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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages
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इन्द्रवायू वीरवाहं रथं वामीशानयोरभि पृक्षः सचन्ते.. (५)
हे सबके स्वामी इंद्र एवं वायु! प्रसिद्ध यजमान सच्चे मन से स्तुति करते हुए एवं
दीप्तिसंपन्न बनकर अपने कर्मों द्वारा तुम्हारे उस रथ को अपने यज्ञों में खींचते हैं, जो वीरों
द्वारा खींचने योग्य हैं. यज्ञ में हव्यरूप अन्न तुम्हारी सेवा करते हैं. (५)
ईशानासो ये दधते स्वर्णो गोभिरश्वेभिर्वसुभिर्हिरण्यैः.
इन्द्रवायू सूरयो विश्वमायुर्वद्भिर्वीरैः पृतनासु सह्युः.. (६)
हे इंद्र एवं वायु! जो सामर्थ्य वाले लोग हमें गांवों, घोड़ों, निवासस्थानों एवं स्वर्ण आदि
धन के साथ सुख देते हैं, वे ही दाता युद्ध में घोड़ों एवं वीर पुरुषों की सहायता के सर्वत्र
व्याप्त अन्न जीत लेते हैं. (६)
अर्वन्तो न श्रवसो भिक्षमाणा इन्द्रवायू सुष्टुतिभिर्वसिष्ठाः.
वाजयन्तः स्ववसे हुवेम यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (७)
घोड़ों के समान हव्य-वहन करने वाले, अन्न की प्रार्थना करने वाले एवं बल के इच्छुक
वसिष्ठगण शोभनरक्षा के निमित्त उत्तम स्तुतियों द्वारा इंद्र एवं वायु को बुलाते हैं. हे देवो! तुम
कल्याणसाधनों द्वारा हमारी रक्षा करो. (७)
सूक्त—९१ देवता—वायु
कुविदङ्ग नमसा ये वृद्धासः पुरा देवा अनवद्यास आसन्.
ते वायवे मनवे बाधितायावासयन्नुषसं सूर्येण.. (१)
प्राचीन काल में जिन वयोवृद्ध स्तोताओं ने वायु देव के हेतु शीघ्र बनाए गए बहुत से
स्तोत्रों द्वारा प्रसिद्धि प्राप्त की, उन्होंने विपत्ति में पड़े मनुष्यों की रक्षा के निमित्त वायु को
हव्य देने के लिए सूर्य के साथ उषा को संगत किया. (१)
उशन्ता दूता न दभाय गोपा मासश्च पाथः शरदश्च पूर्वीः.
इन्द्रवायू सुष्टुतिर्वामियाना मार्डीकमीट्‍टे सुवितं च नव्यम्.. (२)
हे कामना करने योग्य, गतिशील एवं रक्षक इंद्र व वायु! तुम हमारी हिंसा न करके
अनेक मासों एवं वर्षों तक हमारी रक्षा करना. हमारी शोभनस्तुति समीप जाती हुई तुमसे
सुख एवं प्रशंसायोग्य उत्तम धन की याचना करती है. (२)
पीवोअन्नाँ रयिवृधः सुमेधाः श्वेतः सिषक्ति नियुतामभिश्रीः.
ते वायवे समनसो वि तस्थुर्विश्वेन्नरः स्वपत्यानि चक्रुः.. (३)
शोभनबुद्धि वाले एवं अपने घोड़ों को आश्रय देने वाले श्वेतवर्ण वायु अधिक अन्न के

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स्वामी एवं धनसंपन्न व्यक्तियों की सेवा करते हैं. समान मन वाले वे लोग भी वायु के लिए यज्ञ
करने के विचार से स्थित हैं एवं अपनी संतान को लाभ देने वाले कार्य कर चुके हैं. (३)
यावत्तरस्तन्वो३ यावदोजो यावन्नरश्चक्षसा दीध्यानाः.
शुचिं सोमं शुचिपा पातमस्मे इन्द्रवायू सदतं बहिर्इदम्.. (४)
हे पवित्र सोमरस को पीने वाले इंद्र एवं वायु! जब तक तुम्हारे शरीर की गति है, जब
तक बल है एवं जब तक ऋत्विज् ज्ञानरूपी बल से दीप्तिशाली हैं, तब तक तुम हमारे पवित्र
सोमरस को पिओ एवं इन कुशों पर बैठो. (४)
नियुवाना नियुतः स्पार्हवीरा इन्द्रवायू सरथं यातमर्वाक्.
इदं हि वां प्रभृतं मध्वो अग्रमध प्रीणाना वि मुमुक्तमस्मे.. (५)
हे स्पृहायोऽग्य स्तोताओं वाले इंद्र एवं वायु! अपने घोड़ों को एक ही रथ में जोड़ो एवं
हमारे सामने लाओ. इस मधुर सोमरस का उत्तम भाग तुम्हारे निमित्त है. तुम इसे पीकर प्रसन्न
बनो एवं हमें पापों से छुड़ाओ. (५)
या वां शतं नियुतो याः सहस्रमिन्द्रवायू विश्ववाराः सचन्ते.
आभिर्यातं सुविदत्राभिर्वाक्पातं नरा प्रतिभृतस्य मध्वः.. (६)
हे इंद्र एवं वायु! सबके द्वारा वरण करने योग्य तुम्हारे जो घोड़े सैकड़ों तथा हजारों की
संख्या में तुम्हारी सेवा करते हैं, उन्हीं शोभन धनदाता अश्वों की सहायता से तुम हमारे सामने
आओ. हे नेताओ! उत्तर-वेदी पर लाए गए सोम को पिओ. (६)
अर्वन्तो न श्रवसो भिक्षमाणा इन्द्रवायू सुष्टुतिभिर्वसिष्ठाः.
वाजयन्तः स्ववसे हुवेम यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (७)
घोड़ों के समान हव्य वहन करने वाले, अन्न की प्रार्थना करने वाले एवं बल के इच्छुक
वसिष्ठगण शोभनरक्षा के निमित्त उत्तम स्तुतियों द्वारा इंद्र एवं वायु को बुलाते हैं. हे देवो! तुम
कल्याणसाधनों द्वारा हमारी सदा रक्षा करो. (७)
सूक्त—९२ देवता—वायु
आ वायो भूष शुचिपा उप नः सहस्रं ते नियुतो विश्ववार.
उपो ते अन्धो मद्यमयामि यस्य देव दधिषे पूर्वपेयम्.. (१)
हे विशुद्ध सोमरस के पीने वाले वायु! हमारे पास आओ. हे सबके वरणीय वायु! तुम्हारे
हजार घोड़े हैं. हे वायु! तुम जिस सोमरस को सबसे पहले पीने का अधिकार रखते हो, वही
नशीला सोम पात्र में रखा है. (१)
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प्र सोता जीरो अध्वरेश्वस्थात् सोममिन्द्राय वायवे पिबध्यै.
प्र यद्द्वां मध्वो अग्रियं भरन्त्यध्वर्यवो देवयन्तः शचीभिः.. (२)
शीघ्र काम करने वाले एवं सोमरस निचोड़ने वाले अध्वर्यु ने इंद्र तथा वायु को पीने के
लिए यज्ञ में सोमरस स्थापित किया है. हे इंद्र एवं वायु! देवों की कामना करने वाले अध्वर्यु
लोगों ने अपने कर्म द्वारा इस यज्ञ में सोमरस का उत्तम भाग तुम्हारे लिए तैयार किया है. (२)
प्र याभिर्यासि दाश्वांसमच्छा नियुद्भिर्वायविष्टये दुरोणे.
नि नो रयिं सुभोजसं युवस्व नि वीरं गव्यमश्व्यं च राधः.. (३)
हे वायु! यज्ञशाला में स्थित हव्यदाता यजमान का यज्ञ पूर्ण करने के लिए जिन घोड़ों के
द्वारा तुम उसके सामने जाते हो, उन्हीं की सहायता से हमारे यज्ञ में आओ. हमें शोभन अन्न
वाला धन, वीरपुत्र, गायों एवं अश्वों के रूप में ऐश्वर्य प्रदान करो. (३)
ये वायव इन्द्रमादनास आदेवासो नितोशनासो अर्यः.
घ्नन्तो वृत्राणि सूरिभिः ष्याम सासह्वांसो युधा नृभिरमित्रान्.. (४)
जो स्तोता अपनी स्तुतियों द्वारा इंद्र एवं वायु को तृप्त करने वाले एवं दिव्य गुणों से युक्त
हैं, वे शत्रुओं का नाश करते हैं. उन्हीं स्तोताओं की सहायता से हम अपने शत्रुओं का नाश
करते हुए शत्रुओं को युद्ध में हरावें. (४)
आ नो नियुद्भिः शतिनीभिरध्वरं सहस्रिणीभिरुप याहि यज्ञम्.
वायो अस्मिन्त्सवने मादयस्व यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (५)
हे वायु! अपने सैकड़ों एवं हजारों घोड़ों की सहायता से हमारे यज्ञ के पास आओ एवं
इस यज्ञ में सोमरस पीकर प्रसन्न बनो. हे देवो! रक्षासाधनों द्वारा हमारा सदा कल्याण करो.
(५)
सूक्त—९३ देवता—इंद्र व अग्नि
शुचिं नु स्तोमं नवजातमद्येन्द्राग्नी वृत्रहणा जुषेथाम्.
उभा हि वां सुहवा जोहवीमि ता वाजं सद्य उशते धेष्ठा.. (१)
हे वृत्रहंता इंद्र एवं अग्नि! तुम मेरे पवित्र एवं इसी समय निमित्त स्तोत्र को आज सुनो.
सुखपूर्वक बुलाने योग्य तुम दोनों को मैं बार-बार बुलाता हूं. जो यजमान तुम्हारी कामना
करता है, उसे शीघ्र अन्न दो. (१)
ता सानसी शवसाना हि भूतं साकंवृधा शवसा शूशुवांसा.
क्षयन्तौ रायो यवसस्य भूरेः पृङ्क्तं वाजस्य स्थविरस्य घृष्वेः.. (२)
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हे सबके द्वारा सेवनीय इंद्र एवं अग्नि! तुम बल के समान शत्रुनाश करो. तुम एक साथ
उन्नति करते हुए, बल द्वारा बढ़ते हुए एवं अधिक धन के स्वामी हो. तुम हमें शत्रुविनाशक एवं
स्थूल अन्न दो. (२)
उपो ह यदिदथं वाजिनो गुर्धीर्भिविप्राः प्रमतिमिच्छमानाः.
अर्वन्तो न काष्ठां नक्षमाणा इन्द्राग्नी जोहुवतो नरस्ते.. (३)
हव्य धारण करने वाले, बुद्धिमान् इंद्र एवं अग्नि की कृपा चाहने वाले जो यजमान
अपनी कर्मभावना द्वारा यज्ञ को प्राप्त करते हैं, वे ही नेता लोग इंद्र व अग्निसंबंधी यज्ञकर्मों
को व्याप्त करके उसी प्रकार उन्हें बार-बार बुलाते हैं, जैसे घोड़ा शीघ्र ही युद्धभूमि को व्याप्त
कर लेता है. (३)
गीर्भिर्विप्रः प्रमतिमिच्छमान ईट्टे रयिं यशसं पूर्वभाजम्.
इन्द्राग्नी वृत्रहणा सुवज्रा प्र नो नव्येभिस्तिरतं देष्णैः.. (४)
हे इंद्र एवं अग्नि! तुम्हारी कृपाबुद्धि की इच्छा करने वाले वसिष्ठवंशी विप्र यश देने वाले
एवं सर्वप्रथम उपभोग योग्य धन पाने के लिए तुम्हारी स्तुति करते हैं. हे शत्रुनाशक एवं शोभन
आयुध वाले इंद्र व अग्नि! नवीन एवं दानयोग्य धनों द्वारा हमें बढ़ाओ. (४)
सं यन्मही मिथती स्पर्धमाने तनूरूचा शूरसाता यतैते.
अदेवयुं विदथे देवयुभिः सत्रा हतं सोमसुता जनेन.. (५)
हे इंद्र एवं अग्नि! महान्, एकदूसरों का नाश करती हुई एकदूसरी को ललकारती हुई
एवं युद्ध का प्रयत्न करती हुई शत्रुसेनाओं को अपने तेज द्वारा नष्ट करो. तुम सोमरस
निचोड़ने वाले एवं देवों की अभिलाषा करने वाले यजमान की सहायता से देवों की कामना न
करने वाले लोगों का नाश करो. (५)
इमामु षु सोमसुतिमुप न इन्द्राग्नी सौमनसाय यातम्.
नू चिद्धि परिमम्नाथे अस्माना वां शश्वद्भिर्ववृतीय वाजैः.. (६)
इंद्र एवं अग्नि! मैत्रीभाव पाने के लिए हमारे इस सोमरस निचोड़ने के उत्सव में आओ.
तुम हमारे अतिरिक्त किसी को भी मत जानो. वे केवल हमें ही जानते हैं, इसलिए हमें अधिक
अन्न द्वारा बुलाते हैं. (६)
सो अग्न एना नमसा समिद्धोऽच्छा मित्रं वरुणमिन्द्रं वोचेः.
यत्सीमागाश्चकृमा तत्सु मृळ तदर्यमादितिः शिश्रथन्तु.. (७)
हे अग्नि! तुम इस अन्न द्वारा प्रज्वलित होकर मित्र, इंद्र एवं वरुण से कहो कि वह मेरा
भक्त है. हम लोगों से जो अपराध हुआ है, उससे हमारी रक्षा करो. अर्यमा तथा अदिति हमारे
अपराध को हमसे दूर करें. (७)
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सूक्त—९४ देवता—इंद्र व अग्नि

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एता अग्न आशुषाणास इष्टीर्युवोः सचाभ्यश्याम वाजान्.
मेन्द्रो नो विष्णुर्मरुतः परि ख्यन्युयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (८)
हे अग्नि! शीघ्रतापूर्वक इस यज्ञ का सहारा लेते हुए हम एक साथ तुम्हारे द्वारा दिया
हुआ अन्न प्राप्त करें. इंद्र, विष्णु एवं मरुद्गण हमें त्यागकर दूसरे को न देखें. हे देवो! तुम
कल्याणसाधनों द्वारा सदा हमारी रक्षा करो. (८)
सूक्त—९४ देवता—इंद्र व अग्नि
इयं वामस्य मन्मन इन्द्राग्नी पूर्व्यस्तुतिः. अभ्राद्वृष्टिरिवाजनि.. (१)
हे इंद्र एवं अग्नि! इस स्तोता से यह उत्तम स्तुति उसी प्रकार उत्पन्न हुई है, जिस प्रकार
बादल से वर्षा होती है. (१)
शृणुतं जरितुर्हवमिन्द्राग्नी वनतं गिरः. ईशाना पिप्यतं धियः.. (२)
हे इंद्र एवं अग्नि! तुम स्तोता की पुकार सुनो और उसकी स्तुति स्वीकार करो. तुम
सबके स्वामी हो, इसलिए यज्ञकर्म को पूरा करो. (२)
मा पापत्वाय नो नरेन्द्राग्नी माभिशस्तये. मा नो रीरधतं निदे.. (३)
हे नेता इंद्र एवं अग्नि! हमें हीनभाव, पराजय एवं निंदा के वश में मत करना. (३)
इन्द्रे अग्ना नमो बृहत्सुवृक्तिमेरयामहे. धिया धेना अवस्यवः.. (४)
हम अपनी रक्षा की अभिलाषा से विस्तृत हव्यरूप अन्न, शोभनस्तुति एवं यज्ञकर्म-
सहित-स्तुतिवचन इंद्र एवं अग्नि के पास भेजते हैं. (४)
ता हि शश्वन्त ईळत इत्था विप्रास ऊतये. सबाधो वाजसातये.. (५)
बुद्धिमान् लोग अपनी रक्षा के लिए इंद्र व अग्नि दोनों की इस प्रकार स्तुति करते हैं.
समान कष्ट भोगने वाले लोग अन्न पाने के लिए स्तुति करते हैं. (५)
ता वां गीर्भिर्विपन्यवः प्रयस्वन्तो हवामहे. मेधसाता सनिष्यवः.. (६)
स्तुति करने के इच्छुक हव्य अन्न से युक्त एवं धन की अभिलाषा वाले हम यज्ञ का फल
पाने के लिए स्तुति द्वारा उन दोनों को बुलाते हैं. (६)
इन्द्राग्नी अवसा गतमस्मभ्यं चर्षणीसहा. मा नो दुःशंस ईशत.. (७)
हे शत्रुओं को हराने वाले इंद्र एवं अग्नि! तुम अन्न लेकर हमारे पास आओ. बुरे वचन

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बोलने वाला हमारा स्वामी न बने. (७)
मा कस्य नो अररुषो धूर्तिः प्रणङ्‌मर्त्यस्य. इन्द्राग्नी शर्म यच्छतम्.. (८)
हे इंद्र एवं अग्नि! हमें किसी भी मनुष्य द्वारा हिंसा प्राप्त न हो. हमें तुम सुख दो. (८)
गोमद्धिरण्‍यवद्वसु यद्दामश्वावदीमहे. इन्द्राग्नी तद्द्वनेमहि.. (९)
हे इंद्र एवं अग्नि! हम तुमसे जिन गायों, स्वर्ण एवं अश्वों से युक्त धन को मांगते हैं,
उसका हम उपभोग करें. (९)
यत्सोम आ सुते नर इन्द्राग्नी अजोहवुः. सप्तीवन्ता सपर्यवः.. (१०)
सोमरस निचुड़ जाने पर यज्ञकर्म के नेता जनसेवा की अभिलाषा से उत्तम घोड़ों वाले
इंद्र एवं अग्नि को बार-बार बुलाते हैं. (१०)
उक्थेभिर्वृत्रहन्तमा या मन्दाना चिदा गिरा. आङ्गूषैराविवासतः.. (११)
हम उक्थों, स्तुतियों एवं स्तोत्रों द्वारा शत्रुनाशकों में श्रेष्ठ एवं अतिशय प्रसन्न इंद्र एवं
अग्नि की सेवा करते हैं. (११)
ताविद्दुःशंसं मर्त्यं दुर्विद्वांसं रक्षस्विनम्.
आभोगं हन्मना हतमुदधिं हन्मना हतम्.. (१२)
हे इंद्र एवं अग्नि! तुम दुष्टविचारों एवं बुरे ज्ञान वाले, शक्तिशाली एवं हमारी संपत्ति का
अपहरण करने वाले मनुष्य को आयुध द्वारा इस प्रकार नष्ट करो जैसे घड़ा फोड़ा जाता है.
(१२)
सूक्त—९५ देवता—सरस्वती
प्र क्षोदसा धायसा सस्र एषा सरस्वती धरुणमायसी पूः.
प्रबाबधाना रथ्येव याति विश्वा अपो महिना सिन्धुरन्याः.. (१)
यह सरस्वती नदी लोहे के द्वारा बनी नगरी के समान सबको धारण करती हुई
प्राणघातक जल के साथ बहती है. जिस प्रकार सारथि सबको पीछे छोड़कर आगे निकल
जाता है, उसी प्रकार यह अपनी महिमा द्वारा सब जलपूर्ण नदियों को बाधा देकर आगे बढ़ती
है. (१)
एकाचेतत्सरस्वती नदीनां शुचिर्यती गिरिभ्य आ समुद्रात्.
रायश्चेतन्ती भुवनस्य भूरेर्घृतं पयो दुदुहे नाहुषाय.. (२)
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सभी नदियों में पवित्र एवं पर्वत से निकलकर सागर तक जाने वाली सरस्वती नदी ने ही
केवल राजा नहुष की प्रार्थना को समझा. सरस्वती ने नहुष को सारे संसार का पर्याप्त धन
प्रदान करके दूध का दोहन किया था. (२)
स वावृधे नर्यो योषणासु वृषा शिशुर्वृषभो यज्ञियासु.
स वाजिनं मघवद्भ्यो दधाति वि सातये तन्वं मामृजीत.. (३)
मानवों का हित एवं वर्षा करने वाले सरस्वन् नामक वायु यज्ञ के योग्य स्त्री अर्थात्
जरासमूह के बीच वृद्धि को प्राप्त हुए. वे हव्य धारण करने वाले यजमानों को शक्तिशाली
संतान देते हैं एवं उनके कल्याण के लिए शरीर का संस्कार करते हैं. (३)
उत स्या नः सरस्वती जुषाणोप श्रवत् सुभगा यज्ञे अस्मिन्.
मितज्ञुभिर्नमस्यैरियाना राया युजा चिदुत्तरा सखिभ्यः.. (४)
शोभनधन वाली सरस्वती प्रसन्न होकर इस यज्ञ में हमारी स्तुति सुनें. घुटने टेककर
समीप जाने वाले देवों से युक्त सरस्वती धन से नित्य संपन्न होकर अपने मित्रों के लिए क्रमशः
दया वाली बनें. (४)
इमा जुह्वाना युष्मदा नमोभिः प्रति स्तोमं सरस्वति जुषस्व.
तव शर्मन्प्रियतमे दधाना उपस्थेयाम शरणं न वृक्षम्.. (५)
हे सरस्वती! इस यज्ञ का हवन करते हुए हम लोग स्तुतियों द्वारा तुमसे धन प्राप्त करेंगे.
तुम हमारी स्तुति स्वीकार करो. हम तुम्हारे सर्वाधिक प्रिय घर में रहते हुए तुम्हारे साथ इस
प्रकार मिलेंगे, जिस प्रकार पक्षी अपने आश्रयस्थल वृक्ष से मिलते हैं. (५)
अयमु ते सरस्वति वसिष्ठो द्वारावृतस्य सुभगे व्यावः.
वर्ध शुभ्रे स्तुवते रासि वाजान् यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (६)
हे शोभनधन वाली सरस्वती! यह वसिष्ठ तुम्हारे लिए यज्ञ के द्वार खोलता है. हे
उज्ज्वल वर्ण वाली सरस्वती देवी! तुम वृद्धि प्राप्त करो एवं स्तोता को अन्न दो. हे देवो! तुम
कल्याणसाधनों द्वारा हमारा सदा पालन करो. (६)
सूक्त—९६ देवता—सरस्वती व सरस्वन्
बृहदु गायिषे वचोऽसुर्या नदीनाम्.
सरस्वतीमिन्महया सुवृक्तिभिः स्तोमैर्वसिष्ठ रोदसी.. (१)
हे वसिष्ठ! तुम नदियों में सर्वाधिक शक्तिशालिनी सरस्वती के लिए स्तोत्र का गान करो
एवं द्यावा-पृथिवी में स्थित सरस्वती की पूजा दोषहीन स्तोत्रों द्वारा करो. (१)
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उभे यत्ते महिना शुभ्रे अन्धसी अधिक्षियन्ति पूरवः.
सा नो बोध्यवित्री मरुत्सखा चोद राधो मघोनाम्.. (२)
हे उज्ज्वल वर्ण वाली सरस्वती! तुम्हारी महिमा से मनुष्य दिव्य एवं पार्थिव दोनों प्रकार
का अन्न प्राप्त करता है. तुम रक्षा वाली बनकर हमें जानो एवं मरुतों की सखी के रूप में
हव्यदाताओं को धन प्रदान करो. (२)
भद्रमिद्भद्रा कृणवत्सरस्वत्यकवारी चेतति वाजिनीवती.
गृणाना जमदग्निवत्स्तुवाना च वसिष्ठवत्.. (३)
कल्याण करने वाली सरस्वती हमारा कल्याण ही करें. शोभन गति वाली एवं
अन्नस्वामिनी सरस्वती हम में बुद्धि उत्पन्न करें. मैं जमदग्नि के समान तुम्हारी स्तुति कर रहा
हूं. तुम वसिष्ठ अर्थात् मेरे उपर्युक्त स्तोत्र पाओ. (३)
जनीयन्तो न्वग्रवः पुत्रीयन्तः सुदानवः. सरस्वन्तं हवामहे.. (४)
पत्नी एवं पुत्र की कामना करने वाले एवं शोभन दानयुक्त हम स्तोता नामक देव की
स्तुति करते हैं. (४)
ये ते सरस्व ऊर्मयो मधुमन्तो घृतश्चुतः. तेभिर्नोऽविता भव.. (५)
हे सरस्वन् देव! तुम्हारा जो जलसमूह रसयुक्त एवं वर्षा करने वाला है, उसीसे हमारी
रक्षा करो. (५)
पीपिवांसं सरस्वतः स्तनं यो विश्वदर्शतः. भक्षीमहि प्रजामिषम्.. (६)
हम सबके दर्शनीय एवं बुद्धिशाली सरस्वन् देव के जलधारक स्तोत्र को पाकर बुद्धि
एवं अन्न प्राप्त करें. (६)
सूक्त—९७ देवता—इंद्र आदि
यज्ञे दिवो नृषदने पृथिव्या नरो यत्र देवयवो मदन्ति.
इन्द्राय यत्र सवनानि सुन्वे गमन्मदाय प्रथमं वयश्च.. (१)
जिस यज्ञ में देवों की कामना करने वाले ऋत्विज् प्रसन्न होते हैं, जिस यज्ञ में धरती के
नेता इंद्र के निमित्त हर बार सोमरस निचोड़ते हैं, इंद्र प्रसन्नता पाने के लिए उसी यज्ञ में स्वर्ग
से सर्वप्रथम आवें एवं उनके घोड़े भी आवें. (१)
आ दैव्या वृणीमहेऽवांसि बृहस्पतिर्नो मह आ सखायः.
यथा भवेम मीळहुषे अनागा यो नो दाता परावतः पितेव.. (२)
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हे मित्रो! हम अभिलाषापूरक बृहस्पति के प्रति इस प्रकार पापरहित बनें कि वे उसी
प्रकार धन लाकर दें, जिस प्रकार पिता दूर देश से धन लाकर पुत्र को सौंपता है. (२)
तमु ज्येष्ठं नमसा हविर्भिः सुशेवं ब्रह्मणस्पतिं गृणीषे.
इन्द्रं श्लोको महि दैव्यः सिषक्तु यो ब्रह्मणो देवकृतस्य राजा.. (३)
मैं अतिशय प्रसिद्ध एवं शोभन मुख वाले बृहस्पति की स्तुति नमस्कारों एवं हव्य अन्नों
द्वारा करता हूं. देवों के योग्य हमारा मंत्र इंद्र की सेवा करे. इंद्र देवों द्वारा निर्मित स्तोत्रों के
स्वामी हैं. (३)
स आ नो योनिं सदतु प्रेष्ठो बृहस्पतिर्विश्ववारो यो अस्ति.
कामो रायः सुवीर्यस्य तं दातपर्षन्नो अति सश्चतो अरिष्टान्.. (४)
वे बृहस्पति हमारे यज्ञस्थान पर बैठें जो सबके द्वारा वरण करने योग्य हैं. वे हमारी धन
एवं उत्तमबल से संबंधित अभिलाषा को पूरा करें. हम उपद्रवग्रस्तों को वे हिंसा से बचाकर
शत्रुओं के पास पहुंचावें. (४)
तमा नो अर्कममृताय जुष्टमिमे धासुरमृतासः पुराजाः.
शुचिक्रन्दं यजतं पस्त्यानां बृहस्पतिमनर्वाणं हुवेम.. (५)
सर्वप्रथम उत्पन्न हुए मरणरहित देवगण हमें पूजा का साधनरूप अन्न अधिक मात्रा में
दें. पवित्र स्तुतियों वाले, गृहस्थों द्वारा यजनीय एवं पराभवरहित बृहस्पति को हम बुलाते हैं.
(५)
तं शग्मासो अरुषासो अश्वा बृहस्पतिं सहवाहो वहन्ति.
सहश्चिद्यस्य नीलवत्सधस्थं नभो न रूपमरुषं वसानाः.. (६)
सुखकर, तेजस्वी, मिलकर वहन करने वाले एवं सूर्य के समान प्रकाशयुक्त घोड़े प्रसिद्ध
बृहस्पति को वहन करें. उनके पास शक्ति एवं निवास करने योग्य घर है. (६)
स हि शुचिः शतपत्रः स शुन्ध्युर्हिरण्यवाशीरिषिरः स्वर्षाः.
बृहस्पतिः स स्वावेश ऋष्वः पुरू सखिभ्य आसुतिं करिष्ठः.. (७)
बृहस्पति पवित्र एवं विविध वाहनों वाले हैं. वे सबके शोधक हैं. वे हितकर एवं रमणीय
वाणी बोलते हैं. वे गमनशील, स्वर्ग का भोग करने वाले, शोभन निवास वाले एवं दर्शनीय हैं.
वे अपने स्तोताओं को श्रेष्ठ अन्न देते हैं. (७)
देवी देवस्य रोदसी जनित्री बृहस्पतिं वावृधतुर्महित्वा.
दक्षाय्याय दक्षता सखायः करद् ब्रह्मणे सुतरा सुगाधा.. (८)
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बृहस्पति देव को उत्पन्न करने वाली द्यावा-पृथिवीरूप देवी अपनी महिमा से उन्हें
बढ़ावें. हे मित्रो! तुम भी बढ़ाने योग्य बृहस्पति को बढ़ाओ. उन्होंने अन्नवृद्धि के लिए सुख से
तरण करने योग्य एवं स्नानक्षम जलों को बनाया है. (८)
इयं वां ब्रह्मणस्पते सुवृक्तिर्ब्रह्मेन्द्राय वज्रिणे अकारि.
अविष्टं धियो जिगृतं पुरन्धीर्जस्तमर्यो वनुषामरातीः.. (९)
हे ब्रह्मणस्पति! मैंने यह शोभन वचनरूपी स्तुति तुम्हारे एवं वज्रधारी इंद्र के लिए
बनाई है. तुम हमारे यज्ञों की रक्षा करो, अनेक स्तुतियां सुनो एवं हम भक्तों पर आक्रमण
करने वाली शत्रुसेना का नाश करो. (९)
बृहस्पते युवमिन्द्रश्च वस्वो दिव्यस्येशाथे उत पार्थिवस्य.
धत्तं रयिं स्तुवते कीरये चिद्ध्यं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (१०)
हे बृहस्पति! तुम एवं इंद्र दोनों प्रकार के पार्थिव एवं दिव्य धन के स्वामी हो. इसलिए
तुम स्तुतिकर्त्ता को धन देते हो. हे देवो! तुम कल्याणसाधनों द्वारा हमारा सदा पालन करो.
(१०)
सूक्त—९८ देवता—इंद्र व बृहस्पति
अध्वर्यवोऽरुणं दुग्धमंशुं जुहोतन वृषभाय क्षितीनाम्.
गौराद्भेदीयाँ अवपानमिन्द्रो विश्वाहेद्याति सुतसोममिच्छन्.. (१)
हे अध्वर्यु लोगो! मानवों में श्रेष्ठ इंद्र के लिए रुचिकर एवं निचोड़े हुए सोमरस को भेंट
करो. गौरमृग दूरस्थित जल को जानकर जिस तेजी से आता है, इंद्र पीने योग्य सोम का ज्ञान
होने पर सोमरस निचोड़ने वाले यजमान को खोजते हुए उससे भी तेजी से आते हैं. (१)
यद्दधिषे प्रदिवि चार्वन्नं दिवेदिवे पीतिमदस्य वक्षि.
उत हृदोत मनसा जुषाण उशन्निन्द्र प्रस्थितान् पाहि सोमान्.. (२)
हे इंद्र! बीते हुए दिनों में जिस शोभन अन्नरूप सोम को तुम धारण करते थे, अब भी
प्रतिदिन उसी सोम को पीने की अभिलाषा करो. हे इंद्र! तुम हृदय एवं मन से हमारे कल्याण
की कामना करते हुए सम्मुख रखे सोम को पिओ. (२)
जज्ञानः सोमं सहसे पपाथ प्र ते माता महिमानमुवाच.
एन्द्र पप्राथोर्व१न्तरिक्षं युधा देवेभ्यो वरिवश्चकर्थ.. (३)
हे इंद्र! तुमने जन्म लेते ही बलप्राप्ति के लिए सोमरस पिया था. माता अदिति ने तुम्हारी
महिमा का वर्णन किया. तुमने विस्तृत आकाश को अपने तेज से भर दिया था. तुमने युद्ध
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द्वारा देवों के लिए धन प्राप्त किया. (३)
यद्योधया महतो मन्यमानान्त्साक्षाम तान् बाहुभिः शाशदानान्.
यद्वा नृभिर्वृत इन्द्राभियुध्यास्तं त्वयाजिं सौश्रवसं जयेम.. (४)
हे इंद्र! अपने आपको बड़ा मानने वाले योद्धाओं के साथ तुम जब हमारा युद्ध
कराओगे, तब उन हिंसक शत्रुओं को हम हाथों से ही हरा देंगे. हे इंद्र! यदि मरुतों को साथ
लेकर तुम स्वयं युद्ध करोगे, तो हम तुम्हारी सहायता से उस शोभन अन्नप्राप्ति वाले युद्ध में
विजय पाएंगे. (४)
प्रेन्द्रस्य वोचं प्रथमा कृतानि प्र नूतना मघवा या चकार.
यदेददेवींरसहिष्ट माया अथाभवत्केवलः सोमो अस्य.. (५)
मैं इंद्र के प्राचीन कार्यों का वर्णन करता हूं. इंद्र ने जो नए कार्य किए हैं, मैं उन्हें भी
कहता हूं. इंद्र ने असुरों की मायाओं को पराजित किया है, इसलिए सोमरस केवल इंद्र के
लिए ही है. (५)
तवेदं विश्वमभितः पशव्यं१ यत्पश्यसि चक्षसा सूर्यस्य.
गवामसि गोपतिरेक इन्द्र भक्षीमहि ते प्रयतस्य वस्वः.. (६)
हे इंद्र! प्राणियों के लिए हितकारक विश्व चारों ओर स्थित है. उसे तुम सूर्य के प्रकाश
की सहायता से देखते हो. यह विश्व तुम्हारा ही है. एकमात्र तुम्हीं गायों के स्वामी हो. हम
तुम्हारे द्वारा दिया हुआ धन भोगते हैं. (६)
बृहस्पते युवमिन्द्रश्च वस्वो दिव्यस्येशाथे उत पार्थिवस्य.
धत्तं रयिं स्तुवते कीरये चिद्यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (७)
हे बृहस्पति! तुम एवं इंद्र दोनों प्रकार के पार्थिव एवं दिव्य धन के स्वामी हो. इसलिए
तुम स्तुतिकर्त्ता को धन देते हो. हे देवो! तुम कल्याणसाधनों द्वारा हमारा सदा पालन करो.
(७)
सूक्त—९९ देवता—इंद्र व विष्णु
परो मात्रया तन्वा वृधान न ते महित्वमन्वश्नुवन्ति.
उभे ते विद्म रजसी पृथिव्या विष्णो देव त्वं परमस्य वित्से.. (१)
हे विष्णु! शब्द, स्पर्श आदि पंचतन्मात्राओं से अतीत तुम्हारा शरीर जब वामन अवतार
के समय बढ़ता है, तब तुम्हारी महिमा कोई नहीं जान सकता. हम तुम्हारे दो लोकों अर्थात्
धरती एवं अंतरिक्ष को जानते हैं, पर परम लोक को तुम ही जानते हो. (१)
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न ते विष्णो जायमानो न जातो देव महिम्नः परमन्तमाप.
उदस्तभ्ना नाकमृष्वं बृहन्तं दाधर्थ प्राचीं ककुभं पृथिव्याः.. (२)
हे विष्णुदेव! धरती पर जन्म प्राप्त एवं भविष्य में उत्पन्न होने वालों में कोई भी तुम्हारी
महिमा का अंत नहीं पा सकता. तुमने दर्शनीय एवं विशाल स्वर्गलोक ऊपर धारण किया है.
तुमने पृथ्वी की पूर्व दिशा को भी धारण किया है. (२)
इरावती धेनुमती हि भूतं सूयवसिनी मनुषे दशस्या.
व्यस्तभ्ना रोदसी विष्णवेते दाधर्थ पृथिवीमभितो मयूखैः.. (३)
हे द्यावा-पृथिवी! तुम स्तोता मनुष्य को दान करने की अभिलाषा से अन्न, धेनु एवं
शोभन जौ से युक्त हुई हो. हे विष्णु! तुमने द्यावा-पृथिवी को अनेक प्रकार से धारण किया है.
तुमने पृथ्वी को सर्वत्र स्थित पर्वतों की सहायता से धारण किया है. (३)
उरुं यज्ञाय चक्रथुरु लोकं जनयन्ता सूर्यमुषासमग्निम्.
दासस्य चिद्वृषशिप्रस्य माया जघ्नथुर्नरा पृतनाज्येषु.. (४)
हे इंद्र एवं विष्णु! तुम दोनों ने सूर्य, उषा एवं अग्नि को उत्पन्न करके यजमान के लिए
विस्तृत स्वर्गलोक को बनाया है. हे नेताओ! तुमने वृषशिप्र नामक दास की मायाओं को युद्धों
में समाप्त कर दिया था. (४)
इन्द्राविष्णू दृंहिताः शम्बरस्य नव पुरो नवतिं च श्रथिष्टम्.
शतं वर्चिनः सहस्रं च साकं हथो अप्रत्यसुरस्य वीरान्.. (५)
हे इंद्र एवं विष्णु! तुमने शंबर असुर की सुदृढ़ निन्यानवे नगरियों को समाप्त किया था.
तुमने वर्चि नामक असुर के सैकड़ों और हजारों वीरों को नष्ट किया. (५)
इयं मनीषा बृहती बृहन्तोऋक्रमा तवसा वर्धयन्ती.
ररे वां स्तोमं विदथेषु विष्णो पिन्वतमिषो वृजनेष्विन्द्र.. (६)
हमारी यह विशाल स्तुति महान्, विक्रमशाली एवं शक्तिशाली इंद्र व विष्णु को बढ़ाएगी.
हे इंद्र एवं विष्णु! हमने यज्ञ में तुम्हारी स्तुति की है. युद्ध में तुम हमारा अन्न बढ़ाना. (६)
वषट् ते विष्णोवास आ कृणोमि तन्मे जुषस्व शिपिविष्ट हव्यम्.
वर्धन्तु त्वा सुष्टुतयो गिरो मे यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (७)
हे विष्णु! मैं यज्ञ में तुम्हारे लिए अपने मुख से वषट् शब्द बोलता हूं. हे तेजस्वी विष्णु!
तुम हमारे हव्य को स्वीकार करो. हमारी शोभनस्तुति के वाक्य तुम्हारी वृद्धि करें. हे देवो! तुम
कल्याणसाधनों द्वारा हमारा सदा पालन करो. (७)
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सूक्त—१०० देवता—विष्णु

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सूक्त—१०० देवता—विष्णु
नू मर्तो दयते सनिष्यन्यो विष्णव उरुगायाय दाशत्.
प्र यः सत्राचा मनसा यजात एतावन्तं नर्यमाविवासात्.. (१)
जो मनुष्य बहुत से लोगों द्वारा प्रशंसायोग्य विष्णु को हव्य देता है, एक साथ बहुत से
मंत्र बोलकर पूजा करता है एवं मानवहितकारी विष्णु की सेवा करता है, वह मनुष्य अपने
इच्छित धन को शीघ्र प्राप्त करता है. (१)
त्वं विष्णो सुमतिं विश्वजन्यामप्रयुतामेवयावो मतिं दाः.
पर्चो यथा नः सुवितस्य भूरेरश्वावतः पुरुश्चन्द्रस्य रायः.. (२)
हे विष्णु! तुम हम पर ऐसी कृपा करो जो सबका हित करने वाली एवं दोषहीन हो. तुम
ऐसी कृपा करो, जिससे भली प्रकार प्राप्त करने योग्य, अनेक अश्वों से युक्त एवं बहुतों को
प्रसन्न करने वाला धन प्राप्त हो. (२)
त्रिर्देवः पृथिवीमेष एतां वि चक्रमे शतर्चसं महित्वा.
प्र विष्णुरस्तु तवसस्तवीयान्त्वेषं ह्यस्य स्थविरस्य नाम.. (३)
विष्णुदेव ने सौ किरणों वाली धरती पर अपनी महिमा से तीन बार चरण रखा. वृद्धों से
भी वृद्ध विष्णु हमारे स्वामी हों. वृद्धिप्राप्त विष्णु का रूप तेजशाली है. (३)
वि चक्रमे पृथिवीमेष एतां क्षेत्राय विष्णुर्मनुषे दशस्यन्.
ध्रुवासो अस्य कीरयो जनास उरुक्षितिं सुजनिमा चकार.. (४)
धरती को मानवों के निवास के निमित्त देने के विचार से विष्णु ने उस पर तीन बार
चरण रखे. विष्णु के स्तोता निश्चल हो जाते हैं. शोभन जन्म वाले विष्णु ने विस्तृत
निवासस्थान बनाया है. (४)
प्र तत्ते अद्य शिपिविष्ट नामार्यः शंसामि वयुनानि विद्वान्.
तं त्वा गृणामि तवसमत्व्यान्-क्षयन्तमस्य रजसः पराके.. (५)
हे तेजस्वी विष्णु! स्तुतियों के स्वामी एवं जानने योग्य बातों को जानने वाले हम आज
तुम्हारे प्रसिद्ध नाम को कहेंगे. हम वृद्धिरहित होकर भी अत्यंत वृद्धिशाली तुम्हारी स्तुति
करेंगे. तुम रज अर्थात् धरालोक के परे रहते हो. (५)
किमित्ते विष्णो परिचक्ष्यं भूत्प्र यद्ववक्षे शिपिविष्टो अस्मि.
मा वर्पो अस्मदप गूह एतद्यदन्यरूपः समिथे बभूथ.. (६)
हे विष्णु! मैं तुम्हारा नाम किरणों से युक्त बताता हूं. इस नाम को स्वीकार न करना क्या
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तुम्हें उचित है? तुमने युद्ध में दूसरा रूप धारण किया था. तुम हमसे अपना रूप मत
छिपाओ. (६)
वषट् ते विष्णवास आ कृणोमि तन्मे जुषस्व शिपिविष्ट हव्यम्.
वर्धन्तु त्वा सुष्टुतयो गिरो मे यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (७)
हे विष्णु! मैं यज्ञ में तुम्हारे लिए अपने मुख से वषट् शब्द बोलता हूं. हे तेजस्वी विष्णु!
तुम हमारे हव्य को स्वीकार करो. हमारी शोभनस्तुति के वाक्य तुम्हारी वृद्धि करें. हे देवो! तुम
कल्याणसाधनों द्वारा हमारा सदा पालन करो. (७)
सूक्त—१०१ देवता—पर्जन्य
तिस्रो वाचः प्र वद ज्योतिरग्रा या एतद्दुह्रे मधुदोधमूहः.
स वत्सं कृण्वन् गर्भमोषधीनां सद्यो जातो वृषभो रोरवीति.. (१)
हे ऋषि! उन्हीं तीन वचनों को बोलो, जिनके अग्र भाग में ओम है एवं जो जल का
दोहन करते हैं. पर्जन्य अपने साथ रहने वाली बिजलीरूपी अग्नि को उत्पन्न करते हैं एवं
ओषधियों में गर्भ धारण करते हैं. वे शीघ्र उत्पन्न होकर बैल के समान बार-बार शब्द करते हैं.
(१)
यो वर्धन ओषधीनां यो अपां यो विश्वस्य जगतो देव ईशे.
स त्रिधातु शरणं शर्म यंसत्त्रिवर्तु ज्योतिः स्वभिष्ट्य१स्मे.. (२)
ओषधियों एवं जल को बढ़ाने वाले तथा सारे संसार के स्वामी पर्जन्य तीन प्रकार की
भूमियों से युक्त घर एवं सुख प्रदान करें. पर्जन्य हमें तीन ऋतुओं में रहने वाली शोभन ज्योति
दें. (२)
स्तरीरु त्वद्भवति सूत उ त्वद्यथावशं तन्वं चक्र एषः.
पितुः पयः प्रति गृभ्णाति माता तेन पिता वर्धते तेन पुत्रः.. (३)
पर्जन्य का एक रूप बच्चे देने में असमर्थ बूढ़ी गाय के समान है और दूसरा रूप गाय के
समान जल प्रसव करने वाला है. पर्जन्य इच्छानुसार अपना शरीर बदलते हैं. धरती माता
भूलोकरूपी पिता से जलरूपी दूध लेती है. इसके पिता एवं प्राणिवर्गरूपी पुत्र बढ़ते हैं. (३)
यस्मिन् विश्वानि भुवनानि तस्थुस्तिस्रो द्यावस्त्रेधा सस्रुरापः.
त्रयः कोशास उपसेचनासो मध्वः श्चोतन्त्यभितो विरप्शम्.. (४)
पर्जन्य देव वे हैं, जिन में सभी भुवन स्थित हैं. उन में द्युलोक आदि तीनों लोक स्थित हैं
एवं जिन में तीन स्थानों से जल टपकता है. सबके भिगोने वाले तीन प्रकार के मेघ पर्जन्य के
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चारों ओर जल बरसाते हैं. (४)
इदं वचः पर्जन्याय स्वराजे हृदो अस्त्वन्तरं तज्जुजोषत्.
मयोभुवो वृष्टयः सन्तवस्मे सुपिप्पला ओषधीर्देवगोपाः.. (५)
स्वयं प्रदीप्त पर्जन्य के निमित्त यह स्तोत्र बनाया गया है. पर्जन्य यह स्तोत्र स्वीकार करें.
यह उनके मन को भावे. हमारा सुख निर्माण करने वाली वर्षा हो. पर्जन्यों द्वारा सुरक्षित
ओषधियां फलवती हों. (५)
स रेतोधा वृषभः शश्वतीनां तस्मिन्नात्मा जगतस्तस्थुषश्च.
तन्म ऋतं पातु शतशारदाय यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (६)
वे पर्जन्य अनेक ओषधियों के लिए बैल के समान वीर्य धारण करते हैं. स्थावर और
जंगम की आत्मा पर्जन्य में ही स्थित है. पर्जन्य द्वारा बरसाया हुआ जल सौ वर्ष तक जीवित
रहने के लिए मेरी रक्षा करे. हे देवो! तुम कल्याणसाधनों द्वारा हमारी सदा रक्षा करो. (६)
सूक्त—१०२ देवता—पर्जन्य
पर्जन्याय प्र गायत दिवस्पुत्राय मीळहुषे. स नो यवसमिच्छतु.. (१)
हे स्तोताओ! अंतरिक्ष के पुत्र एवं सेचन करने वाले पर्जन्य के लिए स्तुतियां गाओ. (१)
यो गर्भोमोषधीनां गवां कृणोत्यर्वताम्. पर्जन्यः पुरुषीणाम्.. (२)
पर्जन्य देव ओषधियों, गायों, घोड़ियों एवं स्त्रियों में गर्भ धारण करते हैं. (२)
तस्मा इदास्ये हविर्जुहोता मधुमत्तमम्. इळां नः संयतं करत्.. (३)
उन्हीं पर्जन्य देव के निमित्त देवों के मुखरूप अग्नि में अतिशय मधुर हव्य का होम
करो. पर्जन्य हमारे लिए निश्चित अन्न दें. (३)
सूक्त—१०३ देवता—मंडूक
संवत्सरं शशयाना ब्राह्मणा व्रतचारिणः.
वाचं पर्जन्यजिन्वितां प्र मण्डूका अवादिषुः.. (१)
मेंढक व्रत करने वाले स्तोता की तरह एक वर्ष तक सोने के बाद बादलों के प्रति
प्रसन्नताकारक वाणी बोलते हैं. (१)
दिव्या आपो अभि यदेनमायन्दृतिं न शुष्कं सरसी शयानम्.
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गवामह न मायुर्वत्सिनीनां मण्डूकानां वग्नुरत्रा समेति.. (२)
मेंढक सूखे चमड़े के समान तालाब में सोए हुए थे. स्वर्ग का जल जब उन पर बरसता
है, तब वे बछड़े वाली गायों के समान शब्द करने लगते हैं. (२)
यदीमेनाँ उशतो अभ्यवर्षीत्तृष्यावतः प्रावृष्यागतायाम्.
अख्खलीकृत्या पितरं न पुत्रो अन्यो अन्यमुप वदन्तमेति.. (३)
वर्षा ऋतु आने पर जब पर्जन्य अभिलाषा करने वाले एवं प्यासे मेंढकों पर जल बरसाते
हैं, उस समय मेंढक ‘अख्खल’ शब्द करते हुए एक-दूसरे के पास इस प्रकार जाते हैं, जिस
प्रकार खिलखिलाता हुआ बालक पिता के पास जाता है. (३)
अन्यो अन्यमनु गृभ्णात्येनोरपां प्रसर्गे यदमन्दिषाताम्.
मण्डूको यदभिवृष्टः कनिष् कन्पृश्निः सम्पृङ्क्ते हरितेन वाचम्.. (४)
जल बरसने के समय दो प्रकार के मेंढक प्रसन्न होते हैं एवं वर्षा के जल से भीगकर
लंबी छलांगें लगाते हैं. भूरे रंग का मेंढक हरे रंग वाले मेंढकों के साथ अपना स्वर मिलाता है.
उस समय एक मेंढक दूसरे पर अनुग्रह करता है. (४)
यदेषामन्यो अन्यस्य वाचं शाक्तस्येव वदति शिक्षमाणः.
सर्वं तदेषां समृद्धेव पर्व यत्सुवाचो वदथनाध्यप्सु.. (५)
जब एक मेंढक दूसरे के शब्द का इस तरह अनुकरण करता है, जिस तरह शिष्य गुरु के
शब्द दोहराता है एवं जल के ऊपर उछलते हुए सब मेंढक शब्द करते हैं. हे मेंढको! उस
समय तुम्हारे शरीर के सभी जोड़ ठीक हो जाते हैं. (५)
गोमायुरेको अजमायुरेकः पृश्निरेको हरित एक एषाम्.
समानं नाम बिभ्रतो विरूपाः पुरुत्रा वाचं पिपिशुर्वदन्तः.. (६)
मेंढकों में से कोई गाय की तरह बोलता है और कोई बकरी की तरह. एक का रंग भूरा
होता है और दूसरे का हरा. एक नाम धारण करते हुए सब भिन्न रूप वाले होते हैं. मेंढक
भिन्नभिन्न प्रकार के शब्द करते हुए प्रकट होते हैं. (६)
ब्राह्मणासो अतिरात्रे न सोमे सरो न पूर्णमभितो वदन्तः.
संवत्सरस्य तदहः परिष्ठ यन्मण्डूकाः प्रावृषीणं बभूव.. (७)
हे मेंढको! जिस दिन अधिक वर्षा हो, उस दिन तुम इस प्रकार शब्द करते हुए तालाब में
चारों ओर घूमो, जिस प्रकार अतिरात्र नामक यज्ञ में ब्राह्मण सोमरस के चारों ओर मंत्र पढ़ते
हैं. (७)
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ब्राह्मणासः सोमिनो वाचमक्रत ब्रह्म कृण्वन्तः परिवत्सरीणम्.
अध्वर्यवो घर्मिणः सिष्विदाना आविर्भवन्ति गुह्या न के चित्.. (८)
ये मेंढक उसी प्रकार बोलते हैं, जिस प्रकार सोमरस धारण करने वाले स्तोता वार्षिक
स्तुति करते हैं. प्रवर्ग का आचरण करने वाले ऋत्विजों के समान धूप से गीले शरीर वाले एवं
बिलों में छिपे हुए मेंढक प्रकट होते हैं. (८)
देवहितं जुगुपुर्द्वादशस्य ऋतुं नरो न प्र मिनन्त्येते.
संवत्सरे प्रावृष्यागतायां तप्ता घर्मा अश्नुवते विसर्गम्.. (९)
नेताओं के समान ये मेंढक देवनिर्मित नियमों का पालन करते हैं तथा बारह महीनों के
रूप में आने वाली ऋतुओं को नष्ट नहीं करते. एक वर्ष बीतने पर जब वर्षा आती है तो गरमी
के ताप से दुःखी मेंढक गड्ढों से बाहर निकलते हैं. (९)
गोमायुरदादजमायुरदात्पृश्निरदाद्धरितो नो वसूनि.
गवां मण्डूका ददतः शतानि सहस्रसावे प्र तिरन्त आयुः.. (१०)
गाय की तरह बोलने वाला, बकरी की तरह बोलने वाला, भूरे रंग का एवं हरे रंग का
मेंढक हमें संपत्ति दे. हजारों ओषधियों को उत्पन्न करने वाली वर्षार्ऋतु में मेंढक सैकड़ों गाएं
देते हुए हमारी आयुवृद्धि करें. (१०)
सूक्त—१०४ देवता—सोम आदि
इन्द्रासोमा तपतं रक्ष उब्जतं न्यर्पयतं वृषणा तमोवृधः.
परा शृणीतमचितो न्योषतं हतं नुदेथां नि शिशीतमत्रिणः.. (१)
हे इंद्र तथा सोम! तुम राक्षसों को कष्ट दो तथा उनको नष्ट करो. हे अभिलाषापूरको!
तुम अंधकार में बढ़ने वाले राक्षसों को नीचे गिराओ. तुम अज्ञानी राक्षसों को परांगमुख करके
नष्ट करो, जलाओ, मारो, फेंक दो एवं मनुष्यभक्षी राक्षसों को घायल करो. (१)
इन्द्रासोमा समघशंसमभ्य१घं तपुर्ययस्तु चरुरग्निवाँ इव.
ब्रह्मद्विषे क्रव्यादे घोरचक्षसे द्वेषो धत्तमनवायं किमीदिने.. (२)
हे इंद्र एवं सोम! तुम पाप की प्रशंसा करने वाले राक्षसों को भली प्रकार नष्ट करो. तुम
अपने तेज द्वारा संतप्त राक्षसों को इस प्रकार समाप्त कर दो, जिस प्रकार अग्नि में डाला
हुआ चरु लुप्त हो जाता है. ब्राह्मणों से द्वेष रखने वाले, मांसभक्षक, डरावने नेत्रों वाले एवं
कठोरभाषी राक्षसों के प्रति ऐसा व्यवहार करो, जिससे उनके प्रति तुम्हारा सदा द्वेष रहे. (२)
इन्द्रासोमा दुष्कृतो वव्रे अन्तरनारम्भणे तमसि प्र विध्यतम्.
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यथा नातः पुनरेकश्चनोदयत्तद्वामस्तु सहसे मन्युमच्छवः.. (३)
हे इंद्र एवं सोम! तुम बुरे कर्म करने वाले राक्षसों को वारक मरुस्थल एवं आश्रयहीन
अंधकार में फेंक कर मारो, जिससे एक भी राक्षस जीवित न उठ सके. क्रोधयुक्त तुम्हारा वह
प्रसिद्ध बल राक्षसों को दबाने में समर्थ हो. (३)
इन्द्रासोमा वर्तयतं दिवो वधं सं पृथिव्या अघशंसाय तर्हणम्.
उत्तक्षतं स्वर्यं१ पर्वतेभ्यो येन रक्षो वावृधानं निजूर्वथः.. (४)
हे इंद्र एवं सोम! तुम अंतरिक्ष से हननसाधन आयुध उत्पन्न करो. पापों की प्रशंसा करने
वाले के लिए तुम धरती से आयुध उत्पन्न करो. तुम बादलों से उस घातक वज्र को उत्पन्न करो
जिसने बढ़े हुए राक्षस को नष्ट किया था. (४)
इन्द्रासोमा वर्तयतं दिवस्पर्यग्नितप्तेभिर्युवमश्महन्मभिः.
तपुर्वधेभिरजरेभिरत्रिणो नि पर्शने विध्यतं यन्तु निस्वरम्.. (५)
हे इंद्र एवं सोम! अंतरिक्ष के चारों ओर आयुधों को भेजो. तुम अग्नि के द्वारा तपाए हुए,
संतापदायक, प्रहार वाले, जरारहित एवं पत्थरों से निर्मित हननसाधन आयुधों द्वारा राक्षसों
के आसपास के स्थान विदीर्ण करो. इससे वे राक्षस चुपचाप भाग जाएंगे. (५)
इन्द्रासोमा परि वां भूतु विश्वत इयं मतिः कक्ष्याश्वेव वाजिना.
यां वां होत्रां परिहिनोमि मेधयेमा ब्रह्माणि नृपतीव जिन्वतम्.. (६)
हे इंद्र एवं सोम! जिस प्रकार दोनों ओर बंधी हुई रस्सी घोड़े को बांधती है, उसी प्रकार
यह स्तुति तुम्हें प्रभावित करे. मैं बुद्धिबल से यह स्तुति तुम्हारे पास भेज रहा हूं. राजा जिस
प्रकार धन से मांगने वाले की इच्छा पूरी करता है, उसी प्रकार तुम इस स्तुति को सफल
बनाओ. (६)
प्रति स्मरेथां तुजयद्भिरैवेर्हतं द्रुहो रक्षसो भङ्गुरावतः.
इन्द्रासोमा दुष्कृते मा सुगं भूद्यो नः कदा चिदभिदासति द्रुहा.. (७)
हे इंद्र एवं सोम! तुम शीघ्र चलने वाले घोड़ों की सहायता से आओ. तुम द्रोही एवं
तोड़फोड़ करने वाले राक्षसों को नष्ट करो. दुष्कर्म वाले राक्षस को सुख प्राप्त न हो. वह
द्रोहभावना के कारण हमें कभी न कभी मार सकता है. (७)
यो मा पाकेन मनसा चरन्तमभिचष्टे अनृतेभिर्वचोभिः.
आपइव काशिना सङ्गृभीता असन्नस्त्वासत इन्द्र वक्ता.. (८)
हे इंद्र! जो राक्षस मुझ सच्चे मन एवं आचरण वाले को असत्यवादी कहता है, वह झूठ
बोलने वाला राक्षस इस प्रकार नष्ट हो जाए, जिस प्रकार मुट्ठी में बंद पानी समाप्त हो जाता
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है. (८)
ये पाकशंसं विहरन्त एवैर्ये वा भद्रं दूषयन्ति स्वधाभिः.
अहये वा तान् प्रददातु सोम आ वा दधातु निरृतेरुपस्थे.. (९)
जो राक्षस मुझ सत्यवादी को अपने स्वार्थों के कारण बदनाम करते हैं एवं जो बली
राक्षस मुझ भले आदमी को दोषी ठहराते हैं, सोमदेव उन्हें सांप को दे दें अथवा पाप देव की
गोद में धारण करें. (९)
यो ना रसं दिप्सति पित्वो अग्ने यो अश्वानां यो गवां यस्तनूनाम्.
रिपुः स्तेनः स्तेयकृद्ध्रमेतु नि ष हीयतां तन्वा३ तना च.. (१०)
हे अग्नि! जो राक्षस हमारे अन्न का रस नष्ट करना चाहता है, जो हमारी गायों, घोड़ों एवं
संतानों के सार समाप्त करना चाहता है, वह शत्रु, चोर एवं धन छीनने वाला नाश को प्राप्त
हो. वह अपने शरीर एवं संतान दोनों से नाश को प्राप्त हो. (१०)
परः सो अस्तु तन्वा३ तना च तिस्रः पृथिवीरधो अस्तु विश्वाः.
प्रति शुष्यतु यशो अस्य देवा यो ना दिवा दिप्सति यश्च नक्तम्.. (११)
राक्षस शरीर एवं संतान दोनों से हीन हो. वह तीनों लोकों के नीचे चला जाए. हे देवो!
जो राक्षस हमें रात-दिन मारना चाहता है, उसका यश सूख जाए. (११)
सुविज्ञानं चिकितुषे जनाय सच्चासच्च वचसी पस्पृधाते.
तयोर्यत्सत्यं यतरदृजीयस्तदित्सोमोऽवति हन्त्यासत्.. (१२)
विद्वान् यह बात सरलता से जान सकता है कि सत्य एवं असत्य बातों में परस्परविरोध
होता है, उन में सोम सत्य एवं सरल बात का पालन करते हैं एवं असत्य बात का नाश करते
हैं. (१२)
न वा उ सोमो वृजिनं हिनोति न क्षत्रियं मिथुया धारयन्तम्.
हन्ति रक्षो हन्त्यासद्वदन्तमुभाविन्द्रस्य प्रसितौ शयाते.. (१३)
पापी एवं झूठ बोलने वाला शक्तिशाली हो, तब भी सोम उसे नहीं छोड़ते. वे
असत्यवादी एवं राक्षस को मारते हैं. ये दोनों मरकर इंद्र के बंधन में सोते हैं. (१३)
यदि वाहमनृतदेव आस मोघं वा देवाँ अप्यूहे अग्ने.
किमस्मभ्यं जातवेदो हृणीषे द्रोघवाचस्ते निर्ऋथं सचन्ताम्.. (१४)
हे अग्नि! क्या मैं झूठे देवों की भक्ति करता हूं अथवा फल न देने वाले देवों का उपासक
हूं? फिर तुम मुझसे क्यों क्रुद्ध हो? झूठ बोलने वाले ही तुम्हारी हिंसा विशेषरूप से प्राप्त करें.
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(१४)
अद्या मुरीय यदि यातुधानो अस्मि यदि वायुस्ततप पूरुषस्य.
अधा स वीरैर्दशभिर्वि यूया यो मा मोघं यातुधानेत्याह.. (१५)
मैं वसिष्ठ यदि राक्षस होऊं अथवा मैं पुरुषों का जीवन नष्ट करता होऊं तो मैं आज ही
मर जाऊं. नहीं तो जो मुझे व्यर्थ ही राक्षस कहकर पुकारता है, उसके दस वीर पुत्र मर जावें.
(१५)
यो मायातुं यातुधानेत्याह यो वा रक्षाः शुचिरस्मीत्याह.
इन्द्रस्तं हन्तु महता वधेन विश्वस्य जन्तोरधमस्पदीष्ट.. (१६)
जो राक्षस मुझ अराक्षस को राक्षस कहता है एवं स्वयं को पवित्र बतलाता है, उसे इंद्र
अपने महान् आयुधों द्वारा नष्ट कर दें. वह सभी प्राणियों की अपेक्षा अधम बनें. (१६)
प्र या जिगाति खर्गलेव नक्तमप द्रुहा तन्वं१ गृहमाना.
वव्राँ अनन्ताँ अव सा पदीष्ट ग्रावाणो घ्नन्तु रक्षस उपब्दैः.. (१७)
जो राक्षस रात के समय उल्लू के समान अपना शरीर छिपाकर चलता है, वह नीचे को
मुंह करके गहरे गड्ढे में गिरे. सोमरस कुचलने के पत्थर भी अपने शब्दों से उसे नष्ट करें.
(१७)
वि तिष्ठध्वं मरुतो विश्वि१च्छत गृभायत रक्षसः सं पिनष्टन.
वयो ये भूत्वी पतयन्ति नक्तभिर्ये वा रिपो दधिरे देवे अध्वरे.. (१८)
हे मरुतो! तुम प्रजाओं में अनेक प्रकार से स्थित बनो. जो राक्षस रात में पक्षी बनकर
नीचे उतरते हैं अथवा जो प्रज्वलित यज्ञ में बाधा डालते हैं, उन्हें अपनी इच्छानुसार पकड़ो
एवं पीस डालो. (१८)
प्र वर्तय दिवो अश्मानमिन्द्र सोमशितं मघवन्त्सं शिशाधि.
प्राक्तादपाक्तादधरादुदक्तादभि जहि रक्षसः पर्वतेन.. (१९)
हे इंद्र! अंतरिक्ष से अपना वज्र चलाओ. हे धनस्वामी इंद्र! सोमरस के कारण शीघ्र कार्य
करने वाले यजमान को शुद्ध करो. तुम अपने पर्वों वाले वज्र द्वारा पूर्व, पश्चिम, दक्षिण एवं
उत्तर में वर्तमान राक्षसों को नष्ट करो. (१९)
एत उ त्ये पतयन्ति श्वयातव इन्द्रं दिप्सन्ति दिप्सवोऽदाभ्यम्.
शिशीते शक्रः पिशुनेभ्यो वधं नूनं सृजदशनिं यातुमद्भ्यः.. (२०)
जो राक्षस कुत्तों के समान झपटते हैं एवं जो अहिंसनीय इंद्र की हिंसा करना चाहते हैं,
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