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माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

( १९० ) माधवनिदान ।

( १९० ) माधवनिदान ।
दूष्यत्व साध्य ) का हेतु होय है । पित्तकी छः प्रमेह विषम चिकित्सा करनेसे याप्य
होय हैं अर्थात् पित्त हरण करनेवाले जो शीत मधुर आदि द्रव्य वह मेदको बढाने-
वाले हैं और मेद हरणकर्त्ता उष्ण कटुकादि द्रव्य वह पित्तकर्त्ता है ऐसी क्रिया
विषम है। वादीसे प्रगट चार प्रमेह मज्जादि गम्भीर धातुके आकर्षण करनेसे
अत्यन्त पीडा कर्त्ता है और इनकी ( महात्यय ) बडी कठिन क्रिया है । कोई कोई
चकारसे विषमक्रिया ही कहते हैं इसीसे ये चार असाध्य हैं ॥
प्रमेहका दोषदूष्यसंग्रह ।
कफः सपित्तं पवनश्च दोषा मेदोऽस्रशुक्राम्बुवसालसीकाः ।
मज्जारसौजः पिशितं च दूष्याः प्रमेहिनां विंशतिरेव मेहाः ॥ ४ ॥
कफ पित्त और वादी ये दोष और मेद रुधिर शुक्र जल मांस स्नेह ( चर्बी)
लसीका ( मांसका जल ) मज्जारस ओज और मांस ये दूष्य जानने । इन दोष और
दूष्य दोनोंसे बीस प्रकारके प्रमेह होते हैं ॥
प्रमेहका पूर्वरूप ।
दन्तादीनां मलाढ्यत्वं प्राग्रूपं पाणिपादयोः ।
दाहश्चिक्कणता देहे तृट्श्वासश्चोपजायते ॥ ५ ॥
दांतोंमें आदिशब्दसे जिह्वा तालु आदिका ग्रहण जानना इनमें मैल बहुत रहे,
हाथ पैरमें दाह, अङ्गका चिकनापना, प्यास, श्वास, चकारसे केशों ( बालों ) का
आपसमें लिपट जाना और नखोंका बढना ये प्रमेहके पूर्वरूप होते हैं ॥
सामान्य लक्षण ।
सामान्यं लक्षणं तेषां प्रभूताविलमूत्रता ॥ ६ ॥
बहुत और गाढा मूत्र उतरे ये प्रमेहके सामान्य लक्षण हैं।
प्रमेहके कारण ।
दोषदूष्यविशेषेऽपि तत्संयोगविशेषतः ।
मूत्रवर्णादिभेदेन भेदो मेहेषु कल्प्यते ॥ ७ ॥
दोष और दूष्य इनके भेद न होनेसे परन्तु दोष और दूष्य इनके संयोगभेदसे
मूत्र वर्णादि भेद करके प्रमेहमें भेद होते हैं । दश छः चार इत्यादिक दोष ( वात
पित्त कफ ) दूष्य ( मांस मेद मज्जादि ) जैसे सफेद पीला काला तांबेके रंगका और
श्याम इन पांच रंगोंके संयोग करनेसे पिंगल पाटलादि अनेक वर्णभेद होते हैं इसी
प्रकार दोषादिकोंके संयोगसे नानाप्रकारके प्रमेह होते हैं ॥
१ यत्तु मांसत्वगन्तरे उदकं तल्लसीकासञ्ज्ञं लभते ।

भाषाटीकासमेत । ( १९१ )
संयोग भेदकी कैसे प्रतीति हो ऐसे कोई पूछे तो उसके वास्ते कहते हैं-मूत्रके
वर्णादिभेदसे समान कारणोंके भेद कल्पना करने चाहिये जैसे-घट (घडा) बनानेके
समय मृत्तिकादि कारण सामग्रीमें भेद नहीं है परन्तु कुम्भकारादि (कुम्हार आदि)
प्रयत्नभेद करके घडा सरवा मटकना आदि अनेक जातिभेद हो जाते हैं और यह तो
तत्तत् (उन उन) आहारादिकोंका जो अदृष्ट फल है वेही संयोगभेदके हेतु हैं ॥
कफकी १० प्रमेहके लक्षण ।
अच्छं बहु सितं शीतं निर्गन्धमुदकोपमम् । मेहत्युदकमेहेन
किंचिदाविलपिच्छिलम् ॥ ८ ॥ इक्षो रसमिवात्यर्थं मधुरं चेक्षु-
मेहतः। सान्द्रीभवेत्पर्युषितं सान्द्रमेहेन मेहति ॥९॥ सुरामेही
सुरातुल्यमुपर्यच्छमधो घनम् । संहृष्टरोमा पिष्टेन पिष्टवद्ब-
हुलं सितम्॥१०॥ शुक्राभं शुक्रमिश्रं वा शुक्रमेही प्रमेहति ।
मूत्राणूसिकतामेही सिकतारूपिणो मलान्॥११॥ शीतमेही
सुबहुशो मधुरं भृशशीतलम् । शनैः शनैः शनैर्मेही मन्दं मन्दं
प्रमेहति ॥ लालातन्तुयुतं मूत्रं लालामेहेन पिच्छिलम् ॥ १२ ॥
१-उदकप्रमेहकरके स्वच्छ बहुत सफेद शीतल गन्धरहित पानीके समान कुछ
गाढा और चिकना मूते है। २-इक्षुप्रमेहसे ईखके रससमान अत्यन्त मीठा ऐसा
मूत्र होय । ३-सांद्रप्रमेहसे रात्रिमें पात्रमें धरनेसे जैसा होवे ऐसा मूत्र होय । ४-सुरा-
प्रमेहसे-दारूके समान ऊपर निर्मल और नीचे गाढा ऐसा मूते । ५-पिष्टप्रमेहसे
पिसे चावलोंके पानीसमान सफेद और बहुत मूते तथा मूतते समय रोमांच होय ।
६-शुक्रप्रमेहसे शुक्र (वीर्य) के समान अथवा शुक्रमिला मूत्र होय । ७-सिकता-
मेहसे मूत्रके कण और बालूरेतके समान मलके रवा गिरे । ८-शीतमेहसे मधुर तथा
अत्यन्त शीतल ऐसा बारबार बहुत मूते । ९-शनैर्मेहसे धीरे २ और मन्द मन्द
मूते । १०-लालाप्रमेहसे लारके समान तारयुक्त और चिकना मूत्र होय है ॥
पित्तकी ६ प्रमेहकं लक्षण ।
गन्धवर्णरसस्पर्शैः क्षारेण क्षारतोयवत् ॥ १३ ॥ नीलमेहेन
नीलाभं कालमेही मषीनिभम् । हारिद्रमेही कटुकं हरिद्रा-
सन्निभं दहेत् ॥ १४ ॥ विस्रं माञ्जिष्ठमेहेन मञ्जिष्ठासलिलोप-
मम् । विस्रमुष्णं सलवणं रक्ताभं रक्तमेहतः ॥ १५ ॥
११-क्षारप्रमेहसे खारी जलके समान गन्ध वर्ण रस और स्पर्श ऐसा मूत्र होता
है । १२-नीलप्रमेहसे नीले रंगका अर्थात् पपैया पक्षीके पंखके सदृश मूते ।