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माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

( २५२ ) माधवनिदान ।

( २५२ ) माधवनिदान ।
नवान्नदधिमत्स्यातिलवणाम्लनिषेविणाम् ।
माषमूलकपिष्टान्नतिलक्षीरगुडाशिनाम् ॥ ४ ॥
व्यवायं चाप्यजीर्णेऽन्ने निद्रां च भजतां दिवा ।
विप्रान्गुरून्धर्षयतां पापं कर्म च कुर्वताम् ॥ ५ ॥
वातादयस्त्रयो दुष्टास्त्वग्रक्तं मांसमंबु च ।
दूषयंति स कुष्ठानां सप्तको द्रव्यसंग्रहः ॥
अतः कुष्ठानि जायंते सप्त चैकादशैव च ॥ ६ ॥
विरोधी कहिये क्षीरमत्स्यादि, पतले, स्नेहयुक्त, भारी ऐसे अन्नपानके सेवन
करनेसे रर्द्दके वेगको रोकनेसे और अन्य वेग कहिये मलमूत्रादिवेगोंके रोकनेसे, भोजन
करके अत्यन्त व्यायाम ( दण्डकसरत ) अथवा अतिसंताप ( सूर्यका ताप ) सह-
नेसे, शीत, गरमी, लंघन और आहार इनके सेवन उक्त क्रम छोडकर करनेसे
धूप, श्रम और भय इनसे पीडित होय और उसी समय शीतल जल पीवे, कच्चा
अन्न भक्षण करनेसे तथा भोजनके ऊपर भोजन करनेसे, वमन, विरेचन, निरूहण,
अनुवासन, नस्यकर्म इन पंचकर्मके करते समय अपथ्य करनेसे, नया अन्न, दही,
मछली, अत्यन्त खारी खट्टा पदार्थके सेवन करनेसे, उडद, मूली, पिष्टीकी बनी वस्तु,
तिल, दूध, गुड इनके खानेसे, अन्नके पचे विना स्त्रीसंग करनेसे तथा दिनमें
सोनेसे, ब्राह्मण गुरु इनका तिरस्कार करनेसे, पापकर्मके आचरण करनेसे ऐसे पुरु-
षोंके वातादिक तीनों दोष त्वचा, रुधिर, मांस और जल इनको दुष्ट कर कुष्ठरोग
( कोढ ) उत्पन्न करे, कुष्ठ होनेके वातादि तीनों दोष और त्वचादि दूष्य ये सात
पदार्थ अवश्य कारणभूत हैं इनसे ही अठारह प्रकारके कुष्ठ होते हैं, तिनमें सात
महाकुष्ठ और ग्यारह क्षुद्र कुष्ठ हैं ॥
कुष्ठोंको त्रिदोषजत्व भी होनेसे दोषाधिक्यसे वे सात प्रकारके हैं सो कहते हैं-
कुष्ठानि सप्तधा दोषैः पृथग्द्वंद्वैः समागतैः ।
सर्वेष्वपि त्रिदोषेषु व्यपदेशोऽधिको मतः ॥ ७ ॥
पृथक् पृथक् दोषों करके ३, द्वन्द्वज ३ और सन्निपातसे १ सब मिलकर सात
कुष्ठ भये । सब कुष्ठ त्रिदोष होनेपर भी जो दोष अधिक होय उसीसे व्यवहार
करना चाहिये अर्थात् जिस दोषके लक्षण मिलें उसी दोषका कुष्ठ जानना जैसे
“वातेन कुष्ठं कापालं” अर्थात् वाताधिक्य होनेसे कापाल कुष्ठ होता है ॥
कुष्ठके पूर्वरूप ।
अतिश्लक्ष्णखरस्पर्शस्वेदास्वेदविवर्णता ॥ ८ ॥
CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

भाषाटीकासमेत । ( २५३ )
दाहः कंडूस्त्वचि स्वापस्तोदः कोष्ठोन्नतिः क्लमः ।
व्रणानामधिकं शूलं शीघ्रोत्पत्तिश्चिरस्थितिः ॥ ९ ॥
रूढानामपि रूक्षत्वं निमित्तेऽल्पेऽपि कोपनम् ।
रोमहर्षोऽसृजः काष्र्ण्यं कुष्ठलक्षणमग्रजम् ॥ १० ॥
जिस ठिकाने कुष्ठ होनहार होय उस जगह हाथोंसे अत्यन्त चिकना मालूम होय
अथवा खरदरा मालूम होय, उस ठिकाने पसीने आवे अथवा नहीं आवे तथा
उस ठिकानेका वर्ण पलट जाय, दाह होय, खुजली चले, त्वचाको स्पर्श मालूम
न होय, नोचनेकीसी पीडा होय, विषैली माखीके काटनेके सदृश चकत्ते उठे, परि-
श्रम करे विना देहमें श्रम होय, व्रणमें पीडा अधिक होय, उन फोडोंकी उत्पत्ति
शीघ्र होकर बहुत दिवसपर्यंत रहे, जब फोडा भरनेको होय तब रूखे रहें उनका
थोडे निमित्त होनेसे कोप होय, रोमांच होय और रुधिर काला पडजाय, ये कुष्ठ
होनेके पूर्वरूप होते हैं ॥
सप्त महाकुष्ठोंके लक्षण ।
कृष्णारुणकपालाभं यद्रूक्षं परुषं तनु ।
कापालं तोदबहुलं तत्कुष्ठं विषमं स्मृतम् ॥ ११ ॥
कापालकुष्ठ जो काले तथा लाल खोपडीके सदृश, रूखे, खरखरे, पतले ऐसे
त्वचावाले तथा नोंचनेकीसी अधिक पीडायुक्त होयँ, वे दुश्चिकित्स्य हैं अर्थात्
चिकित्सा करनेमें कठिन हैं। इसको कापालकुष्ठ कहते हैं ॥
औदुम्बरकुष्ठके लक्षण ।
रुग्दाहरागकंडूभिः परीतं लोमपिंजरम् ।
उदुंबरफलाभासं कुष्ठमौदुंबरं वदेत् ॥ १२ ॥
औदुम्बरकुष्ठ शूल, दाह लाल और खुजली इनसे व्याप्त होय, इसमें बाल
कपिलवर्णके होयँ तथा ये गूलरफलके समान होते हैं ॥
मण्डलकुष्ठके लक्षण ।
श्वेतं रक्तं स्थिरं स्त्यानं स्निग्धमुत्सन्नमंडलम् ।
कृच्छ्रमन्योन्यसंयुक्तं कुष्ठं मंडलमुच्यते ॥ १३ ॥
मण्डलकुष्ठ सफेद, लाल, कठिन, गीला अथवा जलयुक्त, चिकना, जिसका
आकार मण्डलके सदृश ऊपरको उठा होय तथा एक दूसरेसे मिला होय, ऐसा
यह मण्डलकुष्ठ कष्टसाध्य है ॥