय के लिए नियत नहीं है, अतः 'प्रकरणसम' अनैकान्तिक ही है । इसी
प्रकार 'कालात्ययापदिष्ट' अर्थात् बाधित हेत्वाभास भी अनैकान्तिक ही है, क्योंकि
'वह्निरनुष्णः कृतकत्वात्' इत्यादि अनुमान का कृतकत्व रूप कालात्ययापदिष्ट हेतु
वह्निरूप उस विपक्ष में ही विद्यमान है, जिसमें कि (अनुमान से बलवान्) प्रतिपक्ष
के द्वारा (अनुष्णत्वरूपसाध्य के अभावरूप) उष्णत्व की सत्ता निर्णीत है । (उ.)
(किन्तु प्रकरणसम और कालात्ययापदिष्ट का इस प्रकार अनैकान्तिक में अन्तर्भाव
करना) अयुक्त है, क्योंकि यदि सभी पक्षों में रहने से, एवं सपक्षों में रहने से,
और विपक्षों में न रहने से ही हेतु में साध्य की अनुमिति का सामर्थ्य मान लिया
जाय, तो साध्य की सम्भावना रहने पर भी प्रकरणसम हेत्वाभास से साध्य का
साधन होगा ही, क्योंकि उसमें साध्य को ज्ञापन करने का (पक्षसत्त्वादि) उक्त
सामर्थ्य तो है ही । यदि प्रतिपक्ष संशय के कारण वह अपने साध्य का साधन नहीं
कर सकता, तो फिर यह कहना ठीक नहीं है कि (पक्षसत्यादि) तीनों धर्मों का
रहना ही हेतु में साध्य के साधन का सामर्थ्य है, इसके लिए 'असत्प्रतिपक्षित्व'
नाम का एक और प्रयोजक हेतु में साध्य साधन के लिए मानना पड़ेगा ।
क्योंकि प्रतिपक्ष के रहने पर हेतु में साध्य साधन की क्षमता नहीं रहती है, और
उसके न रहने से हेतु में वह क्षमता रहती है । इसी प्रकार कालात्ययापदिष्ट के
प्रसङ्ग में भी कहना चाहिए कि यदि पक्षसत्त्वादि तीनों रूपों के रहने से ही हेतु
साध्य का साधन कर सके तो कृतकत्व के रहने के कारण वह्नि में अनुष्णता का
अनुमान भी हो सकता है, सुतराम् यह प्रश्न रह जाता है कि वह्नि में अनुष्णता
का साधक कृतकत्व हेतु 'अनैकान्तिक' कैसे है ? यदि वह्नि में कृतकत्व के रहने
पर भी उष्णता की प्रत्यक्ष प्रतीति वह्नि में होती है, अतः अनुष्णत्व की उक्त
अनुमिति नहीं होती है, तो यह कहना पड़ेगा कि पक्षसत्त्वादि की तरह (अबाधित-
विषयत्व या) हेतु में अबाधितत्त्व का रहना भी साध्य ज्ञान के लिए आवश्यक है ।

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४८५

Page 450Permalink

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४८५
न्यायकन्दली
सरणीयम् । तस्मादन्यथोच्यते, पक्षो नाम साध्यपर्यायः, साध्यं च तद् भवति,
यत् साधनमर्हति, सम्भाव्यमानप्रतिपक्षार्थो न साधनमर्हति, वस्तुनो द्वैरूप्या-
भावादित्ययमपक्षधर्म एव । तथा प्रत्यक्षादिविरुद्धोऽपि पक्षो न भवति,
रूपान्तरेण सिद्धस्य रूपान्तरेण साधनानर्हत्वात् । अतः प्रकरणसमकालातया-
पदिष्टोभौ 'यदनुमेयेन सम्बद्धम्' इत्यनेनैव निराकृतौ, अनुमेयाभासाश्रयत्वात् ।
अतः (अर्थात् पक्षसत्त्वादि तीनों रूपों को ही हेतुत्व का प्रयोजक मानें तो
प्रकरणसम और कालात्ययापदिष्ट हेत्वाभासों में हेतुत्व का वारण किस प्रकार
होगा ? अतः इस प्रश्न का हम लोग (सिद्धान्ती) दूसरा समाधान कहते हैं कि
(हेतु के बल रूप) पक्षवृत्तित्वादि के घटकीभूत 'पक्ष' शब्द और 'साध्य' शब्द
दोनों एक ही अर्थ के बोधक हैं। साध्य वह है जिसका कि साधन हो सके; किन्तु
जिस साध्य के प्रतिपक्ष की सम्भावना रहती है, उसका साधन नहीं किया जा
सकता, क्योंकि वस्तुओं के (परस्पर-विरुद्ध) दो रूप नहीं हो सकते 1। अतः
प्रकरणसमहेतु 'पक्षधर्म' ही नहीं है, अर्थात् साध्य से युक्त पक्षरूप अनुमेय से
अभिन्न साध्य के साथ सम्बद्ध ही नहीं है, इसी प्रकार कालात्ययापदिष्ट हेतु भी
'पक्ष धर्म' न होने के ही कारण 'हेतु' नहीं है, क्योंकि वह्नि की अनुष्णता प्रत्यक्ष
से विरुद्ध है, एक प्रकार से सिद्ध वस्तु का दूसरे (विरुद्ध) रूप से साधन करना
सम्भव नहीं है, अतः प्रकरणसम और कालात्ययापदिष्ट इन दोनों हेत्वाभासों में
हेतु का 'यदनुमेयेन सम्बद्धम्' इस वाक्य के द्वारा निर्दिष्ट विशेषण ही नहीं है ।
अतः 'यदनुमेयेन सम्बद्धम्' इसके उपादान से ही प्रकरणसम और कालात्ययापदिष्ट
दोनों हेत्वाभासों में हेतु लक्षण की अतिव्याप्ति हट जाती है ।

  1. अभिप्राय यह है कि 'शब्दो नित्योऽनित्यधर्मानुपलब्धेः' एवं 'शब्दोऽनित्यो नित्यधर्मानुप-
    लब्धेः' इत्यादि प्रकरणसम के स्थल में नित्यत्वविशिष्ट शब्द और अनित्यत्वविशिष्ट शब्द ही
    'साध्य' है । शब्दरूप पक्ष का नित्यत्व या अनित्यत्व दो में से कोई एक ही स्वरूप सत्य हो
    सकता है, अर्थात् शब्द नित्य ही हो सकता है या अनित्य ही, वह नित्य और अनित्य दोनों
    नहीं हो सकता । चूँकि अनुमान के समय शब्द में नित्यत्व या अनित्यत्व कोई भी सिद्ध
    नहीं है, अतः नित्यधर्मानुपलब्धि या अनित्यधर्मानुपलब्धि इन दोनों में से कोई भी हेतु
    'अनुमेय' अर्थात् नित्यत्व या अनित्यत्वविशिष्ट शब्दरूप 'पक्ष' में विद्यमान नहीं है । अतः
    प्रकरणसम हेतु में हेतुत्व का प्रयोजक 'पक्षवृत्तित्व' रूप धर्म ही नहीं है । सुतराम्
    'अपक्षधर्म' होने के कारण ही प्रकरणसम 'असिद्ध' (स्वरूपासिद्ध) हेत्वाभास है, जिसकी
    सूचना 'यदनुमेयेन सम्बद्धम्' इस वाक्य से ही दे दी गयी है ।
    इसी प्रकार बाधित (कालात्ययापदिष्ट) हेतु भी 'असिद्ध' हेत्वाभास में ही अन्तर्भूत हो
    जाता है, क्योंकि 'वह्निरनुष्णो द्रव्यत्वात्' इत्यादि स्थलों में वह्नि में यद्यपि द्रव्यत्व है, किन्तु
    उसमें अनुष्णत्व के विरुद्ध उष्णत्व प्रत्यक्ष से सिद्ध है, अतः अनुष्णत्व बाधित है ।
    अनुष्णत्वविशिष्ट वह्निरूप पक्ष में द्रव्यत्व की सत्ता नहीं है, क्योंकि अनुष्णत्व विशिष्ट वह्नि
    नाम की कोई वस्तु ही नहीं है । इसकी भी सूचना 'यदनुमेयेन सम्बद्धम्' इसी वाक्य से दे
    दी गयी है ।
Page 451Permalink

४८६ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [गुणे अनुमान-
न्यायकन्दली
नन्वेवमप्यलक्षणमिदमव्यापकत्वात् । त्रिविधो हि हेतुः-अन्वयी, व्यतिरेकी,
अन्वयव्यतिरेकी चेति । तत्रान्वयी विशेषोऽभिधेयः, प्रमेयत्वात्, सामान्यवत् । अस्य हि
पक्षादन्यः सर्व एव सदसत्प्रभेदः सपक्षः, प्रमातृमात्रस्य प्रमाणमात्रापेक्षयाऽनभिधेयस्या-
प्रमेयस्याभावात् । यश्च पुरुषमात्रस्यानभिधेयोऽप्रमेयश्च, स वाजिविषाणवदसन्नेव, न वा
सपक्षो विपक्षो वा स स्यात्, निःस्वभावत्वात् । यश्च सत् स सर्वः सपक्ष एवेति तदभावे
च नास्त्येवेत्यव्यापकं लक्षणम्, व्यतिरेकाभावात् । अगमकमेव तदिति चेन्न, अन्वयाव्यभि-
चारात् । अन्यस्य सद्भावादन्यस्य सिद्धिरित्यत्रान्वयः कारणम्, तस्य तु व्यभिचार-
प्रतीतिरपवादिका । अस्ति तावत् प्रमेयत्वाभिधेयत्वयोरन्वयः, सर्वत्र प्रमेयेऽभिधेयत्वस्य
दर्शनात् । न च व्यभिचारो दृष्टो नापि शङ्कामारोहति, यं यं व्यतिरेकविषयं बुद्धिगोचरी-
(प्र.) प्रकरणसम और कालात्ययापदिष्ट हेत्वाभासों में अतिव्याप्ति के न होने
पर भी हेतु का यह लक्षण 'तदभावे च नास्त्येव' इस विशेषण के कारण
केवलान्वयि हेतु में अव्याप्त या अव्यापक ही है । अभिप्राय यह है कि (१) अन्वयी
(केवलान्वयी), (२) (केवल) व्यतिरेकी, एवं (३) अन्वयव्यतिरेकी भेद से हेतु
तीन प्रकार के हैं । इनमें 'विशेषोऽभिधेयः प्रमेयत्वात् सामान्यवत्' १ इस अनुमान
का हेतु अन्वयी (केवलान्वयी) है । इस अनुमान के पक्ष से अतिरिक्त जितने भी भाव
और अभाव पदार्थ हैं, वे सभी सपक्ष हैं, क्योंकि कोई भी ऐसी वस्तु नहीं है, जो
किसी प्रमाता पुरुष के द्वारा प्रमित नहीं है (अर्थात् प्रमेय नहीं है) और किसी
(शब्द) प्रमाण का अभिधेय नहीं है । जो न किसी प्रमाता पुरुष के द्वारा शब्द से
निर्दिष्ट होता है और न किसी प्रमाता पुरुष के द्वारा प्रमित ही होता है, वह घोड़े
के सींग की तरह सर्वथा असत् होने के कारण न सपक्ष ही हो सकता है, न विपक्ष
ही, क्योंकि असत् वस्तुओं का कोई स्वभाव नहीं होता । जितने भी पदार्थ 'सत्'
हैं, वे सभी इस अनुमान के सपक्ष ही हैं । अतः इस अनुमान में व्यतिरेक नहीं है,
अर्थात् कोई विपक्ष नहीं है । सुतराम् 'तदभावे च नास्त्येव' हेतु लक्षण का यह
अंश उक्त केवलान्वयी हेतु में नहीं रहने के कारण हेतु का उक्त लक्षण अव्याप्ति
से दुष्ट है । यदि यह कहें कि (प्र.) केवलान्वयी हेतु से अनुमान होता ही नहीं ।
(उ.) तो यह कहना सम्भव नहीं होगा, क्योंकि एक की सत्ता से दूसरे की जो सिद्धि
होती है, इसमें 'अन्वय' ही कारण है । चूँकि इस कार्यकारणभाव में कोई व्यभिचार
उपलब्ध नहीं है, (अतः 'केवलान्वयि-हेतु से अनुमिति नहीं होती' यह नहीं कहा जा
१. अनुमान प्रयोग का आशय है कि जिस प्रकार घटत्वादि जातियाँ प्रमेय होने के
कारण अभिधेय हैं, उसी प्रकार 'विशेष' अर्थात् घटादि व्यक्ति भी प्रमेय होने के कारण
अभिधेय हैं।

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४८७

Page 452Permalink

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४८७
न्यायकन्दली
करोति परस्य च वक्तुमिच्छति, तस्य सर्वस्य प्रमेयत्वाभिधेयत्वप्राप्तेः । न चास्ति विशेषो
विपक्षे सत्यव्यभिचारः कारणं न विपक्षाभावादिति । तेन प्रमेयत्वमभिधेयत्वं गमयति ।
व्यतिरेकी च सात्मकं जीवच्छरीरं प्राणादिमत्त्वादिति । अस्य पक्षादन्यः सर्व एव विपक्षः,
तथापि हेतुत्वं विपर्ययसम्बन्धाव्यभिचारात् । घटादिष्वप्राणादिमत्त्वेन निरात्मकत्वस्य
व्याप्तिरवगता, अप्राणादिमत्त्वस्य न जीवच्छरीरे निवृत्तिः प्रतीयते । तत्प्रतीत्या व्याप्तस्य
निरात्मकत्वस्य निवृत्त्यनुमानम् ।
अथ मन्यसे योऽर्थो नावगतस्तद्व्यतिरेकोऽपि न शक्यते प्रत्येतुम्, प्रतिषेधस्य
विधिविषयत्वात् । आत्मा च न क्वचिदवगतः, कथं तस्य घटादिभ्यो
सकता), क्योंकि व्यभिचार की प्रतीति ही अन्वयी हेतु से साध्य की अनुमिति होने
में बाधक है, सो प्रकृत में नहीं है । प्रमेयत्व और अभिधेयत्व दोनों में अन्वय या
सामानाधिकरण्य अवश्य है; क्योंकि सभी प्रमेयों में अभिधेयत्व की प्रतीति होती है।
इन दोनों में व्यभिचार (एक को छोड़कर दूसरे का रहना) कहीं नहीं देखा जाता।
एवं उन दोनों में कहीं व्यभिचार की शङ्का भी नहीं है, क्योंकि जो कोई भी स्थल
व्यभिचार के लिए कोई सोचेगा या दूसरे को कहना चाहेगा, उन सभी स्थलों में
अभिधेयत्व और प्रमेयत्व दोनों ही देखे जाते हैं (अतः इस अनुमान में कोई विपक्ष
है ही नहीं) । जिस प्रकार जिन सब स्थलों में विपक्ष प्रसिद्ध है, उन सब स्थलों में
यदि व्यभिचार नहीं है, तो वह हेतु अनुमिति का कारण होता है । उसी प्रकार
जिन सब स्थलों में विपक्ष की सत्ता ही नहीं है, उन सब स्थलों में भी यदि
व्यभिचार की उपलब्धि नहीं होती है, तो वह हेतु साध्य का साधक क्यों नहीं
होगा? क्योंकि दोनों स्थितियों में कोई तात्त्विक अन्तर नहीं है । अतः प्रमेयत्व
अवश्य ही अभिधेयत्व का ज्ञापक हेतु है । 'जीवच्छरीरं सात्मकं प्राणादिमत्त्वात्'
इस अनुमान का हेतु (केवल) व्यतिरेकी है, क्योंकि पक्ष को छोड़कर और सभी
पदार्थ इसके 'विपक्ष' हैं, फिर भी यह 'हेतु' है ही, क्योंकि (साध्य के) विपर्यय
(अर्थात् अभाव का हेत्वभाव के साथ) व्यभिचार नहीं हैं । (साध्य का
निरात्मकत्वरूप अभाव घटादि में है, उनमें हेतु का अप्राणादिमत्त्वरूप अभाव भी
अवश्य ही है, इस प्रकार) अप्राणादिमत्त्वरूप हेत्वभाव के साथ निरात्मकत्वरूप
साध्याभाव की व्याप्ति गृहीत है । इससे जीवित शरीर रूप (प्रकृत पक्ष में)
अप्राणादिमत्त्वरूप (हेत्वभाव की) निवृत्ति अर्थात् अभाव का बोध होता है ।
जीवित शरीर में (अप्राणादिमत्त्वाभाव की) इस प्रतीति से उसमें निरात्मकत्वरूप
साध्याभाव की निवृत्ति का अनुमान होता है ।
अगर यह समझते हों कि (प्र.) जिस वस्तु का ज्ञान नहीं होता है, उसके अभाव का
भी ज्ञान नहीं हो सकता, क्योंकि जिसकी कहीं सत्ता रहती है, उसी का कहीं प्रतिषेध भी

Page 453Permalink

४८८ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे अनुमान-
न्यायकन्दली
व्यावृत्तिप्रतीतिरिति । तदयुक्तम् । परस्य तावत् समस्तवस्तुविषयं नैरात्म्यमिच्छतो
घटादिभ्यः सिद्धैवात्मव्यावृत्तिः । स्वस्यापि जीवच्छरीरेष्वात्मनो बुद्ध्यादिभिः कार्यैः सह
कार्यकारणभावे सिद्धे घटादिभ्यो बुद्ध्यादिव्यावृत्त्या तदुत्पादनसमर्थस्य विशिष्टात्म-
सम्बन्धस्याभावसिद्धिः । यथा धूमाभावे क्वचित् तदुत्पादनयोग्यस्य वह्नेरभावसिद्धिः ।
यद्येवमात्मापि जीवच्छरीरेषु सिद्ध एव, सम्बन्धिप्रतीतिमन्तरेण सम्बन्धप्रतीतेरसम्भवात् ।
ततश्च व्यतिरेक्यनुमानवैय्यर्थ्यम्, निष्पादितक्रिये कर्मणि साधनस्य साधनन्यायातिपातात् ।
नैवम्, स्वसिद्धस्यात्मनः परं प्रतिसिद्धस्य साध्यत्वात् । न चान्वयाव्यभिचारः प्रतिपादको
न व्यतिरेकाव्यभिचार इत्यस्ति नियमहेतुः । तस्माद् व्यतिरेकिणोऽपि हेतुत्वात् तेन
हो सकता है । आत्मा कहीं पर ज्ञात नहीं है, अतः घटादि पदार्थों में भी उसके
अभाव की प्रतीति क्यों होगी ? (उ.) तो यह समझना भूल होगी, क्योंकि
(बौद्धादि) परमत के अनुसार भी तो घटादि में नैरात्म्य सिद्ध ही है, क्योंकि वे तो
सभी वस्तुओं में नैरात्म्य की अभिलाषा करते हैं । 'स्वमत' (वैशेषिकादिमत) में भी
जीवित शरीर में ही आत्मा का सम्बन्ध बुद्धि प्रभृति का कारण है, अतः
(अवच्छेदकत्व सम्बन्ध) से शरीर में बुद्ध्यादि कार्यों की उत्पत्ति होती है (मृत
शरीर एवं घटादि में नहीं), इस प्रकार आत्मा से सम्बद्ध जीवित शरीर और बुद्धि
प्रभृत्ति में कार्यकारण भाव की सिद्धि हो जाने पर घटादि में बुद्धि का अभाव
सिद्ध हो जाएगा, क्योंकि आत्मा का उक्त विशेष प्रकार का सम्बन्ध ही बुद्धि की
उत्पत्ति का कारण है, सो घटादि में नहीं है, अतः उसमें कथित सात्मकत्व भी नहीं
है । इस 'स्व' मत में भी निरात्मकत्वरूप साध्याभाव का ज्ञान सम्भावित है । जैसे
कि धूम के न रहने पर कहीं पर धूम को उत्पादन करनेवाले वह्नि के अभाव की
सिद्धि होती है । (प्र.) (जीवित शरीर में जिस सात्मकत्व की सिद्धि करना चाहते
हैं, वह सात्मकत्व आत्मा का सम्बन्ध ही है) सम्बन्ध का ज्ञान बिना प्रतियोगी और
अनुयोगी रूप दोनों सम्बन्धियों के ज्ञान के बिना सम्भव नहीं है । अतः जीवित
शरीर में आत्मा तो सिद्ध ही है । तस्मात् उक्त व्यतिरेकी अनुमान व्यर्थ है, क्योंकि
निष्पन्न कामों में साधन अपना साधनत्व छोड़ बैठता है (उ.) ऐसी बात नहीं है,
क्योंकि अपने मत से जीवित शरीर में आत्मा के सिद्ध रहने पर भी नास्तिकों के
मत में वह सिद्ध नहीं है । अतः परमत से असिद्ध आत्मा के सम्बन्ध का अनुमान
ही प्रकृत में व्यतिरेकी हेतु से किया गया है । यह नियम मान लेने में कोई युक्ति
नहीं है कि अन्वय का अव्यभिचार (अन्वयव्याप्ति) ही साध्य का ज्ञापक है और
व्यतिरेक का अव्यभिचार (व्यतिरेक) व्याप्ति नहीं। अतः (केवल) व्यतिरेकी भी
हेतु अवश्य है । तस्मात् 'प्रसिद्धञ्च तदन्विते' इत्यादि से कथित सपक्षवृत्तित्वरूप

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४८९

Page 454Permalink

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४८९
न्याय्कन्दली
प्रसिद्धं च तदन्विते इत्यव्यापकम् । अत्रैक समानतन्त्रप्रसिद्ध्या केवलान्वयिनः केवल-
व्यतिरेकिणश्च परिग्रह इति वदन्ति । अपरे तु व्यस्तसमस्तं लक्षणं वदन्ति । अनुमेयेन
सम्बद्धं प्रसिद्धं च तदन्वित इति अन्वयिनो लक्षणम् । अनुमेयेन सम्बद्धं तद्विपरीते च
नास्त्येवेति व्यतिरेकिण इति । समस्तं लक्षणमन्वयव्यतिरेकिण इति । साध्यसाधनत्वं
सामान्यलक्षणं त्रयाणाम् । यथा प्रमाणानां यथार्थपरिच्छेदकत्वं सामान्यलक्षणम् ।
विशेषण के न रहने से हेतु का प्रकृतलक्षण (केवल) व्यतिरेकी हेतु में अव्याप्त है ।
केवलान्वयि हेतु और केवलव्यतिरेकी हेतु इन दोनों में कथित अव्याप्ति का
समाधान कोई इस प्रकार करते हैं कि केवलान्वयि हेतु और केवलव्यतिरेकी हेतु
इन दोनों में हेतुत्व का व्यवहार समानतन्त्र (न्यायदर्शन) के अनुसार समझना
चाहिए । (सिद्धान्ततः वैशेषिक मत से वे दोनों हेतु नहीं हैं) ।
कोई (इन दोनों को वैशेषिक मत से भी हेतु मानते हुए) हेतु के लक्षणवाक्य
को सम्पूर्ण और खण्डशः दोनों प्रकार से लक्षण का बोधक मान कर उनमें
अव्याप्ति दोष का परिहार करते हैं । तदनुसार 'यदन्नुमेयेन सम्बद्धम्' इत्यादि
श्लोक से निम्नलिखित तीन लक्षणवाक्य निष्पन्न होते हैं
(१) यदनुमेयेन सम्बद्धं प्रसिद्धञ्च तदन्विते । (अर्थात् जो पक्ष और सपक्ष दोनों
में ही रहे, वही हेतु है) । हेतु का यह लक्षण (केवल) अन्वयी ('विशेषोऽभिधेयः
प्रमेयत्वात्' इस अनुमान के प्रमेयत्व) हेतु का है (अर्थात् हेतु के इस लक्षण में
'तदभावे च नास्त्येव' इस वाक्य से कथित विपक्षावृत्तित्व का प्रवेश नहीं है, अतः
केवलान्वयि स्थल में विपक्ष की अप्रसिद्धि से हेतु लक्षण की अव्याप्ति नहीं है) ।
(२) यदनुमेयेन सम्बद्धं तदभावे च नास्त्येव । अर्थात् पक्ष में रहे और विपक्ष
में न रहे वही 'हेतु' है । हेतु का यह लक्षण (केवल) व्यतिरेकी हेतु के लिए है ।
अतः 'जीवच्छरीरं सात्मकं प्राणादिमत्त्वात्' इत्यादि व्यतिरेकी हेतु में सपक्ष की
अप्रसिद्धि के कारण अव्याप्ति नहीं है । क्योंकि हेतु के इस लक्षण में 'प्रसिद्धञ्च
तदन्विते' इस वाक्य के द्वारा कथित 'सपक्षसत्त्व' का निवेश नहीं है) ।
(३) 'यदनुमेयेन सम्बद्धम्' इत्यादि संपूर्ण श्लोक के द्वारा कथित लक्षण
अन्वयव्यतिरेकी हेतु का है, क्योंकि इसमें पक्षसत्त्व, सपक्षसत्त्व, एवं विपक्षासत्त्व
हेतु के ये तीनों ही लक्षण विद्यमान रहते हैं ।
कथित तीनों हेतुओं में समान रूप से रहेवाला लक्षण यही है कि 'जो साध्य
का साधन करे, वही हेतु है' जैसे 'जो यथार्थ ज्ञान को उत्पन्न करे वही प्रमाण है'
यह सभी प्रमाणों का साधारण लक्षण है ।

Page 455Permalink

४९० न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे अनुमान-
प्रशस्तपादभाष्यम्
यत्तु यथोक्तात् त्रिरूपाल्लिङ्गादेकेन धर्मेण द्वाभ्यां वा विपरीतं
तदनुमेयस्याधिगमे लिङ्गं न भवतीति । एतदेवाह सूत्रकारः- "अप्रसिद्धोऽन-
पदेशोऽसन् सन्दिग्धश्च" (अ. ३ आ. १ सू. १५) इति ।
उक्त प्रकार से कहे गये (पक्षसत्त्व, सपक्षसत्त्व और विपक्षासत्त्व रूप
हेतुत्व के सम्पादक) तीनों धर्मों में से एक या दो धर्मों से रहित कोई
वस्तु साध्य की अनुमिति का नहीं (किन्तु हेत्वाभास) है । यही बात
(उनका हेत्वाभासत्व) सूत्रकार ने 'अप्रसिद्धोऽनपदेशोऽसन् सन्दिग्धश्च'
इस सूत्र के द्वारा कही है ।
न्यायकन्दली
विपरीतमतो यत् स्यादिति द्वितीयश्लोकार्थं विवृणोति-यत्त्विति । अनपदेश इति ।
अपदेशो हेतुर्न भवतीत्यपदेशोऽहेतुरित्यर्थः । अप्रसिद्ध इति विरुद्धासाधारणयोः परिग्रहः,
तयोः साध्यधर्मेण सह प्रसिद्धयभावोदहेतुत्वम् । असन्नित्यसिद्धस्यावरोधः, स हि सपक्षे
साध्यधर्मेण सह प्रसिद्धोऽपि धर्मिणि वृत्त्यभावादहेतुः । सन्दिग्धश्चेत्यनैकान्तिकाभिधा-
नम् । स हि धर्मिणि दृश्यमानः किं साध्यधर्मसहचरितः किं वा तद्रहित इति सन्दिग्धो
भवति, न पुनरेकं धर्ममुपस्थापयितुं शक्नोति । उभयथा दृष्टत्वादहेतुः ।
'यत्तु' इत्यादि से 'विपरीतमतो यत् स्यात्' इस दूसरे श्लोक की व्याख्या करते
हैं । कथित 'अप्रसिद्धोऽनपदेशोऽसन् सन्दिग्धश्च' इस सूत्र में प्रयुक्त 'अनपदेश'
शब्द का 'अपदेशो हेतुर्न भवति' इस व्युत्पत्ति के अनुसार 'अहेतु' (अर्थात्
हेत्वाभास) अर्थ है । उक्त सूत्र के 'अप्रसिद्ध' शब्द से विरुद्ध और असाधारण इन
दोनों को (हेत्वाभास के अन्तर्गत) समझना चाहिए । ये दोनों इस लिए अहेतु हैं
कि साध्यरूप धर्म के साथ इनकी 'प्रसिद्धि' नहीं है, अर्थात् निश्चय नहीं है,
फलतः सपक्षसत्त्व नहीं है । 'असन्' शब्द से 'असिद्ध' नाम का हेत्वाभास अभिप्रेत
है, क्योंकि असिद्ध हेत्वाभास सपक्ष में साध्य धर्म के साथ रहते हुए भी, अर्थात्
सपक्षवृत्ति होते हुए भी 'धर्मी' में अर्थात् पक्ष में ही नहीं रहता है, अतः वह हेतु
न होकर हेत्वाभास है । 'सन्दिग्धश्च' इस पद से 'अनैकान्तिक' को हेत्वाभास कहा
गया है । अनैकान्तिक यद्यपि पक्ष में देखा जाता है, किन्तु यह सन्देह बना ही
रहता है कि वह साध्य के साथ रहनेवाला है ? या साध्याभाव के साथ ? इसी
सन्देह के कारण यह साध्य या साध्याभाव रूप किसी एक धर्म को निश्चितरूप से
उपस्थित नहीं कर सकता, क्योंकि वह दोनों के साथ देखा जाता है, अतः वह
हेतु नहीं है ।
धर्मी (हेतु) में धर्म (साध्य) की अन्वयव्याप्ति एवं व्यतिरेकव्याप्ति इन दोनों
के रहने पर भी बोद्धा पुरुष को यदि 'यह हेतु इस साध्य से व्याप्त है' इस प्रकार

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४१९

Page 456Permalink

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४१९
प्रशस्तपादभाष्यम्
विधिस्तु यत्र धूमस्तत्राग्निरग्न्यभावे धूमोऽपि न भवतीत्येवं प्रसिद्धसमयस्या-
सन्दिग्धधूमदर्शनात् साहचर्यानुस्मरणात् तदनन्तरमग्न्यध्यवसायो भवतीति ।
(अनुमिति की उत्पत्ति की यह) रीति है कि 'जहाँ-जहाँ धूम है, उन
सभी स्थानों में वह्नि भी अवश्य ही है, एवं जहाँ-जहाँ अग्नि नहीं है,
उन सभी स्थानों में धूम भी नहीं है' इस प्रकार से 'समय' अर्थात्
व्याप्ति का निश्चय जिस पुरुष को है, उसी पुरुष को धूम के असन्दिग्ध
दर्शन अर्थात् निश्चय, और उसके बाद उत्पन्न धूम और वह्नि के
सामानाधिकरण्य (एक अधिकरण में रहने) के स्मरण के बाद अग्नि
का (अनुमिति रूप) निश्चयात्मक ज्ञान उत्पन्न होता है ।
न्यायकन्दली
इदमनेनाविनाभूतमिति ज्ञानं यस्य नास्ति तं प्रति धर्मिणि धर्मस्यान्यव्यतिरेक-
वतोऽपि लिङ्गत्वं न विद्यते, तदर्थमविनाभावस्मरणमनुमेयप्रतीतावङ्गमिति दर्शयति-
विधिस्त्विति ।
विधिस्तु अनुमेयप्रतीतिप्रकारस्तु, यत्र धूमस्तत्राग्निरग्न्यभावे धूमो न भवतीति ।
एवं प्रसिद्धसमयस्य प्रसिद्धाविनाभावस्य पुरुषस्यासन्दिग्धधूमदर्शनाद् धूम एवायम्, न
बाष्पादिकमिति ज्ञानात् साहचर्यानुस्मरणाद् यत्र धूमस्तत्राग्निरित्येवमनुस्मरणात्,
तदनन्तरमग्न्यनुमानं भवति । नन्वेवं द्वितीयो लिङ्गपरामर्शो न लभ्यते ? मा लब्धि, नहि
नस्तेन प्रयोजनम्, लिङ्गदर्शनव्याप्तिस्मरणाभ्यामेवानुमेयप्रतीत्युपपत्तेः । न च स्मृत्यनन्तर-
भावित्वादनुमेयप्रतीतेरनियतदिग्देशा स्यात् ? लिङ्गदर्शनस्य नियामकत्वात् । नाप्युपनय-
से 'अविनाभाव' रूप व्याप्ति का भान नहीं रहता है, तो फिर उस हेतु में उस
साध्य का हेतुत्व (अर्थात् ज्ञापकत्व) नहीं रहता है । अतः अविनाभाव (व्याप्ति)
का स्मरण भी अनुमेय की प्रतीति (अनुमिति) का सहकारिकारण है । यही बात
'विधिस्तु' इत्यादि सन्दर्भ से दिखलायी गयी है ।
'विधि' अर्थात् अनुमिति की उत्पत्ति की रीति यह है कि जहाँ धूम है, वहाँ अग्नि
है, एवं जहाँ अग्नि नहीं है, वहाँ धूम भी नहीं है' इस प्रकार से 'समय' अर्थात्
अविनाभाव (व्याप्ति) की प्रतीति जिस पुरुष को है, उसे जब धूम का 'असन्दिग्ध'
ज्ञान अर्थात् 'यह धूम ही है, बाष्पादि नहीं' इस आकार का ज्ञान होता है, तब
'साहचर्य के अनुस्मरण से' अर्थात् 'जहाँ धूम है वहाँ वह्नि है' इस प्रकार के
स्मरण के बाद अग्नि की अनुमिति होती है । (प्र.) यदि अनुमिति का यही क्रम
निर्धारित हो जाता है तो फिर 'द्वितीय लिङ्गपरामर्श' में (अर्थात् 'साध्यव्याप्ति-
विशिष्टहेतुमान् पक्षः' इस आकार के परामर्श में) अनुमिति की कारणता का लाभ
न होगा ? (उ.) न हो, क्योंकि व्याप्ति का स्मरण और पक्षधर्मता का ज्ञान, इन दोनों
से ही अनुमिति की उत्पत्ति हो जाएगी । (प्र.) अनुमिति यदि (व्याप्ति) स्मरण के
अव्यवहित उत्तर काल में ही उत्पन्न हो, तो फिर वह कब किस देश (पक्ष) में उत्पन्न
होगी, इसका कोई नियामक नहीं होगा ? (उ.) 'लिङ्गदर्शन' ही उसका नियामक होगा

Page 457Permalink

४९२ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे अनुमान-
न्यायकन्दली
वैयर्थ्यम्, अवयवान्तरैरप्रतिपादितस्य पक्षधर्मत्वस्य प्रतिपादनार्थं परार्थानुमानम्, तस्यो-
पन्यासात् ।
अपि भोः । कोऽयमविनाभावो नाम ? अव्यभिचारः । स कस्माद्भवति ? तादात्म्य-
तदुत्पत्तिभ्यामिति सौगताः । यादृच्छिकः सम्बन्धो यथैव भवति, न भवत्यपि, तथा च नियम-
हेतोरभावः । तत्र यदि नाम सपक्षे दर्शनमदर्शनं च विपक्षे, तथाप्यव्यभिचारो न शक्यते
ज्ञातुम्, विपक्षवृत्तिशङ्काया अनिवारणात् । तदुत्पत्तिविनिश्चये तु शङ्का निवार्यते, कारणेन
विना कार्यस्यात्मलाभासंभवात् । तदुत्पत्तिविनिश्चयोऽपि कार्यहेतुः पञ्चप्रत्यक्षोपलम्भानु-
पलम्भसाधनः । कार्यस्योत्पत्तेः प्रागनुपलम्भः, कारणोपलम्भे सत्युपलम्भः, उपलब्धस्य
(अर्थात् अनुमिति का पक्षधर्मताज्ञान रूप लिङ्गदर्शन) जिस पक्ष में होगा, अनुमिति
भी नियमतः उसी पक्ष में होगी । एवं उपनय रूप अवयव वाक्य के वैयर्थ्य की
आपत्ति भी नहीं होगी, क्योंकि पक्षधर्मता का प्रतिपादन अन्य अवयव वाक्यों से
सम्भव नहीं है, अतः पक्षधर्मता का प्रतिपादन करने के लिए ही उपनय वाक्य का
परार्थानुमान में प्रयोग होता है ।
(प्र.) यह 'अविनाभाव' क्या वस्तु है ? यदि यह कहें कि (उ.) अव्यभिचार
ही अविनाभाव है । (प्र.) तो फिर यह पूछना है कि यह अव्यभिचार किससे
(ज्ञात) होता है ?
इस प्रसङ्ग में बौद्धों का कहना है कि (१) तादात्म्य और (२) कार्य की
उत्पत्ति इन दोनों से ही अव्यभिचार (व्याप्ति) गृहीत होती है । (१) (तदुत्पत्ति-
मूलक व्याप्ति के मानने में यह युक्ति है कि) दो वस्तुओं का आकस्मिक
(यादृच्छिक) सम्बन्ध जिस प्रकार कभी होता है, उसी प्रकार कभी नहीं भी होता
है । अतः यह सम्बन्ध व्याप्ति का नियामक नहीं हो सकता । (२) यदि उसी हेतु
में साध्य की व्याप्ति मानें, जिसकी प्रतीति सपक्ष (दृष्टान्त) में हो और विपक्ष में
उसकी प्रतीति न हो, तो यह भी सम्भव नहीं होगा, क्योंकि इस (सपक्षदर्शन और
विपक्षादर्शन) के बाद भी हेतु के विपक्ष में होने की सम्भावना का निराकरण नहीं
हो सकता । किन्तु जब यह निश्चय हो जाता है कि 'इस हेतु की उत्पत्ति उस
साध्य से हुई है' तो फिर उक्त शङ्का, (सम्भावना) का निराकरण हो जाता है,
क्योंकि कारण के बिना कार्य की स्वरूपस्थिति ही नहीं हो सकती । 'हेतुरूप कार्य
साध्यरूप कारण से उत्पन्न होता है' इस प्रकार का निर्णय रूप 'तदुत्पत्ति
विनिश्चय' प्रत्यक्ष रूप उपलम्भ और अनुपलम्भ को मिला कर पाँच कारणों से
उत्पन्न होता है । (इनमें तीन कार्य सम्बन्धी हैं) । (१) उत्पत्ति से पहिले कार्य की
अनुपलब्धि, (२) कारण के उपलब्ध होने पर कार्य की उपलब्धि, एवं (३) उपलब्ध

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४१३

Page 458Permalink

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४१३
न्यायकन्दली
पश्चात् कारणानुपलम्भादनुपलम्भ इति कार्यस्य द्वावनुपलम्भावेक उपलम्भः, कारणस्य
चोपलम्भानुपलम्भाविति । एवमुपलम्भानुपलम्भैः पञ्चभिः सत्येवाग्नौ धूमस्य भावोऽसत्य-
भाव इति निश्चीयते । कार्यस्यैतदेव कार्यत्वं यत् तस्मिन् सत्येव भावोऽसत्यभाव
इति तादात्म्यप्रतीत्याप्यविनाभावो निश्चीयते । भावस्य न स्वभावव्यभिचारः,
निःस्वभावत्वप्रसङ्गात् ।
तादात्म्यनिश्चयो विपक्षे बाधकस्य प्रमाणप्रवृत्त्या सिद्ध्यति । अप्रवृत्ते तु बाधके
शतशः सहभावदर्शनेऽपि कदाचिदेतद्विपक्षे स्यादिति शङ्कायाः को निवारयिता प्रभवति ?
तदुक्तम्-
कार्यकारणभावाद् वा स्वभावाद् वा नियामकात् ।
अविनाभावनियमोऽदर्शनान्न तु दर्शनात् ॥ इति ।
कार्यकारणभावाभ्यामकात् स्वभावाद् वा नियामकादविनाभावनियमः, न सपक्षे
दर्शनाद् विपक्षे चादर्शनादिति ।
होने के बाद भी कारण की अनुपलब्धि से कार्य की (पुनः) अनुपलब्धि, इस
प्रकार कार्य का एक उपलम्भ और दो अनुपलम्भ ये तीन होते हैं । एवं कारण
का (१) उपलम्भ और (२) कारण का अनुपलम्भ ये दो हैं । इन उपलम्भों और
अनुपलम्भों को मिलाकर इन्हीं पाँच कारणों के रहने पर यह निश्चय होता है कि
वह्नि के रहने से ही धूम की सत्ता है, और वह्नि के न रहने से धूम की सत्ता नहीं
रहती है । कोई भी वस्तु 'कार्य' नाम से इसीलिए अभिहित होती है कि कारण के
रहने से ही उसकी सत्ता होती है, और कारण के न रहने से उसकी सत्ता नहीं
रहती है (अर्थात् 'कार्य' वही है जिसकी सत्ता कारण की सत्ता के अधीन हो,
और कारण की सत्ता न रहने पर जो सत्ता का लाभ न कर सके) हेतु में साध्य
की तादात्म्य प्रतीति से भी अविनाभाव (या व्याप्ति) का निश्चय होता है । यह
नहीं हो सकता कि वस्तुओं का स्वभाव उनमें कभी रहे और कभी नहीं, ऐसा
मानने पर तो वस्तुओं का कोई स्वभाव ही नहीं रह जाएगा । जिस धर्म के बिना
भी धर्मी रह सके, वह धर्म उस धर्मी का 'स्वभाव' कैसे होगा ? विपक्ष में
बाधकप्रमाण की प्रवृत्ति से ही हेतु में साध्य का तादात्म्य निश्चित होता है । यदि
विपक्ष में बाधक प्रमाण की प्रवृत्ति न हो, तो फिर सैकड़ों स्थानों में साध्य और
हेतु दोनों को साथ देखने पर भी 'जहाँ साध्य नहीं है, वहाँ भी यह हेतु कभी रह
सकता है' इस शङ्का का निवारण कौन करेगा ?
यही बात 'कार्यकारणभावाद्वा' इत्यादि श्लोक के द्वारा इस प्रकार कही गयी
है कि कार्यकारणभावरूप नियामक और स्वभाव (तादात्म्य) रूप नियामक इन
दोनों से ही अविनाभाव का निश्चय होता है, हेतु का सपक्ष में दर्शन और विपक्ष
में अदर्शन से (अविनाभाव का निश्चय नहीं होता है ) ।

Page 459Permalink

४१४ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे अनुमान-
न्यायकन्दली
अत्रोच्यते-किं यत्र तादात्म्यतदुत्पत्ती तत्राव्यभिचारः ? किं वा यत्राव्यभिचारस्तत्र
तादात्म्यतदुत्पत्ती ? न तावदाद्यः कल्पः, सत्यपि तदुत्पादे धूमधर्मस्य पार्थिवत्वादेरग्निब्यभि-
चारात् । सत्यपि तादात्म्ये वृक्षत्वस्य विशेषाद् व्यभिचारात् । अथ
यत्राव्यभिचारस्तत्र तादात्म्यतदुत्पत्ती, तर्ह्यव्यभिचारस्तत्त्वे तयोर्गमकत्वम् । एवं चेत्,
अव्यभिचार एवास्तु गमकः, किं तादात्म्यतदुत्पत्तिभ्याम् ? कार्यमपि हि न कार्यमित्येव
गमयतीति, नापि स्वभावः स्वभाव इति, किं तर्हि ? तदव्यभिचारीति, अव्यभिचार एव
गमकत्वे कारणं न तादात्म्यतदुत्पत्ती, व्यभिचारात् । न चैवमुपपत्तिमारोहति धूमो
वह्निना क्रियते न पार्थिवत्वादयस्तद्धर्मा इति, वस्तुनो निर्भागत्वात् । नान्ये तदुपलब्धं
शिंशपा वृक्षात्मिका न वृक्षः शिंशपात्मकः, धवखदिरादिसाधारणत्वादिति, तयोर्भेदात् ।
इस प्रसङ्ग में हम (वैशेषिक) लोग पूछते हैं कि (१) क्या जिस साध्य का
तादात्म्य जिस हेतु में रहता है, उसी हेतु में उस साध्य का अव्यभिचार (व्याप्ति)
रहता है ? एवं जिस साध्य से जिस हेतु की उत्पत्ति होती है, उसी हेतु में उस साध्य
का अव्यभिचार (व्याप्ति) रहता है ? (२) अथवा जिस हेतु में साध्य की व्याप्ति
रहती है, उसी हेतु में उस साध्य का तादात्म्य या जन्यत्व रहता है ? इन दोनों में
प्रथम कल्प इसलिए ठीक नहीं है कि वह्नि से धूम की उत्पत्ति होने पर भी धूम के
पार्थिवत्वादि धर्मों के साथ वह्नि का व्यभिचार है (अतः पार्थिवत्वादि धर्म से
अभिन्न धूम के साथ वह्नि का व्यभिचार भी है ही, क्योंकि धर्म और धर्मी आपके
मत से एक हैं) । एवं ('वृक्षः शिंशपायाः' इत्यादि स्थलों में) शिंशपा में यद्यपि वृक्ष
का तादात्म्य है, फिर भी वृक्षत्व में 'विशेष' का अर्थात् शिंशपा का व्यभिचार है
(क्योंकि विल्वादि वृक्ष होने पर भी शिंशपा नहीं है ।) यदि उसका यह अर्थ करें
कि जिस हेतु में साध्य का अव्यभिचार है, वहाँ साध्य निरूपित उत्पत्ति (साध्य
रूप कारण जन्यत्व) या साध्य का तादात्म्य अवश्य है । तो फिर इसका अभिप्राय
यह हुआ कि हेतु में साध्य के अव्यभिचार के रहने के कारण ही उस हेतु में
रहनेवाले साध्य के तादात्म्य या साध्यरूप कारणजन्यत्व दोनों में साध्य की
ज्ञापकता है । यदि यह स्थिति है तो फिर अव्यभिचार को ही साध्य का ज्ञापक
मानिए ? साध्य के तादात्म्य या उत्पत्ति को इन सबों के बीच लाने का क्या प्रयोजन
है ? क्योंकि हेतु साध्य से उत्पन्न होता है या साध्य से अभिन्न है, इन दोनों में से
किसी भी कारण से हेतु में साध्य की ज्ञापकता नहीं है, किन्तु हेतु इसलिए साध्य
का ज्ञापक है कि उसमें साध्य का अव्यभिचार है । (प्र.) धूम की उत्पत्ति तो वह्नि से
होती है; किन्तु धूम के पार्थिवत्वादि धर्म तो वह्नि से उत्पन्न नहीं होते । (उ.) यह
कहना भी ठीक नहीं है, क्योंकि वस्तु का एक ही स्वरूप होता है (अतः धूम को यदि