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संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

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DevanagariHindipublished770 pages

About this granth

The Narada Purana (नारद पुराण) is one of the eighteen major Puranas, a Vaishnava text traditionally ascribed to Veda Vyasa. In its first part the four Kumaras, Sanaka, Sanandana, Sanatana and Sanatkumara, instruct the sage Narada in dharma, devotion and knowledge; the second part unfolds as a dialogue between Vasishtha and King Mandhata. It is notable for summarising the Vedangas (phonetics, ritual, grammar, etymology, astronomy and metre) and for giving a synopsis of all eighteen Puranas.

This is the Gita Press, Gorakhpur "Sankshipt Naradpuran", an illustrated, large-type edition in Hindi only: an abridged Hindi rendering without the Sanskrit text. The copy records the eighteenth reprint of Samvat 2076. It follows the four padas of the first part and then the later part.

The later part is dominated by the glory of the Ekadashi fast, the story of King Rukmangada, and the merits of various places of pilgrimage. At about 770 pages, it is meant for readers who want the stories and teachings of the Purana in plain Hindi.

पूर्वभाग-द्वितीय पाद ३६७

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  • पूर्वभाग-द्वितीय पाद * ३६७

शुभप्रद होता है। यदि चार ग्रह भी बली हों तो भी उन्हें शुभप्रद ही समझना चाहिये ॥ ४३२-४३३ ॥

मुने! जामित्र (लग्नसे सप्तम स्थान) शुद्ध (ग्रहवर्जित) हो तथा लग्न इक्कीस दोषोंसे रहित हो तो उसे विवाहमें ग्रहण करना चाहिये। अब मैं उन इक्कीस दोषोंके नाम, स्वरूप और फलका संक्षेपसे वर्णन करता हूँ, सुनो— ॥ ४३४ १/२ ॥

(विवाहके इक्कीस दोष—) पञ्चाङ्ग-शुद्धिका न होना, यह प्रथम दोष कहा गया है। उदयास्तकी शुद्धिका न होना २, उस दिन सूर्यकी संक्रान्तिका होना ३, पापग्रहका षड्वर्गमें रहना ४, लग्नसे छठे भावमें शुक्रकी स्थिति ५, अष्टममें मङ्गलका रहना ६, गण्डान्त होना ७, कर्तरीयोग ८, बारहवें, छठे और आठवें चन्द्रमाका होना तथा चन्द्रमाके साथ किसी अन्य ग्रहका होना ९, वर-कन्याकी जन्मराशिसे अष्टम राशि लग्न हो या दैनिक चन्द्रराशि हो १०, विषघटी ११, दुर्मुहूर्त १२, वार-दोष १३, खर्जूर १४, नक्षत्रैकचरण १५, ग्रहण और उत्पातके नक्षत्र १६, पापग्रहसे विद्ध नक्षत्र १७, पापसे युक्त नक्षत्र १८, पापग्रहका नवमांश १९, महापात २० और वैधृति २१—विवाहमें ये २१ दोष कहे गये हैं ॥ ४३५-४३८ १/२ ॥

मुने! तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण—इन पाँचोंका मेल 'पञ्चाङ्ग' कहलाता है। उसकी शुद्धि 'पञ्चाङ्ग'शुद्धि कहलाती है। जिस दिन पञ्चाङ्गके दोष हों, उस दिन विवाहलग्न बनाना निरर्थक है। इस प्रकारका लग्न यदि पाँच इष्ट ग्रहोंसे युक्त हो तो भी उसको विषमिश्रित दूधके समान त्याग देना चाहिये ॥ ४३९-४४० १/२ ॥ लग्न या उसके नवमांश अपने-अपने स्वामीसे युक्त या दृष्ट न हों अथवा परस्पर (लग्नशसे नवमांश और नवमांशपतिसे लग्नेश) युक्त या दृष्ट न हों अथवा अपने स्वामीके शुभग्रह मित्रसे युक्त या दृष्ट न हों तो वरके लिये घातक होते हैं*। इसी प्रकार लग्नसे सप्तम और उसके नवमांशमें भी ये दोनों यदि अपने-अपने स्वामीसे अथवा परस्पर युक्त या दृष्ट नहीं हों या अपने-अपने स्वामीके शुभ मित्रसे युक्त या दृष्ट न हों तो उस दशामें विवाह होनेपर वह वधूके लिये घातक है ॥ ४४१-४४२ १/२ ॥

सूर्यकी संक्रान्तिके समयसे पूर्व और पश्चात् सोलह-सोलह घड़ी विवाह आदि शुभ कार्योंमें त्याज्य है। लग्नका षड्वर्ग (राशि, होरा, द्रेष्काण, नवमांश, द्वादशांश तथा त्रिंशांश) शुभ हो तो विवाह, देवप्रतिष्ठा आदि कार्योंमें श्रेष्ठ माना गया है ॥ ४४३-४४४ ॥

लग्नसे छठे स्थानमें शुक्र हो तो वह 'भृगुषष्ठ' नामक दोष कहलाता है। उच्चस्थ और शुभ ग्रहसे युक्त होनेपर भी उस लग्नको सदा त्याग देना चाहिये। लग्नसे अष्टम स्थानमें मङ्गल हो तो यह 'भौम महादोष' कहलाता है। यदि मङ्गल उच्चमें हो और तीन शुभ ग्रह लग्नमें हों तो इस लग्नका त्याग नहीं करना चाहिये (अर्थात् ऐसी स्थितिमें अष्टम मङ्गलका दोष नष्ट हो जाता है) ॥ ४४५-४४६ ॥

(गण्डान्त-दोष—) पूर्णा (५, १०, १५) तिथियोंके अन्त और नन्दा (१, ६, ११) तिथियोंकी आदिकी सन्धिमें दो घड़ी 'तिथिगण्डान्त-दोष' कहलाता है। यह जन्म, यात्रा, उपनयन और विवाहादि शुभ कार्योंमें घातक कहा गया है ॥ ४४७ ॥ कर्क लग्नके अन्त और सिंह लग्नके आदिकी सन्धिमें, वृश्चिक और धनुकी सन्धिमें तथा मीन और मेष लग्नकी सन्धिमें आधा घड़ी 'लग्नगण्डान्त' कहलाता है। यह भी घातक होता है ॥ ४४८ ॥ आश्लेषाके अन्तका चतुर्थ चरण और मघाका प्रथम चरण तथा ज्येष्ठाके अन्तकी १६ घड़ी और मूलका प्रथम चरण एवं रेवती नक्षत्रके अन्तकी


*यहाँ घातक शब्द अशुभ-सूचक समझना चाहिये अर्थात् ऐसे लग्नमें वरको अशुभ फल प्राप्त होता है।

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३६८* संक्षिप्त नारदपुराण *

ग्यारह घड़ी और अश्विनीका प्रथम चरण—इस प्रकार इन दो-दो नक्षत्रोंकी सन्धिका काल 'नक्षत्रगण्डान्त' कहलाता है। ये तीनों प्रकारके गण्डान्त महाक्रूर होते हैं॥ ४४७-४४९ १/२॥

(कर्तरीदोष—) लग्नसे बारहवें मार्गी और द्वितीयमें वक्री दोनों पापग्रह हों तो लग्नमें आगे-पीछे दोनों ओरसे जानेके कारण यह 'कर्तरीदोष' कहलाता है। इसमें विवाह होनेसे यह कर्तरीदोष वर-वधू दोनोंके गलेपर छुरी चलानेवाला (उनका अनिष्ट करनेवाला) होता है। ऐसे कर्तरीदोषसे युक्त लग्नका परित्याग कर देना चाहिये॥ ४५०-४५१॥

(लग्न-दोष—) यदि लग्नसे छठे, आठवें तथा बारहवेंमें चन्द्रमा हो तो यह 'लग्नदोष' कहलाता है। ऐसा लग्न शुभग्रहों तथा अन्य सम्पूर्ण गुणोंसे युक्त होनेपर भी दोषयुक्त होता है। वह लग्न बृहस्पति और शुक्रसे युक्त हो तथा चन्द्रमा उच्च, नीच, मित्र या शत्रुराशिमें (कहीं भी) हो, तो भी यत्नपूर्वक त्याग देने योग्य है, क्योंकि यह सब गुणोंसे युक्त होनेपर भी वर-वधूके लिये 'घातक' कहा गया है॥ ४५२-४५३ १/२॥

(सग्रहदोष—) चन्द्रमा यदि किसी ग्रहसे युक्त हो तो 'सग्रह' नामक दोष होता है। इस दोषमें भी विवाह नहीं करना चाहिये। चन्द्रमा यदि सूर्यसे युक्त हो तो दरिद्रता, मङ्गलसे युक्त हो तो घात अथवा रोग, बुधसे युक्त हो तो अनपत्यता (संतान-हानि), गुरुसे युक्त हो तो दौर्भाग्य, शुक्रसे युक्त हो तो पति-पत्नीमें शत्रुता, शनिसे युक्त हो तो प्रव्रज्या (घरका त्याग), राहुसे युक्त हो तो सर्वस्वहानि और केतुसे युक्त हो तो कष्ट और दरिद्रता होती है॥ ४५४-४५७॥

(पापग्रहकी निन्दा और शुभग्रहोंकी प्रशंसा—) मुने! इस प्रकार सग्रहदोषमें चन्द्रमा यदि पापग्रहसे युक्त हो तो वर-वधू दोनोंके लिये घातक होता है। यदि वह शुभग्रहोंसे युक्त हो तो उस स्थितिमें यदि उच्च या मित्रकी राशिमें चन्द्रमा हो तो लग्न दोषयुक्त रहनेपर भी वर-वधूके लिये कल्याणकारी होता है। परंतु चन्द्रमा स्वोच्चमें या स्वराशिमें अथवा मित्रकी राशिमें रहनेपर भी यदि पापग्रहसे युक्त हो तो वर-वधू दोनोंके लिये घातक होता है॥ ४५८-४५९ १/२॥

(अष्टमराशि लग्नदोष—) वर या वधूके जन्मलग्नसे अथवा उनकी जन्मराशिसे अष्टमराशि विवाह-लग्नमें पड़े तो यह दोष भी वर और वधूके लिये घातक होता है। वह राशि या वह लग्न शुभग्रहसे युक्त हो तो भी उस लग्नको, उस नवमांशसे युक्त लग्नको अथवा उसके स्वामीको यत्नपूर्वक त्याग देना चाहिये॥ ४६०-४६१॥

(द्वादश राशिदोष) वर-वधूके जन्म-लग्न या जन्मराशिसे द्वादश राशि यदि विवाह-लग्नमें पड़े तो वर-वधूके धनकी हानि होती है। इसलिये उस लग्नको, उसके नवमांशको और उसके स्वामीको भी त्याग देना चाहिये॥ ४६२ १/२॥

(जन्मलग्न और जन्मराशिकी प्रशंसा—) जन्म-राशि और जन्मलग्नका उदय विवाहमें शुभ होता है तथा दोनोंके उपचय (३, ६, १०, ११) स्थान यदि विवाह-लग्नमें हो तो अत्यन्त शुभप्रद होते हैं॥ ४६३ १/२॥

(विषघटी ध्रुवाङ्क—) अश्विनीका ध्रुवाङ्क ५०, भरणीका २४, कृत्तिकाका ३०, रोहिणीका ५४, मृगशिराका १३, आर्द्राका २१, पुनर्वसुका ३०, पुष्यका २०, आश्लेषाका ३२, मघाका ३०, पूर्वाफाल्गुनीका २०, उत्तराफाल्गुनीका १८, हस्तका २१, चित्राका २०, स्वातीका १४, विशाखाका १४, अनुराधाका १०, ज्येष्ठाका १४, मूलका ५६, पूर्वाषाढ़का २४, उत्तराषाढ़का २०, श्रवणका १०, धनिष्ठाका १०, शतभिषाका १८, पूर्व भाद्रपदका १६, उत्तर भाद्रपदका २४ और रेवतीका ध्रुवाङ्क ३० है। इन अश्विनी आदि नक्षत्रोंके अपने-अपने ध्रुवाङ्क तुल्य घड़ीके बाद ४ घड़ीतक विषघटी होती है। विवाह आदि शुभ कार्योंमें विषघटिकाओंका

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  • पूर्वभाग-द्वितीय पाद * ३६९

त्याग करना चाहिये^१ ॥ ४६४-४६८ ॥

रवि आदि वारोंमें जो मुहूर्त निन्दित कहा गया है, वह यदि अन्य लाख गुणोंसे युक्त हो तो भी विवाह आदि शुभ कार्योंमें वर्जनीय ही है॥ ४६९॥ रवि आदि दिनोंमें जो-जो वार-दोष कहे गये हैं, वे अन्य सब गुणोंसे युक्त हों तो भी शुभ कार्यमें वर्जनीय हैं ॥ ४७० ॥

नक्षत्रके जिस चरणमें पूर्वोक्त 'एकार्गल दोष' हो, उस चरण (नवांश)-से युक्त जो लग्न हो उसमें यदि गुरु, शुक्रका योग हो तो भी विषयुक्त दूधके समान उसको त्याग देना चाहिये ॥ ४७१ ॥

ग्रहण तथा उत्पातसे दूषित नक्षत्रको तीन ऋतु (छः मास)-तक शुभ कार्यमें छोड़ देना चाहिये। जब चन्द्रमा उस नक्षत्रको भोगकर छोड़ दे तो वह नक्षत्र जली हुई लकड़ीके समान निष्फल हो जाता है अर्थात् दोष-कारक नहीं रह जाता। शुभ कार्योंमें ग्रहसे विद्ध और पापग्रहसे युक्त सम्पूर्ण नक्षत्रको मदिरामिश्रित पञ्चगव्यके समान त्याग देना चाहिये; परंतु यदि नक्षत्र शुभग्रहसे विद्ध हो तो उसका विद्ध चरणमात्र त्याज्य है, सम्पूर्ण नक्षत्र नहीं; किंतु पापग्रहसे विद्ध नक्षत्र शुभकार्यमें सम्पूर्ण रूपसे त्याग देने योग्य है ॥ ४७२-४७४ ॥

(विहित नवमांश—) वृष, तुला, मिथुन, कन्या और धनुका उत्तरार्ध तथा इन राशियोंके नवमांश विवाहलग्नमें शुभप्रद हैं। किसी भी लग्नमें अन्तिम नवमांश यदि वर्गोत्तम हो तभी उसे शुभप्रद समझना चाहिये^२। अन्यथा विवाह-लग्नका अन्तिम नवमांश (२६ अंश ४० कलाके बाद) अशुभ होता है। यहाँ अन्य नवमांश नहीं ग्रहण करने चाहिये; क्योंकि वे 'कुनवांश' कहलाते हैं। लग्नमें कुनवांश हो तो अन्य सब गुणोंसे युक्त होनेपर भी वह त्याज्य है। जिस दिन महापात (सूर्य-चन्द्रमाका क्रान्ति-साम्य) हो, वह दिन भी शुभ कार्यमें छोड़ देने योग्य है; क्योंकि वह अन्य सब गुणोंसे युक्त होनेपर भी वर-वधूके लिये घातक होता है। इन दोषोंसे भिन्न विद्युत्, नीहार (कुहरा) और वृष्टि आदि दोष, जिनका अभी वर्णन नहीं किया गया है, 'स्वल्पदोष' कहलाते हैं ॥ ४७५-४७८ ॥

(लघुदोष—) विद्युत्, नीहार, वृष्टि, प्रतिसूर्य (दो सूर्य-सा दीखना), परिवेष (घेरा), इन्द्रधनुष, घनगर्जन, लत्ता, उपग्रह^३, पात, मासदग्ध^४ तिथि, दग्ध, अन्ध, बधिर तथा पङ्गु—इन राशियोंके लग्न^५, एवं छोटे-छोटे और भी अनेक दोष हैं; अब उनकी व्यवस्थाका प्रतिपादन किया जाता है॥ ४७९-४८०॥


१. विशेष—यदि नक्षत्रका मान ६० घड़ी हो तब इतने ध्रुवाङ्क और उसके पंद्रहवें भाग चार घटीतक 'विषघटी' का अवस्थान मध्यममानके अनुसार कहा गया है। इससे यह स्वयं सिद्ध होता है कि यदि नक्षत्रका मान ६० घड़ीसे अधिक या अल्प होगा तो विषघटीका मान और ध्रुवाङ्क भी उसी अनुपातसे अधिक या कम हो जायगा तथा स्पष्ट भभोगमानका पंद्रहवाँ भाग ही विषघटीका स्पष्ट मान होगा।

मान लीजिये कि पुनर्वसुका भभोगमान ५६ घड़ी है तो त्रैराशिकसे अनुपात निकालिये। यदि ६० घड़ीमें ३० ध्रुवाङ्क तो इष्ट भभोग ५६ घड़ीमें क्या होगा ? इस प्रकार ५६ से ३० को गुणा करके ६० के द्वारा भाग देनेसे लब्धि २८ पुनर्वसुका स्पष्ट ध्रुवाङ्क हुआ तथा भभोग ५६ का पंद्रहवाँ भाग ३ घड़ी ४४ पल स्पष्ट 'विषघटी' हुई। इसलिये २८ घड़ीके बाद ३ घड़ी ४ पलतक विषघटी रहेगी।

२. किसी भी राशिमें अपना ही नवमांश हो तो वह वर्गोत्तम कहलाता है। जैसे मेषमें मेषका नवमांश तथा वृषमें वृषका नवमांश इत्यादि।

३. सूर्य जिस नक्षत्रमें वर्तमान हो, उसमें ५, ७, ८, १०, १४, १५, १८, १९, २१, २२, २३, २४, २५—इन संख्याओंके किसी भी नक्षत्रमें चन्द्रमा हो तो 'उपग्रहदोष' कहलाता है।

४. सूर्य यदि धनु या मीनमें हो तो द्वितीया, वृष या कुम्भमें हो तो चतुर्थी, कर्क या मेषमें हो तो षष्ठी, कन्या या मिथुनमें हो तो अष्टमी, सिंह या वृश्चिकमें हो तो दशमी तथा तुला या मकरमें हो तो द्वादशी 'दग्ध तिथि' कहलाती है।

५. कुम्भ, मीन, वृष, मिथुन, मेष, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु और कर्क—ये क्रमशः चैत्र आदि मासोंमें 'दग्ध राशियाँ' हैं।

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३७० * संक्षिप्त नारदपुराण *

विद्युत् (बिजली), नीहार (कुहरा या पाला), वृष्टि (वर्षा)—ये यदि असमयमें हों तभी दोष समझे जाते हैं। यदि समयपर हों (जैसे जाड़ेके दिनमें पाला पड़े, वर्षा ऋतुमें वर्षा हो तथा सघन मेघमें बिजली चमके, तो सब शुभ ही समझे जाते हैं॥४८१॥ यदि बृहस्पति, शुक्र अथवा बुध इनमेंसे एक भी केन्द्रमें हों तो इन सब दोषोंको नष्ट कर देते हैं। इसमें संशय नहीं है॥४८२॥

(पञ्चशलाका-वेध—) पाँच रेखाएँ पड़ी और पाँच रेखाएँ खड़ी खींचकर दो-दो रेखाएँ कोणोंमें खींचने (बनाने)-से पञ्चशलाका-चक्र¹ बनता है। इस चक्रके ईशान कोणवाली दूसरी रेखामें कृत्तिकाको लिखकर आगे प्रदक्षिण-क्रमसे रोहिणी आदि अभिजित्सहित सम्पूर्ण नक्षत्रोंका उल्लेख करे। जिस रेखामें ग्रह हो, उसी रेखाकी दूसरी ओरवाला नक्षत्र विद्ध² समझा जाता है॥४८३ १/२॥

(लत्तादोष—) सूर्य आदि³ ग्रह क्रमशः अपने आश्रित नक्षत्रसे आगे और पीछे⁴ १२, २२, ३, ७, ६, ५, ८ तथा ९ वें दैनिक नक्षत्रको लातोंसे दूषित करते हैं, इसलिये इसका नाम 'लत्तादोष' है।

(पातदोष—) सूर्य जिस नक्षत्रमें हों उससे आश्लेषा, मघा, रेवती, चित्रा, अनुराधा और श्रवणतककी जितनी संख्या हो, उतनी ही यदि अश्विनीसे दिन-नक्षत्रतक गिननेसे संख्या हो तो वह नक्षत्र पातदोषसे दूषित समझा जाता है॥४८४-४८५ ॥

(परिहार—) सौराष्ट्र (काठियावाड़) और शाल्वदेशमें लत्तादोष वर्जित है। कलिङ्ग (जगन्नाथपुरीसे कृष्णा नदीतकके भूभाग), वङ्ग (बङ्गाल), वाह्लिक (बलख) और कुरु (कुरुक्षेत्र) देशमें पातदोष त्याज्य हैं; अन्य देशोंमें ये दोष त्याज्य नहीं हैं॥४८६-४८७॥ मासदग्ध तिथि तथा दग्ध लग्न—ये मध्यदेश (प्रयागसे पश्चिम, कुरुक्षेत्रसे पूर्व, विन्ध्य और हिमालयके मध्य)में वर्जित हैं। अन्य देशोंमें ये दूषित नहीं हैं॥४८८॥ पङ्गु, अन्ध, काण, लग्न तथा मासोंमें जो शून्य राशियाँ कही गयी हैं, वे गौड़ (बङ्गालसे भुवनेश्वरतक) और मालव (मालवा) देशमें त्याज्य हैं। अन्य देशोंमें निन्दित नहीं हैं॥४८९॥

(विशेष—) अधिक दोषोंसे दुष्ट कालको तो ब्रह्माजी भी शुभ नहीं बना सकते हैं; इसलिये जिसमें थोड़ा दोष और अधिक गुण हों, ऐसा काल ग्रहण करना चाहिये॥४९०॥

(वेदी और मण्डप-) इस प्रकार वर-वधूके लिये शुभप्रद उत्तम समयमें श्रेष्ठ लग्नका निरीक्षण (खोज) करना चाहिये। तदनन्तर एक हाथ ऊँची,


तुला और वृश्चिक—ये दोनों केवल दिनमें तथा धनु और मकर—ये दोनों केवल रात्रिमें 'बधिर' होते हैं। एवं मेष, वृष और सिंह—ये तीनों दिनमें तथा मिथुन, कर्क, कन्या—ये तीनों रात्रिमें 'अन्ध' होते हैं।
दिनमें कुम्भ और रात्रिमें मीन 'पङ्गु' होते हैं।

१. पञ्चशलाकाचक्र—

         ध०  शृ०  पू०  उ०  रे०  अ०  भ०
   श्र०  \   |   |   |   |   /  कृ०
   अ०  ——\———|———|———|———|——/—— रो०
   उ०  ———\——|———|———|——/———-— मृ०
   पू०  ————\—|———|—/——————- आ०
   मू०  ————/—|———|—\——————- पु०
   आ०  ———/——|———|———\———-— पु०
   अ०  ——/———|———|———|———\—— आ०
         /   |   |   |   |   \
        वि० स्वा० चि० ह० उ० पू० म०

२. जैसे—श्रवणमें कोई ग्रह हो तो मघा नक्षत्र विद्ध समझा जायगा।

३. सूर्य, पूर्ण चन्द्र, मङ्गल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु।

४. इनमें सूर्य अपनेसे आगे और पूर्ण चन्द्र पीछे, फिर मङ्गल आगे और बुध पीछेके नक्षत्रोंको दूषित करते हैं। ऐसा ही क्रम आगे भी समझना चाहिये।

\ पूर्वभाग-द्वितीय पाद \ ३७१

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* पूर्वभाग-द्वितीय पाद * ३७१


चार हाथ लंबी और चार हाथ चौड़ी उत्तर दिशामें नत (कुछ नीची) वेदी बनाकर सुन्दर चिकने चार खम्भोंका एक मण्डप तैयार करे, जिसमें चारों ओर सोपान (सीढ़ियाँ) बनायी गयी हों। मण्डप भी पूर्व-उत्तरमें निम्न हो। वहाँ चारों तरफ कदलीस्तम्भ गड़े हों। वह मण्डप शुक आदि पक्षियोंके चित्रोंसे सुशोभित हो तथा वेदी नाना प्रकारके माङ्गलिक चित्रयुक्त कलशोंसे विचित्र शोभा धारण कर रही हो। भाँति-भाँतिके वन्दनवार तथा अनेक प्रकारके फूलोंके शृङ्गारसे वह स्थान सजाया गया हो। ऐसे मण्डपके बीच बनी हुई वेदीपर, जहाँ ब्राह्मणलोग स्वस्तिवाचनपूर्वक आशीर्वाद देते हों, जो पुण्यशीला स्त्रियों तथा दिव्य समारोहोंसे अत्यन्त मनोरम जान पड़ती हो तथा नृत्य, वाद्य और माङ्गलिक गीतोंकी ध्वनिसे जो हृदयको आनन्द प्रदान कर रही हो, वर और वधूको विवाहके लिये बिठावे॥ ४९१–४९५॥

(वर-वधूकी कुण्डलीका मिलान—) आठ प्रकारके भकूट, नक्षत्र, राशि, राशिस्वामी, योनि तथा वर्ण आदि सब गुण यदि ऋजु (अनुकूल या शुभ) हों तो ये पुत्र-पौत्रादिका सुख प्रदान करनेवाले होते हैं॥ ४९६॥

वर और कन्या दोनोंकी राशि और नक्षत्र भिन्न हों तो उन दोनोंका विवाह उत्तम होता है। दोनोंकी राशि भिन्न और नक्षत्र एक हो तो उनका विवाह मध्यम होता है और यदि दोनोंका एक ही नक्षत्र, एक ही राशि हो तो उन दोनोंका विवाह प्राणसंकट उपस्थित करनेवाला होता है॥ ४९७ १/२॥

(स्त्रीदूर दोष—) कन्याके नक्षत्रसे प्रथम नवक (नौ नक्षत्रों)-के भीतर वरका नक्षत्र हो तो यह 'स्त्रीदूर' नामक दोष कहलाता है; जो अत्यन्त निन्दित है। द्वितीय नवक (१० से १८ तक)-के भीतर हो तो मध्यम कहा गया है। यदि तृतीय नवक (१९ से २७ तक)-के भीतर हो तो उन दोनोंका विवाह श्रेष्ठ कहा गया है॥ ४९८ १/२॥

(गणविचार—) पूर्वाफाल्गुनी, पूर्वाषाढ़, पूर्व भाद्रपद, उत्तरा फाल्गुनी, उत्तराषाढ़, उत्तर भाद्रपद, रोहिणी, भरणी और आर्द्रा—ये नक्षत्र मनुष्यगण हैं। श्रवण, पुनर्वसु, हस्त, स्वाती, रेवती, अनुराधा, अश्विनी, पुष्य और मृगशिरा—ये देवगण हैं तथा मघा, चित्रा, विशाखा, कृत्तिका, ज्येष्ठा, धनिष्ठा, शतभिषा, मूल और आश्लेषा—ये नक्षत्र राक्षसगण हैं॥ ४९९–५०१॥ यदि वर और कन्याके नक्षत्र किसी एक ही गणमें हों तो दोनोंमें परस्पर सब प्रकारसे प्रेम बढ़ता है। यदि एकका मनुष्यगण और दूसरेका देवगण हो तो दोनोंमें मध्यम प्रेम होता है तथा यदि एकका राक्षसगण और दूसरेका देवगण या मनुष्यगण हो तो वर-वधू दोनोंको मृत्युतुल्य क्लेश प्राप्त होता है॥ ५०२॥

(राशिकूट—) वर और कन्याकी राशियोंको परस्पर गिननेसे यदि वे छठी और आठवीं संख्यामें पड़ती हों तो दोनोंके लिये घातक हैं। यदि पाँचवीं और नवीं संख्यामें हों तो संतानकी हानि होती है। यदि दूसरी और बारहवीं संख्यामें हों तो वर-वधू दोनों निर्धन होते हैं। इनसे भिन्न संख्यामें हों तो दोनोंमें परस्पर प्रेम होता है॥ ५०३॥

(परिहार—) द्विद्वादश (२, १२) और नवपञ्चम (९, ५) दोषमें यदि दोनोंकी राशियोंका एक ही स्वामी हो अथवा दोनोंके राशिस्वामियोंमें मित्रता हो तो विवाह शुभ कहा गया है। परंतु षडष्टक (६, ८)-में दोनोंके स्वामी एक होनेपर भी विवाह शुभदायक नहीं होता है॥ ५०४॥

(योनिकूट—) १ अश्व, २ गज, ३ मेष, ४ सर्प, ५ सर्प, ६ श्वान, ७ मार्जार, ८ मेष, ९ मार्जार, १० मूषक, ११ मूषक, १२ गौ, १३ महिष, १४ व्याघ्र, १५ महिष, १६ व्याघ्र, १७ मृग, १८ मृग, १९ श्वान, २० वानर, २१ नकुल, २२ नकुल, २३ वानर, २४ सिंह, २५ अश्व, २६ सिंह, २७ गौ तथा २८ गज—ये क्रमशः अश्विनीसे

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३७२* संक्षिप्त नारदपुराण *

लेकर रेवतीतक (अभिजित्सहित) अट्ठाईस नक्षत्रोंकी योनियाँ हैं॥ ५०५-५०६॥ इनमें श्वान और मृगमें, नकुल और सर्पमें, मेष और वानरमें, सिंह और गजमें, गौ और व्याघ्रमें, मूषक और मार्जारमें तथा महिष और अश्वमें परस्पर भारी शत्रुता होती है॥ ५०७॥

(वर्णकूट—) मीन, वृश्चिक और कर्कराशि ब्राह्मण वर्ण हैं, इनके बादवाले क्रमशः क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र वर्ण हैं। (एक वर्णके वर और वधूमें तो विवाह स्वयंसिद्ध है ही) पुरुष-राशिके वर्णसे स्त्री-राशिका वर्ण हीन हो तो भी विवाह शुभ माना गया है। इससे विपरीत (अर्थात् पुरुषराशिके वर्णसे स्त्रीराशिका वर्ण श्रेष्ठ) हो तो अशुभ समझना चाहिये॥ ५०८॥

(नाडीविचार—) चार चरणवाले नक्षत्र (अश्विनी, भरणी, रोहिणी, आर्द्रा, पुष्य, आश्लेषा, मघा, पूर्वाफाल्गुनी, हस्त, स्वाती, अनुराधा, ज्येष्ठा, मूल, पूर्वाषाढ़, श्रवण, शतभिषा, उत्तर भाद्रपद, रेवती— इन)-में उत्पन्न कन्याके लिये अश्विनीसे आरम्भ करके रेवतीतक तीन पर्वोंपर क्रम-उत्क्रम² से गिनकर नाड़ी समझे। तीन चरणवाले (कृत्तिका, पुनर्वसु, उत्तराफाल्गुनी, विशाखा, उत्तराषाढ़ और पूर्व भाद्रपद) नक्षत्रोंमें उत्पन्न कन्याके लिये कृत्तिकासे लेकर भरणीतक क्रम-उत्क्रम³ से चार पर्वोंपर गिनकर नाड़ीका ज्ञान प्राप्त करे तथा दो चरणोंवाले (मृगशिरा, चित्रा, धनिष्ठा) नक्षत्रोंमें उत्पन्न कन्याकी नाड़ी जाननेके लिये मृगशिरासे लेकर रोहिणीतक पाँच पर्वोंपर क्रम-उत्क्रम⁴ से गिने। यदि वर और वधू दोनोंके नक्षत्र एक पर्वपर पड़ें तो वे उनके लिये घातक हैं और भिन्न पर्वोंपर पड़ें तो उन्हें शुभ समझना चाहिये॥ ५०९ १/२ ॥


१. राशियोंके वर्णको स्पष्ट समझनेके लिये यह कोष्ठ देखें—

मीनमेषवृषमिथुन
कर्कसिंहकन्यातुला
वृश्चिकधनुमकरकुम्भ
ब्राह्मणक्षत्रियवैश्यशूद्र

२. त्रिनाडी—

१अश्विनीआर्द्रापुनर्वसुउत्तराफाल्गुनीहस्तज्येष्ठामूलशतभिषापूर्व भाद्रपद
२भरणीमृगशिरापुष्यपूर्वाफाल्गुनीचित्राअनुराधापूर्वाषाढ़धनिष्ठाउत्तर भाद्रपद
३कृत्तिकारोहिणीआश्लेषामघास्वातीविशाखाउत्तराषाढ़श्रवणरेवती

३. चतुर्नाडी—

१कृत्तिकामघापूर्वाफाल्गुनीज्येष्ठामूलउत्तर भाद्रपदरेवती
२रोहिणीआश्लेषाउत्तराफाल्गुनीअनुराधापूर्वाषाढ़पूर्व भाद्रपदअश्विनी
३मृगशिरापुष्यहस्तविशाखाउत्तराषाढ़शतभिषाभरणी
४आर्द्रापुनर्वसुचित्रास्वातीश्रवणधनिष्ठा×

४. पञ्चनाडी—

१मृगशिराचित्रास्वातीशतभिषापूर्व भाद्रपद×
२आर्द्राहस्तविशाखाधनिष्ठाउत्तर भाद्रपद×
३पुनर्वसुउत्तराफाल्गुनीअनुराधाश्रवणरेवती×
४पुष्यपूर्वाफाल्गुनीज्येष्ठाउत्तराषाढ़अश्विनीरोहिणी
५आश्लेषामघामूलपूर्वाषाढ़भरणीकृत्तिका

पूर्वभाग-द्वितीय पाद ३७३

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  • पूर्वभाग-द्वितीय पाद * ३७३

वर और कन्याकी कुण्डली मिलानेके लिये जो वश्य, योनि, राशिकूट, योनिकूट, वर्णकूट तथा नाडी आदिका वर्णन किया गया है, उन सबको सुगमतापूर्वक जानने तथा उनके गुणोंको समझनेके लिये निम्नाङ्कित चक्रोंपर दृष्टिपात कीजिये—

शतपदचक्र

नक्षत्रअ.भ.कृ.रो.मृ.आ.पु.पु.आश्ले.म.पू.फा.उ.फा.ह.चि.
चरणचू.चे. चो.ला.ली.लू. ले.लो.अ.इ. उ.ए.ओ.वा. वी.वूवे.वो. का.की.कु.घ. ङ.छ.के.को. हा.ही.हू.हे. हो.डा.डी.डू. डे.डो.मा.मी. मू.मे.मो.टा. टी.टू.टे.टो. पा.पी.पू.ष. ण.ठ.पे.पो. रा.री.
राशिमे.मे.मे.१ वृ० ३वृ.वृ.२ मि. २मि.मि.३ क.१क.क.सिं.सिं.सिं.१ क.३क.क.२ तु.२
वर्णक्ष.क्ष.क्ष.१ वै.३वै.वै.२ शू.२शू.शू.३ ब्रा.१ब्रा.ब्रा.क्ष.क्ष.क्ष.१ वै.३वै.वै.२ शू.२
वश्यच.च.च.च.च.२ न.२न.न.३ ज.१ज.ज.व.व.व.१ न.३न.न.
योनिअश्व.गज.छाग.सर्प.सर्प.श्वान.मार्जा- र.छाग.मार्जा- र.मूषक.मूषक.गौ.महिष.व्याघ्र.
राशीशमं.मं.मं.१ शु.३शु.शु.२ बु.२बु.बु.३ च.१चं.चं.सू.सू.सू.१ बु.३बु.बु.२ शु.२
गणदे.म.रा.म.दे.म.दे.दे.रा.रा.म.म.दे.रा.
नाड़ीआ.म.अं.अं.म.आ.आ.म.अं.अं.म.आ.आ.म.
नक्षत्रस्वा.वि.अ.ज्ये.मू.पू.षा.उ.षा.श्र.ध.श.पू.भा.उ.भा.रे.
चरणरु.रे. रो.ता.ती.तू. ते.तो.ना.नी. नू.ने.नो.या. यी.यू.ये.यो. भा.भी.भू. ध फ.ढ.भे.भो. जा.जी.खी.खू. खे.खो.गा.गी. गू.गे.गो.सा. सी.सू.से.सो दा.दी.दू.थ. झ.ञ.दे.दो. चा.ची.
राशितु.तु.३ वृ.१वृ.वृ.ध.ध.ध.१ म.३म.म.२ कुं.१कुं.कुं.३ मी.१मी.मी.
वर्णशू.शू.३ ब्रा.१ब्रा.ब्रा.क्ष.क्ष.क्ष.१ वै.३वै.वै.२ शू २शू.शू.३ ब्रा.१ब्रा.ब्रा.
वश्यन.न.३ की.१की.की.न.॥ न. ३ ॥ च.च.१ ॥ च. २ ॥ जा.ज.२ न.२न.न.३ ज.१ज.ज.
योनिमहिष.व्याघ्र.मृग.मृगश्वान.वानर.नकुल.वानर.सिंह.अश्व.सिंह.गौ.गज.
राशीशशु.शु.३ मं.१मं.मं.बृ.बृ.बृ.१ श.३श.श.श.श.३ बृ.१बृ.बृ.
गणदे.रा.दे.रा.रा.म.म.दे.रा.रा.म.म.दे.
नाड़ीअं.अं.म.आ.आ.म.अं.अं.म.आ.आ.म.अं.
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३७४ * संक्षिप्त नारदपुराण *


६ गणगुण। वर

कन्यादे.म.रा.
देव६५१
मनुष्य६६०
राक्षस००६

८ नाडी-गुण। वर

कन्याआ.म.अं.
आदि०८८
मध्य८०८
अन्त८८०

७ भकूटगुण

मे.वृ.मि.क.सिं.क.तु.वृ.ध.म.कुं.मी.
मे.७०७७००७००७७०
वृ.०७०७७००७००७७
मि.७०७०७७००७००७
क.७७०७०७७००७००
सिं.०७७०७०७७००७०
क.००७७०७०७७००७
तु.७००७७०७०७७००
वृ.०७००७७०७०७७०
ध.००७००७७०७०७७
म.७००७००७७०७०७
कुं.७७००७००७७०७०
मी.०७७००७००७७०७

३ तारागुण। वर

कन्या१२३४५६७८९
१३३१॥३१॥३१॥३३
२३३१॥३१॥३१॥३३
३१॥१॥०१॥०१॥०१॥१॥
४३३१३१॥३१॥३३
५१॥१॥०१॥०१॥०१॥१॥
६३३१॥३१॥३१॥३३
७१॥१॥०१॥०१॥०१॥१॥
८३३१॥३१॥३१॥३३
९३३१॥३१॥३१॥३३

५ ग्रहमैत्रीगुण। वर

कन्यासू.चं.मं.बु.बृ.शु.श.
सूर्य५५५४५००
चन्द्र५५४१४॥॥
मङ्गल५४५॥५३॥
बुध४१॥५॥५४
गुरु५४५॥५॥३
शुक्र०॥३५॥५५
शनि०॥॥४३५५

४ योनिगुण। वर

अश्वगजमेषसर्पश्वानमार्जारमूषकगौमहिषव्याघ्रमृगवानरनकुलसिंह
अश्व४२३२२३३२०१३२२१
गज२४३२२३३३३१३२२०
मेष३३४२२३३३३१३०११
सर्प२२२४२११२२२१००२
श्वान२२२२४११२२२०२२२
मार्जार३३३११४०३३२३२२२
मूषक३२२१२०४३३२३२१२
गौ२३३२२३३४३०३२२१
महिष०३३२२३३३४१३२२१
व्याघ्र१११२२२२०१४१२२३
मृग३३३२०३३३३१४२२१
वानर२२०१२२२२२२२४२२
नकुल२२२०२२१२२२२२४२
सिंह१०१२२२२११३१२२४

१ विवाहमें वर्णगुण। वर

कन्याब्रा०क्ष०वै०शू०
ब्राह्मण१०००
क्षत्रिय११००
वैश्य१११०
शूद्र११११

२ वश्यगुण। वर

कन्याच०मा.ज.व.की.
चतुष्पद२११०१
मानव१२॥०१
जलचर१॥२११
वनचर००१२०
कीट१११०२

पूर्वभाग-द्वितीय पाद ३७५

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  • पूर्वभाग-द्वितीय पाद * ३७५

जन्मकालिक ग्रहोंकी स्थिति तथा जन्म-नक्षत्र-सम्बन्धी आठ प्रकारके कूटद्वारा वर-वधूकी कुण्डलीका मिलान किया जाता है। यदि जन्म-लग्न या जन्म-राशि (चन्द्रमा) से १, ४, ७, ८ या १२ वें स्थानमें मङ्गल या अन्य पापग्रह वरकी कुण्डलीमें हों तो पत्नीके लिये और कन्याकी कुण्डलीमें हों तो वरके लिये अनिष्टकारी होते हैं। यदि दोनोंकी कुण्डलियोंमें उक्त स्थानोंमें पापग्रहकी संख्या समान हो तो उक्त दोष नहीं माना जाता है। उदाहरणके लिये—

वरकी कुण्डली

+---------------+---------------+
|       ५       |       ३       |
| रा० ६         |               |
|       ४ चं० गु०       २ बु०   |
|                               |
|     श० ७      |     १ सू०     |
|                               |
|   ८           |         के० १२|
|       १० मं०  |           शु० |
|       ९       |      ११       |
+---------------+---------------+

पुनर्वसुके चतुर्थ चरणमें जन्म

कन्याकी कुण्डली

+---------------+---------------+
|     ५ चं०     |     ३ के०     |
| ६             |               |
|           ४           २ बु०   |
|                               |
|       ७       |     १ सू०     |
|                               |
|   ८           |             १२|
|       १० श० मं०           शु० |
|     ९ गु० रा  |      ११       |
+---------------+---------------+

पूर्वाफाल्गुनीके प्रथम चरणमें जन्म

यहाँ वरकी कुण्डलीमें ४थे और ७वें स्थानमें शनि और मङ्गल दो पापग्रह हैं तथा कन्याकी कुण्डलीमें भी ७ वें स्थानमें शनि, मङ्गल हैं, जिससे दोनोंके परस्पर माङ्गलिक दोष नष्ट होनेके कारण इन दोनोंका वैवाहिक सम्बन्ध श्रेष्ठ सिद्ध होता है। यहाँ भकूटके गुण इस प्रकार हैं—

वरकन्यागुण
१ वर्ण—ब्राह्मणक्षत्रिय१
२ वश्य—जलचरवनचर१
३ तारा—५६१॥
४ योनि—मार्जारमूषक०
५ ग्रह (राशीश)—चन्द्रसूर्य५
६ गण—देवमनुष्य६
७ भकूट—२१२०
८ नाड़ी—१२८

$\overline{गुणोंका योग-२२॥}$

इस तरह नक्षत्रमेलापकमें भी गुणोंका योग २२॥ है। अठारहसे अधिक होनेके कारण इन दोनोंका विवाह-सम्बन्ध श्रेष्ठ सिद्ध होता है।

इसी प्रकार अन्य कुण्डलियोंसे भी ग्रह और नक्षत्रका मेल देखकर विवाहका निर्णय करना चाहिये।

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३७६
* संक्षिप्त नारदपुराण *

(विवाहोंके भेद—) ऊपर बताये हुए शुभ समयमें (१) प्राजापत्य, (२) ब्राह्म, (३) दैव और (४) आर्ष—ये चार प्रकारके विवाह करने चाहिये। ये ही चारों विवाह उपर्युक्त फल देनेवाले होते हैं। इससे अतिरिक्त जो गान्धर्व, आसुर, पैशाच तथा राक्षस विवाह हैं, वे तो सब समय समान ही फल देनेवाले होते हैं॥ ५१०-५११॥

(अभिजित् और गोधूलि लग्न—) सूर्योदय-कालमें जो लग्न रहता है, उससे चतुर्थ लग्नका नाम अभिजित् है और सातवाँ गोधूलि-लग्न कहलाता है। ये दोनों विवाहमें पुत्र-पौत्रकी वृद्धि करनेवाले होते हैं॥ ५१२॥ पूर्व तथा कलिङ्ग देशवासियोंके लिये गोधूलि-लग्न प्रधान है और अभिजित्-लग्न तो सब देशोंके लिये मुख्य कहा गया है, क्योंकि वह सब दोषोंका नाश करनेवाला है॥ ५१३॥

(अभिजित्-प्रशंसा—) सूर्यके मध्य आकाशमें जानेपर अभिजित् मुहूर्त होता है, वह समस्त दोषोंको नष्ट कर देता है, ठीक उसी तरह, जैसे त्रिपुरासुरको श्रीशिवजीने नष्ट किया था॥ ५१४॥

पुत्रका विवाह करनेके बाद छः मासोंके भीतर पुत्रीका विवाह नहीं करना चाहिये। एक पुत्र या पुत्रीका विवाह करनेके बाद दूसरे पुत्रका उपनयन भी नहीं करना चाहिये। इसी प्रकार एक मङ्गल कार्य करनेके बाद छः मासोंके भीतर दूसरा मङ्गल कार्य नहीं करना चाहिये। एक गर्भसे उत्पन्न दो कन्याओंका विवाह यदि छः मासके भीतर हो तो निश्चय ही तीन वर्षके भीतर उनमेंसे एक विधवा होती है॥ ५१५-५१६॥ अपने पुत्रके साथ जिसकी पुत्रीका विवाह हो, फिर उसके पुत्रके साथ अपनी पुत्रीका विवाह करना 'प्रत्युद्वाह' कहलाता है। ऐसा कभी नहीं करना चाहिये तथा किसी एक ही वरको अपनी दो कन्याएँ नहीं देनी चाहिये। दो सहोदर वरोंको दो सहोदरा कन्याएँ नहीं देनी चाहिये। दो सहोदरोंका एक ही दिन (एक साथ) विवाह या मुण्डन नहीं करना चाहिये॥ ५१७ १/२॥

(गण्डान्त-दोष—) पूर्वकथित गण्डान्तमें यदि दिनमें बालकका जन्म हो तो वह पिताका, रात्रिमें जन्म हो तो माताका और संध्या (सायं या प्रातः) कालमें जन्म हो तो वह अपने शरीरके लिये घातक होता है। गण्डका यह परिणाम अन्यथा नहीं होता है। मूलमें उत्पन्न होनेवाली संतान पुत्र हो या कन्या, श्वशुरके लिये घातक होती है, किंतु मूलके चतुर्थ चरणमें जन्म लेनेवाला बालक श्वशुरका नाश नहीं करता है तथा आश्लेषाके प्रथम चरणमें जन्म लेनेवाला बालक भी पिताका या श्वशुरका विनाश करनेवाला नहीं होता है। ज्येष्ठाके अन्तिम चरणमें उत्पन्न बालक ही श्वशुरके लिये घातक होता है, कन्या नहीं। किसी प्रकार पूर्वाषाढ़ या मूलमें उत्पन्न कन्या भी माता या पिताका नाश करनेवाली नहीं होती है। ज्येष्ठा नक्षत्रमें उत्पन्न कन्या अपने पतिके बड़े भाईके लिये और विशाखामें जन्म लेनेवाली कन्या अपने देवरके लिये घातक होती है॥ ५१८-५२१॥

(वधू-प्रवेश—) विवाहके दिनसे ६, ८, १० और ७वें दिनमें वधू-प्रवेश (पतिगृहमें प्रथम प्रवेश) हो तो वह सम्पत्तिकी वृद्धि करनेवाला होता है। द्वितीय वर्ष, जन्म-राशि, जन्म-लग्न और जन्म-दिनको छोड़कर अन्य समयमें सम्मुख शुक्र रहनेपर भी वैवाहिक यात्रा (वधू-प्रवेश) शुभ होती है॥ ५२२-५२३॥

(देव-प्रतिष्ठा—) उत्तरायणमें, बृहस्पति और शुक्र उदित हों तो चैत्रको छोड़कर माघ आदि पाँच मासोंके शुक्लपक्षमें और कृष्णपक्षमें भी आरम्भसे आठ दिनतक सब देवताओंकी स्थापना शुभदायक होती है। जिस देवताकी जो तिथि है, उसमें उस देवताकी और २, ३, ५, ६, ७, १०, ११, १२, १३ तथा पूर्णिमा—इन तिथियोंमें सब देवताओंकी स्थापना शुभ होती है। तीनों उत्तरा, पुनर्वसु, मृगशिरा, रेवती, हस्त, चित्रा, स्वाती, पुष्य, अश्विनी, रोहिणी,

पूर्वभाग-द्वितीय पाद ३७७

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  • पूर्वभाग-द्वितीय पाद * ३७७

शतभिषा, श्रवण, अनुराधा और धनिष्ठा—इन नक्षत्रोंमें तथा मङ्गलवारको छोड़कर अन्य वारोंमें देव-प्रतिष्ठा करनी चाहिये। स्थापना करनेवाले (यजमान)-के लिये सूर्य, तारा और चन्द्रमा बलवान् हों, उस दिनके पूर्वाह्नमें, शुभ समय, शुभ लग्न और शुभ नवमांशमें तथा यजमानकी जन्मराशिसे अष्टम राशिको छोड़कर अन्य लग्नोंमें देवताओंकी प्रतिष्ठा शुभदायक होती है॥ ५२४-५२९॥

मेष आदि सब राशियाँ शुभ ग्रहसे युक्त या दृष्ट हों तो देवस्थापनके लिये श्रेष्ठ समझी जाती हैं। प्रत्येक कार्यमें पञ्चाङ्ग (तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण) शुभ होने चाहिये और लग्नसे अष्टम स्थान भी शुभ (ग्रहवर्जित) होना आवश्यक है॥ ५३०॥ (१) लग्नमें चन्द्रमा, सूर्य, मङ्गल, राहु, केतु और शनि कर्ताके लिये घातक होते हैं। अन्य (बुध, गुरु और शुक्र) लग्नमें धन, धान्य और सब सुखोंको देनेवाले होते हैं। (२) द्वितीय भावमें पापग्रह अनिष्ट फल देनेवाले और शुभग्रह धनकी वृद्धि करनेवाले होते हैं। (३) तृतीय भावमें शुभ और पाप सब ग्रह पुत्र-पौत्रादि सुखको बढ़ानेवाले होते हैं। (४) चतुर्थ भावमें शुभग्रह शुभफल और पापग्रह पाप-फलको देते हैं। (५) पञ्चम भावमें पापग्रह कष्टदायक और शुभग्रह पुत्रादि सुख देनेवाले होते हैं। (६) षष्ठ भावमें शुभग्रह शत्रुको बढ़ानेवाले और पापग्रह शत्रुके लिये घातक होते हैं। (७) सप्तम भावमें पापग्रह रोगकारक और शुभग्रह शुभ फल देनेवाले होते हैं। (८) अष्टम भावमें शुभग्रह और पापग्रह सभी कर्ता (यजमान)-के लिये घातक होते हैं। (९) नवम भावमें पापग्रह हों तो वे धर्मको नष्ट करनेवाले हैं और शुभग्रह शुभ फल देनेवाले होते हैं। (१०) दशम भावमें पापग्रह दुःखदायक और शुभग्रह सुयशकी वृद्धि करनेवाले होते हैं। (११) एकादश स्थानमें पाप और शुभ सब ग्रह सब प्रकारसे लाभकारक ही होते हैं। (१२) लग्नसे द्वादश स्थानमें पाप या शुभ सभी ग्रह व्यय (खर्च)-को बढ़ानेवाले होते हैं॥ ५३१-५३६॥

(प्रतिष्ठामें अन्य विशेष बात—) प्रतिष्ठा करानेवाले पुरोहित (या आचार्य)-को अर्थज्ञान न हो तो यजमानका अनिष्ट होता है। मन्त्रोंका अशुभ उच्चारण हो तो ऋत्विजों (यज्ञ करानेवालों)-का और कर्म विधिहीन हो तो कर्ताकी स्त्रीका अनिष्ट होता है। इसलिये नारद! देव-प्रतिष्ठाके समान दूसरा शत्रु भी नहीं है। यदि लग्नमें अधिक गुण हों और थोड़े-से दोष हों तो उसमें देवताओंकी प्रतिष्ठा कर लेनी चाहिये। इससे कर्ता (यजमान)-के अभीष्ट मनोरथकी सिद्धि होती है। मुने! अब मैं संक्षेपसे ग्राम, मन्दिर तथा गृह आदिके निर्माणकी बात बताता हूँ॥ ५३७-५३९॥

(गृहनिर्माणके विषयमें ज्ञातव्य बातें—) गृह आदि बनाना हो तो पहले गन्ध, वर्ण, रस तथा आकृतिके द्वारा क्षेत्र (भूमि)-की परीक्षा कर लेनी चाहिये। यदि उस स्थानकी मिट्टीमें मधु (शहद)-के समान गन्ध हो तो ब्राह्मणोंके, पुष्पसदृश गन्ध हो तो क्षत्रियोंके, आम्ल (खटाई)-के समान गन्ध हो तो वैश्योंके और मांसकी-सी गन्ध हो तो वह स्थान शूद्रोंके बसनेयोग्य जानना चाहिये। वहाँकी मिट्टीका रंग श्वेत हो तो ब्राह्मणोंके, लाल हो तो क्षत्रियोंके, पीत (पीला) हो तो वैश्योंके और कृष्ण (काला) हो तो वह शूद्रोंके निवासके योग्य है। यदि वहाँकि मिट्टीका स्वाद मधुर हो तो ब्राह्मणोंके, कडुवा (मिर्चके समान) हो तो क्षत्रियोंके, तिक्त हो तो वैश्योंके और कषाय (कसैला) स्वाद हो तो उस स्थानको शूद्रोंके निवास करनेयोग्य समझना चाहिये ॥ ५४०-५४१॥ ईशान, पूर्व और उत्तर दिशामें प्लव (नीची) भूमि सबके लिये अत्यन्त वृद्धि देनेवाली होती है। अन्य दिशाओंमें प्लव (नीची) भूमि सबके लिये हानि करनेवाली होती है॥ ५४२॥

(गृहभूमि-परीक्षा—) जिस स्थानमें घर बनाना

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३७८* संक्षिप्त नारदपुराण *

हो वहाँ अरत्नि (कोहिनीसे कनिष्ठा अंगुलितक) के बराबर लम्बाई, चौड़ाई और गहराई करके कुण्ड बनावे। फिर उसे उसी खोदी हुई मिट्टीसे भरे। यदि भरनेसे मिट्टी शेष बच जाय तो उस स्थानमें वास करनेसे सम्पत्तिकी वृद्धि होती है। यदि मिट्टी कम हो जाय तो वहाँ रहनेसे सम्पत्तिकी हानि होती है। यदि सारी मिट्टीसे वह कुण्ड भर जाय तो मध्यम फल समझना चाहिये॥ ५४३॥ अथवा उसी प्रकार अरत्निके मापका कुण्ड बनाकर सायंकाल उसको जलसे पूरित कर दे और प्रातःकाल देखे; यदि कुण्डमें जल अवशिष्ट हो तो उस स्थानमें वृद्धि होगी। यदि कीचड़ (गीली मिट्टी) ही बची हो तो मध्यम फल है और यदि कुण्डकी भूमिमें दरार पड़ गयी हो तो उस स्थानमें वास करनेसे हानि होगी॥ ५४४॥

मुने ! इस प्रकार निवास करनेयोग्य स्थानकी भलीभाँति परीक्षा करके उक्त लक्षणयुक्त भूमिमें दिक्साधन (दिशाओंका ज्ञान) करनेके लिये समतल भूमिमें वृत्त (गोल रेखा) बनावे। वृत्तके मध्य भागमें द्वादशांगुल शंकु (बारह विभाग या पर्वसे युक्त एक सीधी लकड़ी)-की स्थापना करे और दिक्साधनविधिसे दिशाओंका ज्ञान करे। फिर कर्ताके नामके अनुसार षड्वर्ग शुद्ध क्षेत्रफल (वास्तुभूमिकी लम्बाई-चौड़ाईका गुणनफल) ठीक करके अभीष्ट लम्बाई-चौड़ाईके बराबर (दिशासाधित रेखानुसार) चतुर्भुज बनावे। उस चतुर्भुज रेखामार्गपर सुन्दर प्राकार (चहारदीवारी) बनावे। लम्बाई और चौड़ाईमें पूर्व आदि चारों दिशाओंमें आठ-आठ द्वारके भाग होते हैं। प्रदक्षिणक्रमसे उनके निम्नाङ्कित फल हैं। (जैसे पूर्वभागमें उत्तरसे दक्षिणतक) १- हानि, २- निर्धनता, ३- धनलाभ, ४- राजसम्मान, ५- बहुत धन, ६- अति चोरी, ७-अति क्रोध तथा ८- भय—ये क्रमशः आठ द्वारोंके फल हैं। दक्षिण दिशामें क्रमशः १- मरण, २- बन्धन, ३- भय, ४-धनलाभ, ५- धनवृद्धि, ६-निर्भयता, ७- व्याधिभय तथा ८-निर्बलता—ये (पूर्वसे पश्चिम तकके) आठ द्वारोंके फल हैं। पश्चिम दिशामें क्रमशः १-पुत्रहानि, २-शत्रुवृद्धि, ३-लक्ष्मीप्राप्ति, ४-धनलाभ, ५-सौभाग्य, ६-अति दौर्भाग्य, ७-दुःख तथा ८-शोक—ये दक्षिणसे उत्तरतकके आठ द्वारोंके फल हैं। इसी प्रकार उत्तर दिशामें (पश्चिमसे पूर्वतक) १-स्त्री-हानि, २-निर्बलता, ३- हानि, ४-धान्यलाभ, ५-धनागम, ६-सम्पत्ति-वृद्धि, ७-भय तथा ८-रोग—ये क्रमशः आठ द्वारोंके फल हैं॥ ५४५-५५२ ॥

इसी तरह पूर्व आदि दिशाओंके गृहादिमें भी द्वार और उसके फल समझने चाहिये। द्वारका जितना विस्तार (चौड़ाई) हो, उससे दुगुनी ऊँची किवाड़ें बनाकर उन्हें घरमें (चहारदीवारीके) दक्षिण या पश्चिम भागमें लगावे॥ ५५३॥ चहारदीवारीके भीतर जितनी भूमि हो, उसके इक्यासी पद (समान खण्ड) बनावे। उनके बीचके नौ खण्डोंमें ब्रह्माका स्थान समझे। यह गृहनिर्माणमें अत्यन्त निन्दित है। चहारदीवारीसे मिले हुए जो चारों ओरके ३२ भाग हैं, वे पिशाचांश कहलाते हैं। उनमें घर बनाना दुःख, शोक और भय देनेवाला होता है। शेष अंशों (पदों)-में घर बनाये जायें तो पुत्र, पौत्र और धनकी वृद्धि करनेवाले होते हैं॥ ५५४-५५५ ½॥

वास्तुभूमिकी दिशा-विदिशाओंकी रेखा वास्तुकी शिरा कहलाती है। एवं ब्रह्मभाग, पिशाचभाग तथा शिराका जहाँ-जहाँ योग हो, वहाँ-वहाँ वास्तुकी मर्मसन्धि समझनी चाहिये। वह मर्मसन्धि गृहारम्भ तथा गृह-प्रवेशमें अनिष्टकारक समझी जाती है॥ ५५६-५५७ ½ ॥

(गृहारम्भमें प्रशस्त मास—) मार्गशीर्ष, फाल्गुन, वैशाख, माघ, श्रावण और कार्तिक—ये मास गृहारम्भमें पुत्र, आरोग्य और धन देनेवाले होते हैं॥ ५५८ ½ ॥

(दिशाओंमें वर्ग और वर्गेश—) पूर्व आदि आठों दिशाओंमें क्रमशः अकारादि आठ वर्ग होते हैं। इन दिशावर्गोंके क्रमशः गरुड, मार्जार, सिंह,

पूर्वभाग-द्वितीय पाद ३७९

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  • पूर्वभाग-द्वितीय पाद * ३७९

श्वान, सर्प, मूषक, गज और शशक (खरगोश)—ये योनियाँ होती हैं। इन योनि-वर्गोंमें अपने पाँचवें वर्गवाले परस्पर शत्रु होते हैं¹॥ ५५९-५६०॥

(जिस ग्राममें या जिस दिशामें घर बनाना हो, वह साध्य तथा घर बनानेवाला साधक, कर्ता और भर्ता आदि कहलाता है। इसको ध्यानमें रखना चाहिये।) साध्य (ग्राम)-की वर्ग-संख्याको लिखकर, उसके पीछे (बायें भागमें) साधककी वर्ग-संख्या लिखे। उसमें आठका भाग देकर जो शेष बचे, वह साधकका धन होता है। इसके विपरीत विधिसे (अर्थात् साधककी वर्ग-संख्याके बायें भागमें साध्यकी वर्ग-संख्या रखकर जो संख्या बने, उसमें आठसे भाग देकर शेष) साधकका ऋण होता है। इस प्रकार ऋणकी संख्या अल्प और धन-संख्या अधिक हो तो शुभ माने (अर्थात् उस ग्राम या उस दिशामें बनाया हुआ घर रहने योग्य है, ऐसा समझे)²॥ ५६१(क-ख)॥

इसी प्रकार साधकके नक्षत्र साध्यके नक्षत्रतक गिनकर जो संख्या हो उसको चारसे गुणा करके गुणनफलमें सातसे भाग दे तो शेष साधकका धन होता है॥ ५६२॥

(वास्तुभूमि तथा घरके धन, ऋण, आय, नक्षत्र, वार और अंशके ज्ञानका साधन—)
वास्तुभूमि या घरकी चौड़ाईको लम्बाईसे गुणा करनेपर गुणनफल ‘पद’ कहलाता है। उस (पद)-को (६ स्थानोंमें रखकर) क्रमशः ८, ३, ९, ८,


१. दिशा और वर्ग जाननेका चक्र, यथा—

पूर्व १
८ ईशान<br>शवर्ग<br>शशकपूर्व १<br>अवर्ग<br>गरुड़अग्नि २<br>कवर्ग<br>मार्जार
७ उत्तर<br>यवर्ग<br>गजदक्षिण ३<br>चवर्ग<br>सिंह
६ वायु<br>पवर्ग<br>मूषकपश्चिम ५<br>तवर्ग<br>सर्पनर्ऋत्य ४<br>टवर्ग<br>श्वान

उदाहरण—अवर्ग (अ इ उ ऋ लृ ए ऐ ओ औ)-की पूर्व दिशा और गरुडयोनि है। वहाँसे क्रमशः दिशा गिननेपर पाँचवीं दिशा (पश्चिम)-में तवर्ग और सर्प इस अवर्ग एवं गरुडका शत्रु है। इस प्रकार परस्पर सम्मुख दिशामें शत्रुता होती है। इसी तरह कवर्ग (क ख ग घ ङ)-की दिशा अग्निकोण ओर योनि मार्जार (बिलाव) है। चवर्ग (च छ ज झ ञ)-की दक्षिण दिशा और सिंह योनि है। टवर्ग (ट ठ ड ढ ण)-की नैर्ऋत्य दिशा और श्वान योनि है। तवर्ग (त थ द ध न)-की पश्चिम दिशा और सर्प योनि है। पवर्ग (प फ ब भ म)-की वायुकोण दिशा और मूषक (चूहा) योनि है। यवर्ग (य र ल व)-की उत्तर दिशा और गज (हाथी) योनि है। शवर्ग (श ष स ह)-की ईशान दिशा और शशक (खरगोश) योनि है। इसका प्रयोजन यह है कि अपने-अपने नामके आदि अक्षरसे अपना वर्ग समझकर दिशा और योनिका ज्ञान करे। शत्रु-दिशामें अपने रहनेके लिये घर न बनावे। अर्थात् उस दिशाके घरमें स्वयं वास न करे तथा शत्रुवर्गवाले गाँवमें जाकर वास न करे इत्यादि। इसके सिवा, विशेष प्रयोजन मूलमें कहे गये हैं।

२. उदाहरण—विचार करना है कि ‘जयनारायण’ नामक व्यक्तिको गोरखपुरमें बसने या व्यापार करनेमें किस प्रकारका लाभ होगा? तो साध्य (गोरखपुर)-की वर्ग-संख्या २ के बायें भागमें साधक (जयनारायण)-की वर्ग-संख्या ३ रखनेसे ३२ हुआ। इसमें ८ से भाग देनेपर शून्य अर्थात् ८ बचा, यह साधक (जयनारायण)-का धन हुआ तथा इससे विपरीत वर्ग-संख्या २३को रखकर इसमें ८ का भाग देनेसे शेष ७ बचा। यह साधक (जयनारायण)-का ऋण हुआ। यहाँ ऋण ७ से धन अधिक है; अतः जयनारायणके लिये गोरखपुर निवास करनेयोग्य है—यह सिद्ध हुआ। तात्पर्य यह कि जयनारायणको गोरखपुरमें ८ लाभ और ७ खर्च होता रहेगा।

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३८० * संक्षिप्त नारदपुराण *

९, ६ से गुणा करे और गुणनफलमें क्रमशः १२, ८, ८, २७, ७, ९ से भाग दे। फिर जो शेष बचें, वे क्रमशः धन, ऋण, आय, नक्षत्र, वार तथा अंश होते हैं। धन अधिक हो तो वह घर शुभ होता है। यदि ऋण अधिक हो तो अशुभ होता है तथा विषम (१, ३, ५, ७) आय शुभ और सम (२, ४, ६, ८) आय अशुभ होता है। घरका जो नक्षत्र हो, वहाँसे अपने नामके नक्षत्रतक गिनकर जो संख्या हो, उसमें ९ से भाग दे। फिर यदि शेष (तारा) ३ बचे तो धनका नाश होता है। ५ बचे तो यशकी हानि होती है और ७ बचे तो गृहकर्ताका ही मरण होता है। घरकी राशि और अपनी राशि गिननेपर परस्पर २, १२ हो तो धनहानि होती है; ९, ५ हो तो पुत्रकी हानि होती है और ६, ८ हो तो अनिष्ट होता है; अन्य संख्या हो तो शुभ समझना चाहिये। सूर्य और मङ्गलके वार तथा अंश हो तो उस घरमें अग्निभय होता है। अन्य वार-अंश हो तो सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तुओंकी सिद्धि होती है¹ ॥ ५६३-५६७ ॥

(वास्तुपुरुषकी स्थिति—) भादों आदि तीन-तीन मासोंमें क्रमशः पूर्व आदि दिशाओंकी ओर मस्तक करके बायीं करवटसे सोये हुए महासर्पस्वरूप 'चर' नामक वास्तुपुरुष प्रदक्षिणक्रमसे विचरण करते रहते हैं। जिस समय जिस दिशामें वास्तुपुरुषका मस्तक हो, उस समय उसी दिशामें घरका दरवाजा बनाना चाहिये। मुखसे विपरीत दिशामें घरका दरवाजा बनानेसे रोग, शोक और भय होते हैं। किंतु यदि घरमें चारों दिशाओंमें द्वार हो तो यह दोष नहीं होता है ॥ ५६८-५७० ॥

गृहारम्भकालमें नींवके भीतर हाथभरके गड्ढेमें स्थापित करनेके लिये सोना, पवित्र स्थानकी रेणु (धूलि), धान्य और सेवारसहित ईंट घरके भीतर संग्रह करके रखे। घरकी जितनी लंबाई हो, उसके मध्यभागमें वास्तुपुरुषकी नाभि रहती है। उसके तीन अङ्गुल नीचे (वास्तुपुरुषके पुच्छभागकी ओर) कुक्षि रहती है। उसमें शंकुका न्यास करनेसे पुत्र आदिकी वृद्धि होती है ॥ ५७१-५७२ ॥

(शंकुप्रमाण—) खदिर (खैर), अर्जुन, शाल (शाखू), युगपत्र (कचनार) रक्तचन्दन, पलाश, रक्तशाल, विशाल आदि वृक्षोंसे किसीकी लकड़ीसे शंकु बनता है। ब्राह्मणादि वर्णोंके लिये क्रमशः २४, २३, २० और १६ अंगुलके शंकु होने चाहिये। उस शंकुके बराबर-बराबर तीन भाग करके ऊपरवाले भागमें चतुष्कोण, मध्यवाले भागमें अष्टकोण और नीचेवाले (तृतीय) भागमें बिना कोणका (गोलाकार) उसका स्वरूप होना उचित है। इस प्रकार उत्तम लक्षणोंसे युक्त कोमल और छेदरहित शंकु शुभ दिनमें बनावे। उसको षड्वर्गद्वारा शुद्ध सूत्रसे सूत्रित² भूमि (गृहक्षेत्र)-में मृदु, ध्रुव क्षिप्रसंज्ञक नक्षत्रोंमें, अमावास्या और रिक्ताको छोड़कर अन्य


१. उदाहरण—मान लीजिये, घरकी लंबाई २५ हाथ और चौड़ाई १५ हाथ है तो इनको परस्पर गुणा करनेसे ३७५ यह पद हुआ। इसको ८ से गुणा करनेपर गुणनफल ३००० हुआ। इसमें १२ का भाग देनेपर शेष ० अर्थात् १२ धन हुआ। फिर पदको ३ से गुणा किया तो ११२५ हुआ। इसमें ८ से भाग देकर शेष ५ ऋण हुआ। पुनः पद ३७५ को ९ से गुणा किया तो ३३७५ हुआ। इसमें ८ से भाग देनेपर शेष ७ आय हुआ। इसी तरह पदको ८ से गुणा करनेपर ३००० हुआ। इसमें २७ से भाग दिया तो शेष ३ नक्षत्र हुआ। फिर पदको ९ से गुणा किया तो ३३७५ हुआ। इसमें ७ से भाग देनेपर शेष १ वार हुआ। पुनः पद ३७५ को ६ से गुणा किया तो २२५० हुआ। इसमें ९ से भाग देनेपर शेष ० अर्थात् ९ अंश हुआ। यहाँ सब वस्तुएँ शुभ हैं, केवल वार १ रवि हुआ। इसलिये इस प्रकारके घरमें सब कुछ रहते हुए भी अग्निका भय रहेगा; ऐसा समझना चाहिये; इसलिये ऐसा पद देखकर लेना चाहिये, जिसमें सर्वथा शुभ हो।

२. पूर्वोक्त आय और षड्वर्गादिसे शोधित गृहके चारों ओरकी लंबाई-चौड़ाईके प्रमाण-तुल्य सूत्रसे घिरी हुई भूमिको ही यहाँ सूत्रित कहा है।

पूर्वभाग-द्वितीय पाद ३८१

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  • पूर्वभाग-द्वितीय पाद * ३८१

तिथियोंमें, रविवार, मङ्गलवार तथा चर लग्नको छोड़कर अन्य वारों और अन्य (स्थिर या द्विस्वभाव) लग्नोंमें, जब पापग्रह लग्नमें न हो, अष्टम स्थान शुद्ध (ग्रहरहित) हो; शुभ राशि लग्न हो और उसमें शुभ नवमांश हो, उस लग्नमें शुभग्रहका संयोग या दृष्टि हो; ऐसे समय (सुलग्न)-में ब्राह्मणोंद्वारा पुण्याहवाचन कराते हुए माङ्गलिक वाद्य और सौभाग्यवती स्त्रियोंके मङ्गलगीत आदिके साथ मुहूर्त बतानेवाले दैवज्ञ (ज्योतिषके विद्वान् ब्राह्मण) के पूजन (सत्कार)-पूर्वक कुक्षिस्थानमें शंकुकी स्थापना करे। लग्नसे केन्द्र और त्रिकोणमें शुभ ग्रह तथा ३, ६, ११ में पापग्रह और चन्द्रमा हो तो यह शंकुस्थापन श्रेष्ठ है॥५७३—५७९½॥

घरके छः भेद होते हैं—१-एकशाला, २-द्विशाला, ३-त्रिशाला, ४-चतुश्शाला, ५-सप्तशाला तथा ६- दशशाला। इन छहों शालाओंमेंसे प्रत्येकके १६ भेद होते हैं। उन सब भेदोंके नाम क्रमशः इस प्रकार हैं—१-ध्रुव, २-धान्य, ३-जय, ४-नन्द, ५-खर, ६-कान्त, ७-मनोरम, ८ सुमुख, ९ दुर्मुख, १० क्रूर, ११ शत्रुद, १२ स्वर्णद, १३ क्षय, १४ आक्रन्द, १५ विपुल और १६ वाँ विजय नामक गृह होता है। चार अक्षरोंके प्रस्तारके भेदसे क्रमशः इन गृहोंकी गणना करनी चाहिये॥५८०—५८२½॥

(प्रस्तारभेद—) प्रथम ४ गुरु (ऽ) चिह्न लिखकर उनमें प्रथम गुरुके नीचे लघु (।) चिह्न लिखे। फिर आगे जैसा ऊपर हो उसी प्रकारके गुरु या लघु चिह्न लिखना चाहिये। फिर उसके नीचे (तीसरी पङ्क्तिमें) प्रथम गुरु चिह्नके नीचे लघु चिह्न लिखकर आगे (दाहिने भागमें) जैसे ऊपर गुरु या लघु हो वैसा ही चिह्न लिखे तथा पीछे (बायें भागमें) गुरु चिह्नसे पूरा करे। इसी प्रकार पुनः-पुनः तबतक लिखता जाय जबतक कि पंक्ति (प्रस्तार)-में सब चिह्न लघु न हो जाय। इस प्रकार चार दिशा होनेके कारण ४ अक्षरोंसे १६ भेद होते हैं। प्रत्येक भेदमें चारों चिह्नोंको प्रदक्षिणक्रमसे पूर्व आदि दिशा समझकर जहाँ-जहाँ लघु चिह्न पड़े, वहाँ-वहाँ घरका द्वार और अलिन्द (द्वारके आगेका भाग=चबूतरा) बनाना चाहिये। इस प्रकार पूर्वादि दिशाओंमें अलिन्दके भेदोंसे १६ प्रकारके घर होते हैं*॥५८३-५८४½॥

१.प्रस्तारस्वरूप—

संख्यास्वरूप: पूर्व,स्वरूप: दक्षिण,स्वरूप: पश्चिम,स्वरूप: उत्तरनामद्वारकी दिशा
१ऽऽऽऽध्रुवऊर्ध्व (ऊपर)
२।ऽऽऽधान्यपूर्व
३ऽ।ऽऽजयदक्षिण
४।।ऽऽनन्दपूर्व-दक्षिण
५ऽऽ।ऽखरपश्चिम
६।ऽ।ऽकान्तपूर्व-पश्चिम
७ऽ।।ऽमनोरमदक्षिण-पश्चिम
८।।।ऽसुमुखपूर्व-दक्षिण-पश्चिम
९ऽऽऽ।दुर्मुखउत्तर
१०।ऽऽ।क्रूरपूर्व-उत्तर
११ऽ।ऽ।शत्रुददक्षिण-उत्तर
१२।।ऽ।स्वर्णदपूर्व-दक्षिण-उत्तर
१३ऽऽ।।क्षयपश्चिम-उत्तर
१४।ऽ।।आक्रन्दपूर्व-पश्चिम-उत्तर
१५ऽ।।।विपुलदक्षिण-पश्चिम-उत्तर
१६।।।।विजयपूर्व-दक्षिण-पश्चिम-उत्तर
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३८२* संक्षिप्त नारदपुराण *

वास्तुभूमिकी पूर्वदिशामें स्नानगृह, अग्निकोणमें पाकगृह (रसोईघर), दक्षिणमें शयनगृह, नैर्ऋत्यकोणमें शस्त्रागार, पश्चिममें भोजनगृह, वायुकोणमें धन-धान्यादि रखनेका घर, उत्तरमें देवताओंका गृह और ईशानकोणमें जलका गृह (स्थान) बनाना चाहिये तथा आग्नेयकोणसे आरम्भ करके उक्त दो-दो घरोंके बीच क्रमशः मन्थन (दूध-दहीसे घृत निकालने)-का, घृत रखनेका, पैखानेका, विद्याभ्यासका, स्त्रीसहवासका, औषधका और शृङ्गारकी सामग्री रखनेका घर बनाना शुभ कहा गया है। अतः इन सब घरोंमें उन-उन सब वस्तुओंको रखना चाहिये॥ ५८५—५८८ १/२ ॥

(आयोंने नाम और दिशा—) पूर्वादि आठ दिशाओंमें क्रमसे ध्वज, धूम्र, सिंह, श्वान, वृक्ष, खर (गदहा), गज और ध्वांक्ष (काक)—ये आठ आय होते हैं॥ ५८९ १/२ ॥

(घरके समीप निन्द्य वृक्ष—) पाकर, गूलर, आम, नीम, बहेड़ा तथा काँटेवाले और दुग्धवाले सब वृक्ष, पीपल, कपित्थ (कैथ), अगस्त्य वृक्ष, सिन्धुवार (निर्गुण्डी) और इमली—ये सब वृक्ष घरके समीप निन्दित कहे गये हैं। विशेषतः घरके दक्षिण और पश्चिम-भागमें ये सब वृक्ष हों तो धन आदिका नाश करनेवाले होते हैं॥ ५९०—५९१ १/२ ॥

(गृह-प्रमाण—) घरके स्तम्भ (खम्भे) घरके पैर होते हैं। इसलिये वे समसंख्या (४, ६, ८ आदि)-में होनेपर ही उत्तम कहे गये हैं; विषम संख्यामें नहीं। घरको न तो अधिक ऊँचा ही करना चाहिये, न अधिक नीचा ही। इसलिये अपनी इच्छा (निर्वाह)-के अनुसार भित्ति (दीवार) की ऊँचाई करनी चाहिये। घरके ऊपर जो घर (दूसरा मंजिल) बनाया जाता है, उसमें भी इस प्रकारका विचार करना चाहिये। घरोंकी ऊँचाईके प्रमाण आठ प्रकारके कहे गये हैं, जिनके नाम क्रमशः इस प्रकार हैं—१-पाञ्चाल, २-वैदेह, ३-कौरव, ४-कुजन्यक¹, ५-मागध, ६-शूरसेन, ७ गान्धार और ८ आवन्तिक।

जहाँ घरकी ऊँचाई उसकी चौड़ाईसे सवागुनी अधिक होती है, वह भूतलसे ऊपरतकका पाञ्चालमान कहलाता है, फिर उसी ऊँचाईको उत्तरोत्तर सवागुनी बढ़ानेसे वैदेह आदि सब मान होते हैं। इनमें पाञ्चालमान तो सर्वसाधारण जनोंके लिये शुभ है। ब्राह्मणोंके लिये आवन्तिकमान, क्षत्रियोंके लिये गान्धारमान तथा वैश्योंके लिये कौजन्यमान है। इस प्रकार ब्राह्मणादि वर्णोंके लिये यथोत्तर गृहमान समझना चाहिये तथा दूसरे मंजिल और तीसरे मंजिलके मकानमें भी पानीका बहाव पहले बताये अनुसार ही बनाना चाहिये²॥ ५९२—५९८॥

(घरमें प्रशस्त आय—) ध्वज अथवा गज आयमें ऊँट और हाथीके रहनेके लिये घर बनवावे तथा अन्य सब पशुओंके घर भी उसी (ध्वज और गज) आयमें बनाने चाहिये। द्वार, शय्या, आसन, छाता और ध्वजा—इन सबोंके निर्माणके लिये सिंह, वृष अथवा ध्वज आय होने चाहिये॥ ५९९ १/२ ॥

अब मैं नूतनगृहमें प्रवेशके लिये वास्तुपूजाकी विधि बताता हूँ—घरके मध्यभागमें तन्दुल (चावल)-पर पूर्वसे पश्चिमकी ओर एक-एक हाथ लम्बी दस रेखाएँ खींचे। फिर उत्तरसे दक्षिणकी ओर भी उतनी ही लम्बी-चौड़ी दस रेखाएँ बनावे। इस प्रकार उसमें बराबर-बराबर ८१ पद (कोष्ठ) होते हैं। उनमें आगे बताये जानेवाले ४५ देवताओंका यथोक्त स्थानमें नामोल्लेख करे। बत्तीस देवता बाहर (प्रान्तके कोष्ठोंमें) और तेरह देवता भीतर


१. मूलमें 'कुजन्यकम्' पाठ है; परंतु कुजन्य कोई प्रसिद्ध देश नहीं है; इसलिये प्रतीत होता है कि यहाँ 'कान्यकुब्जकम्' के स्थानमें 'कुब्जकन्यकम्' था। फिर लेखकादिके दोषसे 'कुजन्यकम्' हो गया है।
२. पूर्व या उत्तर प्लवभूमिमें घर बनाना प्रशस्त कहा गया है। यदि नीचेके तल्लेमें पूर्व दिशामें जलस्राव हो तो ऊपरके मंजिलमें भी पूर्व दिशामें ही जलस्राव होना चाहिये।

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  • पूर्वभाग-द्वितीय पाद * | ३८३
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पूजनीय होते हैं। उन ४५ देवताओंके स्थान और नामका क्रमशः वर्णन करता हूँ। किनारेके बत्तीस कोष्ठोंमें ईशान कोणसे आरम्भ करके क्रमशः बत्तीस देवता पूज्य हैं। उनके नाम इस प्रकार हैं-कृपीट योनि (अग्नि) १, पर्जन्य २, जयन्त, ३, इन्द्र ४, सूर्य ५, सत्य ६, भृश ७, आकाश ८, वायु ९, पूषा १०, अनृत (वितथ) ११, गृहक्षत^१ १२, यम १३, गन्धर्व १४, भृङ्गराज १५, मृग १६, पितर १७, दौवारिक १८, सुग्रीव १९, पुष्प-दन्त २०, वरुण २१, असुर २२, शेष २३, राजयक्ष्मा^२ २४, रोग २५, अहि २६, मुख्य २७, भल्लाटक २८, सोम २९, सर्प ३०, अदिति ३१ और दिति ३२,- ये चारों किनारोंके देवता हैं। ईशान, अग्नि, नैर्ऋत्य और वायुकोणके देवोंके समीप क्रमशः आप ३३, सावित्र ३४, जय ३५, तथा रुद्र ३६ के पद हैं। ब्रह्माके चारों ओर पूर्व आदि आठों दिशाओंमें क्रमशः अर्यमा ३७, सविता ३८, विवस्वान् ३९, विबुधाधिप ४०, मित्र ४१, राजयक्ष्मा ४२, पृथ्वीधर ४३, आपवत्स ४४ हैं और मध्यके नव पदोंमें (४५) ब्रह्माजीको स्थापित करना चाहिये। इस प्रकार सब पदोंमें ये पैंतालीस देवता पूजनीय होते हैं। जैसे ईशान-कोणमें आप, आपवत्स, पर्जन्य, अग्नि और दिति-ये पाँच देव एकपद होते हैं, उसी प्रकार अन्य कोणोंके पाँच-पाँच देवता भी एक-पदके भागी हैं। अन्य जो बाह्य-पङ्क्तिके (जयन्त, इन्द्र आदि) बीस देवता हैं, वे सब द्विपद (दो-दो पदोंके भागी) हैं तथा ब्राह्मसे पूर्व, दक्षिण, पश्चिम और उत्तर दिशामें जो अर्यमा, विवस्वान्, मित्र और पृथ्वीधर-ये चार देवता हैं, वे त्रिपद (तीन-तीन पदोंके भागी) हैं, अतः वास्तु-विधिके ज्ञाता विद्वान् पुरुषको चाहिये कि ब्रह्माजीसहित इन एकपद्, द्विपद तथा त्रिपद देवताओंका वास्तुमन्त्रों-द्वारा दूर्वा, दही, अक्षत, फूल, चन्दन, धूप, दीप और नैवेद्यादिसे विधिवत् पूजन करे। अथवा ब्राह्ममन्त्रसे आवाहनादि षोडश (या पञ्च) उपचारोंद्वारा उन्हें दो श्वेत वस्त्र समर्पित करे^३॥६००-६१३॥


१-२. अन्य संहिताओंमें १२ वाँ बृहत्क्षत; २४ वाँ पापयक्ष्मा कहा गया है।
३. एकाशीतिपद वास्तुचक्र-

शिखी १पर्जन्य २जयन्त ३इन्द्र ४सूर्य ५सत्य ६भृश ७आकाश ८वायु ९
दिति ३२आप ३३जयन्तइन्द्रसूर्यसत्यभृशसावित्र ३४पूषा १०
अदिति ३१अदिति४४ आपवत्सअर्यमा३७ अर्यमाअर्यमा३८ सवितावितथवितथ ११
सर्प ३०सर्पपृथ्वीधरविवस्वान्गृहक्षतगृहक्षत १२
सोम २९सोमपृथ्वीधर ४३४५ ब्रह्माविवस्वान् ३९यमयम १३
भल्लाटक २८भल्लाटकपृथ्वीधरविवस्वान्गन्धर्वगन्धर्व १४
मुख्य २७मुख्यराजयक्ष्मा ४२मित्रमित्र ४१मित्रविबुधाधिप ४०भृङ्गभृङ्ग १५
अहि २६रुद्र ३६शेषअसुरवरुणपुष्पदन्तसुग्रीवजय ३५मृग १६
रोग २५राजयक्ष्मा २४शेष २३असुर २२वरुण २१पुष्पदन्त २०सुग्रीव १९दौवारिक १८पितर १७
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३८४ * संक्षिप्त नारदपुराण *

नैवेद्यमें तीन प्रकारके (भक्ष्य, भोज्य, लेह्य) अन्न माङ्गलिक गीत और वाद्यके साथ अर्पण करे। अन्तमें ताम्बूल (पान-सोपारी) अर्पण करके वास्तुपुरुषकी इस प्रकार प्रार्थना करे॥ ६१४ ॥

वास्तुपुरुष नमस्तेऽस्तु भूशय्यानिरत प्रभो।
मद्गृहं धनधान्यादिसमृद्धं कुरु सर्वदा॥

‘भूमिशय्यापर शयन करनेवाले वास्तुपुरुष! आपको मेरा नमस्कार है। प्रभो! आप मेरे घरको धन-धान्य आदिसे सम्पन्न कीजिये।’

इस प्रकार प्रार्थना करके देवताके समक्ष पूजा करानेवाले (पुरोहित)-को यथाशक्ति दक्षिणा दे तथा अपनी शक्तिके अनुसार ब्राह्मणोंको भोजन कराकर उन्हें भी दक्षिणा दे। जो मनुष्य सावधान होकर गृहारम्भ या गृहप्रवेशके समय इस विधिसे वास्तुपूजा करता है, वह आरोग्य, पुत्र, धन और धान्य प्राप्त करके सुखी होता है। जो मनुष्य वास्तुपूजा न करके नये घरमें प्रवेश करता है, वह नाना प्रकारके रोग, क्लेश और संकट प्राप्त करता है॥ ६१५-६१८॥

जिसमें किंवाड़ें न लगी हों, जिसे ऊपरसे छत आदिके द्वारा छाया न गया हो तथा जिसके लिये (पूर्वोक्त रूपसे वास्तुपूजन करके) देवताओंको बलि (नैवेद्य) और ब्राह्मण आदिको भोजन न दिया गया हो, ऐसे नूतन गृहमें कभी प्रवेश न करे; क्योंकि वह विपत्तियोंकी खान (स्थान) होता है॥ ६१९॥

(यात्रा-प्रकरण—) अब मैं जिस प्रकारसे यात्रा करनेपर वह राजा तथा अन्य जनोंके लिये अभीष्ट फलकी सिद्धि करानेवाली होती है, उस विधिका वर्णन करता हूँ। जिनके जन्म-समयका ठीक-ठीक ज्ञान है, उन राजाओं तथा अन्य जनोंको उस विधिसे यात्रा करनेपर उत्तम फलकी प्राप्ति होती है। जिन मनुष्योंका जन्मसमय अज्ञात है, उनको तो घुणाक्षर* न्यायसे ही कभी फलकी प्राप्ति हो जाती है, तथापि उनको भी प्रश्नलग्नसे तथा निमित्त और शकुन आदिद्वारा शुभाशुभ देखकर यात्रा करनेसे अभीष्ट फलका लाभ होता है॥ ६२०-६२१॥

(यात्रामें निषिद्धि तिथियाँ—) षष्ठी, अष्टमी, द्वादशी, चतुर्थी, नवमी, चतुर्दशी, अमावास्या, पूर्णिमा और शुक्लपक्षकी प्रतिपदा—इन तिथियोंमें यात्रा करनेसे दरिद्रता तथा अनिष्टकी प्राप्ति होती है॥ ६२२॥

(विहित नक्षत्र—) अनुराधा, पुनर्वसु, मृगशिरा, हस्त, रेवती, अश्विनी, श्रवण, पुष्य और धनिष्ठा—इन नक्षत्रोंमें यदि अपने जन्म-नक्षत्रसे सातवीं, पाँचवीं और तीसरी तारा न हो तो यात्रा अभीष्ट फलको देनेवाली होती है॥ ६२३॥

(दिशाशूल—) शनि और सोमवारके दिन पूर्व दिशाकी ओर न जाय, गुरुवारको दक्षिण न जाय, शुक्र और रविवारको पश्चिम न जाय तथा बुध और मङ्गलको उत्तर दिशाकी यात्रा न करे॥ ६२४॥ ज्येष्ठा, पूर्वभाद्रपद, रोहिणी और उत्तराफाल्गुनी—ये नक्षत्र क्रमशः पूर्व, दक्षिण, पश्चिम और उत्तर दिशामें शूल होते हैं।

(सर्वदिग्गमन नक्षत्र—) अनुराधा, हस्त, पुष्य और अश्विनी—ये चार नक्षत्र सब दिशाओंकी यात्रामें प्रशस्त हैं॥ ६२५॥

(दिग्द्वार-नक्षत्र—) कृत्तिकासे आरम्भ करके सात-सात नक्षत्रसमूह पूर्वादि दिशाओंमें रहते हैं। तथा अग्निकोणसे वायुकोणतक परिघदण्ड रहता है; अतः इस प्रकार यात्रा करनी चाहिये,


* जैसे घुन (कीटविशेष) काठको खोदता रहता है तो उससे कहीं अकारादि अक्षरका स्वरूप अकस्मात् बन जाता है; उसी प्रकार जो अपने जन्मसमयसे अपरिचित हैं, वे लग्न आदिको न जानकर भी यात्रा करते-करते कभी संयोगवश शुभ फलके भागी हो जाते हैं।

पूर्वभाग-द्वितीय पाद

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  • पूर्वभाग-द्वितीय पाद *
    ३८५

जिससे परिघदण्डका लङ्घन न हो^१ ॥ ६२६ ॥
पूर्वके नक्षत्रोंमें अग्निकोणकी यात्रा करे। इसी प्रकार दक्षिणके नक्षत्रोंमें अग्निकोण तथा पश्चिम और उत्तरके नक्षत्रोंमें वायुकोणकी यात्रा कर सकते हैं।

(दिशाओंकी राशियाँ—) पूर्व आदि चार दिशाओंमें मेष आदि १२ राशियाँ पुनः पुनः (तीन आवृत्तिसे) आती हैं^२॥ ६२७॥

(लालाटिकयोग—) जिस दिशामें यात्रा करनी हो, उस दिशाका स्वामी ललाटगत (सामने) हो तो यात्रा करनेवाला लौटकर नहीं आता है। पूर्व दिशामें यात्रा करनेवालेको लग्नमें यदि सूर्य हो तो वह ललाटगत माना जाता है। यदि शुक्र लग्नसे ग्यारहवें या बारहवें स्थानमें हों तो अग्निकोणमें यात्रा करनेसे, मङ्गल दशम भावमें हो तो दक्षिणयात्रा करनेसे, राहु नवें और आठवें भावमें हो तो नैर्ऋत्य कोणकी यात्रासे, शनि सप्तम भावमें हो तो पश्चिम-यात्रासे, चन्द्रमा पाँचवें और छठे भावमें हो तो वायुकोणकी यात्रासे, बुध चतुर्थ भावमें हो तो उत्तरकी यात्रासे, गुरु तीसरे और दूसरे भावमें हो तो ईशानकोणकी यात्रा करनेसे ललाटगत होते हैं। जो मनुष्य जीवनकी इच्छा रखता हो, वह इस ललाटयोगको त्यागकर यात्रा करे ॥ ६२८-६३२ ॥

लग्नमें वक्रगति ग्रह या उसके षड्वर्ग (राशि-होरादि) हों तो यात्रा करनेवाले राजाओंकी पराजय होती है॥ ६३३ ॥

जब जिस अयन^३ में सूर्य और चन्द्रमा दोनों हों, उस समय उस दिशाकी यात्रा शुभ फल देनेवाली होती है। यदि दोनों भिन्न अयनमें हों तो जिस अयनमें सूर्य हों उधर दिनमें तथा जिस अयनमें चन्द्रमा हों उधर रात्रिमें यात्रा शुभ होती है। अन्यथा यात्रा करनेसे यात्रीकी पराजय होती है॥ ६३४॥


१. पूर्व नक्षत्रमें पश्चिम या दक्षिण जानेसे परिघदण्डका लङ्घन होगा। चक्र देखिये—
(पूर्व)

कृत्तिका, रोहिणी, मृगशिरा, आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, आश्लेषा
भरणी <br> अश्विनी <br> रेवती <br> उत्तरभाद्रपद <br> पूर्वभाद्रपद <br> शतभिषा <br> धनिष्ठामघा <br> पूर्वफाल्गुनी <br> उत्तराफाल्गुनी <br> हस्त <br> चित्रा <br> स्वाती <br> विशाखा
परिघदण्ड
श्रवण, अभिजित्, उत्तराषाढ़, पूर्वाषाढ़, मूल, ज्येष्ठा, अनुराधा,

२. दिग्‌राशिबोधक चक्र—
(पूर्व)

मेष, १सिंह, ५धनु, ९,
मीन १२<br>वृश्चिक ८<br>कर्क ४२ वृष<br>६ कन्या<br>१० मकर
कुम्भ ११तुला ७मिथुन ३

३. मकरसे ६ राशि उत्तरायण है। इनमें सूर्य-चन्द्रमा हों तो उत्तरकी यात्रा शुभ होती है, क्योंकि दोनों सम्मुख होते हैं। इससे सिद्ध होता है कि यदि सूर्य और चन्द्रमा दाहिने भागमें पड़ें तो भी यात्रा शुभ हो सकती है। इसलिये उस समय पश्चिम-यात्रा भी शुभ ही समझनी चाहिये एवं कर्कसे छः राशि दक्षिणायन समझें।

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३८६* संक्षिप्त नारदपुराण *

(शुक्रदोष—) शुक्र अस्त हों तो यात्रामें हानि होती है। यदि वह सम्मुख हो तो यात्रा करनेसे पराजय होती है। सम्मुख शुक्रके दोषको कोई भी ग्रह नहीं हटा सकता है। किंतु वसिष्ठ, कश्यप, अत्रि, भरद्वाज और गौतम—इन पाँच गोत्रवालोंको सम्मुख शुक्रका दोष नहीं होता है। यदि एक ग्रामके भीतर ही यात्रा करनी हो या विवाहमें जाना हो या दुर्भिक्ष होनेपर अथवा राजाओंमें युद्ध होनेपर तथा राजा या ब्राह्मणोंका कोप होनेपर कहीं जाना पड़े तो इन अवस्थाओंमें सम्मुख शुक्रका दोष नहीं होता है। शुक्र यदि नीच राशिमें या शत्रुराशिमें अथवा वक्रगति या पराजित* हो तो यात्रा करनेवालोंकी पराजय होती है। यदि शुक्र अपनी उच्चराशि (मीन)-में हो तो यात्रामें विजय होती है॥ ६३५-६३८॥

अपने जन्मलग्न या जन्मराशिसे अष्टम राशि या लग्नमें तथा शत्रुकी राशिसे छठी राशिमें या लग्नमें अथवा इन सबोंके स्वामी जिस राशिमें हों, उस लग्न या राशिमें यात्रा करनेवालेकी मृत्यु होती है। परंतु यदि जन्मलग्नराशिपति और अष्टम राशिपतिमें परस्पर मैत्री हो तो उक्त अष्टमराशिजन्य दोष स्वयं नष्ट हो जाता है॥ ६३९-६४०॥

द्विस्वभाव लग्न यदि पापग्रहसे युक्त या दृष्ट हो तो यात्रामें पराजय होती है तथा स्थिर राशि पापग्रहसे युक्त न हो तो वह यात्रालग्नमें अशुभ है। यदि स्थिर राशिलग्नमें शुभग्रहका योग या दृष्टि हो तो शुभ फल होता है॥ ६४१॥

धनिष्ठा नक्षत्रके उत्तरार्धसे आरम्भ करके (रेवतीपर्यन्त) पाँच नक्षत्रोंमें गृहार्थ तृण-काष्ठोंका संग्रह, दक्षिणकी यात्रा, शय्या (तकिया, पलङ्ग आदि)-का बनाना, घरको छवाना आदि कार्य नहीं करने चाहिये॥ ६४२॥

यदि यात्रालग्नमें जन्मलग्न, जन्मराशि या इन दोनोंके स्वामी हों अथवा जन्मलग्न या जन्मराशिसे ३, ६, ११, १० वीं राशि हो तो शत्रुओंका नाश होता है॥ ६४३॥

यदि शीर्षोदय (मिथुन, सिंह, कन्या, तुला, कुम्भ) तथा दिग्द्वार (यात्राकी दिशा)-की राशि लग्नमें हो अथवा किसी भी लग्नमें शुभग्रहके वर्ग (राशि-होरादि) हों तो यात्रा करनेवाले राजाके शत्रुओंका नाश होता है॥ ६४४॥

शत्रुके जन्मलग्न या जन्मराशिसे अष्टम राशि या उन दोनोंके स्वामी जिस राशिमें हों वह राशि यात्रालग्नमें हो तो शत्रुता नाश होता है॥ ६४५॥

मीन लग्नमें या लग्नगत मीनके नवमांशमें यात्रा करनेसे मार्ग (रास्ता) टेढ़ा हो जाता है। (अर्थात् बहुत घूमना पड़ता है।) तथा कुम्भलग्न और लग्नगत कुम्भका नवमांश भी यात्रामें अत्यन्त निन्दित है॥ ६४६॥

जलचर राशि (कर्क, मीन) या जलचर राशिका नवमांश लग्नमें हो तो नौकाद्वारा नदी-नद आदि मार्गसे यात्रा शुभ होती है॥ ६४६ १/२॥

(लग्नभावोंकी संज्ञा—) १- मूर्ति (तन), २-कोष (धन), ३-धन्वी (पराक्रम, भ्राता), ४-वाहन (सवारी, माता), ५-मन्त्र (विद्या, संतान), ६-शत्रु (रोग, मामा), ७-मार्ग (यात्रा, पति-पत्नी), ८-आयु (मृत्यु), ९-मन (अन्तःकरण, भाग्य), १०-व्यापार (व्यवसाय, पिता), ११- प्राप्ति (लाभ), १२- अप्राप्ति (व्यय)—ये क्रमसे लग्न आदि १२ स्थानोंकी संज्ञाएँ हैं॥ ६४७-६४८॥

पापग्रह (शनि, रवि, मङ्गल, राहु तथा केतु—ये) तीसरे और ग्यारहवेंको छोड़कर अन्य सब


* जब मङ्गलादि ग्रहोंमें किन्हीं दो ग्रहोंकी एक राशिमें अंशकला बराबर हो तो दोनोंमें युद्ध समझा जाता है। उन दोनोंमें जो उत्तर रहता है, वह विजयी तथा दक्षिण रहनेवाला पराजित होता है।