माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
( २२२ ) माधवनिदान ।
( २२२ ) माधवनिदान ।
जो श्लीपद कफकारक आहार विहारसे प्रगट भया तथा कफप्रकृतिवाले पुरुषके
कफसे प्रगट भया होय, तथा स्रावयुक्त तथा जिस दोषसे प्रगट भया होय उस
दोषके लक्षण उसमें बढ़ गये होयँ, जिसमें खुजली बहुत होय और कफयुक्त होय
सो श्लीपदरोगी वैद्यकरके त्याज्य है ॥
इति श्रीपण्डितदत्ताराममाथुरानिर्मितमाधवार्थबोधिनीमाथुरीभाषाटीकायां
श्लीपदनिदानं समाप्तम् ॥
अथ विद्रधिनिदानम् ।
त्वग्रक्तमांसमेदांसि प्रदुष्यास्थिसमाश्रिताः ।
दोषाः शोथं शनैर्घोरं जनयन्त्युच्छ्रिता भृशम् ॥ १ ॥
महाशूलं रुजावन्तं वृत्तं वाप्यथवायतम् ।
स विद्रधिरिति ख्यातो विज्ञेयः षड्विधश्च सः ॥ २ ॥
पृथग्दोषैः समस्तैश्च क्षतेनाप्यसृजा तथा ।
षण्णामपि हि तेषां तु लक्षणं संप्रचक्षते ॥ ३ ॥
अत्यन्त बढ़े तथा अस्थि ( हड्डी ) का आश्रय करके रहनेवाले वातादिदोष त्वचा,
रुधिर, मांस और मेद इनको दुष्ट कर धीरे धीरे भयंकर शोथ उत्पन्न करे, उसकी जड
हड्डीपर्यन्त पहुँच जाय, उत्पत्तिकालमें अत्यंत पीडाकारक तथा गोल अथवा लंबा
जो शोथ ( सूजन ) होय उसको विद्रधि कहते हैं पृथक् दोषोंसे ३, सन्निपातसे १,
क्षत ( घाव ) से १ और रुधिरसे १ मिलकर छः प्रकारकी विद्रधि होय हैं, उन
छःहों विद्रधिके लक्षण कहते हैं ॥
वातजविद्रधिके लक्षण ।
कृष्णोऽरुणो वा विषमो भृशमत्यर्थवेदनः ।
चित्रोत्थानप्रपाकश्च विद्रधिर्वातसंभवः ॥ ४ ॥
जो विद्रधि काली लाल विषम कहिये कदाचित् छोटी कदाचित् मोटी हो
अत्यन्त वेदनायुक्त और उसका प्रगट होना तथा पाक ये नाना प्रकारके होयँ
उसको वातविद्रधि कहते हैं ॥
पित्तकी विद्रधिके लक्षण ।
पक्वोदुम्बरसंकाशः श्यावो वा ज्वरदाहवान् ।
क्षिप्रोत्थानप्रपाकश्च विद्रधिः पित्तसंभवः ॥ ५ ॥
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भाषाटीकासमेत । (२२३)
पित्तकी विद्रधि पके गूलरके समान होय, अथवा काला वर्ण होय, ज्वर, दाह-
करनेवाली प्रगट होय और उसका पाक शीघ्र होय ॥
कफकी विद्रधिके लक्षण ।
शरावसदृशः पाण्डुः शीतः स्निग्धोऽल्पवेदनः ।
चिरोत्थानप्रपाकश्च विद्रधिः कफसंभवः ॥ ६ ॥
कफकी विद्रधि शराव (मिट्टीके शराव) सदृश बडी होय, पीला वर्ण, शीतल,
चिकनी, अल्पपीडा होय, उसकी उत्पत्ति और पाक देरमें होय है ॥
पकनेके अनन्तर उनका स्राव ।
तनुपीतसिताश्चैषामास्रावाः क्रमशः स्मृताः ।
ये तीन प्रकार विद्रधि पकनेके अनन्तर होते हैं। इनसे वातादिकोंके क्रमसे
अर्थात् वातसे पतली, पित्तसे पीली, कफसे सफेद राध निकलती है ॥
सन्निपातकी विद्रधिका लक्षण ।
नानावर्णरुजा स्रावो घाटालो विषमो महान् ।
विषमं पच्यते चापि विद्रधिः सान्निपातिकः ॥ ७ ॥
सन्निपातकी विद्रधिमें अनेक प्रकारका वर्ण काला पीला आदि अनेक प्रकारका
पीडा, जैसे तोद, दाह, खुजली, पीडा तथा अनेक प्रकारकी स्राव जैसे पतला पीला
सफेद स्राव होय 'घाताल' कहिये नीचे स्थूल होय और ऊपर पतली होय अर्थात्
अग्रभाग अति ऊंचा होय, छोटी बडी कदाचित् पके कदाचित् नहीं पके ऐसी होय॥
आगन्तुजविद्रधिकी सम्प्राप्ति ।
तैस्तैर्भावैरभिहते क्षते वाऽपथ्यकारिणः ।
क्षतोष्मावायुविसृतः सरक्तं पित्तमीरयेत् ॥ ८ ॥
ज्वरस्तृष्णा च दाहश्च जायते तस्य देहिनः ।
आगन्तुर्विद्रधिर्ज्ञेयः पित्तविद्रधिलक्षणः ॥ ९ ॥
तिन तिन भाव कहिये लकडी पत्थर ढेला आदिका अभिघात (चोट लगना
पिच जाना इत्यादि) होनेसे, अथवा तलवार, तीर बरछी इत्यादिके लगनेसे,
घाव होजानेसे, अपथ्य करनेवाले पुरुषके कुपित वायुकरके विस्तृत (फैला)
क्षतोष्मा (घावकी गरमी) और रुधिरसहित पित्तको कोप करे, उस पुरुषके ज्वर,
प्यास और दाह होयँ और उसमें पित्तकी विद्रधिके लक्षण मिलते हों इनको आगं-
तुज विद्रधि जाननी ॥