माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
( २८८ ) माधवनिदान ।
( २८८ ) माधवनिदान ।
कण्डूयनात्ततः क्षिप्रं स्फोटाः स्रावश्च जायते ।
प्राहुर्वृषणकच्छूं तां श्लेष्मरक्तप्रकोपजाम् ॥ ५३ ॥
जो मनुष्य स्नान करते समय लगेहुए मलको नहीं धोवे, उस पुरुषका मल
अण्डकोशोंमें सञ्चित होय पीछे वह पसीना आनेसे गीला होय तब अण्डकोशोंमें
घोर पीडा होय और खुजानेसे तत्काल फोडा होय, पीछे वह फोडा स्रवकर आप-
समें मिलजाते हैं, कफरक्तसे होनेवाली इस व्याधिको वृषणकच्छू कहते हैं ॥
गुदभ्रंशके लक्षण ।
प्रवाहणातिसाराभ्यां निर्गच्छति गुदं बहिः ।
रूक्षदुर्बलदेहस्य गुदभ्रंशं तमादिशेत् ॥ ५४ ॥
जिस पुरुषका देह रूक्ष और अशक्त होय, उस पुरुषके प्रवाहण (कुन्थन) तथा
अतीसार हेतुकरके गुदा बाहर निकल आवे, अर्थात् कांच बाहर निकल आवे उस
रोगको गुदभ्रंश रोग कहते हैं, इस रोगमें धातुक्षय होनेसे वात कुपित होय है ॥
सूकरदंष्ट्रके लक्षण ।
सदाहो रक्तपर्यन्तस्त्वक्पाकी तीव्रवेदनः ।
कण्डूमाञ्ज्वरकारी च स स्याच्छूकरदंष्ट्रकः ॥ ५५ ॥
दाहयुक्त चारों ओर लाल होय, जिसकी त्वचा पकनेवाली होय, तीव्र पीडायुक्त,
खुजली संयुक्त तथा ज्वर करनेवाली ऐसी सूजन अथवा व्रण होय उसको सूकरदंष्ट्र
अर्थात् वराहदाढ कहते हैं ॥
इति श्रीपंडितदत्तराममाथुरनिर्मितमाधवार्थबोधिनीमाथुरीभाषाटीकायां
क्षुद्ररोगनिदानं समाप्तम् ॥
अथ मुखरोगनिदानम् ।
संख्या ।
दन्तेष्वष्टावोष्ठयोश्च मूलेषु दश पंच च ।
नव तालुनि जिह्वायां पंच सप्तदशामयाः ॥
कंठे त्रयः सर्वसरा एकषष्टिचतुःपरे ॥ १ ॥
दन्तरोग ८, होठके रोग ८, दन्तमूलके रोग १५, तालूके रोग ९, जिह्वाके ५,
कण्ठके रोग १७, और सर्वसर ३ ऐसे सब मिलकर पैंसठ ६५ मुखरोग हैं, “ये श्लोक
माधवके नहीं हैं भोजसंहिताके हैं” ॥
CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
भाषाटीकासमेत । ( २८९ )
तिनमें ८ होठके रोगोंकी संप्राप्ति ।
अनूपपिशितक्षीरदधिमाषादिसेवनात् ।
मुखमध्ये गदान्कुर्युः क्रुद्धा दोषाः कफोत्तराः ॥ २ ॥
जलसंचारी प्राणियोंके मांस, दूध, दही, उड़द् आदि पदार्थोंके सेवन करनेसे
कुपित भये कफादिक दोष मुखमें रोग उत्पन्न करते हैं ॥
वातिक ओष्ठरोगके लक्षण ।
कर्कशौ परुषौ स्तब्धौ कृष्णौ तीव्ररुजान्वितौ ।
दाल्येते परिपाट्येते ओष्ठौ मारुतकोपत: ॥ ३ ॥
वादीके कोपसे होठ कर्कश, खरदरे, कठोर और काले होते हैं उनमें तीव्र पीडा
होय व दो टुकडोंके समान होजाय तथा होठकी त्वचा किंचित् फटजाय ॥
पैत्तिकके लक्षण ।
चीयते पिडिकाभिस्तु सरुजाभिः समन्ततः ।
सदाहपाकपिडिकौ पीतभासौ च पित्ततः ॥ ४ ॥
पित्तसे होठ चारों ओर फुन्सियोंसे व्याप्त हों, उनमें पीडा होय तथा पकजावे
और पीलेसे दीखें इसमें जो दाह और पाक कहे हैं सो विशेषताके सूचक हैं ॥
श्लैष्मिकके लक्षण ।
सवर्णाभिस्तु चीयेते पिडिकाभिरवेदनौ ।
भवतस्तु कफादोष्ठौ पिच्छिलौ शीतलौ गुरु ॥ ५ ॥
कफसे होठ त्वचाके समान वर्णवाली फुन्सियोंसे व्याप्त हों, कुछ दूखें, तथा
मलाईके समान और शीतल तथा भारी हों ॥
सान्निपातिकके लक्षण ।
सकृत्कृष्णौ सकृत्पीतौ सकृच्छ्वेतौ तथैव च ।
सन्निपातेन विज्ञेयावनेकापिडिकान्वितौ ॥ ६ ॥
सन्निपातसे होठ कभी काले, कभी पीले, उसी प्रकार कभी सफेद तथा अनेक
प्रकारकी फुन्सियोंसे व्याप्त होयें ॥
रक्तजके लक्षण ।
खर्जूरफलवर्णाभिः पिडिकाभिर्निपीडितौ ।
रक्तोपसृष्टौ रुधिरं स्रवतः शोणितप्रभौ ॥ ७ ॥
CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA