माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
( ३१४ ) माधवनिदान ।
( ३१४ ) माधवनिदान ।
कुपित हुए वातादि दोष नेत्रोंकी नसोंमें प्राप्त हो नेत्रोंका भाग व्याप्त करनेसे
उनमें भयंकर रोग उत्पन्न होता है, ये वात पित्त कफ रुधिर सन्निपात और आगन्तुक
इनसे होनेवाले ऐसे नेत्ररोग ( ७६ ) हैं ॥
नेत्ररोगमें प्रायः अभिष्यंद ( नेत्र आना ) होता है इसीसे प्रथम उसको कहते हैं-
वातात्पित्तात्कफाद्रक्तादभिष्यन्दश्चतुर्विधः ।
प्रायेण जायते घोरः सर्वनेत्रामयाकरः ॥ ५ ॥
वात पित्त कफ और रुधिर इनसे चार प्रकारका अभिष्यन्दरोग होता है।
इसकी पीडा नष्ट नहीं होय तथा यह अभिष्यन्दरोग सर्व नेत्ररोगों ( अधिमंथादिक ) का
उत्पत्तिस्थान जानना । सो सुश्रुतमें लिखा है । ( इस रोगको भाषामें नेत्र दुखना
कहते हैं अथवा आंखआई कहते हैं ) ॥
वाताभिष्यन्दके लक्षण ।
निस्तोदनस्तम्भनरोमहर्षसङ्घर्षपारुष्यशिरोभितापाः ।
विशुष्कभावः शिशिराश्रुता च वाताभिपन्ने नयने भवन्ति ॥ ६ ॥
वादीसे नेत्र दुखने आये होयं उनमें सुई चुभानेकीसी पीडा हो, नेत्रोंके स्तम्भन
( ठहरजाना ), रोमांच नेत्रोंमें रेत गिरनेके समान खटके तथा रूक्ष होय, मस्तकमें पीडा
हो, नेत्रोंसे पानी गिरे परन्तु नेत्र सूखेसे रहें और नेत्रोंसे आँसू गिरे वह शीतल हो ॥
पित्ताभिष्यन्दके लक्षण ।
दाहप्रपाकौ शिशिराभिनन्दा धूमायनं बाष्पसमुच्छ्रयश्च ।
उष्णाश्रुता पीतकनेत्रता च पित्ताभिपन्ने नयने भवन्ति ॥ ७ ॥
पित्तसे नेत्र दुखने आनेसे उनमें बहुत दाह हो, नेत्र पकजायँ, उनमें शीतल पदार्थ
लगानेकी इच्छा हो, नेत्रोंसे धूआं निकले अथवा नेत्रोंमें धूआं जानेकीसी पीडा हो,
तथा नेत्रोंसे गरम अश्रु ( आंसू ) बहुत पडें, आंख पीलीसी मालूम पडें ॥
कफजाभिष्यन्दके लक्षण ।
उष्णाभिनन्दा गुरुताभिशोथः कण्डूपदेहावतिशीतता च ।
स्रावो बहुः पिच्छिल एव चापि कफाभिपन्ने नयने भवन्ति ॥ ८ ॥
कफसे नेत्र दुखने आये हों उसको गरम वस्तु नेत्रोंमें लगानेसे आराम मालूम
हो अर्थात् नेत्रमें सेकसा मालूम हो तथा नेत्र भारी होयँ, सूजन हो, खुजली चले,
कीचडसे नेत्र दूषित हों, शीतल हों उनमेंसे स्राव होय, सो गाढा और बहुत होय ॥
१ प्रायेण सर्वे नयनामयास्ते भवन्त्यभिष्यन्दनिमित्तमूलाः । इति ॥
भाषाटीकासमेत । ( ३१५ )
रक्ताभिष्यन्दके लक्षण ।
ताम्राश्रुता लोहितनेत्रता च राज्यः समन्तादतिलोहिताश्च ।
पित्तस्य लिङ्गानि च यानि तानि रक्ताभिपन्ने नयने भवन्ति ॥ ९ ॥
रक्ताभिष्यन्दसे नेत्रोंसे लाल पानी गिरे, नेत्र लाल होंय, नेत्रोंमें आस पास
रेखासी लाललाल दीखे, जो पित्ताभिष्यन्दके लक्षण कहे वे सब लक्षण होवें ॥
अभिष्यन्दसे अधिमन्थकी उत्पत्ति होती है, सो कहते हैं-
वृद्धैरेतैरभिष्यन्दैर्नराणामक्रियावताम् ।
तावन्तस्त्वधिमन्थाः स्युर्नयने तीव्रवेदनाः ॥ १० ॥
इस अभिष्यन्दमें औषधोपचार न करनेसे यह बढकर उतनेही ( चार ) अभि-
ष्यन्दरोग नेत्रोंमें प्रगट होंयँ, इससे नेत्रोंमें तीव्र पीडा होय, यह अधिमन्थके सामान्य
लक्षण हैं । वेदनाशब्द इस जगह व्यथामात्रका वाचक है, इससे यह प्रगट हुआ
कि, वातके अभिष्यन्दसे वातिक अधिमन्थ प्रगट होय, उसमें तीव्र वातज सर्व
निस्तोदादि पीडा युक्त होंयँ, इसी प्रकार पित्तकेसे, कफकेसे, रुधिरकेसे पित्त कफ-
रुधिरके अधिमन्थ स्वलक्षण करके जानने ॥
उत्पाट्यत इवात्यर्थं नेत्रं निर्मथ्यते तथा ।
शिरसोऽर्धं च तं विद्यादधिमन्थं स्वलक्षणैः ॥ ११ ॥
दूसरे सामान्य लक्षण-आधे शिरमें उपाडनेकीसी पीडा होय अथवा तोडनेकीसी
तथा मथनेकीसी पीडा होय, व्याधिके प्रभावसे आधे शिरमें पीडा हो इसे अधिमन्थ
कहते हैं इनके लक्षण वातज अभिष्यन्दके समान जानने ॥
दोषभेदसे कालमर्यादाके लक्षण ।
हन्याद्दृष्टिं श्लैष्मिकः सप्तरात्राद्योऽधीमन्थो रक्तजः पंचरात्रात् ।
षड्रात्राद्वा वातिको वै निहन्यान्मिथ्याचारात्पैत्तिकः सद्य एव ॥ १२॥
कफका अधिमन्थ सात दिनमें दृष्टिका नाश करे, रक्तज अधिमन्थ पांच दिनमें,
वातिक अधिमन्थ छः ।दिनमें और पैत्तिक अधिमन्थ मिथ्योपचारसे तत्काल ( तीन
दिनमें ) दृष्टिका नाशकरे अर्थात् आंख जाती रहे । इस जगह जो कालकी अवधि
कही है सो व्याधिके स्वभावसे तथा लंघन प्रलेपादि क्रिया करके तथा अञ्जनानिषे-
धके निमित्त कहीं है ॥
नेत्ररोगके सामान्य लक्षण ।
उदीर्णवेदनं नेत्रं रागोद्रेकसमन्वितम् ।
घर्षनिस्तोदशूलाश्रुयुक्तमामान्वितं विदुः ॥ १३ ॥
CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA