माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
( ३६४ ) माधवनिदान ।
( ३६४ ) माधवनिदान ।
उनके काटनेके सामान्य लक्षण ।
ताभिर्दष्टे दंशकोथः प्रवृत्तिः क्षतजस्य च ।
ज्वरो दाहोऽतिसारश्च गदाः स्युश्च त्रिदोषजाः ॥ ३८ ॥
पिडिका विविधाकारा मण्डलानि महांति च ।
शोथा महान्तो मृदवो रक्तश्यावाश्चलास्तथा ॥
सामान्यं सर्वलूतानामेतद्दंशस्य लक्षणम् ॥३९॥
उन मकडियोंके काटनेसे वह स्थान सडे और उसमेंसे रुधिर बहे, ज्वर, दाह
अतिसार और त्रिदोषज तथा अनेक प्रकारके फोडे, बडे बडे चकत्ते नरम लाल
काली नीली और चञ्चल ऐसी सूजन होय इत्यादि लक्षण होते हैं, इस प्रकार सब
लूताओंके सामान्य लक्षण जानने ॥
दूषीविषलूताके काटनेके लक्षण ।
दंशमध्ये तु यत्कृष्णं श्यावं वा जालकावृतम् ॥ ४० ॥
ऊर्ध्वाकृति भृशं पाकं क्लेदकोथज्वरान्वितम् ।
दूषीविषाभिर्लूताभिस्तं दष्टमिति निर्दिशेत् ॥ ४१ ॥
जिस दंशका मध्यभाग काला अथवा नीला अथवा हरा तथा जालके सदृश
ऊंचा होकर शीघ्र पके तथा उसमेंसे दुर्गन्धयुक्त लस बहे, उसमें ज्वर होय उसको
दूषीविष अथवा लूताका काटा हुआ जानना ।
प्राणहरलूताके लक्षण ।
सर्पाणामेव विण्मूत्रशवकोथसमुद्भवाः ।
दूषीविषाः प्राणहरा इति संक्षेपतो मताः ॥ ४२ ॥
शोथाः श्वेताऽसिता रक्ताः पीताः सपिडिका ज्वराः ।
प्राणान्तिकाभिर्जायन्ते दाहहिक्काशिरोग्रहाः ॥ ४३॥
सर्पोंके मलमूत्रसे अथवा मरे हुए सर्पके सडजानेसे जो दूषीविषके कीडे उत्पन्न
होयँ वे प्राण हरनेवाले होते हैं, उनका काटा हुआ स्थान सूज जावे तथा वह सफेद
काला लाल पीला होय और फुन्सी हो जायँ और रोगीको ज्वर आवे, दाह होय,
हिचकी आवे, मस्तकमें शूल होय ॥
दूषीविषाखुलक्षण ।
आदंशाच्छोणितं पाण्डु मण्डलानि ज्वरोऽरुचिः ।
लोमहर्षश्च दाहश्चाप्याखुदूषीविषार्दिते ॥ ४४ ॥
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भाषाटीकासमेत । ( ३६५ )
विषैले आखु ( मूसे ) के काटनेसे पीला रुधिर निकले, देहमें गोल चकत्ते
उठें, ज्वर होय, अरुचि होय, रोमांच और दाह होय, ये मूसेके काटनेके
विषपीडित मनुष्यके लक्षण हैं ॥
प्राणहरमूषकविषके लक्षण ।
मूर्च्छाऽङ्गशोथो वैवर्ण्यं क्लेदो मन्दश्रुतिर्ज्वरः ।
शिरोगुरुत्वं लालासृक्छर्दिश्वासाध्यमूषकैः ॥ ४५ ॥
जिस मूसेके काटनेसे मूर्च्छा, मूसेके आकार सूजन, देहमें विवर्णता, क्लेद, मन्द
सुनाई दे, ज्वर, मस्तक भारी, लार और रुधिर इनकी रद होय ये लक्षण प्राणहर्त्ता
मूसेके असाध्य हैं ॥
कृकलास ( सरट ) के काटेके लक्षण ।
कार्ष्ण्यं श्यावत्वमथवा नानावर्णत्वमेव च ।
व्यामोहो वर्चसो भेदो दष्टे स्यात्कृकलासकैः ॥ ४६ ॥
सरटके काटनेसे देहका वर्ण काला अथवा नीला हरा तथा अनेक प्रकारका होय
तथा उस रोगीको भ्रांति और अतिसार होय ॥
वृश्चिकविषके लक्षण ।
दहत्यग्निरिवाऽदौ तु भिनत्तीवोर्ध्वमाशु वै ।
वृश्चिकस्य विषं याति पश्चाद्दंशेऽवतिष्ठति ॥ ४७ ॥
बिच्छूके काटनेसे उस स्थानमें प्रथम अग्निसी चले पीछे ऊपरको चढे पीछे
काटनेकी जगह फटनेकीसी पीडा होय ॥ अब कहते हैं कि, विच्छू मन्दविष, मध्य-
विष, महाविषके भेदसे तीन प्रकारका है । तिनमें जो गौके गोबरसे प्रगट होय वह
मन्दविष हैं और काठ ईंट इनसे प्रगट होय वह मध्यविष हैं और जो सर्पकी सडी
देहसे प्रगट होय वह अथवा अन्य विषवाली वस्तुओंसे प्रगट होय वह विच्छू महा-
विषवाला होता है, मन्दविषवाले बारह प्रकारके हैं और मध्यविषवाले तीन प्रकारके
हैं और महाविषवाले पंद्रह प्रकारके हैं, ऐसे सब मिलकर तीस प्रकारके बिच्छू हैं ।
कोई आचार्य २७ प्रकारके कहते हैं । कृष्ण, श्याव, कर्बुर ( विचित्रवर्ण ), पीत,
गोमूत्राभ, कर्कश, मेचक, श्वेत, लाल, रोमश, शाद्वलाभ, रक्त ये बारह मन्दवीर्य हैं,
इनके काटनेसे पीडा, कंप, देहका स्तंभ, काले रुधिरका निकलना इत्यादि रोग
होते हैं । रक्तोदर, पित्तोदर, कपिलोदर ये तीन मध्य विषवाले विच्छू हैं, इनके
काटनेसे जीभमें सूजन, भोजनका न होना, घोर मूर्च्छा ये लक्षण होते हैं। श्वेत, चित्र,
श्यामल, लोहिताभ, रक्त, श्वेत, रक्तोदर, नीलोदर, रक्त, पीत, नीलपीत, रक्तनील,
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