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माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

( २६२ ) माधवनिदान ।

( २६२ ) माधवनिदान ।
कोठके लक्षण ।
असम्यग्वमनोदीर्णपित्तश्लेष्मान्ननिग्रहैः ।
मण्डलानि सकण्डूनि रागवन्ति बहूनि च ।
उत्कोठः सानुबन्धश्च कोठ इत्यभिधीयते ॥ ६ ॥
वमनकारक औषध सेवन करनेसे, अच्छी रीतिसे वमन न होनेसे, पित्त और
कफ कुपित होनेसे अथवा स्वतः वमनके वेग आये भयेको रोकनेसे, देहके ऊपर
लाल और बहुत चकत्ता उठें, उनमें खुजली चले, इस रोगको उत्कोठ कहते हैं और
जो क्षणभरमें उत्पन्न होकर नाश हो जाय उसको कोठ कहते हैं ॥
इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरनिर्मितमाधवार्धबोधिनीमाधुरीभाषाटीकायां
शीतपित्तोदर्दकोठनिदानं समाप्तम् ॥
अथाम्लपित्तनिदानम् ।
निदानपूर्वक अम्लपित्तका स्वरूप ।
विरुद्धदुष्टाम्लविदाहिपित्तप्रकोपिपानान्नभुजो विदग्धम् ।
पित्तं स्वहेतूपचितं पुरा यत्तदम्लपित्तं प्रवदन्ति सन्तः ॥ १ ॥
विरुद्ध ( क्षीरमत्स्यादि ) और दुष्टान्न, खट्टा, दाहकारक, पित्त बढानेवाला ऐसा
अन्न पानके सेवन करनेसे वर्षादिक ऋतुमें जलौषधिगत विदाहादि स्वकारणसे
सञ्चित भया पित्त दुष्ट होय उसको अम्लपित्त कहते हैं ॥
अम्लपित्तके लक्षण ।
अविपाकक्लमोट्क्लेदतिक्ताम्लोद्गारगौरवैः ।
हृत्कण्ठदाहारुचिभिश्चाम्लपित्तं वदेद्भिषक् ॥ २ ॥
अन्नका न पचना, विना परिश्रम करे परिश्रमसा मालूम हो, वमन, कडुवी तथा
खट्टी डकार आवे, देह भारी रहे, हृदय और कण्ठमें दाह होय, अरुचि होय ये लक्षण
होनेसे अम्लपित्त वैद्य जाने ॥
अम्लपित्त दो प्रकारका-एक ऊर्ध्वगत तथा दूसरा अधोगत,
उसमें प्रथम अधोगतके लक्षण ।
तृड्दाहमूर्च्छाभ्रममोहकारि प्रयात्यधो वा विविधप्रकारम् ।
हृल्लासकोठानलसादकर्णस्वेदांगपीतत्वकरं कदाचित् ॥ ३ ॥
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भाषाटीकासमेत । ( २६३ )
अम्लपित्त अधोगत होनेसे प्यास, दाह, मोह, ( इन्द्रिय मोह ) मूर्च्छा, भ्रम,
( मनो ) मोह, सूखी रह, मन्दाग्नि, कोठ, कानमें पसीना, देहमें पीलापन ये लक्षण
होकर गुदाके द्वारा काले लाल दुर्गन्धयुक्त अनेक वर्णके पित्त गिरें ॥
ऊर्ध्वगत अम्लपित्तके लक्षण ।
वान्तं हरित्पीतकनीलकृष्णमारक्तरक्ताभमतीव चाम्लम् ।
मांसोदकाभं त्वतिपिच्छलाच्छश्लेष्मानुयातं विविधं रसेन ॥ ४ ॥
भुक्ते विदग्धे त्वथवाप्यभुक्ते करोति तिक्ताम्लवमिं कदाचित्
उद्गारमेवंविधमेव कण्ठे हृत्कुक्षिदाहं शिरसो रुजं च ॥ ५ ॥
ऊर्ध्वगत पित्तसे हरे, पीले, नीले, काले, थोडे लाल अथवा रक्तके सदृश अत्यन्त
खट्टा, मांस धोयेहुए जलके समान, अत्यन्त रेसदार, स्वच्छ, कफमिश्रित, खारी,
कसेला आदि संयुक्त ऐसे पित्त गिरे, कभी कभी भोजन करे अन्न विदग्धावस्थाको
प्राप्त होकर अथवा भोजन करनेके पहिले कडुवी खट्टी ऐसे वमन होय तथा ऐसीही
डकारें आवें, कण्ठ, कूख, हृदय इनमें दाह होय, माथा दूखे ॥
कफपित्तजन्य अम्लपित्तके लक्षण ।
करचरणदाहमौष्ण्यं महतीमरुचिं ज्वरं च कफपित्तम् ।
जनयति कण्डूमण्डलपिडिकाशतनिचितगात्ररोगचयम् ॥ ६ ॥
हाथ पैरोंमें दाह, गरमी, अन्नमें अरुचि, ज्वर, कण्डू ( खुजली ), रुधिरके
बिगडनेसे देहमें मण्डल हो, सैकड़ों पिटिका, अविपाकादि अनेक उपद्रव ये लक्षण
कफपित्तसे होते हैं ॥
साध्यासाध्य विचार ।
रोगोऽयमम्लपित्ताख्यो यत्नात्संसाध्यते नवः ।
चिरोत्थितो भवेद्याप्यः कृच्छ्रसाध्यः स कस्यचित् ॥ ७ ॥
यह अम्लपित्तरोग नया होय तो यत्न करनेसे साध्य होय और बहुत दिनका
होय तो याप्य जानना और जो अपथ्यसेवन करनेवाले पुरुष हैं उनके यह अम्ल-
पित्तरोग कृच्छ्रसाध्य होय है ॥
अम्लपित्तमें केवल वायुका और वातकफका संसर्ग होय सो कहते हैं-
सानिलं सानिलकफं सकफं तच्च लक्षयेत् ।
दोषलिङ्गेन मतिमान्भिषङ्मोहकरं हि तत् ॥ ८ ॥
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