वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
by महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद
Source: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (origin)
About this granth
The Prashastapada Bhashya (प्रशस्तपादभाष्यम्), also titled Padarthadharmasangraha, is the most influential early work of the Vaisheshika school. Rather than glossing Kanada's sutras one by one, it sets out the system as a whole, examining the shared and distinct properties of the six categories: substance, quality, action, universal, particularity and inherence. Later Vaisheshika and Nyaya-Vaisheshika writing builds on it.
This edition is the first volume of the Ganganatha Jha Granthamala of Sampurnanand Sanskrit University, Varanasi. It prints the Bhashya with Shridhara Bhatta's classic Nyayakandali commentary and an introduction by Vice-Chancellor Dr. Mandan Mishra; Pt. Durgadhar Jha Sharma edited it and added a Hindi commentary. The scanned copy is the second edition of 1997.
The Hindi notes take up questions such as variant sutra numbering, the status of absence as a category, the qualities of earth, atomic combination, and fallacies of reason. It is a standard aid for advanced students of Indian philosophy.
२०६ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ द्रव्ये आत्म-
न्यायकन्दली
श्रोत्रेन्द्रियभावमापन्नस्य यश्शब्दो गुणो भवति स तद्विवरव्यापीत्यव्यभिचारः । इतोऽपि न
शरीरेन्द्रियगुणाः सुखादयो भवन्ति, अयावद्द्रव्यभावित्वात्, व्यतिरेकेण रूपादय एव
निदर्शनम् । इन्द्रियगुणप्रतिषेधे तु नायं हेतुः, श्रोत्रगुणेन शब्देनानैकान्तिकत्वात् । इतोऽपि
न शरीरेन्द्रियगुणाः सुखादयो बाह्येन्द्रियाप्रत्यक्षत्वात् । शरीरेन्द्रियगुणानां द्वयी गतिः-
अप्रत्यक्षता गुरुत्वादीनाम्, बाह्येन्द्रियप्रत्यक्षता रूपादीनाम् । विधान्तरन्तु सुखादयस्तस्मान्न
तद्गुणा इति शरीरेन्द्रियगुणत्वे प्रतिषिद्धे परिशेषात्तैरात्मानुमीयत इति स्थितिः ।
ननु सुखं दुःखञ्चेमौ विकाराविति नित्यस्यात्मनो न सम्भवतः । भवतश्चेत्
सोऽपि चर्म्मवदनित्यः स्यात् । न, तयोरुत्पादविनाशाभ्यां तदन्यस्यात्मनः
शरीरादि के गुण नहीं हैं') इसका साधक है । यद्यपि आकाशरूपी विभु-श्रोत्रेन्द्रिय
का विशेष गुण शब्द अव्याप्यवृत्ति प्रतीत होता है, तथापि विभु आकाश श्रोत्रेन्द्रिय
नहीं है; किन्तु कर्णशष्कुली से सीमित आकाश ही श्रोत्रेन्द्रिय है और इस आकाश
में शब्द व्याप्यवृत्ति ही है । अतः 'इन्द्रियादि के विशेष गुण अवश्य ही व्याप्यवृत्ति
होते हैं' इस नियम में कोई व्यभिचार नहीं है । 'सुखादि शरीर और इन्द्रियों के
गुण नहीं हैं' इसमें यह हेतु भी है कि 'वे अयावद्द्रव्यभावी' हैं (अर्थात् वे
आश्रयरूप द्रव्य के विद्यमान समय तक बराबर नहीं रहते ), अयावद्द्रव्यभावित्व
हेतु के न्याय-प्रयोग में भी रूपादि ही व्यतिरेक दृष्टान्त हैं । 'सुखादि इन्द्रिय के
विशेष गुण नहीं हैं' अयावद्द्रव्यहेतुक अनुमान इसका साधक नहीं है (इस
अनुमान से केवल यही सिद्ध होता है कि सुखादि शरीर के गुण नहीं हैं); क्योंकि
यह हेतु श्रोत्रेन्द्रिय के शब्दरूप गुण में व्यभिचरित है । इस हेतु से भी सुखादि
शरीर और इन्द्रियों के गुण नहीं हैं; क्योंकि सुखादि का बाह्य इन्द्रियों से प्रत्यक्ष
नहीं होता है । वस्तुस्थिति यह है कि शरीर और इन्द्रियों के गुण दो ही प्रकार के
हैं-(१) किन्हीं गुणों का तो किसी भी प्रकार प्रत्यक्ष ही नहीं होता है, जैसे कि
गुरुत्वादि का, या फिर (२) बाह्य इन्द्रियों से ही प्रत्यक्ष होता है, जैसे कि रूपादि
का । सुखादि दोनों प्रकारों से भिन्न तीसरे प्रकार के हैं, अतः शरीरादि के गुण
सुखादि नहीं हैं । इस प्रकार यह सिद्ध हो जाने पर कि 'सुखादि शरीर और
इन्द्रियों के गुण नहीं हैं' इन सुखादि हेतुओं से होनेवाले परिशेषानुमान से भी
आत्मा का अनुमान होता है ।
(प्र.) सुख और दुःख ये दोनों तो विकार हैं, अतः वे नित्य आत्मा के गुण नहीं
हो सकते, अगर विकारस्वरूप सुखादि भी आत्मा के गुण हों, तो फिर आत्मा चर्म
की तरह अनित्य वस्तु होगी । (उ.) नहीं, क्योंकि सुख और दुःख दोनों की
उत्पत्ति और विनाश से उन दोनों से भिन्न आत्मा के स्वरूप में कोई विघटन नहीं
प्रकरणम्] भाषाानुवादसहितम् २०७
प्रकरणम्] भाषाानुवादसहितम् २०७
न्यायकन्दली
स्वरूपप्रच्युतेरभावात् । नित्यस्य हि स्वरूपविनाशः स्वरूपान्तरोत्पादश्च विकारो नेष्यते,
गुणनिवृत्तिर्गुणान्तरोत्पादश्चाविरुद्ध एव । अथास्य नित्यस्य सुखदुःखाभ्यां किं क्रियते ?
स्वविषयोऽनुभवः । सुखदुःखानुभवे सत्यस्यातिशयानतिशयरहितस्य क उपकारः ?
अयमेव तस्योपकारोऽयमेव चातिशयो यस्मिन् सति सुखदुःखभोक्तृत्वम् ।
तथाहंशब्देनापीति । यथा सुखादिभिरात्मा अनुमीयते तथाहंशब्देनाप्यनुमीयते, अहंशब्दो
लोके वेदे चाभियुक्तैः प्रयुज्यमानो न तावन्निर्विषयेयः । न च स्वरूपमभिधेयं युक्तं
स्वात्मनि क्रियाविरोधात् । यथोक्तम्-'नात्मानमभिधत्ते हि कश्चिच्छब्दः कदाचन' ।
तस्माद् योऽस्याभिधेयः स आत्मेति । नन्वयं पृथिव्यादीनामेव वाचको भविष्यति तत्राह-
पृथिव्यादिशब्दव्यतिरेकादिति । यो यस्यार्थस्य वाचकः स तच्छब्देन समानाधिकरणो
दृष्टः, यथा द्रव्यं पृथिवीति । अहंशब्दस्य तु पृथिव्यादिवाचकैः शब्दैः सह व्यति-
हो सकता है । एक स्वरूपविनाश और दूसरे स्वरूप की उत्पत्ति ये दोनों विकार
तो नित्य वस्तुओं में होते नहीं हैं । एक गुण का नाश और दूसरे गुण की उत्पत्ति
ये दोनों विकार उसके नित्यत्व के विरोधी नहीं हैं । (प्र.) नित्य आत्मा को सुख
और दुःख से क्या होता है ? (उ.) सुख-दुःखादि का अनुभव होता है । (प्र.)
अतिशय (वैशिष्ट्य ) और अनतिशय से रहित आत्मा का सुख और दुःख के
अनुभव से क्या उपकार होता है ? (उ.) इनसे यही उपकार होता है और इनसे
आत्मा में यही अतिशय उत्पन्न होता है कि इन दोनों के रहने से ही सुख-दुःख के
भोक्तृत्व का व्यवहार उसमें होता है । "तथाऽहंशब्देनापि" जैसे कि सुखादि से
आत्मा का अनुमान होता है, वैसे ही 'अहम्' शब्द से भी आत्मा का अनुमान
होता है । लोक में और वेदों में प्रयुक्त 'अहम्' शब्द अपने वाच्य अर्थ से रहित
नहीं है और अपना स्वरूप (आनुपूर्वी) भी उसका वाच्य अर्थ नहीं है; क्योंकि
एक ही वस्तु में एक क्रिया का कर्तृत्व और कर्मत्व दोनों नहीं रह सकते; क्योंकि
वे दोनों परस्पर विरोधी हैं । जैसे कहा है कि 'कोई भी शब्द अपने स्वरूप
(आनुपूर्वी) को कभी भी अभिधावृत्ति से नहीं समझाते', अतः आत्मा ही 'अहम्'
शब्द का वाच्य अर्थ है । 'अहम्' शब्द पृथिव्यादि का वाचक हो सकता है ? इस
आक्षेप के समाधान में 'पृथिव्यादिशब्दव्यतिरेकात्' यह वाक्य कहा है । जो शब्द
जिस अर्थ का वाचक रहता है, वह उस अर्थ के वाचक दूसरे शब्द के साथ
'समानाधिकरण' अर्थात् अभेद का बोध करानेवाले रूप से प्रयुक्त होता है, जैसे
कि 'द्रव्यं पृथिवी' इत्यादि । 'अहम्' शब्द का पृथिव्यादि वाचक शब्दों के साथ
'व्यतिरेक' अर्थात् सामानाधिकरण्य नहीं है; क्योंकि 'अहं पृथिवी, अहमुदकम्'
इत्यादि प्रतीतियाँ नहीं होती हैं । अतः 'अहम्' शब्द पृथिव्यादि का वाचक नहीं है ।
२०८ न्यायकन्दलीसंवेलितःप्रशस्तपादभाष्यम् [ द्रव्ये आत्म-
प्रशस्तपादभाष्यम्
तस्य गुणा बुद्धिसुखदुःखेच्छाद्वेषप्रयत्नधर्म्माधर्म्मसंस्कारसङ्ख्या-
परिमाणपृथक्त्वसंयोगविभागाः । आत्मलिङ्गाधिकारे बुद्ध्यादयः
१. बुद्धि, २. सुख, ३. दुःख, ४. इच्छा, ५. द्वेष, ६. प्रयत्न, ७. धर्म्म,
८. अधर्म्म, ९. संस्कार, १०. संख्या, ११. परिमाण, १२. पृथक्त्व,
१३. संयोग और १४. विभाग ये चौदह गुण आत्मा के हैं । 'आत्मलिङ्गा-
धिकार' अर्थात् 'प्राणापानादि' (३।२।४) सूत्र के द्वारा बुद्धि से प्रयत्नपर्यन्त
न्यायकन्दली
रेकः समानाधिकरणत्वाभावः, अहं पृथिव्यहमुदकमिति प्रयोगाभावात्, तस्मान्नायं
पृथिव्यादिविषयः । ननु शरीरविषय एवायं दृश्यते स्थूलोऽहमिति ? न, अहं जानामि,
अहं स्मरामीति प्रयोगात् । शरीरस्य च ज्ञानस्मृत्यधिकरणत्वं निषिद्धम्, तस्मा-
दात्मोपकारकत्वेन लक्षणया शरीरे तस्य प्रयोगः, यथा भृत्येऽहमेवायमिति व्यपदेशः ।
एवं व्यवस्थिते सत्यात्मनो गुणान् कथयति- तस्य च गुणा इत्यादिना । बुद्ध्यादीना-
मात्मनि सद्भावे सूत्रकारानुमतिं दर्शयति- आत्मलिङ्गाधिकारे बुद्ध्यादयः प्रयत्नान्ताः
सिद्धा इति । आत्मलिङ्गाधिकार इति प्राणापानादिसूत्रं लक्षयति । धर्माधर्मावात्मान्तर-
गुणानामकारणत्ववचनादिति । धर्म्माधर्म्मावात्मान्तरगुणानामकारणत्वादिति वचनात्सिद्धौ ।
दातरि वर्त्तमानो दानधर्मः प्रतिग्रहीतरि अधर्मं जनयतीति कस्यचिन्मतं निषेद्धुं सूत्रकृतोक्तम्-
(प्र.) 'अहम्' शब्द तो शरीर के लिए ही प्रयुक्त दिखता है, जैसे कि
'स्थूलोऽहम्' इत्यादि । (उ.) नहीं, "अहं जानामि, अहं स्मरामि" इत्यादि भी
प्रयोग होते हैं । यह कह चुके हैं कि अनुभव और स्मृति शरीर के धर्म नहीं हैं,
अतः शरीर चूँकि आत्मा को उपकार पहुँचाने वाला है, अतः आत्मा के वाचक
'अहम्' शब्द का लक्षणावृत्ति से शरीर में भी प्रयोग होता है, जैसे कि भृत्य में
'यह मैं ही हूँ' यह प्रयोग होता है ।
इस प्रकार आत्मा की सिद्धि हो जाने पर 'तस्य च गुणाः' इत्यादि से
आत्मा के गुण कहे जाते हैं ! 'आत्मलिङ्गाधिकारे बुद्ध्यादयः प्रयत्नान्ताः सिद्धाः'
इत्यादि से आत्मा में बुद्ध्यादि गुणों की सत्ता में सूत्रकार की अनुमति सूचित करते
हैं । 'आत्मलिङ्गाधिकार' शब्द से 'प्राणापानादि' सूत्र सूचित होता है ।
'धर्माधर्मावात्मान्तरगुणानामकारणत्ववचनात्" अर्थात् "आत्मान्तरगुणानामात्मान्त-
रेऽकारणत्वात्" (६।१।५) सूत्रकार की इस उक्ति से आत्मा में धर्म और अधर्म
की सिद्धि समझनी चाहिए । किसी का कहना है कि दाता के दानजनित
धर्म से ग्रहण करनेवाले पुरुष में अधर्म की उत्पत्ति होती है, इस मत का
खण्डन करने के लिए सूत्रकार ने 'आत्मान्तरगुणानाम्' इत्यादि सूत्र लिखा
है । इस सूत्र का अभिप्राय है कि जैसे कि एक आत्मा का धर्मरूप गुण
प्रकरणम्] भाषाानुवादसहितम् २०९
प्रकरणम्] भाषाानुवादसहितम् २०९
प्रशस्तपादभाष्यम्
प्रयत्नान्ताः सिद्धाः । धर्म्माधर्म्मावात्मान्तरगुणानामकारणत्यवचनात् ।
संस्कारः, स्मृत्युत्पत्तौ कारणवचनात् । व्यवस्थावचनात् सङ्ख्या ।
छः गुण आत्मा में कहे गये हैं। यतः "आत्मान्तरगुणानामात्मान्तरेऽकारण-
त्वात्' (६।१।१५) इस सूत्र के द्वारा एक आत्मा के गुणों को दूसरी
आत्मा के गुणों का अकारण कहा गया है, इससे सिद्ध होता है कि धर्म
और अधर्म ये दोनों भी आत्मा के गुण हैं । महर्षि ने "आत्ममनसोः
संयोगविशेषात्संस्काराच्च स्मृतिः" (९।२।६) इस सूत्र के द्वारा संस्कार
को स्मृति का कारण कहा है, अतः आत्मा में संस्कार नामक गुण का
रहना भी उनको अभिप्रेत समझना चाहिए । "व्यवस्थातो नाना"
(३।२।२०) सूत्रकार की इस उक्ति से आत्मा में संख्या की सिद्धि समझनी
न्यायकन्दली
"आत्मान्तरगुणानामात्मान्तरगुणेष्वकारणत्वात्" इति। अस्यायमर्थः - आत्मान्तरगुणानां
सुखादीनामात्मान्तरगुणेषु सुखादिषु कारणत्वाभावाद्धर्म्माधर्म्मयोरन्यत्र वर्त्तमानयोरन्यत्रारम्भ-
कत्वमयुक्तमिति। एतेन धर्म्माधर्म्मयोरात्मगुणत्वं कथितम्, अन्यथा तयोः सुखादिसाधर्म्यकथ-
नेनानारम्भकत्वसमर्थनं न स्यात् । संस्कारः स्मृत्युत्पत्ताविति । आत्ममनसोः संयोगात्संस्कारा-
च्चेति स्मृतिसूत्रं लक्षयति । पूर्वानुभूतोऽर्थः स्मर्य्यते, न तत्रानुभवः कारणम्, चिरविनष्टत्वात्,
नाप्यनुभवाभावः कारणमभावस्य निरतिशयत्वेन पटुमन्दादिभेदानुपपत्तेरभ्यासवैयर्थ्याच्च ।
दूसरी आत्मा में सुख का उत्पादन नहीं कर सकता है, वैसे ही एक आत्मा का धर्म
या अधर्म दूसरी आत्मा में धर्म या अधर्म को भी उत्पन्न नहीं कर सकता । इससे
यह कथित हो जाता है कि 'धर्म और अधर्म आत्मा के गुण हैं' । अगर ये
आत्मा के गुण न हों तो फिर जैसे एक आत्मा में रहनेवाले सुखादि दूसरी
आत्मा में सुखादि के उत्पादक नहीं हैं, वैसे ही धर्म और अधर्म भी, तथा एक
आत्मा में रहनेवाले सुखादि भी, इस सादृश्य से दूसरी आत्मा में अधर्मादि के
उत्पन्न न होने का समर्थन असङ्गत हो जायगा । महर्षि कणाद ने संस्कार
को स्मृति का कारण कहा है, अतः आत्मा में संस्कार (भावना नाम का)
गुण भी समझना चाहिए । 'संस्कारः' इत्यादि भाष्य की पंक्ति "आत्ममनसोः
संयोगात्संस्काराच्च स्मृतिः" (९/२/६) इस सूत्र की ओर सङ्केत करती
है । पूर्वकाल में अनुभूत विषय की ही स्मृति होती है । स्मृति के प्रति
पूर्वानुभव कारण नहीं हो सकता है; क्योंकि स्मृति की उत्पत्ति से बहुत पहले
वह नष्ट हो जाता है । उस अनुभव का नाश भी उसका कारण नहीं
हो सकता है; क्योंकि अभाव में अर्थात् अनुभवनाशजनित अनुभव की असत्ता
रूप अभाव में और अनुभव की अनुत्पत्तिमूलक अनुभव की असत्ता रूप
२१० न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ द्रव्ये आत्म-
न्यायकन्दली
तस्मादनुभवेनात्मनि कश्चिदतिशयः कृतो यतः स्मरणं स्यादिति संस्कारकल्पना । ये तु
विनष्टमप्यनुभवमेव स्मृतेः कारणमाहुः, तेषां विनष्टमेव ज्योतिष्टोमादिकं स्वर्गादिफलस्य
साधनं भविष्यतीत्यदृष्टस्याप्युच्छेदः स्यात् । व्यवस्थावचनात् संख्येति । "नानात्मानो
व्यवस्थातः" इति सूत्रेणात्मनानात्वप्रतिपादनाद् बहुत्वसंख्या सिद्धेत्यर्थः ।
अथ केयं व्यवस्था ? नानाभेदभाविनां ज्ञानसुखादीनामप्रतिसन्धानम्, ऐकात्म्ये हि
यथा बाल्यावस्थायामनुभूतं वृद्धावस्थायामनुसन्धीयते मम सुखमासीन्मम दुःखमासीदिति,
एवं देहान्तरानुभूतमप्यनुसन्धीयते, अनुभवितुरेकत्वात् । न चैवमस्ति, अतः प्रतिशरीरं
नानात्मानः । यथा सर्वत्रैकस्याकाशस्य श्रोत्रत्वे कर्णशष्कुल्याद्युपाधिभेदाच्छब्दोपलब्धिव्यवस्था,
अभाव में कोई भी अन्तर नहीं है, अतः अधिक काल तक स्मरण रखने से 'पटु'
और थोड़े समय तक स्मरण रखने से मन्द, इस प्रकार की दोनों स्मृतियों में कोई
अन्तर नहीं रहेगा । एवं चिरकाल तक स्मरण रखने के लिए अभ्यास की भी
जरूरत नहीं रह जायगी, अतः संस्कार रूप अतिशय की कल्पना की जाती है ।
जो कोई विनष्ट अनुभव को ही स्मृति का कारण मानते हैं, उनके मत में विनष्ट
ज्योतिष्टोमादि याग से ही स्वर्गादि की उत्पत्ति माननी पड़ेगी । अतः उनके मत में
धर्म और अधर्म इन दोनों को भी मानने की आवश्यकता नहीं रहेगी । 'व्यवस्था
के रहने से संख्या भी' अर्थात् "व्यवस्थातो नाना" (३।२।२०) इस सूत्र से आत्मा
में नानात्व की सिद्धि की गयी है । इससे आत्मा में बहुत्व संख्या की भी सिद्धि
होती है ।
(प्र.) (आत्मा अनेक हैं) इसमें क्या युक्ति है ? (उ.) यही कि एक के
ज्ञान-सुखादि का दूसरे को स्मरण नहीं होता है । अर्थात् आत्मा अगर एक माना
जाय तो फिर बाल्यावस्था के विषय का जैसे वृद्धावस्था में स्मरण होता है कि
'मुझे दुःख था, मुझे सुख था' वैसे ही और देहों के द्वारा अनुभूत विषयों का
स्मरण भी हो; क्योंकि अनुभव करने वाला आत्मा सभी देहों में एक ही है; किन्तु
ऐसा नहीं होता । अतः प्रत्येक शरीर में रहनेवाले आत्मा भिन्न-भिन्न हैं । (प्र.)
जैसे यह नियम है कि आकाश के एक होने पर भी कर्णशष्कुली रूप उपाधि
से युक्त आकाश से ही शब्द सुना जाता है, वैसे ही आत्मा के एक होने पर
भी जिस देह रूप उपाधि से युक्त होकर वह (आत्मा) जिन सुखादि का
अनुभव करता है, उस देह रूप उपाधि से युक्त आत्मा ही उन सुखादि
का स्मरण भी करेगा दूसरा नहीं, यह व्यवस्था भी की जा सकती है । (इसके
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २११
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २११
न्यायकन्दली
तथात्मैकत्वेऽपि देहभेदादनुभवादिव्यवस्थेति चेत् ? विषमोऽयमुपन्यासः, प्रतिपुरुषं
व्यवस्थिताभ्यां धर्म्माधर्म्माभ्यामुपगृहीतानां शब्दोपलब्धिहेतूनां कर्णशष्कुलीनां व्यवस्था-
नायुक्ता तदधिष्ठाननियमेन शब्दग्रहणव्यवस्था । ऐकात्म्ये तु धर्म्माधर्म्मयोरव्यव-
स्थानाच्छरीरव्यवस्थाभावे किं कृता सुखदुःखोत्पत्तिव्यवस्था ? मनस्सम्बन्धस्यापि
साधारणत्वात् । यस्य तु नानात्मानः, तस्य सर्वेषामात्मनां सर्वगतत्वेन सर्वशरीर-
सम्बन्धेऽपि न साधारणो भोगः । यस्य कर्म्मणा यच्छरीरमारब्धं तस्यैव तदुपभोगायतनं न
सर्वस्य, कर्मापि यस्य शरीरेण तस्यैव तद्भवति नापरस्य, एवं शरीरान्तरनियमः
कर्म्मान्तरनियमादित्यादिः । अथ मतम्, एकत्वेऽपि परमात्मनो जीवात्मनां परस्परभेदाद्
व्यवस्थेति तदसत्, परमात्मनो भेदेऽद्वैतसिद्धान्तक्षतिः, "अनेन जीवेनात्मनानुप्रविश्य
नामरूपे व्याकरवाणि" इति जीवपरमात्मनोस्तादात्म्यश्रुतिविरोधाच्च । अविद्याकृतो
जीवपरमात्मनोर्भेद इति चेत् ? कस्येयमविद्या ? किं ब्रह्मणः ? किमुत जीवानाम् ?
के लिए आत्मा को नाना मानने की आवश्यकता नहीं है) । (उ.) प्रत्येक पुरुष के
शब्दोपलब्धि के अदृष्ट से कर्णशष्कुली रूप कारण की कल्पना की गयी है ।
अतः यह ठीक है कि उसी कर्णशष्कुली रूप उपाधि से युक्त आकाश
(श्रवणेन्द्रिय) से ही शब्द का प्रत्यक्ष होता है, औरों से नहीं; किन्तु आत्मा को एक
मान लेने से धर्म और अधर्म की कोई व्यवस्था नहीं रहेगी, फिर सुखदुःखादि की
भी व्यवस्था नहीं होगी, फिर सुखदुःखादि का भी नियम नहीं रहेगा; क्योंकि मन
का सम्बन्ध तो सभी देहों में समान ही है, अतः उक्त आक्षेप असङ्गत है ।
यद्यपि जिनके मत में आत्माएँ अनेक हैं, उनके मत में भी (व्यापक होने के
कारण प्रत्येक) आत्मा सभी मूर्त द्रव्यों के साथ सम्बद्ध है, फिर भी भोग के
सर्वसाधारणत्व की आपत्ति नहीं होती है; क्योंकि जिस आत्मा के कर्म (अदृष्ट)
से जो शरीर उत्पन्न होगा वह शरीर उसी आत्मा के भोग का 'आयतन'
होगा, दूसरी आत्माओं के भोग का नहीं एवं जिस आत्मा के शरीर से जो कर्म
(अदृष्ट) उत्पन्न होगा, वह कर्म उसी आत्मा का होगा और आत्माओं का नहीं ।
इसी प्रकार अन्य शरीर और अन्य कर्मों की भी व्यवस्था समझनी चाहिए । (प्र.)
जीवात्मा और परमात्मा ये दो मान लेने से ही (शरीर भेद से अनन्त जीव न
मानने पर भी) सभी व्यवस्थायें ठीक हो जाती हैं ? (उ.) यह मान लेने पर
भी अद्वैत सिद्धान्त तो विघटित हो ही जायगा । एवं 'अनेन जीवेन' इत्यादि
श्रुतियाँ भी विरुद्ध हो जायेंगी । (प्र.) जीव और ईश्वर वास्तव में तो अभिन्न ही
हैं; किन्तु 'अविद्या' से अर्थात् अज्ञान से दोनों में भेद की कल्पना की जाती है ।
(उ.) यह अविद्या किसकी ? जीव की ? या ब्रह्म की ? ब्रह्म की तो
२१२ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ द्रव्ये आत्म-
न्यायकन्दली
न तावद् ब्रह्मणोऽस्त्यविद्यायोगः, शुद्धबुद्धस्वभावत्वात् । जीवाश्रयाविद्येति चान्योन्या-
श्रयदोषपराहतम्, अविद्याकृतो जीवभेदो जीवाश्रयाविद्येति । बीजाङ्कुरवदनादिरविद्या
जीवप्रभेद इति चेत् ? बीजाङ्कुरव्यक्तिभेदवदविद्याजीवयोः पारमार्थिकत्वाभावानुपपन्नं
व्यक्तिभेदेन च बीजाङ्कुरयोरन्योन्यकारणता, जीवस्तु सर्वासु भवकोटिष्वेक एव,
मानुषपशुपक्ष्यादियोनिप्रत्यग्रजातस्य शिशोर्जातिसाम्यादाहारविशेषाभिलाषेण तासु तासु
जातिषु जन्मान्तरकृतस्य तत्तदाहारविशेषस्यानुमानपरम्परया तस्यानादिशरीरयोग-
प्रतीतेः, तत्राविद्याकृतो जीवभेदो जीवभेदाच्चाविद्येत्यसङ्गतिः । ब्रह्मवज्जीवस्याप्य-
नादिनिधनत्वेन ब्रह्मप्रतिबिम्बता, तस्मात् "तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं
विभाति" इति श्रुतिप्रामाण्यादनादिनिधनं ब्रह्मतत्त्वमेवेदं सर्वदेहेषु प्रतिभासत इति न
वाच्यम्, तथा सति चानुपपन्ना व्यवस्थितिरिति सूत्रं 'नानात्मानो व्यवस्थतः' इति ।
वह हो नहीं सकती है; क्योंकि वे शुद्ध, बुद्ध और मुक्तस्वभाव के हैं । अगर
अविद्या का आश्रय जीव को मानें, तो फिर अन्योन्याश्रय दोष होगा; क्योंकि
अविद्या से ही जीव की कल्पना की जाती है और वह अविद्या उसी में आश्रित
है । अविद्या के रहने से ही वह जीव होगा एवं जीव के रहने से ही अविद्या की
सत्ता रहेगी, इन दोनों में पहले कौन होगा ? और पीछे कौन ? यह निर्णय
असम्भव है, अतः इस निर्णय के बल पर कोई भी निर्णय सम्भव नहीं है । (प्र.)
बीज और अङ्कुर की तरह जीव और अविद्या का सम्बन्ध भी अनादि है । (उ.)
जब बीज और अङ्कुर नाम की दो स्वतन्त्र वस्तु है, तब यह स्वीकार करना
पड़ता है कि अङ्कुर के कारण बीज का भी कोई दूसरा अङ्कुर ही कारण है ।
अतः अन्योन्याश्रय से दूषित होते हुए भी बीज और अङ्कुर का सामान्य
कार्यकारणभाव मानना पड़ता है; किन्तु जीव और अविद्या वास्तव में दो व्यक्ति
नहीं हैं, अतः यहाँ अन्योन्याश्रयदोष को सह्य करना उचित नहीं है । (प्र.)
संसार के सभी देहों में जीव एक ही है । मनुष्य, पशु, पक्षी प्रभृति जिस योनि में
अभी उसका जन्म होता है, उस जाति के विशेष प्रकार के भोजन की अभिलाषा
से उस जीव में इससे पहले जन्म में भी इस प्रकार के आहार का अनुमान होता
है और यही अनुमान की परम्परा जीव में शरीर के अनादि सम्बन्ध को
प्रमाणित करती है । (उ.) इस पक्ष में भी अविद्या के कारण जीवों में भेद एवं
जीवभेद के कारण अविद्या, यह असङ्गति है ही । (प्र.) ब्रह्म की तरह जीव भी
आदि और अन्त से रहित है, फलतः जीव ब्रह्म का ही प्रतिबिम्ब है । "तमेव
भान्तम्" इत्यादि श्रुतियाँ भी इस अर्थ को पुष्ट करती हैं, अतः आदि और अन्त
से रहित ब्रह्मतत्त्व ही सभी देहों में प्रतिभासित होता है । (उ.) इस पक्ष में भी
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् २१३
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् २१३
प्रशस्तपादभाष्यम्
पृथक्त्वमप्यत एव । तथा चात्मेति वचनात् परममहत्परिमाणम् ।
चाहिए । यतः आत्मा में संख्या है, अतः पृथक्त्व भी अवश्य ही है ।
वैभव सूत्र (७।१।२२) में प्रयुक्त 'तथा चात्मा' इस उक्ति से आत्मा में
परममहत्परिमाण गुण का रहना भी महर्षि का अभिप्रेत समझना चाहिए ।
न्यायकन्दली
अभेदश्रुतयस्तु गौणार्था इति दिक् । न च नानात्वपक्षे सर्वेषां क्रमेण मुक्तावन्ते
संसारोच्छेदः, अपरिमितानामन्त्यन्यूनारिक्तत्वायोगात् । यदाहुर्वार्त्तिककारमिश्राः -
अत एव च विद्वत्सु मुच्यमानेषु सन्ततम् ।
ब्रह्माण्डलोके जीवानामनन्तत्वादशून्यता ॥
अन्त्यन्यूनारिक्तत्वे युज्यते परिमाणवत् ।
वस्तुन्यपरिमेये तु नूनं तेषामसम्भवः ॥ इति ।
पृथक्त्वमप्यत एव । "नानात्मानो व्यवस्थातः" इति वचनादेव पृथक्त्वं सिद्धम्, सङ्ख्या-
नुविधायित्वात्पृथक्त्वस्येत्यभिप्रायः । तथाचात्मेति वचनात्परममहत्परिमाणमिति। "विभववान्
महानाकाशस्तथा चात्मा" इति सूत्रकारवचनादाकाशवदात्मनोऽपि विभुत्वात् परममहत्परिमाणं
सिद्धमित्यर्थः । विभुत्वञ्चात्मनो वहेरूद्ध्र्वज्वलनाद् वायोस्तिर्यग्गमनादवगतम् । ते ह्यदृष्ट-
व्यवस्था की उक्त अनुपपत्ति रहेगी ही, अतः "नानात्मानो व्यवस्थातः" सूत्रकार
की यह उक्ति ठीक है । जीव और ब्रह्म में अभेद को प्रतिपादन करनेवाली श्रुतियाँ
गौण हैं । जीव को नाना मान लेने से इसका भी समाधान हो जाता है कि 'सभी
आत्माओं के मुक्त हो जाने पर अन्त में संसार का ही लोप हो जायगा'; क्योंकि
'अपरिमित' अर्थात् अनन्त वस्तुओं में अन्तिम, न्यूनत्व, अधिकत्व प्रभृति की चर्चा
ही नहीं उठती है । जैसा वार्त्तिककार मिश्र ने कहा है कि यतः जीव अनन्त हैं,
अतः बराबर ज्ञानी जीवों को मुक्त होते रहने पर भी यह संसार जीवों से शून्य
नहीं होता है । अन्तिम, न्यून और अधिक ये सभी बातें परिमित वस्तुओं की हैं,
अपरिमित वस्तुओं में ये सभी बातें असम्भव हैं ।
आत्मा में पृथक्त्व नाम के गुण की भी सिद्धि समझनी चाहिए; क्योंकि जहाँ पर
संख्या रहेगी वहाँ पर पृथक्त्व भी अवश्य ही रहेगा । "तथा चात्मा" (७।१।२२) वैभव
सूत्र में प्रयुक्त सूत्रकार की इस उक्ति से विभुत्व हेतु से आत्मा में भी आकाश की
तरह परममहत्परिमाण की सिद्धि होती है । आत्मा का विभुत्व आग की ऊर्ध्वगति
और वायु की कुटिल गति से समझते हैं; क्योंकि वे दोनों ही अदृष्टकृत हैं । उन गतियों
२१४ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ द्रव्ये आत्म-
न्याय्कन्दली
कारिते । न च तदाश्रयेणासम्बद्धमदृष्टं तयोः कारणं भवितुमर्हति, अतिप्रसङ्गात् । न
चात्मसमवेतस्यादृष्टस्य साक्षाद् द्रव्यान्तरसम्बन्धो घटत इति स्वाश्रयसम्बन्धद्वारेण तस्य
सम्बन्ध इत्यायातम् । ततः समस्तमूर्त्तद्रव्यसम्बन्धलक्षणमात्मनो विभुत्वं सिद्ध्यति ।
स्वभावत एव वह्नेरूर्ध्वज्वलनं नादृष्टादिति चेत् ? कोऽयं स्वभावो नाम ? यदि
वह्नित्वमुत दाहकत्वम् ? रूपविशेषो वा ? तप्तायःपिण्डे वह्नेरपि स्यात् ।
अथेन्धनविशेषप्रभवत्वं स्वभाव इति ? अनिन्धनप्रभवस्य विद्युदादिप्रभवस्य चौर्ध्वज्वलनं
न स्यात् । अथातीन्द्रियः कोऽपि स्वभावः कासुचिद् व्यक्तिष्वस्ति यासामूर्ध्वज्वलनं दृश्यत
इति, पुरुषगुणे कः प्रद्वेषः ? यस्य कर्म्मणो गुरुत्वद्रवत्ववेगा न कारणं तस्यात्मविशेष-
गुणादुत्पादः, यथा पाणिकर्म्मणः पुरुषप्रयत्नात्, ऊर्ध्वज्वलनतिर्यक्पवनादीनां कर्म्मणां
गुरुत्वादयो न कारणमभावात्, तत्कार्य्यविपरीतत्वाच्च । तस्मादेषामप्यात्मविशेष-
के आश्रयों में असम्बद्ध अदृष्ट उनके कारण नहीं हो सकते; क्योंकि ऐसा मानने
से अतिप्रसङ्ग होगा । एवं आत्मा में समवाय-सम्बन्ध से रहने के कारण अदृष्ट का
बाह्य वस्तुओं के साथ कोई भी साक्षात् सम्बन्ध नहीं हो सकता है, अतः यही
मानना पड़ेगा कि अदृष्ट के आश्रय आत्मा के साथ वह्निप्रभृति के सम्बन्ध होते
हैं । इस प्रकार तद्गत अदृष्ट के साथ भी उनका परम्परा सम्बन्ध होता है । अतः
मूर्त्त द्रव्यों के साथ आत्मा का सम्बन्ध अवश्य है और सभी मूर्त्त द्रव्यों के साथ
सम्बन्ध ही 'विभुत्व' है । (प्र.) 'स्वभाव' से ही वह्नि ऊपर की ओर जलती है,
इसमें अदृष्ट कारण नहीं है । (उ.) 'स्वभाव' शब्द का यहाँ क्या अर्थ है ? 'स्व'
वह्नि का जो 'भाव' अर्थात् धर्म वह तो (१) वह्नित्व, (२) दाहकत्व और (३)
विशेष प्रकार का रूप ये तीन ही हैं, 'स्वभाव' शब्द से इन तीनों धर्मों को कारण
मानने से तपे हुए लोहे का भी ऊर्ध्वज्वलन मानना पड़ेगा; क्योंकि उसमें भी
स्वभाव शब्द के उक्त तीनों अर्थ हैं । (प्र.) लकड़ी की आग ही ऊपर की तरफ
जलती है, अतः वह्नि का लकड़ी से उत्पन्न होना ही ऊर्ध्वज्वलन का कारणीभूत
'स्वभाव' है । (उ.) फिर इन्धन के बिना ही उत्पन्न विद्युत् प्रभृति वह्नि का
ऊर्ध्वज्वलन नहीं होगा । अगर किसी वह्नि में कोई ऐसा अतीन्द्रिय सामर्थ्य मानते
हैं, जिससे उसी वह्नि में ऊर्ध्वज्वलन होता. है, तो फिर जीव के अतीन्द्रिय धर्म
रूप अदृष्ट को ही अगर ऊर्ध्वज्वलन का कारण मानते हैं, तो आपको क्यों जलन
होती है ? जिस क्रिया का कारण गुरुत्व, द्रवत्व और वेग नहीं है, वह क्रिया
आत्मा के विशेष गुण से ही उत्पन्न होती है, जैसे कि पुरुष के प्रयत्न से उत्पन्न हाथ
की क्रिया । गुरुत्व, द्रवत्व या वेग वह्नि के ऊर्ध्वज्वलन या वायु की कुटिलगति
रूप क्रिया के कारण नहीं हैं; योंकि वे वहाँ नहीं हैं एवं उनसे होनेवाली क्रियायें भी
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २१५
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २१५
प्रशस्तपादभाष्यम्
सन्निकर्षजत्वात् सुखादीनां संयोगः । तद्विनाशकत्वाद्विभाग इति ।
संयोग से उत्पन्न होते हैं, अतः आत्मा में संयोग भी है । यतः विभाग
संयोग का नाशक है, अतः आत्मा में विभाग भी है ।
न्यायकन्दली
गुणादेवोत्पादो न्याय्यः । ऊर्ध्वज्वलनतिर्य्यक्पवनान्यात्मविशेषगुणकृतानि गुरुत्वादिकारणा-
भावे सति कर्मत्वात् पुरुषप्रयत्नजपाणिकर्म्मवत् ।
सन्निकर्षजत्वात्सुखादीनां संयोगः । सुखादीनामात्मगुणानां मनःसंयोगजत्वादात्मनि
संयोगः सिद्धः, व्यधिकरणस्यासमवायिकारणत्वाभावात् । तद्विनाशकत्वाद् विभाग इति ।
तस्य संयोगस्य विनाशकत्वाद् विभागः सिद्धः, आत्ममनसोर्नित्यत्वेनाश्रयविनाशस्य
विनाशहेतोरभावादित्यर्थः । नन्वात्मनि नित्ये स्थिते नित्यात्मदर्शिनः सुखतृष्णापरिप्लुतस्य
सुखसाधनेषु रागो दुःखसाधनेषु द्वेषस्ताभ्यां प्रवृत्तिनिवृत्ती, ततो धर्म्माधर्म्मौ, ततः संसार
इत्यादिरमोक्षः । नैरात्म्ये त्वहमेव नास्मि कस्य दुःखमित्यनास्थायां सर्वत्र रागद्वेषरहितस्य
प्रवृत्त्यादेरभावे सत्यपवर्गो घटत इति चेत्, न, नित्यात्मदर्शिनोऽपि विषयदोषदर्शनाद्
वैराग्योत्पत्तिद्वारेण तस्योत्पत्तिरित्यलम् ।
विलक्षण प्रकार की होती हैं, अतः यही न्यायसङ्गत है कि ऊर्ध्वज्वलनादि क्रियाओं
का कारण भी आत्मा का विशेषगुण ही हो । जिस प्रकार हाथ की क्रिया पुरुष में
रहने वाले प्रयत्न रूप विशेष गुण से उत्पन्न होती है, उसी प्रकार वह्नि की
ऊर्ध्वज्वलन रूप क्रिया एवं वायु की कुटिल गति रूपा क्रिया ये दोनों ही आत्मा के
विशेष गुण से उत्पन्न होती हैं; क्योंकि गुरुत्वादि उनके कारण वहाँ नहीं हैं, जैसे
कि पुरुष के प्रयत्न से उत्पन्न हाथ की क्रिया ।
'यतः सुखादि संयोग से उत्पन्न होते हैं, अतः संयोग भी आत्मा का गुण है';
क्योंकि 'व्यधिकरण' अर्थात् विभिन्न अधिकरणों में रहने वाले कारणों से उस
अधिकरण में कार्य की उत्पत्ति नहीं होती है । 'विभाग चूँकि संयोग का नाशक है,
अतः वह भी आत्मा का गुण है', अर्थात् विभाग संयोग का नाशक है इससे आत्मा
में विभाग नाम के गुण की भी सिद्धि समझनी चाहिए । अभिप्राय यह है कि आत्मा
और मन दोनों ही नित्य हैं, अतः सुखादि के कारणीभूत संयोग का नाश आश्रयों के
नाश से नहीं हो सकता, फलतः उक्त संयोग का नाश विभाग से ही मानना पड़ेगा ।
(प्र.) नित्य आत्मा के सिद्ध हो जाने पर नित्य आत्मा के ज्ञान से युक्त एवं
सुख की तृष्णा (एवं दुःख की वितृष्णा से) ओतप्रोत जीव का सुख के साधनों में
राग और दुःख के साधनों में द्वेष, राग से प्रवृत्ति एवं द्वेष से निवृत्ति एवं प्रवृत्ति
से धर्म और निवृत्ति से अधर्म और धर्माधर्म से संसार, इस प्रकार मोक्ष की ही अनुपपत्ति
होगी । अगर 'नैरात्म्य' अर्थात् आत्मा का विनाश मान लिया जाय 'जब हम ही नहीं तो
फिर दुःख किसको' ? इस प्रकार की अवज्ञा से पुरुष स्वभावतः राग और द्वेष से
२१६ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ द्रव्ये मनः-
प्रशस्तपादभाष्यम्
मनस्त्वयोगान्मनः । सत्यप्यात्मेन्द्रियार्थसान्निध्ये ज्ञानसुखादीनामभूत्वोत्पत्ति-
दर्शनात् करणान्तरमनुमीयते । श्रोत्राद्यव्यापारे स्मृत्युत्पत्ति-
मनस्त्वजाति के सम्बन्ध से मन का व्यवहार होता है । आत्मा
और इन्द्रिय का संयोग, विषय और इन्द्रिय का संयोग इन दोनों
के रहने पर भी किसी को ज्ञान सुखादि की उत्पत्ति कभी होती
है, कभी नहीं । अतः आत्मा, इन्द्रिय और विषय इन सबों से भिन्न
(ज्ञानादि के) कारण का अनुमान करते हैं, श्रोत्रादि इन्द्रियों के व्यापार
के न रहने पर भी स्मृति की उत्पत्ति होती है । एवं बाह्य इन्द्रियों से
न्यायकन्दली
प्रधानत्वात् प्रथममात्मानमाख्याय तदनन्तरं मनोनिरूपणार्थमाह-मनस्त्वयोगान्मन-
इति । व्याख्यानं पूर्ववत् । मनस्त्वं नाम सामान्यं मनोव्यक्तीनां भेदे स्थिते सत्यनुमेयम् ।
या हि समानगुणकार्या व्यक्तयस्तासु परं सामान्यं दृष्टं यथा घटादिषु, समानगुणकार्याश्च
मनोव्यक्तयस्तस्मात्तासु सद्भावे सामान्ययोगः । असिद्धे मनसि तस्य धर्मनिरूपणमन्याय्य-
मिति मत्वा तस्य सद्भावे प्रमाणमाह-सत्यप्यात्मेन्द्रियार्थसान्निध्ये इति । आत्मनस्तावत्
सर्वेन्द्रियैर्युगपत्सम्बन्धोऽस्त्येव, इन्द्रियाणामपि सन्निहितैरर्थैः सन्निकर्षो भवति, तथाप्येकस्मिन्
निवृत्त हो जायगा । राग और द्वेष से शून्य पुरुष को न किसी विषय में प्रवृत्ति
होगी न किसी से निवृत्ति । प्रवृत्ति और निवृत्ति के न रहने से धर्म और अधर्म
की धारा रुक जायेगी । इससे जन्म की धारा रुक जाएगी । इस प्रकार इस
(नैरात्म्य) पक्ष में अपवर्ग की उपपत्ति हो सकती है। (उ.) नित्य आत्मा के ज्ञान से
युक्त पुरुष को भी विषयों में दोष दीख पड़ते हैं, इस दोष-दर्शन से वैराग्य की
उत्पत्ति होती है, फिर मोक्ष की उत्पत्ति असम्भव नहीं है । अब इस विषय में
इतना ही बहुत है ।
आत्मा और मन इन दोनों में आत्मा ही प्रधान है, अतः आत्मा का निरूपण
करके बाद में 'मनस्त्वयोगात्' इत्यादि से मन का निरूपण करते हैं । इस पङ्क्ति
की व्याख्या 'आत्मत्वाभिसम्बन्धात्' इत्यादि पङ्क्तियों की तरह समझनी चाहिए ।
भिन्न-भिन्न मनोव्यक्तियों की सिद्धि हो जाने पर 'मनस्त्व' जाति का अनुमान करना
चाहिए । जिनसे समान रूप के (जितने भी) कार्य होते हैं एवं समान गुणवाले
जितने भी व्यक्ति हैं, उन सबों में एक परसामान्य देखा जाता है, जैसे कि घटादि
में। मनोव्यक्तियों में भी समान कार्य होते हैं एवं मनोव्यक्तियाँ भी समान गुणवाली
हैं, अतः उनमें भी एक परसामान्य अवश्य ही है । 'मन की सिद्धि के बिना उसके
गुणों का निरूपण सङ्गत नहीं है' यह मान कर ही 'सत्यप्यात्मेन्द्रियार्थसन्निकर्षो' इत्यादि
से मन की सत्ता में प्रमाण देते हैं । आत्मा का सभी इन्द्रियों के साथ एक ही काल में
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् २१७
न्यायकदली
विषये प्रतीयमाने विषयान्तरे ज्ञानसुखादयो न भवन्ति, तदुपरमाच्च भवन्तीति दृश्यते,
तद्दर्शनादात्मेन्द्रियार्थसन्निकर्षेभ्यः करणान्तरमनुमीयते यस्य सन्निधानाज्ज्ञानसुखादीनामुत्पत्तिः,
असन्निधानाच्चानुत्पत्तिः । आत्मेन्द्रियार्थसन्निकर्षाः कार्योत्पत्तौ करणान्तरापेक्षाः, सत्यपि
सद्भावे कार्यार्नुत्पादकत्वात् तन्त्वादिवत्, यच्च तदपेक्षणीयं तन्मनः । एकार्थोप-
लब्धिकालेऽनुपलभ्यमानस्याप्यर्थान्तरस्येन्द्रियसन्निकर्षोऽस्तीति किं प्रमाणम् ? इन्द्रिया-
धिष्ठानसन्निधिरेव । रूपोपलब्धिकाले गन्धादयोऽपि घ्राणादिभिः सन्निकृष्यन्ते, तदधिष्ठान-
सन्निहितत्वादुपलभ्यमानगन्धादिवत् । प्रमाणान्तरमप्याह-श्रोत्राद्यव्यापारे स्मृत्युत्पत्तिदर्शना-
दिति । स्मृतिस्तावदिन्द्रियजा ज्ञानत्वाद् गन्धादिज्ञानवत्, न चास्याः श्रोत्रादीनि
करणानि, बधिरादीनां श्रोत्रादिव्यापाराभावे तस्या उत्पत्तिदर्शनात् । तस्माद्यदस्याः करण-
मिन्द्रियं तन्मनः, न केवलं पूर्वस्मात्कारणात् करणान्तरानुमानं बाह्येन्द्रियैश्चक्षुरादिभि-
सम्बन्ध है ही, (क्योंकि आत्मा विभु है) इन्द्रियाँ भी समीप के अपने विषयों के
साथ सम्बद्ध हैं ही । तब भी जिस क्षण में एक ज्ञान की उत्पत्ति होती है, उस
क्षण में दूसरे ज्ञान या सुखादि रूप आत्मा के दूसरे विशेष गुणों की उत्पत्ति नहीं
होती । उस ज्ञान का नाश हो जाने पर दूसरे ज्ञान या सुखादि की उत्पत्ति देखी
जाती है । इससे ज्ञान के प्रति आत्मा और इन्द्रिय का सन्निकर्ष एवं विषय और
इन्द्रिय का सन्निकर्ष इन दोनों को छोड़कर तीसरे कारण का भी अनुमान होता है,
जिसके संनिहित रहने से दूसरे ज्ञान-सुखादि की उत्पत्ति होती है एवं जिसके
संनिहित न रहने पर नहीं होती है, अतः आत्मा और इन्द्रिय का सन्निकर्ष एवं
इन्द्रिय और विषय का सन्निकर्ष ये दोनों ज्ञानादि के उत्पादन में किसी और व्यक्ति
की भी अपेक्षा रखते हैं; क्योंकि उनके रहते हुए भी ज्ञानादि की उत्पत्ति नहीं
होती है, जैसे कि तन्तु प्रभृति से (ज्ञानादि की उत्पत्ति नहीं होती है) । उन संनिकर्षों
को ज्ञानादि के उत्पादन में जिसकी अपेक्षा होती है वही मन है । (प्र.) 'जिस समय
एक विषय की उपलब्धि होती है, उसी समय अनुपलब्ध दूसरे विषयों के साथ भी
इन्द्रियों का संनिकर्ष है' इसमें क्या प्रमाण है ? (उ.) इन्द्रियों के अधिष्ठान
(चक्षुर्गोलकादि आश्रय प्रदेश) ही प्रमाण हैं । जिस समय (चक्षु से) रूप की उपलब्धि
होती है, उसी समय घ्राणादि इन्द्रियों के साथ भी उनके विषय गन्धादि सम्बद्ध
रहते हैं; क्योंकि वे भी अपने ग्राहक घ्राणादि इन्द्रियों के अधिष्ठान के समीप हैं,
जैसे कि उपलब्धकालिक गन्धादि । 'श्रोत्राद्यव्यापारे' इत्यादि से मन की सत्ता में
और भी प्रमाण देते हैं । स्मृति भी इन्द्रिय से उत्पन्न होती है; क्योंकि वह भी ज्ञान है,
जैसे कि गन्धादि का ज्ञान । श्रोत्रादि इन्द्रियाँ स्मृति की हेतु नहीं हैं; क्योंकि श्रोत्रादि
व्यापार के न रहने पर भी बहरे व्यक्ति को भी स्मृति होती है, अतः स्मृति का
हेतु जो इन्द्रिय वही 'मन' है । केवल इन कहे हुए हेतुओं से ही मन का अनु-
२१८ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ द्रव्ये मनः-
प्रशस्तपादभाष्यम्
दर्शनाद् बाह्येन्द्रियैरगृहीतसुखादिग्राह्यान्तरभावाच्चान्तःकरणम् ।
गृहीत न होने वाले एवं दूसरे प्रकार से प्रत्यक्ष होने वाले सुखादि की
भी सत्ता है । इन दोनों से भी 'अन्तःकरण' (मन) का अनुमान होता है ।
न्यायकन्दली
रगृहीतानां सुखादीनां रूपाद्यपेक्षया ग्राह्यान्तराणां भावाच्च तदनुमानमित्याह – बाह्येन्द्रि-
यैरिति । सुखादिप्रतीतिरिन्द्रियजा, अपरोक्षप्रतीतित्वाद् रूपादिप्रतीतिवत्, यच्च तदिन्द्रियं
तन्मनः, चक्षुरादीनां तत्र व्यापाराभावात् । अभिन्नकारणत्वाज्ज्ञानात्मकाः सुखादयः
सुखसंवेदनानि (च) न कारणान्तरेण गृह्यन्त इति चेत्, न, ज्ञानस्वभावत्वे सुखदुःखयोर-
विशेषप्रसङ्गात् । परस्परभेदे च न तयोर्ज्ञानात्मकता, बोधाकारस्योभयसाधारणत्वेऽपि
सुखदुःखाकारयोः परस्परव्यावृत्तत्वात् । न चानयोर्ज्ञानानाभिन्नहेतुत्वम्, ज्ञानस्यार्थाकारा-
दुत्पत्तेः, तस्माच्च वासनासाहायात् सुखदुःखयोरुत्पादात्, अन्यथोपेक्षाज्ञानाभावप्रसङ्गात् ।
न च स्वसंवेदनं विज्ञानमित्यपि सिद्धम्, एकस्य कर्म्मकरणादिभावे दृष्टान्ताभावात्,
मान नहीं होता है; किन्तु 'बाह्य इन्द्रियों से' अर्थात् चक्षुरादि इन्द्रियों से जिन
सुखादि विषयों का प्रत्यक्ष नहीं हो सकता है, वे रूपादि से विलक्षण अर्थ, अथ च
प्रत्यक्ष योग्य सुखादि से भी मन का अनुमान होता है । यही बात 'बाह्येन्द्रियैः'
इत्यादि से कहते हैं । सुख की प्रतीति भी इन्द्रिय से होती है; क्योंकि वह भी
अपरोक्ष प्रतीति है, जैसे कि रूपादि की प्रतीति । सुखादि का प्रत्यक्ष करानेवाली
इन्द्रिय ही 'मन' है; क्योंकि (वहाँ) चक्षुरादि अन्य इन्द्रियों का व्यापार असम्भव
है । (प्र.) ज्ञान एवं सुखादि वस्तुतः अभिन्न हैं; क्योंकि एक ही सामग्री से इन
सबों की उत्पत्ति होती है, अतः सुख एवं उसके ज्ञान के लिए ज्ञान के उत्पादकों
को छोड़कर और किसी की अपेक्षा नहीं है । (उ.) सुखादि अगर ज्ञान स्वभाव
के होते तो सुख और दुःख में कोई अन्तर न रहता । सुख और दुःख परस्पर
भिन्न हैं तो फिर दोनों ज्ञान स्वभाववाले नहीं हो सकते । सुखादि में
ज्ञानाकारतारूप एक धर्म मान लेने पर भी उनमें से प्रत्येक में रहनेवाले
सुखाकारत्व एवं दुःखाकारत्व रूप विभिन्न धर्म तो परस्पर भिन्न हैं ही । (बौद्ध मत
में भी) केवल ज्ञान के कारण 'विज्ञान से सुख और दुःख की उत्पत्ति नहीं हो
सकती; क्योंकि विषयाकार विज्ञान से ज्ञान की ही उत्पत्ति होती है । विषयाकार
विज्ञान को ही जब वासना का साहाय्य मिलता है तो उससे सुख-दुःख की उत्पत्ति
(बौद्ध मत से) होती है, अगर ज्ञान के उत्पादक विषयाकार विज्ञान से ही सुख
और दुःख की भी उत्पत्ति मानें तो संसार से उपेक्षात्मक ज्ञान की सत्ता उठ
जायगी, (क्योंकि सुख और दुःख से भिन्न ज्ञान ही बौद्ध मत में उपेक्षा ज्ञान है) ।
विज्ञान 'स्वसंवेदन' अर्थात् 'स्वप्रकाश' ही है, इसमें भी कोई प्रमाण नहीं है;
क्योंकि इसमें कोई दृष्टान्त नहीं है कि एक ही वस्तु एक ही क्रिया का एक ही समय
प्रकरणम्] भाषाानुवादसहितम् २१९
प्रकरणम्] भाषाानुवादसहितम् २१९
न्यायकन्दली
स्वप्रकाशः प्रदीपोऽस्ति दृष्टान्त इति चेत्, नैवम्, सोऽपि हि पुरुषेण ज्ञायते ज्ञाप्यते
चक्षुषा । ज्ञानञ्च तस्य क्रिया, न च स्वयं करणं कर्ता कर्म्म क्रिया च भवति । यथात्म-
वादिनां स्वप्रतीतावात्मना युगपत्कर्म्मकर्तृभावः, तथा ज्ञानस्यापि करणादिभाव इति चेत्,
न, अविरोधात्, ज्ञानक्रियाविषयत्वं कर्म्मत्वमात्मनस्तस्यामेव च स्वातन्त्र्यात् कर्तृत्वम्, न
स्वातन्त्र्यविषयत्वयोरस्ति विरोधः । करणत्वं क्रियात्वन्तु सिद्धसाध्यत्वाभ्यामेकस्य परस्पर-
विरुद्धम्, कारणकरणयोरेकत्वाभावात् । एवं परप्रयोज्यता करणत्वमितराप्रयोज्यत्वं
कर्तृत्वमित्यनयोरपि विरोधः, विधिप्रतिषेधस्वभावत्वादित्यतो नैषामेकत्र सम्भवो युक्तः ।
अथ मतम्-न ज्ञानस्य करणाद्यभावः स्वसंवेदनार्थः; किन्तु स्वप्रकाशस्वभावस्य तस्योत्प-
त्तिरेव स्वसंवेदनमिति । अत्रापि निरूप्यते किं तदर्थस्य प्रकाशः ? स्वस्य वा ?
यद्यर्थस्य प्रकाशः, तदुत्पत्तेरर्थस्य संवेदनं स्यान्न तु स्वस्येति तस्यासंवेद्यतादोषः ।
में करण भी हो एवं कर्मादि अन्य कारक भी हो । (प्र.) स्वतः प्रकाश प्रदीप हो
इस विषय में दृष्टान्त हैं ? (उ.) नहीं, प्रदीप का ज्ञान पुरुष को होता है (अतः
वह उसका कर्त्ता है) । वह चक्षु से उत्पन्न होता है, अतः चक्षु उसका करण है
(वह ज्ञान प्रदीपविषयक होने के कारण प्रदीप कर्म है), वह क्रिया (धात्वर्थ) प्रदीप-
विषयक ज्ञान रूप है । अतः एक ही वस्तु एक ही समय में क्रिया, कर्त्ता, कर्म
और करण नहीं हो सकती है । (प्र.) आत्मवादियों (ज्ञानादि भिन्न स्थिर नित्य
आत्मा माननेवालों) के मत में एक ही आत्मतत्त्वज्ञान (क्रिया) का कर्तृत्व और
कर्मत्व दोनों एक ही समय में एक ही आत्मा में हैं ही, अतः कर्तृत्व और कर्मत्व
दोनों में कोई विरोध नहीं है, उसी प्रकार विज्ञानवादियों के मत में उपपत्ति हो
सकती है । (उ.) सविषयक (ज्ञानादि रूप) एक ही क्रिया का कर्तृत्व और कर्मत्व
ये दोनों विरुद्ध नहीं हैं; क्योंकि सविषयक ज्ञान क्रिया का विषयत्व ही उसका
कर्मत्व है एवं उसी क्रिया में स्वतन्त्रता है कर्तृत्व, ये दोनों ही आत्मा में रह सकते
हैं; किन्तु क्रियात्व एवं करणत्व ये दोनों परस्पर विरुद्ध हैं; क्योंकि करण सिद्ध
रहता है एवं क्रिया साध्य होती है, अतः एक ही व्यक्ति में क्रियात्व एवं करणत्व दोनों
नहीं रह सकते । करणत्व एवं कर्तृत्व ये दोनों भी परस्पर विरुद्ध हैं; क्योंकि करण
दूसरे के द्वारा प्रयुक्त होता है एवं कर्त्ता दूसरे कारकों से बिलकुल ही अप्रयोज्य होता
है, अर्थात् स्वतन्त्र होता है । अतः ये दोनों भी एक समय में एक नहीं रह सकते ।
(प्र.) ज्ञान के प्रकाश के लिए करणादि का अभाव कभी हो ही नहीं सकता; क्योंकि
ज्ञान की उत्पत्ति ही उसका प्रकाश है । (उ.) इस विषय में यह पूछना है कि ज्ञान अपने
विषयों का प्रकाश रूप है ? या 'स्वसंवेदन', 'स्व' अर्थात् अपना ही प्रकाश रूप है ?
अगर अर्थ प्रकाश रूप है तो फिर उससे अर्थ का ही 'संवेदन' अर्थात् प्रकाश होगा,
२२० न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ द्रव्ये मनः-
न्यायकन्दली
अथेदं स्वस्य प्रकाशः, तदेव प्रकाश्यं प्रकाशश्चेति क्रियाकरणयोरेकत्वं तदवस्थम् । न च
स्योत्पत्तिरेव स्वात्मनि क्रियेत्यपि निदर्शनमस्ति । यदपि स्वसंवेदनासिद्धौ प्रमाणमुक्तं
यद्यदायत्तप्रकाशं तत्तस्मिन् प्रकाशमाने प्रकाशते, यथा प्रदीपायत्तप्रकाशो घटः, ज्ञानायत्त-
प्रकाशश्च रूपादय इति । तत्रापि यदि ज्ञानमेवार्थप्रकाशोऽभिमतः, तदा तदायत्तप्रकाशा
रूपादय इत्यसिद्धमनैकान्तिकञ्चेन्द्रियेण ।
अथ च ज्ञानजन्योऽर्थप्रकाशो न तु ज्ञानमेवार्थप्रकाशस्तदा दृष्टान्ताभावः, ज्ञानजन-
कस्य प्रदीपस्यार्थप्रकाशकत्वाभावात् । एतेनैतदपि प्रत्युक्तम्-"अप्रत्यक्षोपलम्भस्य नार्थ-
दृष्टिः प्रसिद्धयति" इति । न हि ज्ञानस्य प्रत्यक्षतार्थस्य दर्शनम्; किन्तु विज्ञान-
स्योत्पत्तिः, तत्रासंविदितेऽपि ज्ञाने तदुत्पत्तिमात्रेणैवार्थस्य संवेदनं सिद्धयति । कथमन्य-
स्योत्पत्तिरन्यस्य संवेदनमिति चेत् ? किं कुर्मो वस्तुस्वभावत्वात् । न चैवं सति सर्वस्य
संवेदनम् ? तस्य स्वकारणसामग्रीनियमात् प्रतिनियतार्थसंवित्तिस्वभावस्य प्रतिनियतप्रति-
पत्तृसंवेद्यतयैव चोत्पादात् ।
'स्व' अर्थात् ज्ञान का नहीं, अतः ज्ञान को अर्थप्रकाश रूप मानने से बौद्ध मत में
ज्ञान 'असंवेद्य' अर्थात् अतीन्द्रिय हो जायगा । अगर ज्ञान को 'स्व' का ही
प्रकाशक मानें तो फिर एक ही वस्तु प्रकाश्य और प्रकाशक दोनों ही होगी, अतः
इस पक्ष में भी करणत्व और क्रियात्व रूप दो विरुद्ध धर्मों का समावेश रूप
असामञ्जस्य है ही । 'स्व' की उत्पत्ति ही 'स्व'रूपा क्रिया है, इसमें कोई दृष्टान्त
नहीं है । 'स्वसंवेदन' अर्थात् ज्ञान के स्वप्रकाशत्व में जो यह युक्ति दी जाती है ।
(प्र.) जिसका प्रकाश जिसके अधीन रहता है, उस प्रकाशक के प्रकाशित होने पर
वह (प्रकाश्य) भी प्रकाशित हो जाता है, जैसे कि प्रदीप से प्रकाशित होने वाले
घटादि एवं ज्ञान से प्रकाशित होने वाले रूपादि । (उ.) इस विषय में यह पूछना है
कि 'प्रकाश' शब्द से अगर रूपादि विषय का ज्ञान ही इष्ट है, तो फिर यह सिद्ध
नहीं होता कि रूपादि का प्रकाश ज्ञान के अधीन है । अतः उक्त हेतु इन्द्रियों में
व्यभिचरित है । अगर यह कहें कि (प्र.) ज्ञान अर्थ-प्रकाश रूप नहीं है; किन्तु
ज्ञान से अर्थ का प्रकाश होता है, (उ.) तो फिर इस विषय में कोई दृष्टान्त
नहीं मिलेगा; क्योंकि प्रदीप में अर्थ को प्रकाशित करने का सामर्थ्य नहीं है ।
चूँकि ज्ञान को ही अर्थ का प्रकाशक माना है । (प्र.) अप्रत्यक्ष ज्ञान से अर्थ
प्रकाशित नहीं होता है । (उ.) ज्ञान का प्रत्यक्षत्व और अर्थ का प्रकाशन दोनों
एक नहीं हैं, अतः ज्ञान का प्रत्यक्ष न होने पर भी उसकी उत्पत्ति से ही अर्थ
प्रकाशित हो जाता है, (फलतः ज्ञान की उत्पत्ति ही अर्थ का प्रकाश है) । (प्र.)
एक वस्तु की उत्पत्ति दूसरे की उत्पत्ति कैसे हो सकती है ? (उ.) इसके लिए हम
क्या करें ? यह तो वस्तुओं के स्वभाव के अधीन है । (प्र.) इस प्रकार से तो
सभी अर्थों का प्रकाशन होना चाहिए ? (उ.) वह तो अपने विलक्षण कारणसमूह
रूप सामग्री के अधीन है, जिससे कि कुछ नियमित विषयों का ज्ञान कुछ
नियमित ज्ञाताओं को ही होता है ।
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् २२१
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् २२१
प्रशस्तपादभाष्यम्
तस्य गुणाः संख्यापरिमाणपृथक्त्वसंयोगविभागपरत्वापरत्वसंस्काराः ।
प्रयत्नज्ञानायौगपद्यवचनात् प्रतिशरीरमेकत्वं सिद्धम् । पृथक्त्व-
मन के संख्या, परिमाण, पृथक्त्व, संयोग, विभाग, परत्व, अपरत्व
और संस्कार ये आठ गुण हैं । चूँकि सूत्रकार ने कहा है (३/२/३)
कि प्रयत्न और ज्ञान एक क्षण में (एक आत्मा में) नहीं होते,
अतः सिद्ध होता है कि प्रति शरीर में एक-एक मन है ।
एकत्व संख्या के रहने से ही उसमें पृथक्त्व गुण की भी सिद्धि
न्यायकन्दली
अपरे पुनरेवमाहुः-ज्ञानसंसर्गाद्विषये प्रकाश्यमाने प्रकाशस्वभावत्वात् प्रदीपवद्विज्ञानं
प्रकाशते, प्रकाशाश्रयत्वात् प्रदीपवर्तिवदात्माऽपि प्रकाशत इति त्रिपुटीप्रत्यक्षतेति । तदप्य-
सत्, घटोऽयमित्येतस्मिन् प्रतीयमाने ज्ञातृज्ञानयोरप्रतिभासनात् । यत्र त्वनयोः प्रतिभासो
घटमहं जानामीति, तत्रोत्पन्ने ज्ञाने ज्ञातृज्ञानविशिष्टस्यार्थस्य मानसप्रत्यक्षता । न तु
ज्ञातृज्ञानयोश्चाक्षुषज्ञाने प्रतिभासः, तयोरपि चाक्षुषत्वप्रसङ्गात् ।
तदेवं सिद्धे मनसि तस्य गुणान् प्रतिपादयति-तस्य गुणा इत्यादिना ।
सङ्ख्याद्यष्टगुणयोगोऽपि मनसो वैधर्म्यम् । सङ्ख्यासद्भावं कथयति-प्रयत्नेत्यादिना ।
प्रतिशरीरमेकं मन आहोस्विद्वनेकमिति संशये सति सूत्रकृतोक्तम्-"प्रयत्ना-
कोई कहते हैं कि (प्र.) जब ज्ञान के सम्बन्ध से विषय प्रकाशित होता है,
उसी समय 'प्रकाशस्वभाव' के कारण ज्ञान भी प्रदीप की तरह प्रकाशित हो जाता
है एवं प्रकाश का आश्रय होने के कारण जैसे प्रदीप भी प्रकाशित होता है, वैसे ही
प्रकाश रूप ज्ञान के प्रकाशित होने पर आत्मा भी प्रकाशित होता है । इस प्रकार
ज्ञान, ज्ञाता और ज्ञेय इन तीनों 'पुटों' से युक्त होने के कारण प्रत्यक्षता 'त्रिपुटी'
है । (उ.) किन्तु यह कहना ठीक नहीं है; क्योंकि 'यह घट है' इस प्रकार का
प्रत्यक्ष होने पर भी उसमें ज्ञान और ज्ञाता प्रतिभासित नहीं होते । 'घट को मैं
जानता हूँ' इत्यादि जिन ज्ञानों से वे प्रकाशित होते हैं, वे घटप्रत्यक्ष के बाद ज्ञान
और ज्ञाता विशिष्ट घटादिविषयक और ही मानस प्रत्यक्षात्मक ज्ञान हैं; किन्तु
पहले के घटादिविषयक चाक्षुष प्रत्यक्ष में ही ज्ञान और ज्ञाता ये दोनों भी विषय
नहीं होते; क्योंकि तब ज्ञाता और ज्ञान इन दोनों को भी चाक्षुष प्रत्यक्ष का विषय
मानना पड़ेगा ।
इस प्रकार मन के सिद्ध हो जाने से पर 'तस्य गुणाः' इत्यादि से मन का गुण
कहते हैं । संख्यादि आठ गुणों का सम्बन्ध मन का 'वैधर्म्य' अर्थात् असाधारण
धर्म है । 'प्रयत्न' इत्यादि से 'मन में संख्यादि आठ गुणों का सम्बन्ध है' इसमें प्रमाण
देते हैं । 'प्रति शरीर में मन एक है या अनेक ?' इस संशय में सूत्रकार ने कहा है कि
२२२ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ द्रव्ये मनः-
न्यायकन्दली
यौगपद्याज्ज्ञानायौगपद्याच्च प्रतिशरीरमेकं मनः" इति । तेन प्रतिशरीरमेकत्वं सिद्धमिति ।
मनोबहुत्वे ह्यात्ममनःसंयोगानां बहुत्वायुगपज्ज्ञानानि प्रयत्नाश्च भवेयुः, दृश्यते च क्रमो
ज्ञानानामेकोपलब्धव्यासक्तेन विषयान्तरानुपलम्भाद् निवृत्तव्यासङ्गेन चोपलम्भादित्युक्तम् ।
एवं प्रयत्नानामपि क्रमोत्पाद एव, एकत्र प्रयतमानस्यान्यत्र व्यापाराभावात्, समाप्तक्रियस्य
च भावात्, तस्मादेकं मनः । तस्यैकत्वे कल्प्येक एवैकदा संयोग इत्येकमेव ज्ञानमेकः
प्रयत्न इत्युपपद्यते । यस्तु क्वचिद्युगपदभिमानस्तदलातचक्रवदाशुभावात्, न तु तात्त्विकं
यौगपद्यमेकत्र दृष्टेन कार्यक्रमेणान्यत्रापि करणस्य तस्यैव सामर्थ्यानुमानात् ।
नन्वेवं तर्हि द्वाविमावर्थौ पुष्पितास्तरव इत्यनेकार्थप्रतिभासः कुतः ?
कुतश्च स्वशरीरस्य सह प्रेरणधारणे, न; अर्थसमूहालम्बनस्यैकज्ञानस्याप्रतिषेधाद्
बुद्धिभेद एव, न तु तथा प्रतिभासः, सर्वासा मेकैकार्यनियतत्वात् । एवं शरीरस्य
चूँकि एक काल में (एक आत्मा में) दो ज्ञानों और दो प्रयत्नों की उत्पत्ति नहीं
होती है, अतः 'एक शरीर में एक ही मन है' इस कथन से (एकशरीरस्थ) मन में
एकत्व संख्या की सिद्धि होती है । अभिप्राय यह है कि (एक ही शरीर में) अगर
अनेक मन माने जायें तो मन और आत्मा के संयोग भी उतने ही होंगे, फिर उन
संयोगों से (एक ही आत्मा में एक साथ) अनेक ज्ञान एवं अनेक प्रयत्नों की
उत्पत्ति होनी चाहिए; किन्तु ज्ञानादि की उत्पत्ति क्रमशः ही देखी जाती है; क्योंकि
एक प्रयत्न के समय अन्य विषयों के व्यापार नहीं देखे जाते । उस प्रयत्न
जनित व्यापार के समाप्त होने पर फिर अन्य विषयक व्यापार भी होते हैं, अतः
(एक शरीर में) एक ही मन है । उसे एक मान लेने पर आत्मा और मन का
संयोग भी एक ही होगा, अतः एक क्षण में एक ही ज्ञान और प्रयत्नादि की
उत्पत्ति होगी । कभी-कभी एक ही क्षण में अनेक ज्ञानों और अनेक प्रयत्नों की
जो उत्पत्ति दीख पड़ती है, वह भी एक ही क्षण में नहीं होती है; किन्तु अलातचक्र
भ्रमण की तरह क्रमशः ही होती है । यह और बात है कि अतिशीघ्रता के कारण
वह क्रम समझ में नहीं आता है । एक स्थान पर देखे हुए कार्य के क्रम से
दूसरी जगह भी उन्हीं सामर्थ्य से युक्त कारणों का अनुमान होता है । (प्र.)
तो फिर 'ये दो वस्तुएँ हैं, ये वृक्ष फूले हैं' इत्यादि अनेक विषयों का ज्ञान
एवं एक समय अपने शरीर में धारण और प्रेरण आदि क्रियायें कैसे होती हैं ?
(उ.) अनेक विषयक एक समूहालम्बन ज्ञान का खण्डन करना उक्त कथन
का अभिप्राय नहीं है, किन्तु एक क्षण में अनेक ज्ञानों की उत्पत्ति का खण्डन
करना ही उसका अभिप्राय है; चाहे वे एक ही विषयक क्यों न हों ? अगर
उक्त (समूहालम्बन) ज्ञान विभिन्न विषयक अनेक ज्ञान ही होते तो फिर
उनके आकार भी परस्पर विलक्षण ही होते; क्योंकि वे सभी परस्पर विभिन्न
व्यक्तियों में नियत होते हैं । इसी प्रकार विशेष प्रकार के एक ही प्रयत्न से शरीर
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २२३
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २२३
प्रशस्तपादभाष्यम्
मप्यत एव । तदभाववचनादणुपरिमाणम् । अपसर्पणोपसर्पणवचनात्संयोग-
होती है। "तदभाववचनादणु मनः" (७/१/२२) सूत्रकार की इस उक्ति से मन में
अणु परिमाण की सिद्धि होती है। अपसर्पणोपसर्पण 'वचन से अर्थात् 'अपसर्पण-
मुपसर्पणमाशितपीतसंयोगवत् कायान्तरसंयोगश्चादृष्टकारितानि' (५/२/१७)
न्यायकन्दली
प्रेरणधारणे च प्रयत्नविशेषादेकस्मादेव भवतः, यधानेकविषयमेकं ज्ञानं तथा तत्कारणा-
विच्छाप्रयत्नावपीति न किञ्चिद् दुरुपपादम् । पृथक्त्वमप्यत एवेति । सङ्ख्यानुविधानादेव
पृथक्त्वमपि सिद्धमित्यर्थः । तदभाववचनादणुपरिमाणम् । विभववान्महानाकाशस्तथा
चात्मेत्यभिधाय तदभावादणु मन इत्युक्तम् । तस्मादणुपरिमाणं मन इति सिद्धम् ।
नित्यद्रव्यगतस्य विभवाभावस्य अणुपरिमाणत्वाव्यभिचारात् । विभवाभावश्चास्य
युगपज्ज्ञानानुपपत्तैव समधिगतः । मनसो विभुत्वे युगपत्समस्तेन्द्रियसम्बन्धाच्चक्षु-
रादिसन्निकृष्टेषु रूपादिषु ज्ञानयौगपद्यं स्यात् । अथ कथमेकेन्द्रियग्राह्येषु घटादिषु
मनोधिष्ठितेन चक्षुषा युगपत्सन्निकृष्टेषु ज्ञानानि युगपन्न भवन्ति ? आत्मैन्द्रियार्थ-
सन्निकर्षाणां यौगपद्यान्न भवन्ति । तावदनेनात्ममनः संयोगस्यैकस्य युगपदनेकस्य ज्ञानस्यो-
त्पादनसामर्थ्याभावः कल्प्यत इति चेत् ? समानमेतद्विभुत्वेऽपि मानसः, तस्माद्विभुत्वेऽपि
का धारण और प्रेरण दोनों ही होंगे । जैसे कि एक ही सामग्री से अनेक विषयक
एक ज्ञान की उत्पत्ति होती है, वैसे ही एक ही इच्छा और प्रयत्नवाली सामग्री से
धारण और प्रेरण दोनों की उत्पत्ति होगी, इसमें कुछ भी असङ्गति नहीं है । 'अत
एव मन में पृथक्त्व भी है', अर्थात् चूँकि मन में संख्या है, अतः उसमें पृथक्त्व भी
है । उसके 'अभाव' के कहने से मन में अणु परिमाण भी है, अर्थात् महर्षि
कणाद ने विभवसूत्र के बाद कहा है कि 'तदभावादणु मनः', इसमें मन में अणु
परिमाण की सिद्धि होती है । 'जो नित्य द्रव्य विभु न हो वह अवश्य ही अणु
परिमाण का हो' इस नियम में कोई व्यभिचार नहीं है । एक क्षण में एक आत्मा
में अनेक ज्ञानों की उत्पत्ति नहीं होती है, इसी से समझते हैं कि मन विभु नहीं
है । अगर मन विभु हो तो फिर एक ही क्षण में अनेक इन्द्रियों के साथ
सम्बद्ध होने के कारण चक्षुरादि इन्द्रियों के साथ सम्बद्ध रूपादिविषयक अनेक
ज्ञानों की उत्पत्ति हो जायगी । (प्र.) (हर एक शरीर में एक-एक ही मन मान
लेने पर भी) एक ही इन्द्रिय से सम्बद्ध घटादिविषयक अनेक ज्ञानों की उत्पत्ति
क्यों नहीं होती है ? क्योंकि आत्ममनःसंयोग इन्द्रिय का मन के साथ संयोग, एवं
अनेक विषयों के साथ इन्द्रिय का संयोग ये सभी तो एक ही क्षण में हैं ही ।
अगर यह कल्पना करें कि 'उस सामग्री को एक क्षण में एक ही ज्ञान को उत्पन्न
करने का सामर्थ्य है, अनेक ज्ञानों को उत्पन्न करने का नहीं, तो फिर ज्ञान-यौगपद्य
२२४ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ द्रव्ये मनः
न्यायकन्दली
युक्त्यन्तरं वाच्यम् । तदुच्यते-विभुत्वादात्ममनसोः परस्परसंयोगाभावे सत्यात्मगुणानां
ज्ञानसुखादीनामनुत्पत्तिरसमवायिकारणाभावात् । आत्मार्थसंयोगस्य ह्यसमवायिकारण-
त्वेऽर्थदेशे ज्ञानोत्पत्तिः स्यादसमवायिकारणाव्यवधानेन प्रदेशवृत्तीनां गुणानामुत्पादात् ।
आत्मेन्द्रियसंयोगस्यासमवायिकारणत्वे शब्दज्ञानानुत्पत्तिः, आकाशात्मकेन श्रोत्रेणात्मनः
संयोगाभावात् । न च बहिर्देशे प्रत्ययो नापि शब्दज्ञानानुत्पादः, तस्मादात्मार्थसंयोगस्या-
त्मेन्द्रियसंयोगस्य चासमवायिकारणत्वे प्रतिषिद्धे परिशेषादात्ममनःसंयोगस्यासमवायि-
कारणत्वं व्यवतिष्ठते, तच्च मनसो व्यापकत्वे न सम्भवतीत्यनुत्पत्तिरेव ज्ञानसुखादीनाम्,
अस्ति च तेषामुत्पादः स एव मनसो विभुत्वं निवर्तयतीति । अपसर्पणोपसर्पणवचनात्
संयोगविभागाविति । "अपसर्पणमुपसर्पणमशितपीतसंयोगवत् कायान्तरसंयोगश्चादृष्ट-
का वारण मन को विभु मान लेने पर भी हो सकता है, इसके लिए मन को अणु
मानना व्यर्थ ही होगा, अतः 'मन विभु नहीं है' इसके लिए दूसरी युक्ति कहनी
चाहिए । (उ.) कहते हैं, आत्मा और मन ये दोनों ही अगर विभु हों तो फिर इन
दोनों का संयोग ही नहीं होगा और उन दोनों के संयोग न होने पर आत्मा के विशेष
गुण ज्ञानसुखादि की उत्पत्ति ही नहीं होगी; क्योंकि उसका कोई असमवायिकारण
नहीं होगा । आत्मा और विषय इन दोनों के संयोग को अगर ज्ञानसुखादि का
असमवायिकारण मानें तो फिर उस विषय के देश में ही ज्ञानादि की उत्पत्ति
माननी पड़ेगी; क्योंकि प्रादेशिक (अव्याप्यवृत्ति) गुणों का यह स्वभाव है कि वे
असमवायिकारण के अव्यवहित प्रदेश में ही उत्पन्न हों । आत्मा एवं (श्रोत्रादि)
इन्द्रियों के संयोग को ही अगर आत्मा के उन ज्ञानादि गुणों का असमवायिकारण
मानें तो शब्दज्ञान की ही अनुत्पत्ति माननी पड़ेगी; क्योंकि आकाशात्मक (विभु)
श्रोत्र के साथ (विभु) आत्मा का संयोग ही असम्भव है, तस्मात् भूतलादि प्रदेशों में
ज्ञानादि गुणों की उत्पत्ति नहीं होती है एवं शब्दादि गुणों की उत्पत्ति होती है । इन
(अनुत्पत्ति और उत्पत्ति) दोनों से यह सिद्ध होता है कि आत्मा के साथ विषयों के
संयोग एवं इन्द्रियों के साथ आत्मा का संयोग, ये दोनों आत्मा के विशेष गुणों के
असमवायिकारण नहीं हैं । अतः आत्मा और मन का संयोग ही उनका
असमवायिकारण है । यह (असमवायिकारण) संयोग मन को विभु मानने पर
असम्भव होगा, फलतः ज्ञान की उत्पत्ति अनुपपन्न हो जायगी; किन्तु ज्ञान की
उत्पत्ति होती है, अतः ज्ञानसुखादि की उत्पत्ति से ही मन से विभुत्व हट जाता है ।
"अपसर्पण और उपसर्पण के कहने से मन में संयोग और विभाग भी
हैं", अर्थात् सूत्रकार ने लिखा है कि "अपसर्पणमुपसर्पणमशितपीतसंयोगवत्
कायान्तरसंयोगश्चादृष्टकारितानि"। अभिप्राय यह है कि मन का एक
शरीर से 'अपसर्पण' अर्थात् हटना एवं 'उपसर्पण' अर्थात् दूसरे शरीर
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २२५
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २२५
प्रशस्तपादभाष्यम्
विभागौ । मूर्त्तत्वात्परत्वापरत्वे संस्कारश्च । अस्पर्शवत्त्वाद् द्रव्यानारम्भ-
कत्वम् । क्रियावत्त्वान्मूर्त्तत्वम् । साधारणविग्रहवत्त्वप्रसङ्गादज्ञत्वम् ।
सूत्रकार की इस उक्ति से मन में संयोग और विभाग भी सिद्ध
हैं । यतः इसमें मूर्तत्व है, अतः परत्व, अपरत्व और (वेगाख्य) संस्कार
भी हैं । यतः इसमें स्पर्श नहीं है, अतः यह किसी द्रव्य
का समवायिकारण भी नहीं है । यतः इसमें क्रिया है, अतः इसमें
मूर्त्तत्व भी है । मन चेतन नहीं है; क्योंकि मन को चेतन मान लेने पर
न्यायकन्दली
कारितानि" इति सूत्रेण मनसः पूर्वशरीरादपसर्पणं शरीरान्तरे चोपसर्पणञ्चादृष्ट-
कारितमित्युक्तम्, तस्मादस्य संयोगविभागौ सिद्धौ । मूर्त्तत्वात्परत्वापरत्वे संस्कारश्च ।
विभवाभावान्मूर्त्तत्वं सिद्धं तस्माद् घटादिवत् परत्वापरत्ववेगाः सिद्धाः । अस्पर्शवत्त्वाद्
द्रव्यानारम्भकत्वम् । अस्पर्शवत्त्वं मनसः शरीरान्यत्वे सति सर्वविषयज्ञानोत्पादकत्वादा-
त्मवत् सिद्धम्, तस्माच्चात्मवदेव सजातीयद्रव्यानारम्भकत्वम् । क्रियावत्त्वान्मूर्त्तत्वमिति ।
अणुत्वप्रतिपादनान्मूर्त्तत्वे सिद्धेऽपि विस्पष्टार्थमेतदुक्तम् । साधारणविग्रहवत्त्वप्रसङ्गाद-
ज्ञत्वम् । यदि ज्ञातृ मनो भवेच्छरीरमिदं साधारणमुपभोगायतनं स्यात् । न चैवम्, एकाभि-
प्रायानुरोधेन तस्य सर्वदा प्रवृत्तिनिवृत्तिदर्शनात्, तस्मादज्ञं मनः । चैतन्ये निषिद्धेऽपि प्रक्रमात्
में जाना ये दोनों ही अदृष्ट से होते हैं, अतः मन में संयोग और विभाग की
सिद्धि होती है । चूँकि मन में मूर्त्तत्व है, अतः परत्व, अपरत्व और (वेगाख्य)
संस्कार भी हैं । विभुत्व के न रहने पर ही मन में मूर्त्तव्य सिद्ध है । मूर्त्तत्व हेतु से
घटादि की तरह मन में परत्व, अपरत्व और वेग (संस्कार) ये तीनों भी सिद्ध
होते हैं । चूँकि मन में स्पर्श नहीं है, अतः वह किसी द्रव्य का समवायिकारण भी
नहीं है । मन में स्पर्श इसलिए नहीं है कि शरीर से भिन्न होने पर भी आत्मा की
तरह ज्ञान का कारण है एवं आत्मा की तरह ही अपने सजातीय द्रव्य का
अनारम्भक है । चूँकि मन में क्रिया है, अतः मूर्त्तत्व भी है । यद्यपि उसमें अणु
परिमाण के कह देने से ही मूर्त्तत्व भी सिद्ध हो जाता है, फिर भी और स्पष्ट
करने के लिए क्रिया रूप हेतु का भी उपादान किया है । 'वह अज्ञ (अचेतन) इस-
लिए है कि (उसको चेतन मानने पर) 'साधारणविग्रहवत्त्व' प्रसङ्ग होगा' । अभिप्राय
यह है कि मन में अगर ज्ञान (चैतन्य) मान लिया जाय तो शरीर जो केवल आत्मा
के ही भोग का 'आयतन' है, उसे आत्मा और मन दोनों के ही भोग का
'आयतन' मानना पड़ेगा; किन्तु शरीर की प्रवृत्ति और निवृत्ति ये दोनों ही एक ही
व्यक्ति के अनुरोध से देखी जाती हैं, अतः मन 'अज्ञ' (चेतन नहीं) है । यद्यपि मन के