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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

by महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद

Source: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished759 pages

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४०३

Page 368Permalink

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४०३
प्रशस्तपादभाष्यम्
काले दिक्पिण्डसंयोगविनाशाद् गुणस्य विनाशः ।
द्रव्यविनाशादपि कथम् परत्वाधारावयवे कर्मोत्पन्नं यस्मिन्नेव
कालेऽवयवान्तराद्विभागं करोति, तस्मिन्नेव कालेऽपेक्षा-
भूत द्रव्य इन दोनों के) संयोग के विनाश से परत्वादि गुणों का विनाश
होता है ।
३. (प्र.) (आधारभूत) द्रव्य के विनाश से (परत्वादि गुणों का)
विनाश किस प्रकार (किस स्थिति में) होता है ? (उ.) (जहाँ)
परत्वादिगुणों के आधारभूत द्रव्य (के एक अवयव) में उत्पन्न हुई क्रिया
जिस समय एक अवयव का दूसरे अवयव से विभाग को उत्पन्न करती है,
न्यायकन्दली
बुद्धेश्च परत्वस्योत्पत्तिरित्येकः कालः । तत उत्पन्ने परत्वे परत्वसामान्यबुद्धेरुत्पत्तिः
दिक्पिण्डसंयोगस्य च विभागाद् विनाश इत्येकः कालः । ततो यस्मिन्नेव काले
सामान्यज्ञानाद् गुणबुद्धिरुत्पद्यते तस्मिन्नेव काले दिक्पिण्डसंयोगविनाशात् परत्वस्य विनाशो
नापेक्षाबुद्धिविनाशात्, अपेक्षाबुद्धेरपि तदानीमेव विनाशात् ।
द्रव्यविनाशादपि कथं विनाश इत्याह-परत्वाधारावयव इति । भविष्यतः
परत्वस्याधारो द्रव्यम्, तस्यावयवे कर्मोत्पन्नं यदाऽवयवान्तराद् विभागं करोति,
तस्मिन्नेव कालेऽपेक्षाबुद्धिरुत्पद्यते ततो विभागाद् यस्मिन्नेव काले
द्रव्यारम्भकसंयोगविनाशः, तस्मिन्नेव कालेऽपेक्षाबुद्धेः परत्वमुत्पद्यते । ततः
एवं अपेक्षाबुद्धि के द्वारा परत्व की उत्पत्ति होती है । इतने सारे काम एक ही
समय होते हैं । इसके बाद जिस समय (परत्वगत जातिरूप) सामान्य के ज्ञान से
गुणविशिष्टद्रव्य विषयक बुद्धि की उत्पत्ति होती है, उसी समय दिशा और
(परत्व के आधारभूत द्रव्य रूप) पिण्ड इन दोनों के संयोग के विनाश से परत्व
का भी विनाश होता है । (यहाँ) परत्व का विनाश अपेक्षाबुद्धि के विनाश से
सम्भव नहीं है, क्योंकि उसी समय (परत्वनाश के समय ही) अपेक्षाबुद्धि का भी
विनाश होता है ।
(३) (आधारभूत) द्रव्य के विनाश से परत्वादि का विनाश किस प्रकार होता है ?
इस प्रश्न का उत्तर 'परत्वाधारावयवे' इत्यादि ग्रन्थ से दिया गया है । उत्पन्न होनेवाले
परत्व के आधारभूत अवयवि द्रव्य ही (प्रकृत में 'परत्वाधार' शब्द से इष्ट है) इस (द्रव्य)
के अवयव में उत्पन्न हुई क्रिया जिस समय (अपने आधारभूत एक अवयव द्रव्य
का) दूसरे अवयव से विभाग को उत्पन्न करती है, उसी समय अपेक्षाबुद्धि भी उत्पन्न
होती है । इसके बाद जिस समय विभाग से द्रव्य के उत्पादक संयोग का विनाश

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४०४ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे परत्वापरत्व-
प्रशस्तपादभाष्यम्
बुद्धिरुत्पद्यते । ततो विभागाद् यस्मिन्नेव काले संयोगविनाशः, तस्मिन्नेव काले
परत्वमुत्पद्यते । ततः संयोगविनाशाद् द्रव्यविनाशः, तद्विनाशाच्च तदाश्रितस्य
गुणस्य विनाशः ।
द्रव्यापेक्षाबुद्ध्योर्युगपद्विनाशादपि कथम् ? यदा परत्वाधारावयवे
इसके बाद जिस समय उक्त विभाग के द्वारा परत्वादि के आधारभूत
द्रव्य के उत्पादक दोनों अवयवों के संयोग का नाश होता है, उसी समय
परत्वादि गुणों की उत्पत्ति भी होती है । इसके बाद (उक्त) संयोग के
विनाश से (परत्वादि के आधारभूत) द्रव्य का नाश होता है, एवं द्रव्य
के विनाश से उसमें रहनेवाले परत्वादि गुणों का भी नाश हो जाता है ।
४. एक ही समय (परत्वादि के आधारभूत) द्रव्य और अपेक्षाबुद्धि
इन दोनों के विनाश से परत्वादि गुणों का विनाश (कहाँ और किस
न्यायकन्दली
संयोगविनाशाद् द्रव्यविनाशः । ततो द्रव्यविनाशात् तदाश्रितस्य गुणस्य विनाशः ।
तदानीमेव परत्वसामान्यज्ञानादपेक्षाबुद्धेर्विनाशः, आश्रयविनाशाच्च दिक्पिण्डसंयोगविनाश
इत्यनयोर्न हेतुत्वं सहभावित्वात् ।
द्रव्यापेक्षाबुद्ध्योर्युगपद्विनाशादपि कथम् । यदैव परत्वाधारावयवे
कर्मोत्पद्यते, तदैवापेक्षाबुद्धिरुत्पद्यते । कर्मणा चावयवान्तराद्विभागः क्रियते, परत्व-
स्योत्पत्तिरित्येकः कालः । ततो यस्मिन्नेव कालेऽवयवविभागाद् द्रव्यारम्भक-
होता है, उसी समय अपेक्षाबुद्धि के द्वारा परत्व की भी उत्पत्ति होती है । इसके बाद
उक्त संयोग के विनाश से (अवयवि) द्रव्य का विनाश होता है । चूँकि परत्वगुण में
रहनेवाले सामान्य के ज्ञान से अपेक्षा बुद्धि का विनाश एवं (उक्त अवयवी रूप)
आश्रय के विनाश से दिशा और पिण्ड के संयोग का विनाश, ये दोनों भी उसी
समय उत्पन्न होते हैं, अतः (परत्व के विनाशक रूप में कथित होने पर भी) ये
दोनों प्रकृत में परत्वादि के विनाशक नहीं हो सकते ।
(४) एक ही समय उत्पन्न होनेवाले द्रव्य का विनाश, और अपेक्षा बुद्धि का
विनाश इन दोनों से किस प्रकार परत्वादि का विनाश होता है ? 'द्रव्यापेक्षाबुद्ध्योः'
इत्यादि से इस प्रश्न का उपपादन किया गया है, एवं 'यदैव परत्वाधारावयवे'
इत्यादि से उसके समाधान का उपपादन हुआ है । (जहाँ) जिस समय परत्व के

प्रकरणम्] भाषाानुवादसहितम् ४०५

Page 370Permalink

प्रकरणम्] भाषाानुवादसहितम् ४०५
प्रशस्तपादभाष्यम्
कर्मोत्पद्यते तदैवापेक्षाबुद्धिरुत्पद्यते । कर्मणा चावयवान्तराद्विभागः
क्रियते, परत्वस्योत्पत्तिरित्येकः कालः । ततो यस्मिन्नेव कालेऽवयव-
विभागाद् द्रव्यारम्भकसंयोगविनाशस्तस्मिन्नेव काले सामान्यबुद्धि-
रुत्पद्यते, तदनन्तरं संयोगविनाशाद् द्रव्यविनाशः, सामान्य-
क्रिया) और अपेक्षाबुद्धि दोनों एक ही समय उत्पन्न होती हैं, एवं क्रिया उसी
समय दोनों अवयवों में विभाग को उत्पन्न करती है, एवं (अपेक्षाबुद्धि) परत्वादि
गुणों को उत्पन्न करती है । इतने सारे काम एक ही समय होते हैं ।
इसके बाद जिस समय उक्त विभाग से द्रव्य के उत्पादक संयोग का
विनाश होता है, उसी समय (परत्वादिगुणों में रहनेवाली) सामान्य (जाति)
विषयक बुद्धि भी उत्पन्न होती है । इसके बाद (उक्त संयोग के नाश से)
न्यायकन्दली
संयोगविनाशः, तस्मिन्नेव काले परत्वसामान्यज्ञानमुत्पद्यते । तदनन्तरं संयोगविनाशाद्
द्रव्यविनाशः, सामान्यबुद्धेश्चापेक्षाबुद्धेरपि विनाश इत्येकः कालः । ततो द्रव्यापेक्षा-
बुद्धयोर्विनाशात् परत्वस्य विनाशः, प्रत्येकमनयोर्भयोरपि विनाशं प्रति कारणत्वप्रतीतेः ।
इह चान्यतरविशेषानवधारणादुभयोरपि विनाशं प्रति कारणत्वम् ।
आधारभूत द्रव्य के अवयव में क्रिया उत्पन्न होती है, उसी समय क्रिया से उसके
आधारभूत अवयव द्रव्य का दूसरे अवयव से विभाग उत्पन्न होता है, एवं (उक्त
अवयवी द्रव्य में) परत्व की भी उत्पत्ति होती है । इतने सारे काम एक ही समय
होते हैं । इसके बाद जिस समय अवयवों के विभाग से द्रव्य (अवयवि) के
उत्पादक संयोग का विनाश होता है, उसी समय परत्व (में रहनेवाले) सामान्य का
ज्ञान भी उत्पन्न होता है । इसके बाद (अवयवों के) संयोग के विनाश से द्रव्य का
विनाश होता है, एवं कथित सामान्य विषयक ज्ञान से अपेक्षा बुद्धि का भी विनाश
होता है । इतने सारे काम एक ही समय होते हैं । इसके बाद परत्व का विनाश
होता है, वह द्रव्य विनाश और अपेक्षाबुद्धि का विनाश, इन दोनों से ही होता
है; क्योंकि इन दोनों में से प्रत्येक में परत्व विनाश की कारणता स्वीकृत हो चुकी
है । एवं दोनों में से किसी एक में किसी विशिष्टता की प्रतीति नहीं होती, जिससे
कि किसी एक को ही कारण मानें दूसरे को नहीं, अतः (समानयुक्ति रहने के
कारण) दोनों को ही परत्व-विनाश का कारण मानना पड़ता है ।

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४०६ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे परत्वापरत्व-
प्रशस्तपादभाष्यम्
बुद्धेश्चापेक्षाबुद्धिर्विनाश इत्येकः कालः । ततो द्रव्यापेक्षाबुद्ध्योर्विनाशात्
परत्वस्य विनाशः ।
द्रव्यसंयोगविनाशादपि कथम् ? यदा परत्वाधारावयवे कर्मोत्पन्न-
मवयवान्तराद्विभागं करोति, तस्मिन्नेव काले पिण्डकर्मापेक्षाबुद्ध्योर्युग-
पदुत्पत्तिः । ततो यस्मिन्नेव काले परत्वस्योत्पत्तिस्तस्मिन्नेव काले विभा-
द्रव्य का नाश एवं उक्त सामान्यविषयक बुद्धि और अपेक्षाबुद्धि इन
दोनों का भी नाश होता है । इसके बाद उक्त द्रव्यनाश और अपेक्षा-
बुद्धि का विनाश इन दोनों से परत्वादि गुणों का विनाश होता है ।
(५) (प्र.) द्रव्यनाश और संयोगनाश इन दोनों से परत्वादि गुणों
का विनाश (कहाँ और) किस स्थिति में होता है ? (उ.) (जहाँ) जिस समय
परत्वादि के आधारभूत द्रव्यके अवयवमें उत्पन्न क्रिया उसके दूसरे अवयव
से विभाग को उत्पन्न करती है, उसी समय परत्वादि के आधारभूत (अवयवि)
द्रव्य में भी क्रिया एवं अपेक्षाबुद्धि दोनों की उत्पत्ति पहिले की तरह होती
है, इसके बाद जिस समय परत्वादि गुणों की उत्पत्ति होती है, उसी
न्यायकन्दली
द्रव्यसंयोगविनाशादपीत्यादि । द्रव्यसंयोगविनाशादपि कथंम् विनाशः ? यदा परत्वा-
धारावयवे कर्मोत्पन्नमवयवान्तराद्विभागं करोति, तस्मिन्नेव काले पिण्डकर्मापेक्षाबुद्ध्योर्युग-
पदुत्पत्तिः । ततो यस्मिन्नेव काले परत्वस्योत्पत्तिस्तस्मिन्नेव कालेऽवयवविभागाद् द्रव्या-
रम्भकसंयोगविनाशः, पिण्डकर्मणा च दिक्पिण्डस्य च विभागः क्रियत इत्येकः कालः ।
ततो यस्मिन्नेव काले सामान्यबुद्धिरुत्पद्यते, तस्मिन्नेव काले द्रव्यारम्भकसंयोगविनाशात् पिण्ड-
(५) 'द्रव्यसंयोगादवि' इत्यादि भाष्यग्रन्थ के द्वारा यह प्रश्न किया गया है कि द्रव्य
का विनाश और संयोग का विनाश इन दोनों से परत्वादि का विनाश कैसे होता
है ? (उ.) (जहाँ) जिस समय परत्वादि के आधारभूत अवयव में कर्म उत्पन्न होकर
अपने आश्रयरूप अवयव का दूसरे अवयवों से विभाग को उत्पन्न करता है, उसी
समय एक साथ ही अवयवी में क्रिया और अपेक्षाबुद्धि इन दोनों की उत्पत्ति
होती है । इसके बाद जिस समय परत्व की उत्पत्ति होती है, उसी समय अवयवों के
विभाग से द्रव्य के उत्पादक संयोग का भी विनाश होता है । एवं अवयवी की क्रिया
के द्वारा दिशा से अवयवी का विभाग भी उत्पन्न होता है। इतने सारे काम एक ही समय
होते हैं । इसके बाद जिस समय (परत्व गुण में रहनेवाले) सामान्य का ज्ञान होता है, उसी
समय द्रव्य के उत्पादक संयोग के विनाश से अवयवी का विनाश भी उत्पन्न होता है ।

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४०७

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प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४०७
प्रशस्तपादभाष्यम्
गाद् द्रव्यारम्भकसंयोगविनाशः, पिण्डकर्मणा दिक्पिण्डस्य च विभागः
क्रियत इत्येकः कालः । ततो यस्मिन्नेव काले सामान्यबुद्धिरुत्पद्यते,
तस्मिन्नेव काले द्रव्यारम्भकसंयोगविनाशात् पिण्डविनाशः, पिण्ड-
समय विभाग से द्रव्य के उत्पादक संयोग का नाश, और (उक्त अवयवि-
रूप) पिण्ड की क्रिया से पिण्ड का पूर्वदिक्प्रदेश से विभाग, ये दोनों
काम एक ही समय होते हैं । इसके बाद जिस समय सामान्य विषयक बुद्धि
उत्पन्न होती है, उसी समय (अवयवि) द्रव्य के उत्पादक संयोग के विनाश
से (परत्वादि के आधारभूत अवयवि) पिण्डद्रव्य का विनाश, और पिण्ड के
विनाश से (पूर्वदिक् प्रदेश के साथ) पिण्डसंयोग का विनाश भी होता
न्यायकन्दली
विनाशः, पिण्डविनाशाच्च पिण्डसंयोगविनाशः, ततो गुणबुद्धिसमकालं पिण्डदिक्पिण्ड-
संयोगविनाशात् परत्वस्य विनाशः । अपेक्षाबुद्धिविनाशास्तु न कारणम्, तदानीमेव
सामान्यबुद्धेस्तस्य सम्भवात् ।
संयोगापेक्षाबुद्धयोर्युगपद्विनाशादपि कथम् । यदा परत्वमुत्पद्यते तदा
परत्वस्याधारे द्रव्ये कर्म, ततो यस्मिन्नेव काले परत्वसामान्यबुद्धिरुत्पद्यते
परत्वस्याधारे तस्मिन्नेव काले पिण्डकर्मणा दिक्पिण्डविभागः क्रियते । ततः
सामान्यबुद्धितोऽपेक्षाबुद्धिविनाशो दिक्पिण्डविभागाच्च दिक्पिण्डसंयोग-
एवं अवयवी के विनाश से उसमें रहनेवाले संयोग का भी विनाश होता जाता है ।
इसके बाद जिस समय परत्व गुण (विशिष्टद्रव्य) की बुद्धि उत्पन्न होती है, उसी
समय परत्व का विनाश भी होता है । अपेक्षाबुद्धि का विनाश यहाँ परत्व के
विनाश का कारण नहीं हो सकता, क्योंकि परत्व के विनाश के काल में ही परत्व
में रहनेवाले सामान्य के ज्ञान से वह उत्पन्न होती है ।
(६) (प्र.) एक ही समय संयोग और अपेक्षाबुद्धि दोनों के विनाश से परत्व
का विनाश किस प्रकार होता है ? (उ.) (इस प्रकार होता है कि) जिस समय
परत्व उत्पन्न होता है उसी समय परत्व के आधारभूत द्रव्य में क्रिया भी उत्पन्न
होती है । इसके बाद जिस समय परत्व में रहनेवाले सामान्य का ज्ञान उत्पन्न होता
है, उसी समय परत्व के आधार भूत द्रव्य में उसी में रहनेवाली क्रिया से दिशा के साथ
उसका विभाग भी उत्पन्न होता है । इसके बाद परत्व में रहनेवाले सामान्य विषयक
बुद्धि के विनाश से अपेक्षाबुद्धि का विनाश उत्पन्न होता है, एवं दिशा और (परत्व के

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४०८ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे परत्वापरत्व-
प्रशस्तपादभाष्यम्
विनाशाच्च पिण्डसंयोगविनाशः । ततो गुणबुद्धि समकालं पिण्डदिक्पिण्ड-
संयोगाविनाशात् परत्वस्य विनाशः ।
संयोगापेक्षाबुद्धयोर्युगपद्विनाशादपि कथम् ? यदा परत्वमुत्पद्यते, तदा
परत्वाधारे कर्म, ततो यस्मिन्नेव काले परत्वसामान्यबुद्धिरुत्पद्यते,
तस्मिन्नेव काले पिण्डकर्मणा दिक्पिण्डविभागः क्रियते, ततः सामान्य-
है । इसके बाद (परत्वादि) गुणविषयक बुद्धि की उत्पत्ति के समय
(परत्वादि के आधारभूत) पिण्ड के नाश और पिण्ड का (पूर्वदिक् प्रदेश
के साथ) संयोग के नाश, इन दोनों से परत्वादि गुणों का विनाश होता है ।
(६) एक ही समय संयोग और अपेक्षाबुद्धि दोनों के विनाश से
(कहाँ और) किस स्थिति में परत्वादिगुणों का विनाश होता है ? (उ.)
(जहाँ) जिस समय परत्वादि की उत्पत्ति होती है, उसी समय उनके
आधारभूत द्रव्यों में क्रिया भी उत्पन्न होती है । इसके बाद जिस समय
परत्वादि गुणों में रहनेवाले (परत्वादि) सामान्यविषयक बुद्धि उत्पन्न
होती है, उसी समय पिण्ड (द्रव्य) की क्रिया से पूर्वदिक्प्रदेश के साथ
पिण्ड (द्रव्य) का विभाग भी उत्पन्न होता है । इसके बाद उक्त
सामान्यविषयक ज्ञान से अपेक्षाबुद्धि का विनाश और उक्त विभाग से
पूर्वदिक्प्रदेश के साथ पिण्ड के संयोग का विनाश इतने कार्य एक समय
में होते हैं । इसके बाद उक्त संयोगनाश और अपेक्षाबुद्धि का विनाश
इन दोनों से परत्वादि गुणों का विनाश होता है ।
न्यायकन्दली
विनाश इत्येकः कालः । ततः संयोगापेक्षाबुद्धिविनाशात् परत्वस्य विनाशः ।
द्रव्यविनाशस्तु तदानीं नास्त्येवेति न तस्य हेतुत्वम् ।
त्रयाणां समवाय्यसमवायिनिमित्तकारणानां विनाशादपि कथम् ?
आधारभूत) द्रव्य के विभाग से उन दोनों के संयोग का नाश होता है । इतने सारे
काम एक ही समय होते हैं । इसके बाद कथित (दिक्पिण्ड) संयोग और
अपेक्षाबुद्धि इन दोनों के विनाश से परत्व विनाश होता है । उस समय द्रव्य का
विनाश नहीं है, अतः वह (उस समय के परत्व विनाश का) कारण नहीं हो सकता ।
(७) 'त्रयाणाम्' इत्यादि वाक्य के द्वारा (समवायि चासमवायि च निमित्तञ्च समवाय्य-
समवायिनिमित्तानि, तानि च कारणानि चेति समवाय्यसमवायिनिमित्तकारणानि) इस
विग्रह के अनुसार यह प्रश्न किया गया है कि द्रव्य या रूप समवायिकारण, दिक्पिण्ड

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४०९

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प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४०९
प्रशस्तपादभाष्यम्
बुद्धितोऽपेक्षाबुद्धिविनाशः, विभागाच्च दिक्पिण्डसंयोगविनाश इत्येकः कालः ।
ततः संयोगविनाशात् परत्वस्य विनाशः। त्रयाणां समवाय्यसमवायिनिमित्तकारणानां
युगपद्विनाशादपि कथम् ? यदापेक्षाबुद्धिरुत्पद्यते, तदा पिण्डावयवे कर्म, ततो
यस्मिन्नेव काले कर्मणाऽवयवान्तराद्विभागः क्रियतेऽपेक्षाबुद्धेः परत्वस्य
चोत्पत्तिस्तस्मिन्नेव काले पिण्डेऽपि कर्म, ततोऽवयवविभागात् पिण्डारम्भकसंयोग-
(७) (प्र.) समवायिकारण (परत्वादि के आधारभूत द्रव्य) असमवायि-
कारण (दिक्प्रदेशसंयोग) और निमित्तकारण (अपेक्षाबुद्धि) इन तीनों के
नाश से परत्वादि गुणों का नाश (कहाँ और) किस स्थिति में होता है ?
(उ.) जहाँ जिस समय अपेक्षाबुद्धि की उत्पत्ति होती है, उसी समय
(परत्वादि के समवायिकारण) पिण्ड के अवयव में क्रिया उत्पन्न होती है ।
इसके बाद जिस समय उक्त क्रिया से (एक अवयव का) दूसरे अवयव से
विभाग उत्पन्न होता है, उसी समय अपेक्षाबुद्धि और परत्वादि गुण इन
दोनों की उत्पत्ति होती है । एवं पिण्ड (अवयवि) में भी क्रिया उसी समय
उत्पन्न होती है । इसके बाद अवयवों के उक्त विभाग से पिण्ड के
न्यायकन्दली
समवायि चासमवायि च निमित्तं च समवाय्यसमवायिनिमित्तानि, तानि च कारणानि चेति
समवाय्यसमवायि निमित्तकारणानि द्रव्यसंयोगापेक्षाज्ञानानि, तेषां त्रयाणां युगपद्विनाशात्
कथं परत्वस्य विनाश इति प्रश्ने कृते प्रत्युत्तरमाह - यदेति । इत्येतत् सर्वं युगपद्भवति कारण-
यौगपद्यात्, ततश्च त्रयाणां समवाय्यसमवायिनिमित्तकारणानां विनाशात् परत्वस्य विनाश
इति । परत्वस्य विनाश इत्युपलक्षणमिदम् । अपरत्वस्याप्ययमेव विनाशक्रमो दर्शयितव्यः ।
संयोग रूप असमवायिकरण, एवं अपेक्षाबुद्धिरूप निमित्तकारण, इन तीनों कारणों
के एक ही समय विनाश के कारण परत्व का विनाश किस प्रकार होता है ? इसी
प्रश्न के उत्तर में 'यदा' इत्यादि भाष्य सन्दर्भ लिखा गया है । अर्थात् जब एक ही
समय उक्त तीनों कारणों के विनाश कारणसमूह एकत्र हो जाते हैं, तो फिर तीनों
का एक ही समय विनाश हो जाता है । इसके बाद परत्व के तीनों कारणों के
विनाश से परत्व का विनाश हो जाता है । इस प्रकरण में 'परत्वविनाश' शब्द
उपलक्षणमात्र है (नियामक नहीं), अतः इसी से अपरत्व नाश का भी यही क्रम
जानना चाहिए ।

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४१० न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [गुणे बुद्धि-
प्रशस्तपादभाष्यम्
विनाशः पिण्डकर्मणा च दिक्पिण्डविभागः क्रियते, सामान्यबुद्धेश्चोत्पत्ति-
रित्येकः कालः । ततः संयोगविनाशात् पिण्डविनाशः, विभागाच्च दिक्पिण्ड-
संयोगविनाशः, सामान्यज्ञानादपेक्षाबुद्धेर्विनाश इत्येतत् सर्वं युगपत् त्रयाणां
समवाय्यसमवायिनिमित्तकारणानां विनाशात् परत्वस्य विनाश इति ॥
बुद्धिरुपलब्धिर्ज्ञानं प्रत्यय इति पर्यायाः । सा चानेकप्रकारा, अर्थानन्त्यात्
प्रत्यर्थनियतत्वाच्च ।
उत्पादक संयोग का विनाश, और अवयवी (पिण्ड) की क्रिया, उसका
पूर्वदिक्प्रदेश के साथ विभाग और सामान्य विषयक बुद्धि की उत्पत्ति,
इतने सारे काम एक ही समय होते हैं । इसके बाद उक्त संयोग के
विनाश से पिण्ड का विनाश एवं पूर्वदिशा और पिण्ड के विभाग से इन
दोनों के संयोग का नाश, एवं सामान्य ज्ञान से अपेक्षाबुद्धि का नाश
होता है । इस प्रकार एक ही समय समवायिकारण (परत्वादि के
आधारभूत पिण्डद्रव्य), असमवायिकारण (उक्त पिण्ड का पूर्वादि
दिक्प्रदेशों के साथ संयोग) और निमित्तकारण (अपेक्षाबुद्धि) इन तीनों
के विनाश से (भी) परत्वादि गुणों का विनाश होता है ।
बुद्धि, उपलब्धि, ज्ञान और प्रत्यय (ये सभी) शब्द अभिधावृत्ति के
द्वारा एक ही अर्थ के बोधक हैं ।
यह अनेक (अनन्त) प्रकार की है, क्योंकि इसके विषय अनन्त हैं
और यह प्रत्येक विषय में स्वतन्त्र रूप से (भी) अवश्य ही सम्बद्ध है ।
न्यायकन्दली
बुद्धिजे परत्वापरत्वे इति समर्थिते । अथ केयं बुद्धिरित्याह-बुद्धिरित्यादि ।
प्रधानस्य विकारो महदाख्यमन्तःकरणं चित्तपर्यायबुद्धिः । बुद्धी-
यह समर्थन कर चुके हैं कि परत्व और अपरत्व दोनों ही बुद्धि से उत्पन्न होते
हैं । किन्तु 'यह बुद्धि कौन-सी वस्तु है ?' (इस स्वाभाविक प्रश्न का उत्तर)
'बुद्धिः' इत्यादि पङ्क्ति से देते हैं ।
सांख्याचार्यों का कहना है कि प्रकृति (प्रधान) का महत् नाम का विकाररूप
अन्तःकरण ही 'बुद्धि' है, जिसे 'चित्त' भी कहते हैं। इस बुद्धि की वह विषयाकार की

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४११

Page 376Permalink

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४११
प्रशस्तपादभाष्यम्
तस्याः सत्यप्यनेकविधत्वे समासतो द्वे विधे-विद्या चाविद्या चेति ।
तत्राविद्या चतुर्विधा-संशयविपर्ययानध्यवसायस्वप्नलक्षणा ।
संशयस्तावत् प्रसिद्धानेकविशेषयोः सादृश्यमात्रदर्शनादुभय-
विशेषास्मरणार्द्धर्म्माच्च किंस्विदित्युभयालम्वी विमर्शः
यह (बुद्धि व्यक्तिशः) अनन्त प्रकार की होने पर भी संक्षेप में (१)
विद्या (यथार्थज्ञान) और २. अविद्या (अयथार्थ ज्ञान) भेद से दो प्रकार
की है । इनमें अविद्या के (१) संशय (२) विपर्यय (३) अनध्यवसाय
और (४) स्वप्न, ये चार भेद हैं ।
जिन दो वस्तुओं के साधारण धर्म पहिले से ज्ञात हैं, उन दोनों के
केवल साधारण धर्म रूप सादृश्य के ज्ञान, एवं पश्चात् दोनों के असाधारण
धर्मों के स्मरण और अधर्म इन (तीनों हेतुओं) से 'यह अमुक वस्तु है ?
या उससे भिन्न ?' इस प्रकार के दो विरुद्ध विषयों का ज्ञान ही 'संशय'
है । यह (१) अन्तःसंशय और (२) बहिःसंशय भेद से दो प्रकार का
न्यायकन्दली
न्द्रियप्रणालिकया बाह्यविषयोपरक्तायास्तदाकारोपग्रहवती सत्त्वगुणाश्रयवृत्ति-
ज्ञानम्, प्राप्तविषयाकारोपग्राहां बुद्धौ प्रतिबिम्बितायाश्चेतनाशक्तेस्तद्वृत्यनुकार
उपलब्धिः । तथा चाह स्म भगवान् पतञ्जलिः - "अपरिणामिनी हि
भोक्तृशक्तिरप्रतिसङ्क्रमा च परिणामिन्यर्थे प्रतिसंक्रान्तेव तद्वृत्तिमनुभव-
तीति" इति । भोक्तृशक्तिरिति चितिशक्तिरुच्यते, सा चात्मैव ।
परिणामिन्यर्थ इति बुद्धितत्त्वे प्रतिसङ्क्रान्तेवेति प्रतिबिम्बितेवेत्यर्थः । तद्वृत्तिमनु-
भवति बुद्धौ प्रतिबिम्बिता सती बुद्धिच्छायापत्त्या बुद्धिवृत्त्यनुकारिणी
वृत्ति ही ज्ञान है, जिसमें सत्वगुण की प्रधानता रहती है, एवं जो ज्ञानेन्द्रिय के मार्ग
से बुद्धि के निकलने पर विषयों के साथ उसके सम्बद्ध होने के कारण उत्पन्न
होती है । एवं विषय के आकार में परिणत बुद्धि (ज्ञान में) प्रतिबिम्बित पुरुष
के उस वृत्ति के अनुकरण को ही 'उपलब्धि' कहते हैं । जैसा कि भगवान्
पतञ्जलि ने कहा है कि भोक्तृशक्ति अपरिणामिनी एवं किसी में प्रतिबिम्बित
होनेवाली नहीं है; किन्तु (बुद्धिरूप) परिणामी अर्थ में प्रतिबिम्बित की तरह
उसकी वृत्तियों का अनुभव करती है । अभिप्राय यह है कि चितिशक्ति को
ही भोक्तृशक्ति कहते हैं जो वस्तुतः आत्मा ही है । परिणामी अर्थ में-अर्थात्
बुद्धितत्व में 'प्रतिसंक्रान्तेव' अर्थात् प्रतिबिम्बित की तरह 'तद्वृत्तिमनुभवति'
अर्थात् बुद्धि की छाया पड़ने के कारण वह (चितिशक्ति) बुद्धि की वृत्तियों
का अनुकरण करने-सी लगती है । सुखादि आकार के (अहं सुखी-इत्यादि

Page 377Permalink

४१२ न्यायसन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे बुद्धि-
प्रशस्तपादभाष्यम्
संशयः। स च द्विविधः - अन्तर्बहिश्च । अन्तस्तावद्यद् आदेशिकस्य सम्यङ्
मिथ्या चोद्दिश्य पुनरादिशतस्त्रिषु कालेषु संशयो भवति - 'किन्नु सम्यङ् मिथ्या
वा' इति ।
है । (१) अन्तःसंशय (का उदाहरण यह है कि जहाँ) किसी ज्योतिषी
ने (एक समय एक व्यक्ति के ग्रह स्थिति को देखकर उसे) कहा कि तुम्हें
अमुक इष्ट या अनिष्ट फल भूत काल में मिल चुका है, या भविष्य में
मिलनेवाला है (या) वर्त्तमान में भी है । उनका यह फलादेश सत्य हुआ ।
किन्तु उनके ही अन्य निर्देश मिथ्या सिद्ध हुए । (ऐसी स्थिति में वही
यदि) पुनः फलादेश करते हैं तो उस व्यक्ति को ज्योतिषी के इस आदेश
से उत्पन्न अपने ज्ञान में संशय होता है कि 'यह सत्य है या मिथ्या ?'
न्यायकन्दली
भवतीत्यर्थः । बुद्धेर्विषयः सुखाद्याकारः प्रत्ययः । तथा चाह स एव भगवान् - "शुद्धोऽपि
पुरुषः प्रत्ययं बौद्धमनुपश्यति, अनुपश्यंस्तदात्मापि तदात्मक इव प्रत्यवभासते" इति ।
एतत् सांख्यमतं निराकर्तुमाह-बुद्धिरित्यादि ।
यस्या अमी पर्यायशब्दाः, सा बुद्धिः । या पुनरियं प्रक्रियोपदर्शिता
सा प्रतीत्यभावादेव पराणुद्यते । विषयहानोपादानानुगुणमुत्पादव्ययधर्मकमेकम्,
तदधिकरणं चापरम्, यस्य तदुत्पादात् प्रवृत्तिनिवृत्ती स्याताम्, इत्युभयं
प्रत्यात्ममनुभूयते, न प्रकारान्तरम् । या चास्या बुद्धेर्वृत्तिः, सा किं बुद्धेरन्यानन्या वा ?
न तावदन्या, वृत्तिवृत्तिमतोरेकान्तिकतादात्म्याभ्युपगमात् । अथानन्या, तदा
आकार के) प्रत्यय ही बुद्धि के विषय हैं। जैसा कि भगवान् पतञ्जलि ने ही कहा
है कि पुरुष शुद्ध (अपरिणामी) होने पर भी बुद्धि की देखी हुई वस्तुओं को ही
उसके पीछे देखता है । उसके बाद देखने ही के कारण विषय स्वरूप न होने पर
भी विषय रूप से प्रतिभासित होता है ।
इसी सांख्यमत का खण्डन करने के लिए 'बुद्धि' इत्यादि पङ्क्ति लिखी गई है ।
अर्थात् अभिधावृत्ति के द्वारा इन सभी शब्दों से जिसका बोध हो वही 'बुद्धि' है ।
सांख्य के अनुयायियों की जो रीति ऊपर लिखी गयी है, वह साधारण प्रतीति के विरुद्ध
होने के कारण ही खण्डित हो जाती है । बुद्धि एक ऐसी वस्तु है ; जिसके द्वारा
(अभिमत) विषयों को ग्रहण और (प्रतिकूल विषयों का) त्याग होता है । एवं जिसकी

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४१३

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प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४१३
प्रशस्तपादभाष्यम्
बहिर्द्विविधः-प्रत्यक्षविषये चाप्रत्यक्षविषये च। तत्राप्रत्यक्षविषये तावत् साधारण-
लिङ्गदर्शनादुभयविशेषांनुस्मरणार्द्धर्माच्च संशयो भवति । यथाऽटव्यां विषाणमात्र-
दर्शनाद् गौर्गवयो वेति । प्रत्यक्षविषयेऽपि स्थाणुपुरुषयोरूर्ध्वतामात्रसादृश्यदर्शनाद्
बहिःसंशय दो प्रकार का है १. जिसके विषय प्रत्यक्ष प्रमाण के
द्वारा गृहीत हों एवं २. जिसके विषय प्रत्यक्ष के द्वारा गृहीत न हो सकें ।
इनमें अप्रत्यक्षविषय का बहिःसंशय वह है जो दोनों कोटियों में
रहनेवाले (साधारण) धर्म के ज्ञान, एवं दोनों कोटियों में से प्रत्येक के
असाधारण धर्म की अनुस्मृति (पश्चात्स्मरण) और अधर्म इन कारणों
से उत्पन्न होता है । जैसे जङ्गल में (जाने पर) केवल सींग के देखने पर
यह संशय होता है कि यह (सींगवाला) गो है या गवय ? प्रत्यक्ष के
द्वारा गृहीत होनेवाले विषयों के संशय (का यह उदाहरण है कि) स्थाणु
और पुरुष दोनों में समान रूप से रहनेवाला उच्चता (ऊँचाई) रूप
से सादृश्य का ज्ञान, दोनों में से प्रत्येक में रहनेवाली वक्रता
न्यायकन्दली
बुद्धेरेकत्वे विषयाकारवतीनां तद्वतीनामप्येकत्वात् त्रिचतुरादिप्रत्ययो दुर्लभः,
परस्परविलक्षणाकारसंवेदनाभावाद् बुद्ध्यारूढाकारमात्रवेदित्वाच्च पुरुषस्य । यथोक्तम् -
'बुद्धेः प्रतिसंवेदी पुरुष' इति । वृत्तीनां वा नानात्वे बुद्धेरपरापि नानात्वादेकत्वव्याघात'
इत्यादि दूषणमूह्यम् ।
बुद्धेर्भेदं निरूपयति-सा चानेकप्रकारेति । अत्र कारणमाह-अर्था-
उत्पत्ति और विनाश दोनों ही होते हैं । एवं जिसका कोई दूसरा आश्रय है ।
जिसमें उसकी उत्पत्ति से प्रवृत्ति और निवृत्ति दोनों ही उपपन्न होती हैं । (बुद्धि के
प्रसङ्ग में) इन्हीं दोनों प्रकारों का प्रत्येक आत्मा अनुभव करता है, दूसरे का नहीं ।
(इस प्रसङ्ग में यह प्रश्न भी उठता है कि) बुद्धि की यह कथित 'वृत्ति' बुद्धि से
भिन्न है या अभिन्न ? सांख्याचार्यगण वृत्ति और उसके आश्रय दोनों में अत्यन्त
अभेद मानते हैं, अतः (उनके मत से) ये दोनों भिन्न तो हो नहीं सकते । यदि
वृत्ति और वृत्तिमान में भेद मानें, तो ये तीन हैं, ये चार हैं इत्यादि विभिन्न प्रकार
की प्रतीतियाँ दुर्लभ होंगी, क्योंकि बुद्धि के एक होने के कारण उसकी वृत्ति
भी एक ही होगी, अतः वृत्तियों में परस्पर विशेष नहीं हो सकता, क्योंकि
सभी आकार एक ही बुद्धि में आरूढ हैं । जैसा कि (भगवान् पतञ्जलि ने)

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४१४ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् | गुणे बुद्धि-
प्रशस्तपादभाष्यम्
वक्रादिविशेषानुपलब्धितः स्थाणुत्वादिसामान्यविशेषानाभिव्यक्तावुभयविशेषानु-
स्मरणादुभयत्राकृष्यमाणस्यात्मनः प्रत्ययो दोलायते— किं नु खल्वयं स्थाणुः
स्यात् पुरुषो वेति ?
(टेढ़ापन) और हस्तपादादि असाधारण धर्मों का अज्ञान, दोनों कोटियों
में से प्रत्येक में रहनेवाले स्थाणुत्वपुरुषत्वादि जाति रूप विशेष धर्मों का
अप्रत्यक्ष, एवं इन दोनों जातियों की पश्चात् स्मृति, इन सभी कारणों से
पुरुष का चित्त झूले की तरह स्थाणु और पुरुष दोनों तरफ डोलता है
और उसे संशय होता है कि यह (सामने दीखनेवाला) स्थाणु है ? या पुरुष ?
न्यायकन्दली
नन्वादिति । यदि नामार्थस्य विषयस्यानन्तत्वं बुद्धेरनेकविधत्वे किमायातम् ? तत्राह-
प्रत्यर्थनियतत्त्वाच्चेति । प्रत्यर्थं प्रतिविषयमस्मदादिबुद्धयो नियताः, अर्थाश्चानन्ता इति
प्रत्येकं तत्र बुद्धयोऽप्यनन्ताः । यदि क्वचिदनेकविषयमेकं विज्ञानं तदपि तावदर्थनियत-
त्वात् तदर्थाद् विज्ञानान्तराद् विलक्षणमेवेत्यदोषः ।
बुद्धेर्विषयभेदेन सत्यपि भेदे संक्षेपतो द्वैविध्यमाह—तस्या इति ।
निःसन्दिग्धाबाधिताध्यवसायात्मिका प्रतीतिर्विद्या, तद्विपरीता चाविद्येति । अत्र
प्रतिपादनमात्रस्य विवक्षितत्वात् पश्चादुद्दिष्टामप्यविद्यां प्रथमं कथयति-
कहा है कि 'बुद्धेः प्रतिसंवेदी पुरुषः ।' अर्थात् बुद्धि में आरूढ़ आकारों को ही
पुरुष अनुभव करता है । वृत्ति को यदि अनेक मानें तो फिर बुद्धि को भी नाना
मानना पड़ेगा ही, जिससे बुद्धि की एकता खतरे में पड़ जाएगी, इन सभी दोषों
की भी कल्पना करनी चाहिए ।
'सा चानेकप्रकारा' इत्यादि सन्दर्भ से बुद्धि के भेदों का निरूपण करते हैं ।
'अर्थानन्त्यात्' इस पद के द्वारा इसमें हेतु दिखलाया गया है (कि बुद्धि अनेक
प्रकार की क्यों है?) यदि अर्थ या विषय अनन्त हैं, तो फिर इसलिए बुद्धियाँ क्यों
अनेक हों ? इसी प्रश्न का समाधान 'प्रत्यर्थनियतत्त्वाच्च' इस वाक्य के द्वारा दिया
गया है । 'प्रति अर्थ' अर्थात् प्रत्येक विषय में हम लोगों की बुद्धियाँ नियत रूप से
अलग हैं । ये 'अर्थ' या विषय असंख्य हैं, फिर बुद्धियाँ भी अवश्य ही अनन्त
होंगी । जहाँ कहीं अनेक विषयक एक ज्ञान उपलब्ध भी होता है, वह भी उतने
अर्थों में नियत तो है ही, किन्तु जो अपने विषयों से भिन्नविषयक या
अल्पाधिक-विषयक ज्ञानों से भिन्न भी हैं । इस प्रकार (विषयभेद से ज्ञानभेद

प्रकरणम्] भाषाानुवादसहितम् ४१५

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प्रकरणम्] भाषाानुवादसहितम् ४१५
न्यायकन्दली
तत्रेति । तयोर्विद्याऽविद्ययोर्मध्ये अविद्या चतुर्विधा चतुष्प्रकारा संशयविपर्ययानध्य-
वसायस्वप्नलक्षणा ।
नन्वविद्या चतुर्विधेति परिसंख्यानानुपपत्तिः, रूढस्य तर्कज्ञानस्यापि सम्भवात् ।
अनुभूयते ह्यन्तरा संशयं निर्णयं च तर्कः । तथा हि-उत्पत्तिधर्मक आत्मेत्येके ।
अनुत्पत्तिधर्मक इत्यपरे । ततो विप्रतिपत्तेः किंस्विदयमुत्पत्तिधर्मा आहोस्विदेवं न भवतीति
संशये विचारात्मकस्तर्कः प्रवर्तते । यद्ययमुत्पत्तिधर्मकः, तदैकस्यानेकशरीरादिसंयोग-
लक्षणः संसारस्तदत्यन्तविमोक्षलक्षणश्चापवर्गो नोपपद्यते । अनुत्पत्तिधर्मके तु ज्ञातरि
स्यातां संसारापवर्गावित्यनुत्पत्तिधर्मकेणानेन भवितव्यमिति ।
किमस्य सम्भावनाप्रत्ययस्य प्रयोजनम् ? तत्त्वज्ञानमेव, प्रतिपक्षनिश्चयवत् प्रतिपक्ष-
संशयेऽपि हि हेतोरप्रवृत्तिरेव, वस्तुनो द्वैरूप्याभावात् । यथाहर्भट्टमिश्राः-
यावद्व्यतिरेकित्वं शतांशेनापि शङ्क्यते ।
विपक्षस्य कुतस्तावद्धेतोर्गमनिकाबलम् ॥ इति ।
के मानने में) कोई दोष नहीं है । 'तस्याः' इत्यादि से कहते हैं कि विषयों के भेद
से बुद्धियों के असंख्य भेद होने पर भी संक्षेपतः उसके दो ही प्रकार हैं । सन्देह
से भिन्न वह निश्चयात्मक ज्ञान ही 'विद्या' है, जिसके विषय बाधित न हों । यहाँ
जिस किसी प्रकार से विषयों का प्रतिपादन ही इष्ट है, अतः पीछे कही गयी
अविद्या का भी 'तत्र' इत्यादि से पहिले ही निरूपण करते हैं । 'तयोः' अर्थात्
विद्या और अविद्या इन दोनों में अविद्या 'चतुर्विधा' अर्थात् (१) संशय
(२) विपर्यय (३) अनध्यवसाय और (४) स्वप्न भेद से चार प्रकार की है ।
(प्र.) 'अविद्या चार ही प्रकार है' संख्या का यह नियम ठीक नहीं है; क्योंकि
अविद्या के अन्तर्गत इनसे भिन्न तर्क रूप पाँचवें ज्ञान की भी सम्भावना है ।
क्योंकि संशय और विपर्यय के मध्यवर्ती तर्क का भी अनुभव होता है । जैसे कि
कोई कहता है कि आत्मा की उत्पत्ति होती है । दूसरे उसे अनुत्पत्तिशील कहते
हैं । इस विप्रतिपत्ति से यह संशय होता है कि 'आत्मा उत्पत्तिशील है या नहीं ?'
इस संशय के बाद यह विचार रूप तर्क उपस्थित होता है कि अगर आत्मा
उत्पत्तिशील वस्तु हो, तो फिर अनेक शरीरों के साथ इसका सम्बन्ध रूप संसार
और उस सम्बन्ध के अत्यन्त विनाश रूप अपवर्ग ये दोनों ही अनुपपन्न होंगे । यदि
इसे अनुत्पत्तिधर्मक मान लेते हैं, तो फिर कथित संसार और अपवर्ग दोनों ही
उपपन्न हो जाते हैं । अतः इसे अनुत्पत्तिधर्मक ही होना चाहिए ।

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४१६ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे बुद्धि-
न्यायकन्दली
अनेन तृत्पत्तिधर्मकत्वं व्युदस्यानुत्पत्तिधर्मकत्वं सम्भावयिताविषये विवेचिते सत्य-
सत्प्रतिपक्षत्यादनुमानं प्रवर्तते इति विषयविवेचनद्वारेण प्रमाणानुग्राहकतया तर्कस्तत्त्व-
ज्ञानाय घटते, प्रमाणस्य करणत्वेनेतिकर्तव्यतास्थानीयतर्कसहायस्यैव स्वकार्ये पर्यवसानात् ।
न ह्यनपेक्षितदृढमुष्टिनिपीडितो जाल्मकरपञ्जरोदरे विलुठन्नपि कठोरधारः कुठारः प्रतिति-
ष्ठति निष्ठुरस्यापि काष्ठस्य छेदाय । तथा चोक्तम्-
नहि तत्करणं लोके वेदे वा किञ्चिदीदृशम् ।
इतिकर्तव्यतासाध्ये यस्य नानुग्रहेऽर्थिता ॥ इति ।
यदि पुनरेवं तर्को नेष्यते परस्यानिष्टापादनरूपः प्रसङ्गोऽपि नाभ्युपगन्तव्यः स्यात् ?
स हि तर्कादनतिरिक्तयमानात्मा, अस्ति च वैशेषिकाणामपि प्रसङ्गः, प्रसङ्गो हेतुरा-
श्रयासिद्धतादिदोषात् ।
(प्र.) इस 'सम्भावना प्रत्यय' रूप तर्क का प्रयोजन क्या है? (उ.) तत्त्व का
ज्ञान ही इसका भी प्रयोजन है । क्योंकि प्रतिपक्ष (बाध) निश्चय की तरह प्रतिपक्ष
संशय के रहने पर भी हेतु की प्रवृत्ति नहीं होती है । क्योंकि कोई भी वस्तु
(परस्पर विरुद्ध) दो रूपों का नहीं होता । जैसा कि भट्टमिश्र ने कहा है कि 'जब
तक विपक्ष में अव्यतिरेकित्व अर्थात् बाधाभाव का संशय (भी) रहेगा, तब तक
हेतु में साध्य की सिद्धि करने का सामर्थ्य कहाँ से आएगा ?' इस प्रकार आत्मा
से उत्पत्तिधर्मकत्व को हटा कर विषय के विवेचित होने पर सत्प्रतिपक्ष दोष के हट
जाने के कारण सम्भावयिता (तर्क करनेवाला पुरुष) अनुमान में प्रवृत्त होता है ।
इस रीति से विषय-विवेचन के द्वारा प्रमाण का सहायक होने के कारण तर्क भी
तत्त्वज्ञान का सम्पादक होता है । प्रमाण करण रूप है । 'इतिकर्त्तव्यता' (करण से
कार्य सम्पादन की रीति) के साहाय्य के बिना कोई करण अपना कार्य नहीं कर
सकता । प्रमाण रूप करण का तर्क ही 'इतिकर्त्तव्यता' की जगह है । अतः इसके
साहाय्य से ही प्रमाण अपने कार्य में सफल हो सकता है । कैसी ही तीखे धार की
कुल्हाड़ी हो, उसको पकड़नेवाला चाहे जितना बलवान् हो, यदि वह गलत ढंग से
उसको पकड़ता है, तो फिर उससे कठोर काठ का छेदन नहीं हो सकता, (अतः
इतिकर्त्तव्यता का साहाय्य आवश्यक है) । जैसा कहा भी गया है कि लौकिक
(कुठारादि) या वैदिक (यागादि) कोई भी ऐसा करण नहीं है, जिसे अपने कार्य
के सम्पादन में इतिकर्त्तव्यता के साहाय्य की अपेक्षा न हो । इस प्रकार तत्त्वज्ञान
के लिए उपयोगी तर्क को यदि स्वीकार नहीं करेंगे, तो फिर (प्रसङ्ग) को भी
मानना सम्भव नहीं होगा, क्योंकि वह भी प्रतिपक्षी के अनभीष्ट पक्ष का
उपस्थापन स्वरूप ही है । इस प्रकार तर्क से प्रसङ्ग में कोई अन्तर नहीं है । किन्तु
वैशेषिक लोग भी प्रसङ्ग की सत्ता मानते ही हैं ।

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४१७

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प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४१७
न्यायकन्दली
अत्रोच्यते-किं परपक्षाभावप्रतीतिस्तर्कः ? किं वा स्वपक्षसम्भावना ? आद्ये पक्षे
प्रमाणमेवेदम्, ज्ञातुरनित्यत्वे संसारापवर्गयोरसंभव इति ज्ञानं यद्यप्रमाणम्, नास्माद्
विपक्षाभावसिद्धिः, अप्रमाणेन कस्यचिदर्थस्य सिद्धेरयोगादित्यत्रास्याप्रवृत्तिरेव विषय-
विवेकाभावात् । अथ सिद्धयत्यस्माद् विपक्षाभावस्तदा प्रमाणमिदं प्रत्यक्षादिषु कस्मिंश्चि-
दन्तर्भविष्यति, तद्व्यतिरेकेणान्यस्य प्रतीतिसाधनाभावादित्यकामेनाभ्युपगन्तव्यम् ।
प्रसङ्गोऽपि विरोधोद्भावनम्, तच्च कस्यचिद्बलीयसो विपरीतप्रमाणस्योपदर्शनम् । कस्तत्र
विपरीतात् प्रमाणात् तदुपदर्शकाच्च वचनादन्यस्तर्कः ?
अथ स्वपक्षसम्भावनात्मकः प्रत्ययस्तर्कः ? अस्योत्पत्तौ किं कारणम् ? न
तावत्स्वपक्षसाधकं प्रमाणम्, तस्याप्रवृत्तेः । तर्केण विवेचिते विषये स्वपक्षसाधकं
प्रवर्तते । तदेव यदि तस्य कारणम्, सुव्यक्तमन्योन्याश्रयत्वम् ।
विपक्षाभावे प्रतीते स्वपक्षसम्भावनोपजायत इति विपक्षाभावप्रतीतिरस्य
कारणमिति चेत् ? तर्हि विपक्षाभावलिङ्गमनुमानमेवैतत्, परस्पर-
विरुद्धयोरेकप्रतिषेधस्येतरविधिनान्तरीयकत्वात् । भवत्येवं यदि विषयमवधार-
(उ.) इस प्रसङ्ग में हम (सिद्धान्तियों) का कहना है कि तर्क (१) प्रतिपक्षी से
माने हुए सिद्धान्त के अभाव का प्रतीतिरूप है ? अथवा (२) अपने सिद्धान्तपक्ष
का सम्भावनारूप है ? यदि इनमें पहिला पक्ष मानें, तब तो तर्क का प्रमाण ही
मानना पड़ेगा (जिससे तर्क विद्यारूप ज्ञान में ही अन्तर्भूत हो जाएगा) क्योंकि
'ज्ञाता' (आत्मा) को यदि अनित्य मानेंगे तो संसार और अपवर्ग दोनों ही
अनुपपन्न होंगे, यह ज्ञान यदि अप्रमाण है, तो इससे विपक्षाभाव (अर्थात् आत्मा में
नित्यत्व) की सिद्धि न हो सकेगी, क्योंकि अप्रमाणभूत ज्ञान से किसी भी विषय
की सिद्धि सम्भव नहीं है । अतः प्रकृत में विपक्ष के अभाव की सिद्धि के लिए
उक्त तर्करूप ज्ञान प्रवृत्त ही नहीं होगा, क्योंकि उसका विषय ही निर्दिष्ट नहीं है ।
यदि तर्क से विपक्षाभाव की सिद्धि होती है, तो फिर यह प्रमाण ही है । अतः
प्रत्यक्षादि किसी प्रमाण में ही अन्तर्भूत हो जाएगा । क्योंकि इच्छा न रहने पर भी
यह मानना ही पड़ेगा कि प्रत्यक्षादि प्रमाणों को छोड़कर प्रतीति का कोई दूसरा
साधन नहीं है । 'प्रसङ्ग' भी विरोध के उद्भावन को छोड़कर और कुछ नहीं है ।
विरोध का यह उद्भावन बलिष्ठ विरोधी प्रमाण का प्रदर्शन ही है । तर्क भी
विरोधी प्रमाणों और उनके प्रतिपादक वाक्यों से भिन्न और कुछ नहीं है ।
यदि तर्क को अपने पक्ष के सम्भावनात्मक ज्ञान रूप द्वितीय पक्ष मानें, तो फिर
पूछना है कि इसका कारण कौन है ? अपने पक्ष का साधक प्रमाण तो उसका कारण
नहीं हो सकता, क्योंकि वह इस ज्ञान के उत्पादन के लिए प्रवृत्त ही नहीं होगा, क्योंकि
तर्क के द्वारा विचार किये हुए विषयों में ही अपने पक्ष का साधक प्रमाण प्रवृत्त होता
है, यही प्रमाण अगर तर्क का भी कारण हो तो इस पक्ष में अन्योन्याश्रय दोष स्पष्ट

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४१८ न्यायकन्दलीसंवेलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे बुद्धि-
न्यायकन्दली
यत्येवमेवेदमिति । अनुजानात्ययमेकतरधर्मं न त्ववधारयति । न चायं संशयोऽपि,
उभयकोटिसंस्पर्शाभावात् । किन्तु संशयात् प्रच्युतो निर्णयं चाप्राप्तः सम्भावना-
प्रत्ययोऽन्य एव । तथा च लोके वक्तारो भवन्ति - एवमहं तर्कयामीति । न,
योग्यतावधारणाद् यत्र विपक्षाभावस्तत्रान्यतरपक्षोपपत्तिः, यत्र तु तस्य सम्भव-
स्तत्रानुपपत्तिरित्यन्वयव्यतिरेकदर्शी विपक्षाभावं प्रतिपद्यमानः सम्भावयत्ययमनुत्पत्तिधर्मको
भविष्यतीत्यस्मिन्नर्थे प्रमाणमेतत्प्रतिपादनाय योग्येऽयमर्थ इति प्रमाणयोग्यतां विषय-
स्याध्यवस्यतीति अनुमानमेव । इत्थमेव च प्रमाणमनुगृह्णाति, योग्यताप्रतीतेः प्रमाणप्रवृत्ति-
हेतुत्वात् । अन्यथा पुनरिदं सम्भावनामात्रमनर्थकमेव, स्वयमप्रमाणस्य सिद्धयुपलम्भ-
योरनङ्गत्वाद् विषयविवेकस्यापि विपक्षाभावं प्रतिपादयता बाधकप्रमाणेनैव कृतत्वात् ।
है । (प्र.) विपक्ष के अभाव की प्रतीति से अपने पक्ष की सम्भावना उत्पन्न होती
है, इस प्रकार विपक्षाभाव की प्रतीति स्वपक्षसम्भावना का कारण है । (उ.) तो
फिर स्वपक्ष की सम्भावना परपक्षाभावहेतुक अनुमान ही है; क्योंकि परस्पर
विरुद्ध दो पक्षों में से एक का प्रतिषेध तब तक नहीं किया जा सकता जब तक
दूसरे की विधि न हो । (प्र.) किन्तु इस प्रकार की प्रतीतियाँ भी तो होती हैं कि
'यह इसी प्रकार है' या 'इन दोनों में से एक को जानते तो हैं; किन्तु निश्चय नहीं
कर सकते' । यह दूसरा ज्ञान संशय रूप नहीं है; क्योंकि इसमें दो कोटि विषय
नहीं है । किन्तु संशय से आगे बढ़ा हुआ, एवं निश्चय स्वरूप को अप्राप्त यह
सम्भावनाप्रत्यय, प्रत्यक्ष संशय और निश्चय से भिन्न एक अलग ही ज्ञान है ।
साधारण जन भी ऐसा कहते हैं कि 'मैं ऐसा तर्क करता हूँ' । (उ.) उक्त कथन
ठीक नहीं है । क्योंकि योग्यता निश्चित रहने के कारण जहाँ कोई विपक्ष नहीं
रहता है, वहाँ दो में से एक पक्ष की उपपत्ति ही होती है, जहाँ योग्यता की
सम्भावना भर होती है, वहाँ एक पक्ष की अनुपपत्ति होती है । इस अन्वय और
व्यतिरेक का ज्ञान जिस पुरुष को है, वह विपक्ष के अभाव को समझता हुआ
यह सम्भावना करता है कि आत्मा अनुत्पत्तिधर्मक ही होगी, इस विषय को
समझाने के लिए (उक्त सम्भावना प्रत्यय का विषय) आत्मा का यह
अनुत्पत्तिधर्मकत्व सर्वथा उपयुक्त है एवं इस अर्थ को समझाने के लिए
उक्त विषय सर्वथा उपयुक्त है । इस प्रकार आत्मा के अनुत्पत्तिधर्मकत्व के विषय
में प्रमाण से उत्पन्न होने की योग्यता निश्चित होती है । अतः यह अनुमान ही है ।
उक्त रीति से ही तर्क प्रमाण का सहायक भी होता है । प्रमाण में विषय को
उचित रूप में समझाने की योग्यता की प्रतीति तर्क से ही होती है, यह योग्यता
की प्रतीति ही प्रमाण की प्रवृत्ति का कारण है । यदि ऐसी बात न हो तो फिर
यह सम्भावनाप्रत्ययरूप तर्क व्यर्थ ही होगा; क्योंकि तर्क स्वयं अप्रमाण है, वह न
किसी के स्थापन में न किसी के खण्डन में ही सहायक हो सकता है । विषय के
विवेक का ज्ञान तो विपक्षाभाव के प्रतिपादक बाधक प्रमाण से ही हो जाएगा ।

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ४१९

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प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ४१९
न्यायकन्दली
अन्ये तु संशयप्रभेद एव तर्कोऽनवधारणात्मकत्वादित्याहुः ।
संशयस्तावत् । तावच्छब्दः क्रमार्थः । संशयस्तावत् कथ्यते इत्यर्थः ।
प्रसिद्धानेकविशेषयोरिति । प्रसिद्धाः पूर्वं प्रतीता अनेकविशेषा असाधारणधर्मा वक्र-
कोटरादयः शिरःपाण्यादयश्च ययोः स्थाणुपुरुषयोस्तयोः सादृश्यमात्रस्य साधारणधर्म-
मात्रस्य क्वचिदेकत्र धर्मिणि दर्शनादुभयोः स्थाणुपुरुषयोर्विशेषाणां वक्रकोटरादीनां
शिरःपाण्यादीनां च पूर्वं प्रतीतानां स्मरणाद्धर्माच्च किंस्विदिति उभयालम्बी विमर्शः
संशयः । किं स्थाणुः ? किं वा पुरुषः ? इति अनवस्थितोभयरूपेणोभयविशेषसंस्पर्शी
विमर्शो विरुद्धार्थविमर्शो ज्ञानविशेषः संशयः ।
सादृश्यमात्रदर्शनादिति । मात्रग्रहणसामर्थ्याद् विशेषाणामनुपलम्भो गम्यते ।
दर्शनशब्द उपलब्धिवचनो न प्रत्यक्षप्रतीतिवचनोऽनुमेयस्यापि सामान्यस्य
संशयहेतुत्वात् । सादृश्योपलम्भाभिधानाद्धर्म्युपलम्भोऽपि लभ्यते । अस्यानुपलम्भे
तद्धर्मस्य सादृश्यस्योपलम्भाभावात् संशयोऽपि धर्मिण्येव, न सादृश्ये, तस्य निश्चि-
तत्त्वात् । सादृश्यमिति च साधारणधर्ममात्रं कथ्यते, नानेकार्थसमवेतं सादृश्यम्,
कोई सम्प्रदाय तर्क को निश्चयात्मक न होने के कारण संशय रूप ही मानते हैं ।
'संशयस्तावत्' इत्यादि सन्दर्भ का 'तावत्' शब्द 'क्रम' का बोधक है,
तदनुसार इसका यही अर्थ है कि क्रमप्राप्त संशय का निरूपण करते हैं । (प्रसिद्ध)
'अनेकविशेषयोः' (इत्यादि सन्दर्भ का) "प्रसिद्धा अनेकविशेषा ययोः, तयोः
सादृश्यमात्रस्य दर्शनादुभययोः स्मरणादधर्माच्च किंस्विदित्युभयालम्बी विमर्शः
संशयः" इस विवरण के अनुसार स्थाणु एवं पुरुष रूप जिन दो धर्मियों
में से स्थाणु की वक्रता एवं कोटर प्रभृति, एवं पुरुष के शिर-पैर प्रभृति
पहिले से ज्ञात हैं, इन पूर्वज्ञात विषयों के स्मरण और अधर्म इन दोनों
से 'किंस्वित्' अर्थात् यह स्थाणु है या पुरुष' इत्यादि आकार के दोनों विषयों
को ग्रहण करनेवाला 'विमर्श' अर्थात् विरुद्ध दो विषयों का विशेष प्रकार
का ज्ञान ही 'संशय' है । 'सादृश्यमात्रदर्शनात्' इस वाक्य में 'मात्र' पद
के उपादान से उन दोनों विषयों (स्थाणु और पुरुष) के असाधारण धर्म
की अनुपलब्धि का आक्षेप होता है (अर्थात् दोनों के सादृश्य ज्ञान की तरह दोनों
के विशेष धर्मों का अज्ञान भी संशय के लिए आवश्यक है) । उक्त वाक्य के
'दर्शन' शब्द से सभी प्रकार के ज्ञान अभिप्रेत हैं, केवल प्रत्यक्ष ही नहीं । क्योंकि
अनुमान के द्वारा ज्ञात साधारण धर्म से भी संशय होता है । सादृश्य को धर्मज्ञान
का कारण कहने से धर्मी के ज्ञान में संशय की कारणता स्वयं कथित हो जाती
है । क्योंकि धर्मी के ज्ञान के बिना सादृश्य रूप धर्म का ज्ञान सम्भव ही नहीं
हैं । धर्मी में ही संशय होता है, सादृश्यादि (उभय साधारण) धर्मों में नहीं, क्योंकि
वे तो निश्चित हैं । 'सादृश्य' शब्द से (संशय की दोनों कोटियों में रहनेवाले) सभी

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४२० न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे संशय-
न्यायकन्दली
अस्पर्शवत्त्वस्य स्पर्शाभावस्याकाशान्तःकरणगतस्य प्रतीत्यात्मन्यणुत्वमहत्त्वसंशयदर्शनात् ।
तदयं संक्षेपार्थः-यदायं प्रतिपत्तोभयसाधारणं धर्मं क्वचिदेकत्र धर्मिण्युपलभते,
कुतश्चिन्निमित्तात् तस्य धर्मिणो विशेषं नोपलभते, पूर्वप्रतीतयोः स्मरति विरुद्धविशेषयोः,
न चोभयोरेकत्र सम्भावयति सद्भावम्, विरुद्धत्वात् । नाप्यभावं तदविनाभूतस्य साधारण-
धर्मस्य दर्शनात् । तदास्य साधारणधर्मविषयत्वेनावधारिते धर्मिणि विशेषविषयत्वे-
नानवधारणात्मकः प्रत्ययः संशयो भवति ।
नन्यनवधारणात्मकः प्रत्ययश्चेति प्रतिषिद्धम् । इदं हि प्रत्ययस्य प्रत्ययत्वं यद्विषयमव-
धारयति ? न, उभयस्यापि सम्भवात् । अयं हि सामान्यविशिष्टधर्म्युपलम्भेन धर्मविशेषानु-
पलम्भविरुद्धोभयविशेषस्मरणसहकारिणा जन्यमान इति सामान्यविशिष्टधर्मिणमवधारयन्
स्थाणुर्वा पुरुषो वेति विशेषमनवधारयन्नवधारणात्मकः प्रत्ययश्च स्यात् । दृष्टं
साधारण धर्मों को समझना चाहिए । अनेक वस्तुओं में समवाय सम्बन्ध से रहनेवाली
'सादृश्य' नाम की कोई वस्तु नहीं है, क्योंकि आकाश और अन्तःकरण (मन) इन
दोनों में रहनेवाले स्पर्शाभाव से आत्मा में अणुत्व और महत्त्व दोनों का संशय
होता है ।
कहने का तात्पर्य यह है कि जिस समय किसी ज्ञाता को किसी धर्मी में दो
वस्तुओं में समान रूप से रहनेवाले धर्म का ज्ञान होता है, एवं उन दोनों वस्तुओं
के असाधारण धर्मों का अनुभव नहीं हो पाता । एवं दोनों धर्मियों के पहिले से
ज्ञात विशेष धर्मों का स्मरण भी रहता है । उस समय वह यह समझता है कि इन
दोनों विशेष धर्मों का एक धर्मी में रहना सम्भव नहीं है, क्योंकि ये दोनों परस्पर
विरुद्ध हैं, इन दोनों विशेष धर्मों का अभाव भी निश्चित नहीं है, क्योंकि उनके
साथ अवश्य रहनेवाले साधारण धर्म तो देखे ही जाते हैं । उस समय साधारण
धर्मों के आश्रयरूप से निश्चित उस धर्मी में विशेष धर्मों का जो अनिश्चयात्मक
ज्ञान उत्पन्न होता है, वही 'संशय' है ।
(प्र.) यह अनिश्चयात्मक है, एवं प्रतीति भी है, ये दोनों बातें परस्पर विरुद्ध
हैं, क्योंकि सभी प्रतीतियों का यही काम है कि अपने विषयों को निश्चित रूप में
समझावें । (उ.) ऐसी बात नहीं है, क्योंकि दोनों ही बातें हो सकती हैं, चूँकि यह
संशयरूप ज्ञान सामान्य धर्म से युक्त धर्मी के ज्ञान, विशेष धर्मों की अनुप-
लब्धि, एवं विशेष धर्मों के स्मरण, इन तीनों से उत्पन्न होता है, अतः सामान्य
धर्म विशिष्ट धर्मों का तो वह अवधारण कर सकता है, क्योंकि केवल धर्मी
के अंश में वह अवधारणात्मक है ही, किन्तु 'स्थाणु है या पुरुष' यह ज्ञान
इन (स्थाणुत्व और पुरुषत्व) दोनों का निश्चायक न होने के कारण 'अयं स्थाणुर्वा
पुरुषः' यह संशयज्ञान रूप अनवधारणात्मक भी है, अतः अनवधारण

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ४२१

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प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ४२१
न्यायकन्दली
हि यत्र विलक्षणसामग्री, तत्र कार्यमपि विलक्षणमेव, यथा प्रत्यभिज्ञानम् ।
संशयोऽप्यविद्या । सा चानिष्टा पुरुषस्येत्यधर्मकार्यत्वं तस्य दर्शितम् । अधर्माच्चेति ।
सामान्यं दृष्ट्वा यदेकं विशेषमनुस्मृत्य विशेषमनुस्मरति, तदा सामान्यदर्शनस्य विनष्टत्वात्
संशयहेतुत्वानुपपत्तिरिति चेन्न, उभयविशेषविषयाभ्यां संस्काराभ्यां युगपल्लब्धबुद्धाभ्यामुभय-
विशेषविषयैकस्मरणजननात्, तत्काले च विनश्यदवस्थस्य सामान्यज्ञानस्य सम्भवात् ।
स च द्विविध इति भेदकथनम् । केन रूपेणेत्यत आह- अन्तर्बहिर्चेति । यः
समानधर्मोपपत्तेरनेकधर्मोपपत्तेर्विप्रतिपत्तेरुपलब्ध्यव्यवस्थातोऽनुपलब्ध्यव्यवस्थातश्च समान-
तान्त्रिकैः पञ्चविधः संशयो दर्शितः, स सर्वो द्वैविध्येनैव संगृहीतः ।
अन्तस्तावद् आदेशिकस्येति । आदेशिको ज्योतिर्वित्, तेनैकदा किञ्चिद्
ग्रहसञ्चारादिनिमित्तमुपलभ्यादिष्टं किञ्चिदिष्टमनिष्टं यात्राभूद्वर्त्तते भविष्यति
और प्रत्यय दोनों ही हो सकता है । जहाँ की सामग्री (कारणसमूह) विशेष रूप
की होगी, वहाँ का कार्य भी विशेष प्रकार का ही होगा, जैसे कि 'प्रत्यभिज्ञा'
(अनुभवात्मक और स्मरणात्मक दोनों हैं) ।
संशय भी अविद्या ही है, अविद्या पुरुष का अनिष्ट करनेवाली है । इसीलिए
कहा गया है कि 'संशय अधर्म से उत्पन्न होता है' । (प्र.) सामान्य ज्ञान के बाद
एक विशेष धर्म का स्मरण कर अगर दूसरे विशेष धर्म का स्मरण होता है, तो
फिर उस समय कथित सामान्य ज्ञान का ही विनाश हो जाएगा । अतः सामान्य
दर्शन संशय का कारण नहीं हो सकता । (उ.) एक ही समय दोनों विशेष धर्मों
के एक ही उद्बुद्ध संस्कार से दोनों विशेष धर्म विषयक एक ही (समूहालम्बन)
स्मरण की उत्पत्ति हो सकती है, उस समय आगे क्षण में ही विनष्ट होनेवाले
(विनश्यदवस्थ) सामान्य धर्म के ज्ञान की सम्भावना है ।
'स च द्विविधः' इस वाक्य के द्वारा संशय के दो भेद कहे गये हैं । कौन से
उसके दोनों प्रकार हैं ? इसी प्रश्न का उत्तर 'स च द्विविधः' इत्यादि से दिया गया
है । समानतन्त्र (न्याय) के आचार्यों ने जो (१) साधारण धर्म के ज्ञान से उत्पन्न
(२) असाधारण धर्म के ज्ञान से उत्पन्न (३) विप्रतिपत्ति वाक्य से उत्पन्न (४)
उपलब्धि की अव्यवस्था से उत्पन्न एवं (५) अनुपलब्धि की अव्यवस्था से उत्पन्न
इत्यादि संशय के जो पाँच भेद गिनाये गये हैं, वे सभी इन्हीं दो प्रकारों में अन्तर्भूत
हो जाते हैं ।
'आदेशिकस्य' इत्यादि से कहा गया है कि कथित संशय 'अन्तःसंशय' का उदाहरण
है । 'आदेशिक' शब्द का यहाँ 'ज्योतिषशास्त्रवेत्ता' अर्थ है । उन्होंने एक समय
किसी पुरुष को उसके ग्रहसञ्चारादि निमित्त को देखकर 'आदेश' किया कि 'यहाँ

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४२२ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे संशय-
न्यायकन्दली
चेति, तत् तथैव तदा संवृत्तम् । अन्यदादिष्टं तद्वितथमभूत् । पुनरिदानीं तस्योत्पन्नं
तथाभूतमेव निमित्तं दृष्ट्वादिशतोऽन्तः स्वज्ञाने संशयो भवति यदेतन्मम नैमित्तिकं
ज्ञानमभूत्, तत्किं सत्यमसत्यं वेति ।
बहिर्द्विविधः-प्रत्यक्षविषये अप्रत्यक्षविषये च । तत्र तयोर्मध्येऽप्रत्यक्षविषये तावत्
साधारणलिङ्गदर्शनादुभयविशेषांनुस्मरणादधर्माच्च संशयो भवति । यथाऽटव्यां विषाण-
मात्रदर्शनाद् गौर्गवयो वेति । वाटान्तरितस्य पिण्डस्याप्रत्यक्षस्य सामान्येन विषाणमात्रदर्शना-
नुमितस्य संशयविषयत्वादप्रत्यक्षविषयोऽयं संशयः ।
प्रत्यक्षविषयेऽपि कथयति-स्थाणुपुरुषयोरित्यादिना । स्थाणुपुरुषयोः
सम्बन्धिनी योर्ध्वता तन्मात्रस्य प्रत्यक्षविषये पुरोवर्त्तिनि धर्मिणि दर्शनात् ।
वक्रादिविशेषानुपलब्धित इत्यादिपदेन शिरःपाण्यादिपरिग्रहः । 'वक्रकोटरादेः
कुछ इष्ट या अनिष्ट था, या है , अथवा होगा, और वे उस प्रकार सङ्घटित भी
हुए । फिर उसी प्रकार का निमित्त उपस्थित होते देखकर उस आदेशिक पुरुष को
अपने ज्ञान में यह संशय होता है कि मेरा वह नैमित्तिक ज्ञान था या मिथ्या ?
(१) प्रत्यक्ष के द्वारा जानने योग्य विषयों का और (२) अप्रत्यक्ष विषयों का
बाह्य संशय के ये दो भेद हैं । (गो और गवय) दोनों में साधारण रूप से
रहनेवाले धर्मों के ज्ञान से एवं पीछे दोनों के असाधारण धर्मों के स्मरण और
अधर्म से जङ्गल में केवल सींग देखने से जो पुरुष को 'यह गो है अथवा गवय'
इस आकार का संशय होता है, वह 'अप्रत्यक्ष विषयक संशय' है । यह अप्रत्यक्ष
विषयक इसलिए है कि विषाणरूप साधारण हेतु से अनुमित एवं रास्ते में छिपा
हुआ अप्रत्यक्ष पिण्ड (गो और गवय) उसका विषय है । 'स्थाणुपुरुषयोः' इत्यादि
ग्रन्थ से उस संशय का निरूपण किया है, जिसका विषय प्रत्यक्ष के द्वारा जाना
जाता है । स्थाणु और पुरुष दोनों में समान रूप से रहनेवाली जो ऊँचाई
(ऊर्ध्वता) है, आगे स्थित एवं प्रत्यक्ष के द्वारा गृहीत धर्मी में उसके प्रत्यक्ष से
'स्थाणुर्वा पुरुषः' यह संशय उत्पन्न होता है । एवं 'वक्रादिविशेषानुपलब्धितः' इस
वाक्य में 'आदि' पद से (पुरुष में रहनेवाले) शिर एवं हाथ-पैर प्रभृति धर्मों का
ग्रहण समझना चाहिए । अर्थात् वक्रता और कोटर प्रभृति स्थाणु के विशेष धर्मों
की अनुपलब्धि तथा शिर एवं पैर प्रभृति पुरुष के विशेष धर्मों की अनुपलब्धि से
प्रकृत में प्रत्यक्ष के द्वारा ज्ञात होनेवाले विषयों का संशय होता है ।
'स्थाणुत्वादिसामान्यविशेषानभिव्यक्तो' इस वाक्य में प्रयुक्त 'आदि' पद से
'पुरुषत्वादि' धर्मों का संग्रह अभीष्ट है । वक्रता और कोटर प्रभृति धर्म स्थाणुत्व
की अभिव्यक्ति के कारण हैं । शिर और पैर प्रभृति धर्म पुरुषत्व की अभिव्यक्ति के
कारण हैं । इन (स्थाणुत्व और पुरुषत्व के अभिव्यञ्जक) धर्मों की अनुपलब्धि के कारण