माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
( ११२ ) माधवनिदान ।
( ११२ ) माधवनिदान ।
क्रमसे कहता हूं। इनमें पहिली चार तृष्णा सुखसाध्य हैं और बाकीकी तीन कष्ट-
साध्य हैं। शंका-क्योंजी ! इस श्लोकमें- “स्रोतःसु” यह बहुवचन क्यों धरा यह
विरुद्ध है, क्योंकि, सुश्रुतमें तो जलके बहनेवाली दोही नाडी मानी हैं। उत्तर-उद-
कके बहानेवाले दो स्रोतोंकाही अनेक विस्तार होनेसे बहुवचन किया है। यहांपर
अन्न, कफ आमको दुष्ट करनेसे तथा दुष्ट रोगोंको सम्बन्ध होनेसे अन्न, आम,
कफको दोषत्व ग्रहण है यह गयदासका मत है अथवा दोषके कहनेसे वात, पित्त,
कफका ही ग्रहण करना चाहिये ॥
वातकी तृषाके लक्षण ।
क्षामास्यता मारुतसंभवायां तोदस्तथा शंखशिरःसु चापि ।
स्रोतोविरोधो विरसं च वक्त्रं शीताभिरद्भिश्च विवृद्धिमेति ॥ ३ ॥
वातकी तृषा (प्यास) से मुख उतर जाय अथवा दीन होय, कनपटी और
मस्तक इन ठिकाने नोचनेके समान पीडा होय, रस और जल बहनेवाली नाडि-
योंका मार्ग रुक जाय, मुखसे स्वाद जाता रहे और शीतल जलके पीनेसे प्यास
बढे, चकारसे निद्राका नाश होय ॥
पित्तकी तृषाके लक्षण ।
मूर्च्छान्नविद्वेषविलापदाहा रक्तेक्षणत्वं प्रततश्च शोषः ।
शीताभिनन्दा मुखतिक्तता च पित्तात्मिकायां परिदूयनं च ॥ ४ ॥
पित्तकी तृषामें मूर्च्छा, अन्नमें अरुचि, बडबड, दाह, नेत्रोंमें लाली, अत्यन्त
शोष, शीत पदार्थकी इच्छा, मुखमें कटुता और सन्ताप ये लक्षण होते हैं ॥
कफकी तृषाके लक्षण ।
बाष्पावरोधात्कफसंवृतेऽग्नौ तृष्णाबलासेन भवेत्तथा तु ।
निद्रा गुरुत्वं मधुरास्यता च तृष्णार्दितः शुष्यति चातिमात्रम् ॥५॥
अपने कारणसे कुपित कफ करके जठराग्नि आच्छादित होय तब अग्निकी
गरमी अधोगत जलके बहनेवाली नाडियोंको सुखाय कफकी तृषाको प्रगट करें
केवल कफसे तृष्णाका प्रगट होना असंभव है, केवल कफ बढे भयेका द्रवीभूत
धर्म पतला होनेसे प्यासकर्तृत्व असंभव है और वातपित्तको तृषा करनेवाले
होनेसे होय हैं सो ग्रन्थान्तरमें लिखा भी है इसीसे चरकाचार्यने कफकी तृष्णा
१ द्वे उदकवहे इति । २ यदुक्तम्-‘पित्तं सवातं कुपितं नराणाम्’ इत्यादि । चरकेऽप्युक्तम्-
‘नोऽग्नेर्विना सर्पणाद्वा तौ हि शोषणे हेतुः’ इति । सुश्रुतेऽप्युक्तम्–मन्दस्याग्नेयवायव्यौ गुणाब-
म्बुवहानि च । स्रोतांसि शोषयेद्यस्मात्ततस्तृष्णा प्रवर्तते ॥
भाषाटीकासमेत । ( ११३ )
नहीं कही, सुश्रुतने चिकित्सा में भेद होनेसे कही है और हारीतने भी सपित्त कफकी
तृष्णा मानी केवल कफकी नहीं मानी । इस तृष्णामें निद्रा, भारीपना, मुखमें मिठास
ये लक्षण होते हैं । इस तृष्णासे पीडित पुरुष अत्यन्त सूख जाता है ॥
क्षतजतृष्णाके लक्षण ।
क्षतस्य रुक्शोणितनिर्गमाभ्यां तृष्णा चतुर्थी क्षतजा मता तु ॥ ६ ॥
शस्त्रादिकके लगनेसे घाव होय तब उस पुरुषके पीडा और रुधिरका स्राव होनेसे
जो तृष्णा होय यह चौथी क्षतजतृष्णा जाननी ॥
क्षयजतृष्णाके लक्षण ।
रसक्षयाद्या क्षयसंभवा सा तयाभिभूतस्तु निशादिनेषु ।
पेपीयतेऽम्भः स सुखं न याति तां सन्निपातादिति केचिदाहुः ।
रसक्षयोक्तानि च लक्षणानि तस्यामशेषेण भिषग्व्यवस्येत् ॥ ७ ॥
रसक्षयसे जो तृष्णा होय उसमें जो लक्षण होते हैं सो क्षयज तृष्णामें होते हैं,
तिससे पीडित पुरुष रात्रिदिन बारम्बार पानी पीवे परन्तु सन्तोष नहीं होय । कोई
आचार्य इसको सन्निपातसे प्रगट कहते हैं रसक्षयके जो लक्षण कहे वे सब होते हैं
सो वैद्योंको जानने चाहिये । रसक्षय लक्षण सुश्रुतमें कहे हैं सो इस प्रकारका रसक्षय
होनेसे हृदयमें पीडा, कंप, शोष, बाधिरता ( बहरापना ) और प्यास होती है ॥
आमजतृष्णाके लक्षण ।
त्रिदोषलिङ्गामसमुद्भवा तु हृच्छूलनिष्ठीवनसादकर्त्री ॥ ८ ॥
आमज कहिये अजीर्णसे जो तृष्णा होय उसमें तीनों दोषोंके लक्षण होते हैं सो
सुश्रुतमें लिखा भी है और हृदयमें शूल, लारका गिरना, ग्लानि ये सब होते हैं ॥
अन्नजतृष्णाके लक्षण ।
स्निग्धं तथाम्लं लवणं च भुक्तं गुर्वन्नमेवाशु तृषां करोति ।
१ तदुक्तं हारीतेन-स्वाद्वम्ललवणाजीर्णैः क्रुद्धः श्लेष्मा सहोष्मणा । प्रपद्याम्बुवहां स्रोतस्तृष्णां
संजनयेन्नृणाम् ॥ शिरसो गौरवं तन्द्रा माधुर्यं वदनस्य च । भक्तद्वेषः प्रसेकश्च निद्राधिक्यं
तथैव च ॥ लिङ्गैरैतैर्विजानीयात्तृष्णां कफसमुद्भवाम् ॥ २ रसक्षये हृत्पीडा कंपशोषौ बाधि-
रता तृष्णा चेति ॥ ३ अजीर्णात्पवनादीनां विभ्रमो बलवान्भवेत् । इति । सततं यः पिबे-
त्तोयं न तृप्तिमधिगच्छति । पुनः काङ्क्षति तोयं च तं तृष्णार्दितमादिशेत् ॥ इति ॥