माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
( ३७२ ) माधवनिदानका परिशिष्ट ।
( ३७२ ) माधवनिदानका परिशिष्ट ।
दुष्ट रुधिर निकले उसका लिंग अग्निसे दग्धके समान होजाय, मूत्राशय अंडकोश
ऊरुकी सन्धियोंमें घोर दाह और पीडा होय, कभी कभी गाढा और पीला स्राव होय,
सूजन मन्द और गीली होय, तथा थोडा स्राव होय देरमें पके, अथवा शीघ्रही पक
जावे, उसके लिंगमें कीडे पडजायँ, क्लेदयुक्त और दुर्गंध आवे, लिंगके ऊपरकी
सुपारी गलजाय, तथा लिंग और अंडकोश दोनों गलकर गिरजायँ, यह ध्वजभंग-
नपुंसकके लक्षण कहे हैं ॥
कोई सुश्रुतादिक आचार्य इस ध्वजभंग नपुंसकके ईर्ष्यक, सौगन्धिक, कुंभिक,
आसेक्य और महापंढ इन भेदोंसे पांच प्रकारका बतलाते हैं ॥ उनको भी प्रसंग-
बशसे इस जगह सुश्रुतसे लिखते हैं ।
तहां प्रथम आसेक्य नपुंसकके लक्षण ।
पित्रोरत्यल्पवीर्यत्वादासेक्यः पुरुषो भवेत् ।
स शुक्रं प्राश्य लभते ध्वजोच्छ्रायमसंशयम् ॥ १ ॥
मातापिताके अत्यल्पवीर्यसे जो गर्भ रहे वह पुरुष आसेक्यनाम नपुंसक होता है, वह
पुरुष अन्य पुरुषसे अपने मुखमें मैथुन कराकर उसके वीर्यको खा जाय तब उसको
चैतन्य अर्थात् लिंग सत्तर हो तब स्त्रीसे मैथुन करे इसका दूसरा नाम मुखयोनि है ॥
सौगन्धिकनपुंसकके लक्षण ।
यः पूतियोनौ जायेत स सौगन्धिकसंज्ञितः ।
स योनिशेफसोग्न्धमाघ्राय लभते बलम् ॥ २ ॥
जो पुरुष दुष्टयोनिसे उत्पन्न होय, उसको योनि तथा लिंगके सूंघनेसे चैतन्यता प्राप्ति
होय, उसको सौगंधिक कहते हैं, इसका दूसरा पर्यायवाची नाम नासायोनि है ॥
कुम्भिक नपुंसकके लक्षण ।
स्वगुदेऽब्रह्मचर्याद्यः स्त्रीषु पुंवत्प्रवर्तते। कुम्भिकः स तु विज्ञेयः-
जो पुरुष पहले अपनी गुदा भंजन करावे तब उसको चैतन्यता प्राप्त होय तब
स्त्रीके विषयपुरुषके समान प्रवृत्त होय, उसको कुम्भिक नपुंसक कहते हैं । कोई
आचार्य इसका और प्रकारसे अर्थ करते हैं अर्थात् जो पुरुष लोंडेबाजी करते हैं वे
प्रथम स्त्रीके पीछे बैठकर पशुके समान शिथिल लिंगसेही उसकी गुदाभंजन करें,
इस प्रकार करनेसे जब चैतन्यता प्राप्त होती है तब मैथुन करें, उसका नाम कुम्भिक
कहते हैं और गुदायोनी यह इसका पर्यायवाची नाम है। इसकी उत्पत्ति काश्यपने
इस प्रकार लिखी है कि, ऋतुकालमें अल्परजस्क स्त्रीसे श्लेष्म रेतवाले पुरुषके
सम्भोग करनेसे उस स्त्रीका कामदेव शान्त न हो इस कारण उस स्त्रीका मन अन्य
पुरुषसे सम्भोग करनेकी इच्छा करे तब उसको कुम्भिकनामक नपुंसक होता है ॥
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भाषाटीकासमेत । ( ३७३ )
ईर्ष्याकनपुंसकके लक्षण ।
-ईर्ष्यकं शृणु चापरम् ॥ ३ ॥
दृष्ट्वा व्यवायमन्येषाम् व्यवाये यः प्रवर्तते ।
ईर्ष्यकः स तु विज्ञेयो दृग्योनिरयमीर्ष्यकः ॥ ४ ॥
जो मनुष्य दूसरेको मैथुन करते देख आप मैथुन करे उसको ईर्ष्यक नपुंसक
कहते हैं। दूसरा पर्यायवाचक नाम दृग्योनि है। कोई 'दृग्योनिरयमीर्ष्यकः' इस
जगह 'षण्ढकं शृणु पञ्चमम्' ऐसा पाठ कहते हैं अर्थात् षण्ढक जो पञ्चम नपुंसक
उसके लक्षण सुन ॥
महाषण्ढनपुंसक लक्षण ।
यो भार्यायामृत्तौ मोहादंगनेव प्रवर्तते ।
ततः स्त्रीचेष्टिताकारो जायते षण्ढसंज्ञितः ॥ ५ ॥
जो पुरुष ऋतुकालमें मोहसे स्त्रीके सदृश प्रवृत्त होय अर्थात् आप नीचेसे सीधा
हो ऊपर स्त्रीको चढाकर मैथुन करे उससे जो गर्भ रहे वह पुरुष स्त्रीकीसी चेष्टा करे
और स्त्रीकी आकार होय, स्त्रीकी चेष्टा करे (आप स्त्रीके समान नीचे होकर अन्य
पुरुषसे अपने लिंगके ऊपर वीर्य पतन करावे) ॥
नारीषण्ढनपुंसकके लक्षण ।
ऋतौ पुरुषवद्वापि प्रवर्त्तेताङ्गना यदि ।
तत्र कन्या यदि भवेत्सा भवेन्नरचेष्टिता ॥ ६ ॥
ऋतुसमय यदि स्त्री पुरुषके सदृश प्रवृत्त होय अर्थात् पुरुषको नीचे सुलाय उसके
ऊपर चढ पुरुषके समान मैथुन करे, उस मैथुनसे जो कन्या प्रगट हो वह पुरुषकेसे
आकारवान् होय और पुरुषकीसी चेष्टा करे (अर्थात् स्वयं स्त्रीरूप भी होकर दूसरी
स्त्रीके ऊपर पुरुषके समान उसकी योनिसे अपनी योनि घर्षण करे) ये षण्ढनपुंसकके
दोनों भेद हैं। इससे पांच प्रकारके ही ध्वजभंग नपुंसक जानने परन्तु चरकके मतसे
नपुंसक स्त्री पुरुषके भेदसे दो प्रकारका है और जितने पुरुषके नपुंसक भेद हैं
उतनेही स्त्रीके जानने ॥
उक्त श्लोकोंका संग्रह ।
आसेक्यश्च सुगंधी च कुम्भिकश्चैर्ष्यकस्तथा ।
सरेतसस्त्वमी ज्ञेया अशुक्रः षण्ढसंज्ञितः ॥ ७ ॥
आसेक्य, सुगन्धी, कुंभिक और ईर्ष्यक ये चारों प्रकारके नपुंसक शुक्र (वीर्य)
सहित जानने और षण्ढसंज्ञक नपुंसकके वीर्य नहीं होता है वह वीर्यरहित जानना ॥
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