माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
( ८६ ) माधवनिदान ।
( ८६ ) माधवनिदान ।
और जिसमें पूर्वोक्त ( कहे ) श्वासकासादि विकार युक्त हों ऐसा रक्तपित्त वर्जित है
और जो रक्तपित्त इन्द्रधनुषके वर्ण समान रंगवाला हो सो भी त्याज्य है अर्थात्
ऐसे रक्तपित्तकी वैद्य चिकित्सा न करे ॥
दूसरे असाध्य लक्षण ।
येन चोपहतो रक्तं रक्तपित्तेन मानवः ।
पश्येद दृश्यं वियच्चापि तच्चासाध्यमसंशयम् ॥ १४ ॥
जिस रक्तपित्तने मनुष्यको ग्रस लिया होय वह दृश्य ( घटपटादि ) और वियत
( आकाश ) इनको रक्तवर्णका देखे वह रोगी निःसन्देह असाध्य जानना ॥
लोहितं छर्दयेद्यस्तु बहुशो लोहितेक्षणः ।
लोहितोद्गारदर्शी च म्रियते रक्तपैत्तिकः ॥ १५ ॥
दूसरे असाध्य लक्षण-जो वारंवार रुधिरकी वमन करे और जिसके लाल नेत्र
होयँ तथा डकार भी लाल आवे वह रक्तपित्तवाला रोगी मरजावे ॥
इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरप्रणीतमाधवार्थदीपिकामाथुरीभाषा-
टीकायां रक्तपित्तनिदानं समाप्तम् ॥
अथ राजयक्ष्मनिदानम् ।
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वेगरोधात् क्षयाच्चैव साहसाद्विषमाशनात् ।
त्रिदोषो जायते यक्ष्मा गदो हेतुचतुष्टयात् ॥ १ ॥
वात, मूत्र, पुरीष आदि वेगोंके रोकनेसे, अतिमैथुन, उपवास, ईर्ष्या, खेद
इत्यादिक धातुक्षयके कारणोंसे, बलवान्से वैर करनेसे, विषमाशन कहिये कुस-
मय थोडा अथवा बहुत भोजन करनेसे इन चार कारणोंसे तीनों दोषोंके कोपसे
मनुष्यके राजयक्ष्मा रोग होता है । वेगका रोकना ही वातकोपका कारण है, यह
सत्य है तथापि वातकोपसे अग्नि दुष्ट होकर कफपित्तका कोप होता है, इन चार
हेतुओंमें असंख्य हेतुओंका अन्तर्भाव होता है. रसादि धातुओंके शोषणे (सुखाने) से
इस रोगको ( शोष ) कहते हैं तथा शरीरमें पाचनादि सर्व क्रियाओंको
क्षय करे है इसीसे इस रोगको ( क्षय ) कहते हैं और राजा ( चन्द्र ) इस
रोगसे अतिपीडित भया इसीसे इसको ( राजयक्ष्मा ) कहते हैं । यह सुश्रुतका
१ संशोषणाद्रसादीनां शोष इत्यभिधीयते । क्रियाक्षयकरत्वाच्च क्षय इत्युच्यते पुनः ॥
राज्ञश्चन्द्रमसो यस्मादभूदेष किलामयः । तस्मात्तं राजयक्ष्मेति केचिदाहुर्मनीषिणः ॥ इति ॥
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भाषाटीकासमेत । ( ८७ )
आशय है और वाग्भटने इसको सर्व रोगोंका राजा कहा है इसीसे इसको
राजयक्ष्मा नाम कहा है । इस श्लोकमें जो कहा है कि, त्रिदोषका एक ही यक्ष्मा
रोग प्रगट होता है उसका तात्पर्य यह है कि, तीनों दोषोंके कारणभेदसे अनेक
प्रकारका नहीं है सो सुश्रुतमें कहा भी है और इस श्लोकमें “वेगरोधात्” इस पदमें
केवल वात, मूत्र, मल इनका ही ग्रहण करना चाहिये, श्रमादिक सबोंका ग्रहण नहीं
है, सो चरकमें लिखा है ॥
राजयक्ष्माकी विशिष्टसंप्राप्ति ।
कफप्रधानैर्दोषैस्तु रुद्धेषु रसवर्त्मसु ।
अतिव्यवायिनो वापि क्षीणे रेतस्यनन्तराः ॥
क्षीयन्ते धातवः सर्वे ततः शुष्यति मानवः ॥ २ ॥
कफ है प्रधान जिनमें ऐसे जो वातादि दोष तिन करके रसके बहनेवाली नाडि-
योंके मार्ग रुक जानेसे (इससे यह सूचना करी कि, रसमार्ग बन्द होनेसे हृदयमें
स्थित जो रस उसको बिगाड और उसी स्थानमें विकृति कहिये और प्रकारका
स्वरूप करके खांसीके वेगसे मुखमार्ग होकर निकाले) सो चरकमें लिखा भी है ।
(इससे अनुलोमक्षयं दिखाय अब प्रतिलोमक्षय कैसा होता है उसको कहते हैं-)
अथवा अतिमैथुन करनेसे मनुष्यका वीर्य क्षीण होता है, जब शुक्र क्षीण होजाय
तब समीपकी धातु क्षीण होयं तब पुरुष सूखने लगता है, जैसे शुक्र क्षीणके अनन्तर
मज्जा क्षीण होय, मज्जा क्षीणके अनन्तर हड्डी क्षीण होयं ऐसे पूर्वपूर्व धातु क्षीण हो
जायं । शंका--क्यों जी ! रस, रुधिर, मांस, मेदा, हड्डी, मज्जा, शुक्र इनमें क्रमसे
प्रत्येक क्षीण होनेसे शुक्रका क्षय होना उचित है, परन्तु कार्यभूत शुक्रका क्षय
होनेसे कारणभूत धातुओंका नाश कैसे होता है ? उत्तर--जब शुक्रका क्षय होता है
तब वात कुपित होता है, सो तन्त्रान्तरोंमें लिखा है अर्थात् धातुके नष्ट होनेसे पवनको
बहनेवाली नाडियोंका मार्ग बन्द होकर वायुको कुपित करे तब वही पवन समीपकी
मज्जा धातुको सुखावे तदनंतर हड्डी और उसके पश्चात् मेदा इसी रीतिसे रसपर्यंत
धातुओंको सुखावे है, इस जगहपर दृष्टान्त है-जैसे अग्निमें तपायभया लोहका गोला
गीली पृथ्वीमें धरनेसे प्रथम समीपकी पृथ्वीके आर्द्रपनेको शोषण करे पीछे दूरका
गीलापन शोषण करे उसी रीतिसे यहां जानना चाहिये ॥
१ “एक एव मतः शोषः स.त्रिपातात्मको यतः । उद्रेकात्तत्र लिंगानि दोषाणां निर्मितानि हि॥”
इति । २ “ह्रीमत्त्वाद्वा घृणित्वाद्वा भयाद्वा वेगमागतम् । वातमूत्रपुरीषाणां निगृह्णाति यदा नरः॥”
इत्यादि । ३ रससे रुधिर, रुधिरसे मांस, इसी रीतिसे शुक्रपर्यंत धातुओंका क्षय हो सो ।
४शुक्रसे रसपर्यंत धातुओंका शोष हो सो। ५ “वायोर्धातुक्षयात् कोपो मार्गस्यावरणेन च” इति॥