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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

by महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद

Source: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished759 pages

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३११

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प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३११
न्यायकन्दली
कारस्य व्यवस्थितत्वाभावात् । तथा च यदेकेनाहमिति प्रतीयते तदपरेण त्वमिति प्रतीयते,
स्वयं स्वस्य संवेदनेऽहमिति प्रतिभास इति चेत् ? किं वै परस्यापि संवेदनमस्ति ?
स्वरूपस्यापि भ्रान्त्या भेदप्रतीतिरिति चेत् ? प्रत्यक्षेण प्रतीतो भेदो वास्तवो न कस्मात् ?
भ्रान्तं प्रत्यक्षमिति चेत् ? यथोक्तम्-
परिच्छेदान्तरं योऽयं भागो बहिरवस्थितः ।
ज्ञानस्याभेदिनो भेदप्रतिभासो ह्युपप्लवः ॥ इति ।
कुत एतत् ? अनुमानेनाभेदसाधनादिति चेत् ? प्रत्यक्षस्य भ्रान्तत्वेनाबाधित-
विषयत्वादनुमानस्यात्मलाभः, लब्धात्मके चानुमाने प्रत्यक्षस्य भ्रान्तत्वमित्यन्योन्या-
पेक्षितादोषः । अस्तु वा भेदो विप्लवो नियतदेशाधिकरणप्रतीतिः , कुतः ? न हि
तत्रायमारोपयितव्यो नान्यत्रेत्यस्ति नियमहेतुः । वासनानियमात् तदारोप-
नियमः स्यादिति चेत्, न, तस्या अपि तद्देशनियमकारणाभावात् । सति
ह्यर्थसद्भावे यद्देशोऽर्थस्तद्देशानुभवस्तद्देशा च तत्पूर्विका वासना, बाह्याभावे
नहीं है । जिसको एक आकार की प्रतीति 'अहम्' रूप से होती है, उसी
आकार की प्रतीति किसी दूसरे को 'त्वम्' रूप से या 'इदम्' रूप से होती है ।
(प्र.) (यह नियम है कि) स्वयं की प्रतीति अपने को 'अहम्' आकार से
होती है । (उ.) 'स्वयं' से भिन्न का भी तो संवेदन होता है । (प्र.) वह संवेदन भी
वस्तुतः 'स्वरूप का ही है; किन्तु भ्रान्तिवश उसमें भेद की प्रतीति होती है ।
(उ.) प्रत्यक्ष के द्वारा ज्ञात होनेवाला यह भेद वास्तविक ही क्यों नहीं है । (प्र.)
चूँकि प्रत्यक्ष भ्रान्त है । जैसा कहा है कि जो अंश ज्ञान से भिन्न एवं बाह्य मालूम
होता है, वह भी ज्ञान से अभिन्न ही है, उसमें ज्ञान-भेद की प्रतीति भ्रान्ति है ।
(उ.) यह क्यों ? (प्र.) चूँकि अनुमान से ज्ञान और अर्थ का अभेद सिद्ध है ।
(उ.) उक्त कथन असङ्गत है; क्योंकि यह अन्योन्याश्रय से दूषित है । कथित
अभेद का साधक अनुमान इसलिए प्रमाण है कि भेद का साधक प्रत्यक्ष भ्रान्त
है । प्रत्यक्ष इसलिये भ्रान्त है कि अभेद का साधक अनुमान प्रमाण है । अगर
यह मान भी लें कि उक्त भेद की प्रतीति भ्रान्ति है, फिर भी नियमित देशरूप
अधिकरण की प्रतीति कैसे उपपन्न होगी ? क्योंकि इसका नियामक कोई नहीं
है कि अमुक आकार के विज्ञान का आरोप अमुक आकार के विज्ञान में ही हो,
विज्ञान के दूसरे आकारों में नहीं ? (प्र.) वासना के नियम से आरोप का नियम
होगा ? (उ.) वासना में भी तद्देशविषयकत्व का कोई नियामक नहीं है । बाह्य
वस्तुएँ जब रहती हैं, तब जो अर्थ जिस देश में रहता है उस अर्थविशिष्ट उस
देश का अनुभव होता है एवं उस देशविषयक इस अनुभव से ही उस देशविषयक
'वासना' (संस्कार) की उत्पत्ति होती है । अगर बाह्य अर्थ ही न रहेंगे तो फिर
वासना में भी यह विशेष किससे उपपन्न होगा ? बिना विशेष कारण के विशेष

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३१२ न्यायकन्दलीसंवेलितप्रशस्तपादभाष्यम् । गुण संख्या-
न्यायकन्दली
तु तस्याः किंकृतो देशनियमः ? न च कारणविशेषमन्तरेण कार्यविशेषो घटते,
बाह्यार्थो नास्ति । तेन वासनानामेव वैचित्र्यं वैचित्र्यस्यार्थवत्तत्कारणानां
वैचित्र्यादित्यानादिरिति चेत् ? वासनावैचित्र्यं यदि बोधाकारादनन्यत् कस्तासां परस्परतो
विशेषः ? अथान्यदर्थे कः प्रद्वेषः ? येन सर्वलोकप्रतीतिरपहूयते । केन चायमाकारो
बहिरारोप्यते ? ज्ञानेन चेत् ? किं तस्य स्वात्मन्याकारसंवित्तिरेव बहिरारोपस्तदन्यो वा ?
आद्ये कल्पे सैव तस्य सम्यक्प्रतीतिः, सैव च मिथ्येत्यापतितम्, ज्ञानगतत्वेनाकारग्रहणस्य
सत्यत्वात्, बाह्यतासंवितेश्चायथार्थत्वात् । अन्यत्वे तु तयोर्न क्रमेण भावः, तत्कारणस्य
ज्ञानस्य क्षणिकत्वात् । न चैकस्य युगपत्सत्यत्वेन मिथ्यात्वेन च प्रतीतिसम्भवः । न च
क्रमयौगपद्याभ्यामन्यः प्रकारोऽस्ति, यत्र वर्तमानं ज्ञानं स्वात्मन्याकारं गृह्णीयाद्बहिश्च
तमारोपयति ।
अपि च यदि ज्ञानाकारो नीलादिरर्थो यस्यैवायमाकारः स एव तं
प्रतीयात्, न पुरुषान्तरं प्रतीयात् । प्रतीयते चायं बहुभिरेकः, सर्वेषां तदाभिमुख्येन
कार्य की उत्पत्ति नहीं हो सकती । (प्र.) चूँकि बाह्य वस्तुओं की सत्ता नहीं है,
अतः वासना में ही वैचित्र्य की कल्पना करते हैं । प्रयोजन से युक्त (उस पहली
वासना में स्थित) कारणों का वैचित्र्य ही उक्त वासना के वैचित्र्य का कारण है ।
(उ.) वासनाओं के ये वैचित्र्य भी अगर केवल विज्ञान रूप ही हैं तो फिर उनमें
परस्पर भेद क्या है ? अगर ये वैचित्र्य विज्ञान से भिन्न हैं तो फिर नीलादि
वस्तुओं को ही विज्ञान से भिन्न मानने में आपको क्यों द्वेष है ? जिससे कि
सर्वजनीन प्रतीतियों का आप अपलाप करते हैं । (एवं) विज्ञान के आकारों का
यह आरोप कौन करता है ? अगर ज्ञान ही ? अगर आकार से अभिन्न विज्ञान
में ही आकार का भान होता है और वही आरोप कहलाता है, तो फिर इस पक्ष
में एक ही ज्ञान को सत्य और मिथ्या दोनों ही कहने की आपत्ति होगी; क्योंकि
ज्ञान ही आकार के ग्रहण रूप होने से सत्य है एवं उसमें बाह्यत्व का आरोप होने
से मिथ्या है । अगर आकार विज्ञान और आकाराधायक विज्ञान दोनों को भिन्न
मानें तो फिर उक्त कारणविज्ञान और कार्यविज्ञान दोनों की क्रमशः सत्ता नहीं
रहेगी; क्योंकि कारणविज्ञान क्षणिक है । (अगर दोनों विज्ञानों को एक मानें तो
फिर) एक ही विज्ञान एक ही समय सत्य और मिथ्या दोनों नहीं हो सकता । क्रम
और यौगपद्य को छोड़कर कोई तीसरा प्रकार नहीं है कि जिस रूप में विद्यमान
आकार अपने से अभिन्न आकार का भी ग्रहण करे और अपने आकार को
बाहर आरोपित भी करे ।
और भी बात है । अगर ये नीलादि वस्तुएँ विज्ञान के ही आकार हों तो फिर
जिस पुरुष के विज्ञान के ये आकार होंगे केवल उसी पुरुष से गृहीत हो सकेंगे, दूसरे
पुरुषों से नहीं; किन्तु एक ही वस्तु अनेक पुरुषों से गृहीत होती है; क्योंकि एक