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माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

( १३२ ) माधवनिदान ।

( १३२ ) माधवनिदान ।
पूर्वमदके लक्षण ।
बुद्धिस्मृतिप्रीतिकरः सुखश्च पानान्ननिद्रारतिवर्धनश्च ।
संपाठगीतस्वरवर्धनश्च प्रोक्तोऽतिरम्यः प्रथमो मदो हि ॥ ६ ॥
बुद्धि, स्मरण और प्रीति इनको करे, सुख करे, पान ( पीना ), अन्न, निद्रा
और रति इनको बढावे, सुन्दर पाठ और गीत गानेको बढावे, ऐसा प्रथम मद अति-
रमणीय कहा है । शंका-क्यों जी ! मद तो मनमें विकार उत्पन्न करे है फिर
आप इनको रमणीय कैसे कहते हो ? उत्तर-आपने कहा सो ठीक है परन्तु
दुःखको दूर करनेसे इनको रमणीयता है, इसी कारण सुश्रुतने हर्षको मनके
विकारोंमें कहा है ॥
द्वितीय मदके लक्षण ।
अव्यक्तबुद्धिस्मृतिवाग्विचेष्टः सोन्मत्तलीलाकृतिरप्रशान्तः ।
आलस्यनिद्राभिहतो मुहुश्च मध्येन मत्तः पुरुषो मदेन ॥ ७ ॥
मध्यम मदसे मतवाले पुरुषकी बुद्धि स्मरण और वाणी यथार्थ नहीं होय
विरुद्ध चेष्टा करे और बावलेकीसी चेष्टा करे, प्रचण्ड हो जाय, बारंबार आलसक
और निद्रासे पीडित हो जाय ॥
तृतीय मदके लक्षण ।
गच्छेदगम्यां न गुरू॑श्च पश्येत्खादेदभक्ष्याणि च नष्टसंज्ञः ।
ब्रूयाच्च गुह्यानि हृदि स्थितानि मदे तृतीये पुरुषोऽस्वतन्त्रः ॥ ८ ॥
तीसरे मदसे पुरुष मदके अधीन होकर अगम्या (गुरुकी स्त्री आदिसे) गमन
करे, बडोंका तिरस्कार करे, जो वस्तु खानेके योग्य नहीं हैं उनको खाय, संज्ञा
जाती रहे और जो गुप्तवात हृदयमें हैं उनको कहने लगे ॥
चतुर्थ मदके लक्षण ।
चतुर्थे तु मदे मूढो भग्नदार्विव निष्क्रियः ।
कार्याकार्यविभागाज्ञो मृतादप्यपरो मृतः ॥ ९ ॥
को मदं तादृशं गच्छेदुन्मादमिव चापरम् ।
बहुदोषमिवारूढः कान्तारं स्ववशः कृती ॥ १० ॥
चतुर्थ मदसे मनुष्य मूढ होकर टूटे वृक्षके समान क्रियारहित होय, कार्य ( करने
योग्य ) अकार्य ( नहीं करने योग्य ) इनको न समझे वह पुरुष मरेसे भी अधिक
CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

भाषाटीकासमेत । ( १२३ )
भरा भया है कौन ऐसा स्ववश अथवा सुकृती पुरुष ऐसे निंद्य मद (अमल) का
सहनशील होता है किन्तु कोई नहीं होता. कैसे कि, सिंह व्याघ्रादि हिंसक पशु जिस
वनमें बहुत हैं ऐसे निर्जन वनमें मार्गमें कौन चतुर मनुष्य जायगा। शंका-चरक
विदेह वाग्भट आदि आचार्योंने तो चतुर्थमद कहा ही नहीं है और सुश्रुतने
कहा है इनमें विरोध क्यों है ? उत्तर-चरकमें जो दूसरे और तीसरेमें अन्तर
कहा है सोही सुश्रुतने तृतीय मदको मानकर उसके लक्षण कहे हैं और जो चरकमें
तृतीय मदके लक्षण कहे हैं, सो सुश्रुतने चतुर्थ मदके लक्षण कहे हैं। ऐसे विरोध
नहीं हैं, वास्तवमें तीनही मद हैं। शंका- योंजी ! एकमदसे तीन प्रकारके मद
होते हैं इसमें क्या कारण है ? उत्तर-मद्य यह अग्निके समान है जैसे अग्निमें सुवर्ण
( सोना ) तपानेसे, उत्तम मध्यम अधमकी परीक्षा होती है ऐसे ही मद्य भी
सत्त्वगुण, रजोगुण, तमोगुणवाले पुरुषोंकी प्रकृतिसूचक है अर्थात् सत्त्वगुणवाले
पुरुषको प्रथम मद, रजोगुणवाले पुरुषको दूसरा मद, तमोगुणवाले पुरुषको तीसरा
मद प्राप्त होता है। सो चरकमें लिखा है ॥
विधिहीन मद्यसेवनसे और विकार होते हैं उनको कहते हैं-
निर्भुक्तमेकान्तत एव मद्यं निषेव्यमाणं मनुजेन नित्यम् ।
आपादयेत्कष्टमान्विकारानापादयेच्चापि शरीरभेदम् ॥ ११ ॥
जिस पुरुषने अन्नरहित निरन्तर मद्यपान नित्य करा होय वह अत्यन्त दुःख-
दायक विकार (पानात्ययादिक) उत्पन्न करे है और शरीरका विनाश करे है ॥
अन्नके साथ मद्य सेवन करा भया भी क्रुद्धादिकारणोंसे
विकारकर्त्ता होता है, सो कहते हैं--
क्रुद्धेन भीतेन पिपासितेन शोकाभितप्तेन बुभुक्षितेन ।
व्यायामभाराध्वपरिक्षतेन वेगावरोधाभिहतेन चापि ॥ १२ ॥
अत्यम्लभक्ष्यावततोदरेण साजीर्णभुक्तेन तथाऽबलेन ।
उष्णाभितप्तेन च सेव्यमानं करोति मद्यं विविधान्विकारान् १३॥
क्रोधयुक्त, भयसे पीडित, प्यास, शोकवान्, क्षुधायुक्त, दंड कसरत और भारसे
जो क्षीण हो गया होय, मलमूत्रादि वेगसे पीडित हो, अत्यन्त अम्लरस खानेसे
जिसका पेट भरा रहा हो, अजीर्णमें भोजन करनेवाले पुरुषके निर्बल पुरुषके गरमीसे
तपायमान ऐसे मनुष्यके मद्य सेवन करनेसे अनेक विकार उत्पन्न होते हैं ॥
१ प्रधानावरमध्यानां रुक्माणां व्यक्तिदर्शकः। यथाग्निरेवं सत्त्वानां मद्यं प्रकृतिदर्शकम् ॥