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माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

( ३२६ ) माधवनिदान ।

( ३२६ ) माधवनिदान ।
जो दोष ( कफ ) तीनों पटलोंमें रहे वह नक्तांध्य ( रतौंध ) उत्पन्न करे वह
कफ दिवस ( दिन ) में सूर्यके तेजसे कम होनेसे दीखे ॥
धूमदर्शीके लक्षण ।
शोकज्वरायासशिरोऽभितापैरभ्याहता यस्य नरस्य दृष्टिः ।
धूम्रांस्तथा पश्यति सर्वभावान्स धूमदर्शीति नरः प्रदिष्टः ॥ ६१ ॥
शोक, ज्वर, परिश्रम और मस्तकताप इन कारणोंसे पित्त कुपित होकर जिसकी
दृष्टिमें विकार होवे उससे उस मनुष्यको सर्व पदार्थ धूएँके रंगके दीखें, इस रोगको
धूमदर्शी वा शोकविदग्धदृष्टि कहते हैं, इसमें दिनको धूएँके रंगके पदार्थ दीखें, इसका
कारण यह है कि, रात्रिमें पित्तका तेज घटनेसे निर्मल दीखे ॥
ह्रस्वदृष्टिके लक्षण ।
यो ह्रस्वजाड्यो दिवसेषु कृच्छ्राद्
ह्रस्वानि रूपाणि च तेन पश्येत् ॥ ६२ ॥
जो ह्रस्वजाड्य पुरुष होता है उसको दिनमें बडे पदार्थ छोटे दीखें इसका कारण
यह है कि उस समय दृष्टिके मध्यगत दोष होता है, यह रोग भी पित्तजन्य है॥
नकुलांध्यके लक्षण ।
विद्योतते यस्य नरस्य दृष्टिर्दोषामिपन्ना नकुलस्य यद्वत् ।
चित्राणि रूपाणि दिवा स पश्येतस वै विकारो नकुलांध्यसंज्ञः॥६३॥
जिस पुरुषकी दृष्टि दोषोंसे व्याप्त होकर नैलेकी दृष्टिके समान चमके वह पुरुष
दिनमें अनेक प्रकारके रूप देखे, इस विकारको नकुलांध्य कहते हैं ॥
गम्भीरदृष्टिके लक्षण ।
दृष्टिर्विरूपा श्वसनोपसृष्टा संकोचमभ्यंतरतश्च याति ।
रुजावगाढं च तमक्षिरोगं गम्भीरिकेति प्रवदंति तज्ज्ञाः ॥ ६४ ॥
जो दृष्टि वायुसे विकृत होंकर भीतरको संकुचित होवे तथा उसमें पीडा होवे,
उसको गम्भीरदृष्टि कहते हैं ॥
आगन्तुज लिंगनाशके लक्षण ।
बाह्यो पुनर्द्विविह संप्रदिष्टौ निमित्ततश्चाप्यनिमित्ततश्च ।
निमित्ततस्तत्र शिरोऽभितापाज्ज्ञेयस्त्वभिष्यंदनिदर्शनः सः ॥६५॥
CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

भाषाटीकासमेत । ( ३२७ )
अभिघातज लिंगनाश दो प्रकारका है-एक निमित्तजन्य, दूसरा अनिमित्तजन्य,
तिनमें शिरोभितापकरके ( विषवृक्षके फलसे मिले पवनका मस्तकमें स्पर्श होनेसे )
होय उसको निमित्तजन्य कहते हैं, इसमें रक्ताभिष्यंदके लक्षण होते हैं ॥
अनिमित्तके लक्षण ।
सुरर्षिगंधर्वमहोरगाणां सन्दर्शनेनापि च भास्करस्य ।
हन्येत दृष्टिर्मनुजस्य यस्य स लिंगनाशस्त्वनिमित्तसंज्ञः ॥
तत्राक्षि विस्पष्टमिवावभाति वैदूर्यवर्णा विमला च दृष्टिः ॥ ६६ ॥
देव, ऋषि, गंधर्व, महासर्प और सूर्य इनके संमुख दृष्टिको लगाकर ( टकटकी
लगाकर ) देखनेसे जिस मनुष्यकी दृष्टि नष्ट होय, उसको अनिमित्तलिंगनाश कहते
हैं, इस रोगमें नेत्र स्वच्छ दीखते हैं और दृष्टि वैदूर्यमणिके समान स्वच्छ कहिये
श्यामवर्ण होय । अब कहते हैं कि, देवादिक भौतिक इन्द्रियोंको नहीं बिगाड़ें, परन्तु
उनकी शक्तिका नाश करते हैं, सो चरकमें लिखा है ॥
अर्मरोग ५ प्रकारका है ।
प्रस्तार्यर्म तनु स्तीर्णं श्यावं रक्तनिभं सिते ।
सश्वेतं मृदु शुक्रार्म शुक्रे तद्वर्द्धते चिरात् ॥ ६७ ॥
पद्माभं मृदु रक्तार्म यन्मांसं चीयते सिते ।
पृथु मृद्धधिमांसार्म बहलं च यकृन्निभम् ।
स्थिरं प्रस्तारि मांसाढ्यं शुष्कं स्नाव्यर्म पंचमम् ॥ ६८ ॥
नेत्रोंके सफेद भागमें पतला विस्तीर्ण श्यामवर्ण तथा लाल ऐसा जो मांस बढ़े
उसको प्रस्तारि अर्मरोग कहते हैं । शुक्लभागमें सफेद मृदुमांस बहुत दिनमें बढ़े
उसको शुक्रार्म कहते हैं । कमलके समान लाल तथा मृदु मांस जो बढ़े उसको रक्तार्म
कहते हैं । जो मांस विस्तीर्ण स्थूल कलेजाके समान ( कुछ काला लाल ) दीखे
उसको अधिमांसार्म कहते हैं । जो कठिन तथा फैलनेवाले स्त्रावरहित मांस बढ़े,
उसको स्नाव्यर्म कहते हैं । विदेहने कहा भी है ॥
१ देवादयोऽष्टौ हि महाप्रभावा न दूषयेयुः पुरुषस्य देहम् । विशंत्यदृश्यास्तरसा यथैव
च्छाया तयोर्द्पणसूर्यकांतौ ॥ २ प्रस्तारिणोऽर्मणः स्रावं निरुणद्धि यथाऽनिलः । विना स्रावं
विशुष्यं यत्स्नाव्यर्मेतीति तद्विदः ॥