माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
( ३० ) माधवनिदान ।
( ३० ) माधवनिदान ।
८ कर्णक ।
प्रलापः श्रुतिह्रासकण्ठग्रहाङ्गव्यथाश्वासकासप्रसेकप्रभावम् ।
ज्वरं तापकर्णान्तयोर्गल्लपीडा बुधाः कर्णकं कष्टसाध्यं वदन्ति ॥८॥
अनर्थभाषण करे, बहरा हो जावे, कण्ठमें दर्द होय, अंगोंमें पीडा, श्वास, कास,
पसीना, लारका गिरना, ज्वर, सन्ताप, कर्णके मूल और गाल इनमें पीडा जिसमें
ये लक्षण हों उसको पण्डित कष्टसाध्य ( कर्णक ) सन्निपात कहते हैं ॥
९ भुग्ननेत्र ।
ज्वरबलापचयः स्मृतिशून्यता श्वसनभुग्नविलोचनमोहितः ।
प्रलपनभ्रमकंपनशोफगांस्त्यजति जीवितमाशु स भुग्नदृक् ॥ ९॥
ज्वर, बलका नाश, स्मृतिनाश, श्वास, टेढी दृष्टि, बेहोशी, अनर्थ भाषण, भ्रम,
कंप और सूजन ये लक्षण ( भुग्ननेत्र ) सन्निपातके हैं । यह रोगी जल्दी मरता है ॥
१० रक्तष्ठीवी ।
रक्तष्ठीवी ज्वरवमितृषामोहशूलातिसारा हिक्काध्मानभ्रमणद्-
वथुश्वाससंज्ञाप्रणाशाः । श्यामा रक्ता भवति मण्डलो-
त्थानरूपा रक्तष्ठीवी निगदित इह प्राणहन्ता प्रसिद्धः ॥१०॥
रक्तकी उलटी करे, ज्वर, वमन, तृषा, मूर्च्छा, शूल, अतीसार, हिचकी, अफरा,
भौंरेका आना, सन्ताप, श्वास, संज्ञानाश, काली और लाल जीभ, देहमें रुधिरके
विकारसे चकत्ते जिसमें ये लक्षण हों उसको ( रक्तष्ठीवी ) सन्निपात कहते हैं । यह
प्राणनाशक प्रसिद्ध है ॥
११ प्रलापक ।
कम्पप्रलापपरितापनशीर्षपीडाप्रौढप्रभावपवमानपरोऽन्यचिन्ता ।
प्रज्ञाप्रणाशविकलप्रचुरप्रवादः क्षिप्रं प्रयाति पितृपालपदं प्रलापी ११
कंप, बड़बड़ाना, सन्ताप, शिरमें पीडा इनका विशेष जोर हो, पवित्रतामें आसक्त'
दूसरेकी चिन्ता करे, बुद्धिका नाश हो, विकल और बहुत बकवाद करे ऐसा यह
( प्रलापक ) सन्निपात है । इस सन्निपातवाला रोगी यमराजके पुरको पधारे ॥
१२ जिह्वक ।
श्वसनकासपरितापविह्वलः कठिनकण्टकपरीतजिह्वकः ।
बधिरमूकबलहानिलक्षणो भवति कष्टतरसाध्यजिह्वकः ॥ १२ ॥
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भाषाटीकासमेत । ( ३१ )
श्वास, खांसी, सन्ताप, विह्वल, कठोर और कांटोंसे व्याप्त ऐसी जीभ, बहरा ,
गूंगा और बलकी हानि इन लक्षणोंसे संयुक्त ऐसा यह ( जिह्वक ) सन्निपात
कष्टसाध्य है ॥
१३ अभिन्यास ।
दोषत्रयस्निग्धमुखत्वनिद्रावैकल्यनिश्चेष्टनकष्टवाग्मी ।
बलप्रणाशः श्वसनादिनिग्रहोऽभिन्यास उक्तो ननु मृत्युकल्पः॥१३॥
त्रिदोषोंके कोपके समान मुखपर चिकनापन, निद्रा, बेकली, चेष्टाहीन हो,
कष्टसे बोले, बलनाश, श्वासादिकोंका रुकना ये लक्षण ( अभिन्यास ) सन्निपातमें
होते हैं, यह महाअसाध्य मृत्युके तुल्य है ॥
सन्निपातोपद्रव ।
सन्निपातज्वरस्यान्ते कर्णमूले सुदारुणः ।
शोथः संजायते तेन कश्चिदेव प्रमुच्यते ॥ १४ ॥
ज्वरस्य पूर्वं ज्वरमध्यतो वा ज्वरान्ततो वा श्रुतिमूलशोथः ।
क्रमादसाध्यः खलु कष्टसाध्यः सुखेन साध्यो मुनिभिः प्रदिष्टः॥१५॥
सन्निपातज्वर शांत होनेके पीछे कानकी जडमें दारुण सूजन पैदा होती है उस
सूजनसे कोई रोगी बचे है प्रायः यह मारही डाले है । यदि यह सूजन ज्वरके
पहिले होवे तो असाध्य है, ज्वरके मध्यमें होय तो कष्टसाध्य है और ज्वरके अंतमें
होय तो सुखसाध्य है ऐसा मुनीश्वरोंने कहा है ॥
सद्यस्त्रिपंचसप्ताहाद्दशाहाद्द्वादशादपि ।
एकविंशाद्दिनैः शुद्धः सन्निपाती सुजीवति ॥ १६ ॥
सन्निपात हुए पर तत्काल तीन पांच सात दश और बारह दिनमें इक्कीस दिन-
तक सन्निपातवाला रोगी शुद्ध होकर जीवे हैं ॥
त्रिदोषज्वराकी साधारण मर्यादा ।
सप्तमी द्विगुणा यावन्नवम्येकादशी तथा ।
एषा त्रिदोषमर्यादा मोक्षाय च वधाय च ॥ १७ ॥
पित्तकफानिलवृद्धया दशदिवसद्वादशाहसप्ताहात् ।
हन्ति विमुञ्चति पुरुषं त्रिदोषजो धातुमलपाकात् ॥ १८ ॥
१-सप्तमे दिवसे प्राप्ते दशमे द्वादशेऽपि वा । पुनर्घोरतरो भूत्वा प्रशमं याति हन्ति वा ॥ इति ।