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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

by महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद

Source: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished759 pages

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३५९

Page 319Permalink

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३५९
प्रशस्तपादभाष्यम्
संयोगमुत्पाद्यमुक्त्वा पृथङ् नित्यं ब्रूयात्, न त्वेवमब्रवीत्, तस्मान्नास्त्यजः
संयोगः । परमाणुभिराकाशादीनां प्रदेशवृत्तिरन्यतरकर्मजः संयोगः ।
उसी प्रकार (अगर नित्य संयोग भी होता तो) उत्पत्तिशील
अन्यतर कर्मजादि संयोगों को कहने के बाद नित्य संयोग का भी
अलग से उल्लेख अवश्य ही करते, सो नहीं किया है, अतः
संयोग नित्य नहीं है। परमाणुओं के साथ आकाशादि के संयोग
न्यायकन्दली
त्रिविध एव संयोग इत्युक्तम् । नित्यस्यापि संयोगस्य सम्भवादिति केचित्,
तद्व्यतिषेधार्थमाह-नास्त्यजः संयोगः, परिमण्डलवत् पृथगनभिधानात् । सर्वज्ञेन
महर्षिणा सर्वार्थोपदेशाय प्रवृत्तेन पृथगनभिधानात्, अजः संयोगो नास्ति, खपुष्पवत् ।
एतदेव विवृणोति-यथेत्यादिना । संयोगोऽजो न भवतीति प्रतिज्ञार्थो न पुनरजः संयोगो
नास्तीति, आश्रयासिद्धत्वात् । ननु परमाण्वाकाशयोः संयोगो नित्य एव, तयोर्नित्यत्वाद-
प्राप्त्यभावाच्च । यत् पुनरयं कणादेन नोक्तः, तद् भ्रान्तेः पुरुषधर्मत्वात्, अत आह-
परमाणुभिराकाशादीनामिति । यथा महतो न्यग्रोधस्य मूलाग्रावयवव्यापिन एकस्य
मूलादग्रमग्रान्मूलं गच्छता पुरुषेण संयोगविभागान्यतरकर्मजौ युगपत्प्रतीयेते, तथा व्यापि-
'संयोग तीन ही प्रकार के हैं' इस अवधारण के प्रसङ्ग में किसी की आपत्ति है
कि उक्त अवधारण ठीक नहीं है; क्योंकि नित्य भी संयोग हो सकता है । इसी
पूर्वपक्ष का खण्डन 'नास्त्यजः संयोगः' इत्यादि से किया गया है । अर्थात् सभी
विषयों के ज्ञाता महर्षि कणाद सभी वस्तुओं के उपदेश देने के लिए प्रवृत्त हुए थे ।
अतः अगर नित्य परिमण्डल की तरह नित्य संयोग की भी सत्ता रहती, तो नित्य
परिमण्डल की तरह उसका भी उल्लेख अवश्य ही करते; किन्तु गगनकुसुम की
तरह नित्यसंयोग का भी उल्लेख महर्षि ने नहीं किया है, अतः नित्यसंयोग नहीं है ।
'यथा' इत्यादि से इसी का विवरण देते हैं । 'संयोग नित्य नहीं है' प्रकृत में इसी
आकार की प्रतिज्ञा है, 'नित्यसंयोग नहीं है' इस प्रकार की नहीं; क्योंकि इस
(दूसरी) प्रतिज्ञा का आश्रय (पक्ष) नित्यसंयोग (आकाशकुसुम की तरह अप्रसिद्ध)
है, अतः इसके लिए प्रयुक्त हेतु आश्रयासिद्ध हेत्वाभास होगा । (प्र.) परमाणु और
आकाश का संयोग तो नित्य है; क्योंकि वे दोनों ही नित्य हैं और वे दोनों कभी
अप्राप्त (असम्बद्ध) भी नहीं रहते । (इस वस्तुस्थिति के अनुसार यह कहना ही
पड़ेगा कि) कणाद ने जो नित्य संयोग का निरूपण नहीं किया है, इसका कारण
उनकी भ्रान्ति है, चूँकि भ्रान्ति पुरुष का धर्म है । इसी पूर्वपक्ष के समाधान के लिए
'परमाणुभिराकाशादीनाम्' इत्यादि पङ्क्ति लिखते हैं । जैसे कि एक महान् वटवृक्ष
के मूल से ऊपर की तरफ जाते हुए पुरुष का एवं अग्रभाग से मूल की तरफ
आते हुए पुरुष का एक ही समय उस वृक्ष के साथ अन्यतरकर्मज संयोग और
अन्यतरकर्मज विभाग दोनों ही प्रतीत होते हैं; क्योंकि वे दोनों अव्याप्यवृत्ति हैं,
उसी प्रकार परमाणु और आकाश का भी अन्यतरकर्मजसंयोग (आकाश के

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३६० न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे संयोग-
प्रशस्तपादभाष्यम्
विभूनां तु परस्परतः संयोगो नास्ति, युतसिद्धयभावात् । सा पुनर्द्वयोरन्य-
तरस्य वा पृथग्गतिमत्त्वं पृथगाश्रयाश्रयित्वं चेति ।
अव्याप्यवृत्ति एवं अन्यतरकर्मज ही हैं । आकाशादि विभु द्रव्यों में परस्पर
संयोग है ही नहीं; क्योंकि उन सबों की युतसिद्धि नहीं है । दोनों
(प्रतियोगी और अनुयोगी) में एक की स्वतन्त्र गतिशीलता और दोनों
में से प्रत्येक में स्वतन्त्र रूप से किसी के आश्रय होने की या कहीं
आश्रित होने की योग्यता ही 'युतसिद्धि' है ।
न्यायकन्दली
नोऽप्याकाशस्य परमाणुना सह संयोगविभागौ परमाणुकर्मजौ भवतः,
तयोरव्याप्यवृत्तित्वादिति न परमाण्वाकाशसंयोगस्य नित्यत्वम् । इदं तावदित्थं परिहृतम्,
विभूनां परस्परतः संयोगे का प्रतिक्रिया ? न ह्यसावन्यतरकर्मजः, नाप्युभयकर्मजः,
तेषां निष्क्रियत्वात् । नापि संयोगजः कार्यस्य हि कारणसंयोगिना अकारणेन संयोगजः
संयोगो भवति । न चायं विभूनामुपपद्यते, नित्यत्वात् । अस्ति च तेषां संयोग
आकाशममूर्तेनापि द्रव्येण समं संयुज्यते मूर्तद्रव्यसंयोगित्वात् पटवदित्यनुमानात् प्रतीतः ।
स चाकारणवन्नित्यं तस्मादनुपपन्नमिदम्, अजः संयोगो नास्तीति । तत्राह-विभूनामिति ।
निष्क्रिय होने पर भी, परमाणु के क्रियाशील होने के कारण) हो सकता है;
क्योंकि संयोग और विभाग दोनों ही अव्याप्यवृत्ति हैं । अतः परमाणु
और आकाश का संयोग (दोनों के नित्य होने पर भी परमाणुगत क्रिया के
अनित्य होने के कारण) नित्य नहीं है । संयोग के नित्यत्व के पक्ष में आयी हुई
आपत्ति का उद्धार उसके समर्थक इस प्रकार करते हैं कि (परमाणु और आकाश
के संयोग में नित्यत्व अनिवार्य न होने पर भी) विभु द्रव्यों के परस्पर संयोग
में (नित्यत्व मानने के सिवाय) क्या समाधान करेंगे ? क्योंकि विभु द्रव्यों के
संयोग न अन्यतरकर्मज हो सकते हैं, न उभयकर्मज; क्योंकि वे सभी क्रिया से
रहित हैं । संयोग से भी (विभु द्रव्य का दूसरे विभु द्रव्य के साथ संयोग) नहीं
उत्पन्न हो सकता; क्योंकि संयोगजसंयोग किसी कार्य द्रव्य का उसके अकारणीभूत
द्रव्य के ही साथ होता है, जिसमें उस कार्य द्रव्य के कारणीभूत द्रव्य का
संयोग रहता है । विभु द्रव्य तो नित्य ही होते हैं, अतः उनका कोई कारण
ही नहीं है, तस्मात् उनका परस्पर संयोगजसंयोग नहीं हो सकता; किन्तु
विभु द्रव्यों में परस्पर संयोग अवश्य ही होता है; क्योंकि इस प्रसङ्ग में यह
अनुमान प्रमाण है कि जिस प्रकार पटादि द्रव्य घटादि मूर्त द्रव्यों के साथ संयुक्त
होने पर आकाशादि अमूर्त द्रव्यों के साथ भी संयुक्त होते हैं, उसी प्रकार
आकाशादि विभु द्रव्य भी दिगादि अमूर्त (विभु) द्रव्यों के साथ भी अवश्य ही
संयुक्त होते हैं; क्योंकि उनमें घटादि मूर्त द्रव्यों का संयोग है (जो मूर्त द्रव्यों के
साथ संयुक्त होगा, वह अमूर्त द्रव्यों के साथ भी संयुक्त होगा ही); किन्तु (इस प्रकार से