माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
( ३०० ) माधवनिदान ।
( ३०० ) माधवनिदान ।
शतघ्नीके लक्षण ।
वर्त्तिर्घना कण्ठनिरोधिनी या चिताऽतिमात्रं पिशितप्ररोहैः ।
अनेकरुक् प्राणहरी त्रिदोषा ज्ञेया शतघ्नी तु शताग्निरूपा ॥ ५२ ॥
कंठमें लम्बी और कठिन सूजन होयँ तथा उसमें तोद ( चोटनी ) दाह खुजली
आदि अनेक वेदना होयँ, यह प्राण हरनेवाली सूजनको शतघ्नी ( लंबे लंबे कांटे जिसमें
होयँ ऐसे शस्त्र अथवा तोप ) के समान होय इसीसे रोगको यह संज्ञा दी है ॥
गिलायुके लक्षण ।
ग्रन्थिर्गले त्वामलकास्थिमात्रः स्थिरोऽल्परुक्स्यात्कफरक्तमूर्तिः ।
संलक्ष्यते सक्तमिवाशनं च स शस्त्रसाध्यस्तु गिलायुसंज्ञः ॥ ५३ ॥
कफरक्तके कोपसे गलेमें आंवलेकी गुठलीके बराबर गांठ उत्पन्न होवे, वह गांठ
कठिन, मन्द पीडावाली हो, इसके होनेसे अन्न गलेमें अटकतासा मालूम देवे । यह
रोग शस्त्रके द्वारा अर्थात् शस्त्रसे काटनेसे साध्य होय इसको गिलायु कहते हैं ॥
गलविद्रधिके लक्षण ।
सर्वं गलं व्याप्य समुत्थितो यः शोथो रुजः सन्ति च यत्र सर्वाः ।
स सर्वदोषो गलविद्रधिस्तु तस्यैव तुल्यः खलु सर्वजस्य ॥ ५४ ॥
जो सूजन सब गलेमें व्याप्त होवे तथा जिसमें सर्व प्रकारकी पीडा होय वह
विद्रधिनिदानमें जो त्रिदोषकी विद्रधि कही है उसके समान गलविद्रधिके लक्षण जानना ॥
गलौघके लक्षण ।
शोथो महानन्नजलावरोधी तीव्रज्वरो वायुगतेर्निहन्ता ।
कफेन जातो रुधिरान्वितेन गले गलौघः परिकीर्त्यतेऽसौ ॥ ५५ ॥
रक्तयुक्त कफसे गलेमें भारी सूजन होय, उसके योगसे कण्ठमें अन्न जलका अव-
रोध ( रुकावट ) होय तथा वायुका संचार होय नहीं, इसको वैद्य गलौघ कहते हैं॥
स्वरघ्नके लक्षण ।
यस्ताम्यमानः श्वसिति प्रसक्तं भिन्नस्वरः शुष्कविमुक्तकण्ठः ।
कफोपदिग्धेष्त्वनिलायनेषु ज्ञेयः स रोगः श्वसनात्स्वरघ्नः ॥ ५६ ॥
वायुका मार्ग कफसे लिप्त होनेसे बारबार नेत्रोंके आगे अन्धकार आकर जो
पुरुष श्वासको छोडे अथवा मूर्च्छा आकर जिसकी श्वास निकले, जिसका भिन्न
स्वर होय, कण्ठ सूखे और ' विमुक्त ' कहिये कण्ठ स्वाधीन न हो अर्थात् थोडा भी
अन्न खाया हो तथापि कण्ठसे नीचे न उतरे, इस वातज रोगको स्वरघ्न कहते हैं ॥
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भाषाटीकासमेत । ( ३०१ )
मांसतानके लक्षण ।
प्रतानवान् यः श्वयथुः सुकष्टो गलोपरोधं कुरुते क्रमेण ।
स मांसतानेति बिभर्ति संज्ञां प्राणप्रणुत्सर्वकृतो विकारः ॥ ५७ ॥
जो सूजन गलेमें उत्पन्न होकर क्रमसे फैलकर गलेको रोक ले तब बहुत कष्ट
हो। इस त्रिदोष विकारको मांसतान कहते हैं । यह विकराल रोग प्राणोंका नाश
करनेवाला है ॥
विदारीके लक्षण ।
सदाहतोदं श्वयथुं सुतीव्रमन्तर्गले पूतिविशीर्णमांसम् ।
पित्तेन विद्याद्वदने विदारीं पार्श्वे विशेषात्स तु येन शेते ॥ ५८ ॥
पित्तसे गलेमें सूजन होवे तिस करके दाह होय, चबक होय, तथा दुर्गंधियुक्त
सड़ा मांस गिरे और रोगी जिस करवट सोवे उसी तरफ वह रोग होता है मांसके
विदारण करनेसे यह विदारी कहलाता है ॥
मुखपाक ।
सर्वसर ( मुखपाक मुख आना ) तीन प्रकारका है ।
वातजके लक्षण ।
स्फोटैः सतोदैर्वदनं समन्ताद्यस्याचितं सर्वसरः स वातात् ।
वादीके योगसे मुखमें सर्वत्र छाले होजायँ वह चिनमिनावें, मुख जिह्वा गला होंठ
मसूढे दांत तालु इन सबमें व्याधि होनेसे इस रोगको सर्वसर कहते हैं ॥
पित्तजके लक्षण ।
रक्तैः सदाहैः पिडकैः सपीतैैर्यस्याचितं चापि स पित्तकोपात् ॥५९॥
पित्तसे मुखमें लाल तथा पीले छाले होयँ और दाह होवे ॥
कफजके लक्षण ।
अवेदनैः कण्डुयुतैः सवर्णैर्यस्याचितं चापि स वै कफेन ॥ ६० ॥
कफसे मुखमें मन्दपीडा और त्वचाके समान वर्ण जिनका ऐसे छाले सर्वत्र होयँ॥
असाध्य मुखरोगके लक्षण ।
ओष्ठप्रकोपे वर्ज्याः स्युर्मांसरक्तप्रकोपजाः ।
दन्तमूलेषु वर्ज्यौ तु त्रिलिंगगतिशौषिरौ ॥ ६१ ॥
दन्तेषु न च सिध्यन्ति श्यावदालनभञ्जनाः ।
जिह्वागले बलासश्च तालव्येष्वर्बुदं तथा ॥ ६२ ॥
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