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माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

(२२०) माधवनिदान ।

(२२०) माधवनिदान ।
द्विरर्बुदके लक्षण ।
यद्वन्द्वजातं युगपत्क्रमाद्वा द्विरर्बुदं तच्च भवेदसाध्यम् ॥ ८ ॥
एक कालमें दो अर्बुद, अथवा एकके पिछाडी दूसरा अर्बुद क्रमसे प्रगट होय
उसको द्विरर्बुद कहते हैं, यह असाध्य हैं ॥
अर्बुद न पकनेका कारण ।
न पाकमायान्ति कफाधिकत्वान्मेदोबहुत्वाच्च विशेषतस्तु ।
दोषस्थिरत्वाद् ग्रथनाच्च तेषां सर्वार्बुदान्येव निसर्गतस्तु ॥ ९ ॥
कफ अधिक होनेसे अथवा विशेषकरके मेद अधिक होनेसे, तथा दोषोंके
स्थिर होनेसे अथवा दोषोंके ग्रन्थिरूप होनेसे सर्व प्रकारकी अर्बुद स्वभावसे ही
पके नहीं हैं ॥
इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरप्रणीतमाधवार्थदीपिकामाथुरीभाषाटीकाया-
मर्बुदनिदानं समाप्तम् ॥
अथ श्लीपदनिदानम् ।
श्लीपदकी सम्प्राप्ति ।
यः सज्ज्वरो वंक्षणजो भृशार्तिः शोथो नृणां पाद्गतः क्रमेण ।
तच्छ्लीपदं स्यात्करकर्णनेत्रशिश्रौष्ठनासास्वपि केचिदाहुः ॥ १ ॥
जो सूजन अत्यन्त पीडायुक्त प्रथम वंक्षणमें उत्पन्न होकर धीरे धीरे पैरोंमें आवै
उसके साथ ज्वर भी हो सो इस रोगको श्लीपद कहते हैं। यह श्लीपद हाथ, कान,
नेत्र, शिश्न, ओठ, नाक इनमें भी होती है, ऐसे कोई कहते हैं ॥
वातजश्लीपद ।
वातजं कृष्णरूक्षं च स्फुटितं तीव्रवेदनम् ।
अनिमित्तरुजं तस्य बहुशो ज्वर एव च ॥ २ ॥
वातकी श्लीपद काली, रूखी, फटी और जिसमें तीव्र पीडा होय, बिना कारणके
दूखे और उसमें ज्वर बहुत होय ॥

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भाषाटीकासमेत । (२२१)
पित्तजश्लीपद ।
पित्तजं पीतसंकाशं दाहज्वरयुतं मृदु ।
पित्तकी श्लीपद पीले रंगकी, दाह और ज्वरयुक्त होय तथा नरम होय है ॥
श्लैष्मिकश्लीपद ।
श्लैष्मिकं स्निग्धवर्णं च श्वेतं पाण्डु गुरु स्थिरम् ॥ ३ ॥
कफकी श्लीपदका वर्ण चिकना, सफेद, पीला, भारी और कठिन होय है ॥
असाध्य लक्षण ।
वल्मीकमिव सञ्जातं कण्टकैरुपचीयते ।
अब्दात्मकं महत्तच्च वर्जनीयं विशेषतः ॥ ४ ॥
सर्पकी बांबीके समान बढी हुई और जिसके ऊपर कांटे होयँ, ऐसी एक वर्षकी
होगई हो और बडी होय उसको वैद्य त्याग दे ॥
श्लीपदमें कफको प्राधान्य अव्यभिचारकरके है उसको कहते हैं-
त्रीण्यप्येतानि जानीयाच्छ्लीपदानि कफोच्छ्रयात् ।
गुरुत्वं च महत्त्वं च यस्मान्नास्ति विना कफात् ॥ ५ ॥
इन पूर्वोक्त तीनों श्लीपदोंमें कफकी अधिकता है कारण इसका यह है कि, भारी
और महत्त्व ये दोनों कफके बिना नहीं होते ॥
श्लीपद कौनसे देशमें उत्पन्न होता है उसको कहते हैं-
पुराणोदकभूयिष्ठाः सर्वर्तुषु च शीतलाः ।
ये देशास्तेषु जायन्ते श्लीपदानि विशेषतः ॥ ६ ॥
वर्षार्ऋतुमें पानी अधिक वर्षे परन्तु पृथ्वीके नीचे होनेसे सूखे नहीं इसीसे पुराने
पानीका संचय ( इकट्ठा ) होय और सर्व ऋतुमें सरदी रहाकरे ऐसे जो अनूपदेश
( पूर्व आदि देश ) उनमें यह श्लीपदरोग विशेषकरके होय है । जांगल देशोंमें
अग्निका अधिक अंश होय है इससे उन देशोंमें जलको पुरातनत्व नहीं होय है और
अनूपदेशमें गरमी मन्द पडनेसे उष्ण ऋतुमें भी शीतलता होय है, हाथ कान
आदिमें श्लीपदरोगकी शंका होनेसे दोषोंके कोपद्वारा ज्वर करके श्लीपदको जान ले ॥
असाध्य लक्षण ।
यच्छ्लेष्मलाहारविहारजातं पुंसः प्रकृत्या च कफात्मकस्य ।
सास्रावमत्युन्नतसर्वलिङ्गं सकण्डुरं श्लेष्मयुतं विवर्ज्यम् ॥ ७ ॥

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