माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
( १० ) माधवनिदान ।
( १० ) माधवनिदान ।
कालरूपसंप्राप्तिके लक्षण ।
नक्तंदिनर्तुभुक्तांशैर्व्याधिकालो यथामलम् ॥ १३ ॥
नक्त ( रात्री ) दिन ( दिवस ) ऋतु ( वसन्तादि ) भुक्त ( आहार ) इनका
अंश कहिये एकदेश उसको यथादोष ( वात, पित्त, कफ ) के अनुसार व्याधिका
काल अर्थात् रोगके घटने बढनेके हेतुका समय जाने । उदाहरण-दिखाते हैं जैसे-
रात्रिके तीन भाग करे प्रथम, मध्य और अन्त्य; ता रात्रिका प्रथमभाग कफका है,
मध्यभाग पित्तका, अन्त्यभाग वातका है। ऐसेही दिनके भी तीन भाग करे तो
पूर्वाह्न कफका, मध्याह्न पित्तका, अपराह्न वातका है। ऐसे ही ऋतु जैसे वसंत-
ऋतुमें कफ, शरदऋतुमें पित्त और वर्षामें वात कुपित होता है । ऐसे ही भोजनका
जैसे भोजन करनेके समय कफका काल और अन्नके पचनेके समय पित्तका काल
और जब भले प्रकार परिपक्व होगया तब वातका काल. इसके जाननेसे यह
प्रयोजन है कि जिसे दोष ( वात, पित्त, कफ ) का जो काल कहा है उसका उसी
उसी कालमें जान लेना कठिन मालूम नहीं होता ॥
निदानपंचकका उपसंहार ।
इति प्रोक्तो निदानार्थः स व्यासेनोपदेक्ष्यते ॥ १४ ॥
इति कहिये यह संक्षेप प्रकारसे जो निदानार्थ कहा उसे विस्तारपूर्वक प्रतिरोगके
निदान पूर्वरूपादि करके कहेंगे ॥
सर्वेषामेव रोगाणां निदानं कुपिता मलाः ।
तत्प्रकोपस्य तु प्रोक्तं विविधाहितसेवनम् ॥ १५ ॥
अब पूर्व चतुर्थ श्लोककी व्याख्यामें कहे निदानके दो भेद कौन संनिकृष्ट और
विप्रकृष्ट, तिसमें संनिकृष्ट कौन वातादिक समीपके कारण करके सर्व रोगोंका कारण
हैं सो कहते हैं- “सर्वेषामिति” कुपित भये जो मल ( वात, पित्त, कफ )
ये सम्पूर्ण रोगोंके कारण होते हैं और उन वात, पित्त, कफ दोषोंके कोपका कारण
अनेक प्रकारका जो अपथ्यसेवन करना ही है ॥
निदानार्थकरो रोगो रोगस्याप्युपजायते ।
तद्यथा ज्वरसन्तापाद्रक्तपित्तमुदीर्यते ॥ १६ ॥
१ केचन ऋत्वंशाः कतिपयाहोरात्राणि कथयंति । यदुक्तं वाग्भटे-“ऋतवोरित्यादि सप्ताहा-
वृतुसन्धिरिति स्मृतः । ” २ यदाह चरकः-“ नास्ति रोगो विना दोषैर्यस्मात्तस्माद्विचक्षणः ।
अनुक्तमपि दोषाणां लिंगैर्व्याधिमुपाचरेत् ॥” मलिनीकरणान्मला वातपित्तकफाः ॥
भाषाटीकासमेत । ( ११ )
रक्तपित्ताज्ज्वरस्ताभ्यां श्वासश्चाप्युपजायते ।
प्लीहाभिवृद्ध्या जठरं जठराच्छोफ एव च ॥ १७ ॥
अर्शोभ्यो जाठरं दुःखं गुल्मश्चाप्युपजायते ।
( दिवास्वापादिदोषैश्च प्रतिश्यायश्च जायते । )
प्रतिश्यायादथो कासः कासात्संजायते क्षयः ॥ १८ ॥
क्षयो रोगस्य हेतुत्वे शोषस्याप्युपजायते ।
कोई प्रश्न करे कि, जो पूर्व कह आये हैं यह ही निदान है अथवा इसके व्यति-
रिक्त और, इसलिये कहते हैं रोगका रोग भी निदान होता है अर्थात् जो निदानसे
कार्य होता है वह ही रोगसे भी होता है. इसवास्ते दृष्टांत देकर कहते हैं-“तद्यथेति”
जैसे ज्वरसन्तापसे रक्तपित्त प्रगट होता है और रक्तपित्तसे ज्वर और रक्तपित्त-
ज्वरसे श्वास प्रगट होता है और प्लीहाके बढनेसे जैसे उदररोग और उदररोगसे
सूजन और बवासीरसे जैसे उदररोग और गुल्म ( गोला ) रोग, दिनमें सोने आदि-
कोंसे जुकाम होता है और जुकामसे खांसी तथा खांसीसे ओजप्रभृति धातुओंका क्षय
होता है, यह क्षयरोग ( राजयक्ष्मा ) सम्पूर्ण रोगोंमें राजा है इसको प्रगट करते हैं ॥
ते पूर्वं केवला रोगाः पश्चाद्धेत्वर्थकारिणः ॥ १९ ॥
वे रोग प्रथम स्वतन्त्र होते हैं और पीछे जब बल मिलगया तो वेही हेत्वर्थकारी
अर्थात् रोगके उत्पन्न करनेवाले होते हैं जैसे ज्वरसे रक्तपित्त होता है ॥
कश्चिद्धि रोगो रोगस्य हेतुर्भूत्वा प्रशाम्यति ।
न प्रशाम्यति चाप्यन्यो हेत्वर्थं कुरुतेऽपि च ॥
एवं कृच्छ्रतमा नृणां दृश्यन्ते व्याधिसङ्कराः ॥ २० ॥
अब उसी रोग उत्पन्न करनेवाली व्याधिकी विचित्रता दिखाते हैं, जैसे कोई
एक रोग दूसरेका कारण हो अर्थात् दूसरे रोगको प्रगट कर आप शांत हो जाता
है जैसे ज्वरके सन्तापसे रक्तपित्त होता है उस समय ज्वर दूर होजाय और रक्त-
पित्त रह जावे और कोई रोग दूसरे रोगको प्रगट कर आप जैसाका तैसा बना
रहता है जैसे बवासीर नहीं जाय और गुल्म तथा उदररोग पैदा होते हैं । इस प्रकार
मनुष्योंके घोर क्लेशदायक मिलेहुए रोग देखनेमें आते हैं । विशेष करके चिकित्सा
विरुद्ध होनेसे ये रोग कृच्छ्रतम होते हैं ॥
CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA