माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
( ६ ) माधवनिदान ।
( ६ ) माधवनिदान ।
औषधान्नविहाराणामुपयोगं सुखावहम् ॥ ८ ॥
विद्यादुपशयं व्याधेः स हि सात्म्यमिति स्मृतः ।
व्याधेः सुखावहम्, उपयोगम्, उपशयं विद्यात् स सात्म्यम् इति स्मृतः । केषाम्
औषधान्नविहाराणाम्, किंभूतानां हेतुव्याधिविपर्यस्तविपर्यस्तार्थकारिणाम् इत्यन्वयः ।
व्याधेरुपयोगः सुखावहस्तमुपशयं विद्यात् जानीयात् । उपयुज्यत इति उप-
योगः सेवनं सुखमावहति सम्यगनुबन्धेन सुखमुत्पादयतीति सुखावहः, केषामुपयोगः
औषधान्नविहाराणाम्, औषधं चान्नं च विहारश्चौषधान्नविहारास्तेषाम्, औषधं हरी-
तक्यादि, अन्नं रक्तशाल्यादि, विहारो देहमनोनिर्वर्तितचेष्टाविशेषः,किंभूतानाम् औष-
धान्नविहाराणां हेतुव्याधिविपर्यस्तविपर्यस्तार्थकारिणाम्, हेतुर्बाह्य आभ्यन्तरश्च
व्याधिर्ज्वरादिः हेतुश्च व्याधिश्च हेतुव्याधी तयोर्व्यस्तसमस्तयोः विपर्यस्ता व्याधि-
निदानयोर्विपरीताः तथा विपर्यस्तानाम् अर्थो विपर्यस्तार्थः तयोर्व्यस्तसमस्तयोरेव
विपरीतमर्थं कुर्वन्तीति विपर्यस्तार्थकारिणः हेतुव्याधिविपर्यस्ताश्च विपर्यस्तार्थकारिणश्च
हेतुव्याधिविपर्यस्तविपर्यस्तार्थकारिणः, तेषां हेतुव्याधिविपर्यस्तविपर्यस्तार्थकारिणाम् ।
तदायमर्थः,-निदानरोगयोर्व्यस्तसमस्तयोर्विपरीता अपि कारणरूपा इव भासमाना
व्याधिरूपा इव भासमाना हेतुव्याधिविपरीतानाम् अर्थं व्याध्युपशमलक्षणं कुर्वन्तीति ।
यथा । हेतुविपरीतैः औषधान्नविहारैर्व्याध्युपशयः क्रियते प्रतिपक्षत्वात् एवं विपर्य-
स्ताश्चिपर्यस्तार्थकारिभिरपीत्यर्थः । तत्र चोपशमानामष्टादश भेदा भवन्ति । तान् वर्ण-
यति यथा-हेतुविपरीतमौषधं हेतुविपरीतमन्रं हेतुविपरीतो विहारः । यथेमे त्रयो भेदा
एवमेव सर्वत्र । तथा च हेतुविपरीतानां व्याधिविपरीतानां हेतुव्याधिविपरीतानां
हेतुविपरीतार्थकारिणां व्याधिविपरीतार्थकारिणां हेतुव्याधिविपरीतार्थकारिणाम् औष-
धान्नविहाराणां यः सुखावह उपयोगः स उपशय इति पिण्डार्थः । अथैषां क्रमेणो-
दाहरणानि भाषायां वेदितव्यानि ॥
हेतुविपरीत व्याधिविपरीत हेतुव्याधिविपरीत हेतुविपर्यस्तार्थकारी व्याधिविपर्य-
स्तार्थकारी हेतुव्याधिविपर्यस्तार्थकारी ऐसे जो औषध अन्न (पथ्य) विहार (आचरण)
इनका सेवन सुखकारक जानना उसको व्याधिका उपशय कहते हैं, इसका तात्पर्य
यह है कि रोग और रोगका हेतु इनको सुखकारक जो औषधि पथ्य आचरणरूप
प्रयोग उसको उपशय कहते हैं और व्याधिसात्म्य ये पर्यायवाचक नाम उसी उप-
शयके हैं। सुखकारकके कहनेसे यह प्रयोजन है कि दाह और प्यासयुक्त नवीन ज्वरमें
शीतलजलका पीना व्याधिका बढानेवाला है इससे शीतलजल सुखकर्ता न भया अतएव
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भाषाटीकासमेत । (७)
शीतल जलको उपशय न समझना चाहिये परंतु दाहयुक्त प्यासमें शीतलजल उपशय
मानाजायगा क्योंकि सुखकारक है ॥
आगे अब क्रमसे उदाहरण लिखते हैं-
| नाम | औषधि | अन्न | विहार |
|---|---|---|---|
| हेतुविपरीत | शीतज्वरमें गरम औषधि सोंठ | श्रम और बादीस प्रगट रोगपर मांसके रस और भात. | दिनके सोनेसे प्रगट कफरोगपर विपरीत आचरण रातमें जागना. |
| व्याधिविपरीत | अतिसारमें दस्त बन्द करनेवाली औषधि पाठा, आदि | दस्तोंमें दस्तके बन्द कारक पथ्य मसूर. | उदावर्तरोगमें शब्दपूर्वक अधोवायुका निकसना, मन्त्र आषधि धारण, देव गुरूकी सेवा करनी. |
| हेतुव्याधिविपरीत | वातकी सूजनमें दशमूलका काढा वात और सूजन दोनोंको दूर करनेवाला है. | कफकी संग्रहणीमें छाछका पीना वातनाशक कफनाशक और संग्रहणी नाशक है. | स्निग्ध जो दिनके सोनेसे उत्पन्न तन्द्रा तिसमें रूक्ष तन्द्रासे विपरीत स्निग्धतानाशक रात्रिमें जागना. |
| हेतुविपर्यस्तार्थकारी | जैसे पित्त प्रधान व्रण सूजनमें पित्तकारक उष्ण पिण्डाकी बांधना. | पित्तकी सूजनमें दाहकारक अन्नका भोजन करना. | जैसे वातसे पैदा उन्मादमें वासका देना. |
| व्याधिविपर्यस्तार्थकारी | जैसे कफरोगमें वमन कारक मैनफल आदि. | अतिसार रोगमें दस्तकारक दुग्ध देना. | छर्दिरोगमें हाथका अगूठा गलेमें करवा कमलनाल आदिसे उलटीका लाना. |
| हेतुव्याधिविपर्यस्तार्थकारी | जैसे अग्नि जलेपर गरम अगर लेप आदि अथवा विष पर विष. | जैसे मद्यपानके करनेसे प्रगट मदात्ययरोगमें मदकारक फिर मद्य पीना. | दंड कसरतसे प्रगट वातमें जलका तैरनारूप व्यायामका करना. |
हेतुविपरीत औषध-जैसे शीतकफज्वरमें सोंठ, तो इसमें प्रथम समझना चाहिये
कि, यहां हेतु कौन है कि, सर्दी उसका शीतल धर्म है तो अब शीत कफ यह
कब शान्त होय कि, जब सर्दी और कफसे विपरीत औषध मिले ऐसी औषध कौन
कि, शुंठी यह सर्दीको और कफ दोनोंको शान्त करती है तो शीतकफज्वरमें हेतुविपरीत