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माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

( ८२ ) माधवनिदान ।

( ८२ ) माधवनिदान ।
कुम्भकामलाके असाध्य लक्षण ।
छर्द्यरोचकहृल्लासज्वरक्लमनिपीडितः ।
नश्यति श्वासकासार्त्तो विड्भेदी कुम्भकामली ॥ २३ ॥
वमन, अरुचि, ओकारीका आना, ज्वर, अनायास श्रम इनसे पीडित तथा श्वास
खाँसी इनसे जर्जरित और अतिसारयुक्त ऐसा कुम्भकामलावाला रोगी मरजावे ॥
पाण्डुरोगसे हलीमक रोग प्रगट होता है, सो कहते हैं-
यदा तु पाण्डुवर्णः स्याद्धरितः श्यावपीतकः ।
बलोत्साहक्षयस्तन्द्रा मन्दाग्नित्वं मृदुज्वरः ॥ २४ ॥
स्त्रीष्वहर्षोऽङ्गमर्दश्च दाहस्तृष्णाऽरुचिर्भ्रमः ।
हलीमकं तदा तस्य विद्यादनिलपित्ततः ॥ २५ ॥
जिस समय पाण्डुरोगीका वर्ण हरा, काला, पीला होय और बल व उत्साह
इनका नाश, तन्द्रा, मन्दाग्नि, महीन ज्वर, स्त्रीसंभोगकी इच्छाका नाश, अंगोंका
टूटना, दाह, प्यास, अन्नमें अप्रीति और भ्रम ये उपद्रव वातपित्तसे प्रगट हली-
मक रोगके हैं ॥
पानकी लक्षण ।
सन्तापो भिन्नवर्चस्त्वं बहिरन्तश्च पीतता ।
पाण्डुता नेत्रयोर्यस्य पानकीलक्षणं भवेत् ॥ २६ ॥
सन्ताप कहिये इन्द्रिय, मन इनका ताप, मलका पतला होना, भीतर बाहर
पीला हो जावे और नेत्रोंका पीला होना ये पानकी रोगके लक्षण हैं ॥
इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरनिर्मितमाधवार्थदीपिकामाधुरीभाषाटीकायां
पाण्डुकामलाहलीमकनिदानं समाप्तम् ॥
अथ रक्तपित्तनिदानम् ।
पाण्डुरोगके सदृश रक्तपित्तको भी पित्तजन्य होनेसे तदनन्तर रक्तपित्तनिदानको कहते हैं-
घर्मव्यायामशोकाध्वव्यवायैरतिसेवितैः ।
तीक्ष्णोष्णक्षारलवणैरम्लैः कटुभिरेव च ॥ १ ॥
१ रक्तं च तत् पित्तं च रक्तपित्तम् । अथवा रक्तं च पित्तं चेत्यनयोः समाहारः रक्तपित्तम्,
तस्य निदानम् ॥
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भाषाटीकासमेत । ( ८३ )
पित्तं विदग्धं स्वगुणैर्विदहत्याशु शोणितम् ।
ततः प्रवर्त्तते रक्तमूर्ध्वं वाऽधो द्विधापि वा ॥ २ ॥
ऊर्ध्वं नासाक्षिकर्णास्यैर्मेढूयोनिगुदैर्धः ।
कुपितं रोमकूपैश्च समस्तैस्तत्प्रवर्त्तते ॥ ३ ॥
धूपमें बहुत डोलनेसे, अति परिश्रम करनेसे, शोकसे, बहुत मार्ग चलनेसे, अति
मैथुन करनेसे, मिरच आदि तीखी वस्तु खानेसे, अग्निके तापनेसे जवाखार आदि
खारे पदार्थ, नोनसे आदि ले लवणके पदार्थ, खट्टी कडुवी ऐसी वस्तुओंके खानेसे
कोपको प्राप्त भया जो पित्त सो अपने तीक्ष्ण द्रव पूति इत्यादि गुणोंसे रुधिरको
बिगाडे तब रुधिर ऊपरके अथवा नीचेके मार्ग अथवा दोनों मार्ग होकर प्रवृत्त
हो निकले ( ऊपरके मार्ग, नाक, नेत्र मुख इनके द्वारा निकले ) और अधोमार्ग
कहिये लिंग गुदा और योनि इनके रास्ते होकर निकले और जब रुधिर अत्यन्त
कुपित होय तब दोनों मार्ग और सब रोमछिद्रोंके द्वारा निकले हैं ॥
रक्तपित्तका पूर्वरूप ।
सदनं शीतकामित्वं कण्ठधूमायनं वमिः ।
लोहगन्धिश्च निश्वासो भवत्यस्मिन् भविष्यति ॥ ४ ॥
ग्लानि, शीतकी इच्छा, कण्ठसे धूआं निकलना, वमन और तपाये भये लोहेपर
जल गेरनेसे जैसी गन्ध आवे ऐसी श्वास लेनेसे गन्धका आना जिस मनुष्यमें इतने
लक्षण मिलते होयँ उसको जानना कि, इसके रक्तपित्त प्रगट होवेगा ॥
कफयुक्त रक्तपित्तके लक्षण ।
सान्द्रं सपाण्डु सस्नेहं पिच्छिलं च कफान्वितम् ।
सघन, कुछ पीला और कुछ चिकना तथा गाढा ऐसा रक्तपित्त कफमिश्रित
जानना॥
वातिक रक्तपित्तके लक्षण ।
श्यावारुणं सफेनं च तनु रूक्षं च वातिकम् ॥ ५ ॥
नीलवर्ण, लालवर्ण, कुछ झागयुक्त, पतला और रूखा ऐसा रक्तपित्त
वातका जानना ॥
पैत्तिक रक्तपित्तके लक्षण ।
रक्तपित्तं कषायाभं कृष्णं गोमूत्रसंनिभम् ।
मेचकागारधूमाभमञ्जनाभं च पैत्तिकम् ॥ ६ ॥
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