माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
(२९६) माधवनिदान ।
(२९६) माधवनिदान ।
उपजिह्वाके लक्षण ।
जिह्वाग्ररूपः श्वयथुर्हि जिह्वामुन्नम्य जातः कफरक्तमूर्तिः ।
लालाकरः कण्डुयुतः सचोषः सा तूपजिह्वा कथिता भिषग्भिः ३६
कफरुधिरसे जिह्वाग्रके समान (जैसा जीभका आगेका भाग होय है) ऐसी
सूजन जीभको नीची दबाकर उत्पन्न होय, उसके योगसे लार बहुत बहे और उसमें
खुजली चले, तथा दाह होय (दाह इसमें रक्तमें स्थान पित्तका है उसके होय है)
इस रोगको वैद्य उपजिह्वा रोग कहते हैं ॥
तालुगत ९ रोग ।
कण्ठशुण्डीके लक्षण ।
श्लेष्मासृग्भ्यां तालुमूलात्प्रवृद्धो दीर्घः शोथो ध्मातबस्तिप्रकाशः ।
तृष्णाकासश्वासकृत्तं वदन्ति व्याधिं वैद्याः कण्ठशुण्डीति नाम्ना ३७
कफरुधिरसे तालुके मूलमें फूली वस्तिके समान भारी सूजन होय, इसके प्रभा-
वसे प्यास, खांसी, श्वास ये होते हैं। इस रोगको वैद्य कण्ठशुंडी कहते हैं ॥
तुण्डिकेरीके लक्षण ।
शोथः शूलस्तोददाहप्रपाकी प्रागुक्ताभ्यां तुण्डिकेरी मता तु ।
कफरक्तसे तालुएमैं बनकपासके फलके समान सूजन होय और उसमें पीडा
सुईके छेदनेकासा दुःख और दाह होकर पके उसको तुंडिकेरी कहते हैं ॥
अधुषके लक्षण ।
शोथः स्तब्धो लोहितस्तालुदेशे रक्तो ज्ञेयः सोऽधुषो रुग्ज्वरश्च॥३८
रुधिरसे तालुएमैं लाल स्तब्ध (लठर) ऐसी सूजन होय, उसमें पीडा और ज्वर
होय, उसको अधुष कहते हैं ॥
कच्छपके लक्षण ।
कूर्म्मोत्सन्नोऽवेदनोऽशीघ्रजन्मा रोगो ज्ञेयः कच्छपः श्लेष्मणा वा ।
कफसे तालुएमैं कछुएकी पीठके समान ऊंची सूजन होय, उसमें पीडा थोडी
होय, देरसे प्रगट होनेवाला, वह शीघ्र बढे नहीं, उसको कच्छपरोग कहते हैं ॥
अर्बुदके लक्षण ।
पद्माकारं तालुमध्ये तु शोथं विद्याद्रक्तादर्बुदं प्रोक्तलिङ्गम्॥ ३९ ॥
रुधिरसे तालुएम कमलकी कर्णिकाके समान सूजन होय, इसके लक्षण अर्बुद
निदानमें जो रक्तार्बुदके कहे हैं उसके प्रमाण जानने ॥
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भाषाटीकासमेत । ( २९७ )
मांससंघातके लक्षण ।
दुष्टं मांसं नीरुजं तालुमध्ये कफाच्छूनं मांससङ्घातमाहुः ।
कफकरके तालुमें मांस दुष्ट होकरके जो सूजन होय और वह दूखे नहीं उसको
मांससंघात कहते हैं ॥
तालुपुप्पुटके लक्षण ।
नीरुक्स्थायी कोलमात्रःकफात्स्यान्मेदोयुक्तःपुप्पुटस्तालुदेशे॥४०॥
मेदयुक्त कफकरके तालुमें पीडारहित और स्थिर तथा बेरके समान सूजन
होय उसको तालुपुप्पुट कहते हैं ॥
तालुशोषके लक्षण ।
शोषोऽत्यर्थं दीर्यते चापि तालु श्वासश्चोग्रस्तालुशोषोऽनिलाच्च ।
वादीसे तालु अत्यन्त सूखकर फट जाय, तथा भयंकर श्वास होय उसको तालु-
शोष कहते हैं ॥
तालुपाकके लक्षण ।
पित्तं कुर्यात्पाकमत्यर्थघोरं तालुन्येवं तालुपाकं वदंति ॥ ४१ ॥
पित्त कुपित होकर तालुमें अत्यन्त भयंकर पाक ( पकी फुन्सी ) उत्पन्न करे
उसको तालुपाक कहते हैं ॥
कण्ठगत १७ रोग ।
तिनमें पांच रोहिणीकी सामान्य सम्प्राप्ति ।
गलेऽनिलःपित्तकफौच मूर्च्छितौ प्रदूष्य मांसं च तथैव शोणितम् ।
गलोपसंरोधकरैस्तथांकुरैर्निहंत्यसूनव्याधिरयं हि रोहिणी ॥ ४२ ॥
गलेमें वायु पित्त और कफ ये दुष्ट होकर मांसको तथा रुधिरको दूषित कर
गलेमें अंकुर ( कांटे ) उत्पन्न करे हैं, उनसे गला रुकजाय, यह रोहिणीनामक व्याधि
प्राणनाशक है । सब रोहिणी सन्निपातसे प्रगट होती हैं । उत्कर्षके वास्ते वात-
आदिका व्यपदेश है इस सबका असाध्यत्व भोजने पृथक् लिखा है ॥
वातजाके लक्षण ।
जिह्वासमन्ताद्भृशवेदनास्तु मांसाङ्कुराः कण्ठनिरोधना ये ।
सा रोहिणी वातकृता प्रदिष्टा वातात्मकोपद्रवगाढयुक्ता ॥ ४३ ॥
जीभके चारों ओर अत्यन्त वेदनायुक्त जो मांसांकुर उत्पन्न होयँ, उनसे कंठका
अवरोध होय, तथा कम्प, विनाम, स्तम्भादि वातके उपद्रव होयँ ॥
१ सद्यस्त्रिदोषजं हन्ति त्र्यहाच्छ्लेष्मसमुद्भवा । पंचाह्रात्पित्तसंभूता सप्ताहात्पवनोत्थिता ॥ इति ॥