माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
( २८१ ) माधवनिदान ।
( २८१ ) माधवनिदान ।
पैरोंमें कंकर छिदनेसे अथवा कांटे लगनेसे बेरके समान ऊंची गांठ प्रगट होय
उसको कदर अर्थात् ठेक कहते हैं अथवा ' ग्रंथिः कोलवदुत्सन्नो' इस जगह ' ग्रंथिः
कीलवदुत्सन्नो ' ऐसा भी पाठ है अर्थात् कीलके समान जो गांठ होय, उसको कदर
कहते हैं । यह कदररोग हाथोंमें भी होय है सो भोजने लिखा भी है ॥
अलस ( खारुआ ) के लक्षण ।
क्लिन्नांगुल्यंतरौ पादौ कण्डूदाहरुजान्वितौ ।
दुष्टकर्दमसंस्पर्शादलसं तं विभावयेत् ॥ २६ ॥
दुष्ट कीचमें डोलनेसे ( वर्षा आदिका पानी और सडी कीचमें डोलनेसे ) पैरोंकी
उंगली गीली रहनेसे उंगलियोंके बीचमें सफेद चकत्ते हो जायँ, उनमें खुजली, दाह
और गीलापन होय, तथा पीडा होय उसको अलस अर्थात् खारुआ कहते हैं, यह
कफरक्तके दोषसे होता है ॥
इन्द्रलुप्त ( चाईं ) के लक्षण ।
रोमकूपानुगं पित्तं वातेन सह मूच्छितम् ।
प्रच्यावयति रोमाणि ततः श्लेष्मा सशोणितः ॥ २७ ॥
रुणद्धि रोमकूपांस्तु ततोऽन्येषामसंभवः ।
तदिंद्रलुप्ते खालित्यं रुह्येति च विभावयेत् ॥ २८ ॥
पित्त वादीके साथ कुपित होकर रोमकूपोंमें अर्थात् बालोंके छिद्रोंमें प्राप्त हो तब
मस्तक अथवा अन्य स्थानके बाल झडने लगें, पीछे कफ और रुधिर रोमकूप
कहिये बालोंके प्रगट होनेके स्थानको रोकदे उससे फिर बाल नहीं ऊगें, इस रोगको
इन्द्रलुप्त खालित्य चाचा ( चाईं ) कहते हैं, यह रोग स्त्रियोंके नहीं होय, कारण
इसका यह है कि उनका रुधिर महीनेके महीने शुद्ध होता रहे है और निकलता रहे
है इससे वह रोमकूपोंको नहीं रोके है, सो विदेहाचार्यने भी लिखा है और इसी
रोगको खालित्य और रुह्या कहते हैं सो भोजने लिखा है परन्तु कार्तिकाचार्य कहते
हैं कि इन्द्रलुप्तं रोग कुछ दाढीमें होय है और खालित्यरोग शिरमें होय है और रुह्या-
रोग पीडासहित होय है ॥
१ ' हस्तयोः पादयोश्चापि गम्भीरानुमतं स्थिरम् । मांसकीलं जनयतः कुपितौ कफ
मारुतौ । सशल्यमिव तं देशं मन्यते तेन पीडितम् । शर्कराकदरं केचिन्मन्यन्ते वातकंटकम् ॥
२ अत्यन्तसुकुमाराङ्ग्यो रजो दुष्टं स्रवंति च । अव्यायामरता यस्मात्तस्मान्न स्खलतिः-
स्त्रियाः ॥ इति । ३ “ इन्द्रलुप्तं श्मश्रुणि भवति खालित्यं शिरस्येव रुह्या सर्वदेहे ।”
भाषाटीकासमेत । ( २८३ )
दारुणकके लक्षण ।
दारुणा कण्डुरा रूक्षा केशभूमिः प्रपच्यते ।
कफमारुतकोपेन विद्याद्दारुणकं तु तम् ॥ २९ ॥
कफवायुके कोपसे केशोंकी जमीन अतिकठिन होकर खुजावे, खरदरी होय
तथा बारीक फुन्सी होकर पके उसको दारुणक कहते हैं, कफवातके कोपसे यह
रोग होय है. इसका कारण यह है कि बिना पित्तके पाक नहीं होय सो विदेहने
कहा भी है ॥
अरूंषिकाके लक्षण ।
अरूंषि बहुवक्त्राणि बहुक्लेदीनि मूर्धनि ।
कफासृक्कृमिकोपेन नृणां विद्यादरूंषिकाम् ॥ ३० ॥
रुधिर कफ और कृमि इनके कोपसे माथेमें बहुत फुन्सी हो जायँ, उनमेंसे
चोप विशेष निकले और क्लेदयुक्त होयँ इन फुन्सियोंको अथवा व्रणोंको अरूंषिका
कहते हैं ॥
पलित ( सफेद बाल ) के लक्षण ।
क्रोधशोकश्रमकृतः शरीरोष्मा शिरोगतः ।
पित्तं च केशान्पचति पलितं तेन जायते ॥ ३१ ॥
क्रोध शोक और श्रमके करनेसे उत्पन्न भई जो शरीरमें ऊष्मा ( गरमी ) और
पित्त सो मस्तकमें जाकर बालोंको पकाय दे अर्थात् सफेद करदे उस करके यह
पलितरोग होय है । पलित रोगपर मधुकोशटीकाकारने तथा भावप्रकाशने
शास्त्रार्थ लिखा है ॥
मुखदूषिकाके लक्षण ।
शाल्मलीकण्टकप्रख्याः कफमारुतकोपजाः ।
जायन्ते पिडिकायूनां विज्ञेया मुखदूषिकाः ॥ ३२ ॥
कफवायुके कोपसे सेमरके कांटेके समान तरुण ( जवान ) पुरुषके मुखके ऊपर
जो फुन्सी होयँ उनको मुखदूषिका अर्थात् मुहासे कहते हैं । इनके होनेसे मुख
बुरा हो जाता है ॥
१ यद्वन्न पाटलाभासं सरजस्कं शिरस्त्वचि । परुषं जायते जन्तोस्तस्य रूपं विशेषतः ॥
बोदैः समन्वितं वातात्सकण्डूगौरवं कफात् । सपिपासं सदाहार्तिरोगं पित्तासृजं तथा ॥