माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
( १९६ ) माधवनिदान ।
( १९६ ) माधवनिदान ।
असम्भव है तो यह केवल झगडेका स्थान है, इसका किसीने यथार्थ निर्णय नहीं
करा । प्रमेहनिवृत्तिके लक्षण सुश्रुतमें कहे हैं, यथा- " प्रमेहिणो यदा मूत्रमनाविल-
मपिच्छिलम् । विशदं कटु तिक्तं च तदारोग्यं प्रचक्षते ॥ "
इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरनिर्मितमाधवार्थबोधिनीमाथुरीभाषाटीकायां
प्रमेहपिटिकानिदानं समाप्तम् ॥
अथ मेदोनिदानम् ।
मेदका कारण और सम्प्राप्ति ।
अव्यायामदिवास्वप्नश्लेष्मलाहारसेविनः ।
मधुरोऽन्नरसः प्रायः स्नेहान्मेदो विवर्द्धते ॥ १ ॥
मेदसाऽऽवृतमार्गत्वात्पुष्यन्त्यन्ये न धातवः ।
मेदस्तु चीयते यस्मादशक्तः सर्वकर्मसु ॥ २ ॥
दंड कसरतके न करनेसे, दिनमें सोनेसे और कफकारक पदार्थोंके सेवन करनेसे
ऐसी रीतिसे वर्त्तनेवाले पुरुषका अन्नरस केवल मधुर कहिये आमरूप हो स्नेहकरके
मेदको बढावे । मेद करके मार्ग बन्द होनेसे अन्य धातु ( हाड मज्जा वीर्य आदि )
पुष्ट नहीं होते और मेद बढे तब वह पुरुष सर्व कर्म करनेको अशक्त होय ॥
मेदस्वीपुरुषके लक्षण ।
क्षुद्रश्वासतृषामोहास्वप्रक्रथनसादनैः । युक्तः क्षुत्स्वेददुर्गन्धै-
रल्पप्राणोऽल्पमैथुनः ॥ ३ ॥ मेदस्तु सर्वभूतानामुदरेष्वस्थिषु
स्थितम् । अत एवोदरे वृद्धिः प्रायो मेदस्विनो भवेत् ॥ ४ ॥
क्षुद्र श्वास " रूक्षायासोद्भवः " इत्यादि पिछाडी कहि आये सो तृषा मोह
निद्रा अकस्मात् श्वासका रोग अंगग्लानि भूख पसीना और दुर्गन्धि इन लक्षणों-
करके वह पुरुष युक्त होय, उसकी शक्ति घटजाय और मैथुन करनेमें उत्साह
न होय । मेद यह सब प्राणिमात्रोंके उदर और हड्डियोंमें रहे इसीसे मेदवाले
पुरुषका पेट बढा करता है ॥
मेदस्वीकी अवस्थाविशेष ।
मेदसावृतमार्गत्वाद्वायुः कोष्ठे विशेषतः । चरन्संधुक्षयत्यग्नि-
माहारं शोषयत्यपि ॥ ५ ॥ तस्मात्स शीघ्रं जरयत्याहारं
भाषाटीकासमेत । ( १९७ )
चापि कांक्षति । विकारांश्चाश्नुते घोरान्कांश्चित्कालव्यति-
क्रमात् ॥ ६ ॥ एतावुद्रवकरौ विशेषादग्निमारुतौ । एतौ हि
दहतः स्थूलं वनं दावानलो यथा ॥ ७ ॥
मेदसे मार्ग रुकजानेसे कोठेमें पवनका सञ्चार विशेष होय तब अग्निको यह
पवन बढावे, भोजनकिये आहारको तुरन्त शोषण करे, तब वह आहार शीघ्र पच
कर फिर भोजनकी इच्छाको प्रगट करे और भोजन करनेमें कालका व्यतिक्रम
होनेसे भयंकर वातके रोग उत्पन्न होय । यह अग्नि और वायु बडा उपद्रव करै है,
जैसे दावानल (वन अग्नि) वनको जलावै है उसी प्रकार ये दोनों उस स्थूल
(मोटे) पुरुषको जलाती है ॥
अत्यन्त मेद बढनेका परिणाम ।
मेदस्यतीव संवृद्धे सहसैवानिलादयः ।
विकारान्दारुणान्कृत्वा नाशयन्त्याशु जीवितम् ॥ ८ ॥
मेद अत्यन्त बढनेसे वायु आदि ये अकस्मात् भयंकर विकार (प्रमेह पिटिका
ज्वर भगन्दर विद्रधि वातरोग इत्यादि) उत्पन्न करके शीघ्रही जीवनका नाश करें ॥
स्थूललक्षण ।
मेदोमांसातिवृद्धत्वाच्चलस्फिगुदरस्तनः ।
अयथोपचयोत्साहो नरोऽतिस्थूल उच्यते ॥ ९ ॥
मेद और मांस ये अत्यन्त बढनेसे जिस पुरुषके कूले पेट और स्तन ये थलथल
हले और उसके शरीरकी स्थूलता बढी होय अर्थात् जैसी चाहिये तैसी न होय
तथा उत्साह (होशियारी) न रहे ऐसे मनुष्यको अतिस्थूल कहते हैं ॥
इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरनिर्मितमाधवार्थदीपिकामाथुरीभाषाटीकायां
मेदोनिदानं समाप्तम् ॥
अथ कार्श्यनिदानम् ।
प्रसंगवशसे कार्श्य (क्षीणता) रोगका निदान ग्रन्थान्तरसे लिखते हैं-
वातो रूक्षान्नपानानि लङ्घनं प्रमिताशनम् । क्रियातियोगः
शोकश्च वेगनिद्राविनिग्रहः ॥ १ ॥ नित्यं रोगोऽरतिर्नित्यं
व्यायामो भोजनाल्पता । भीतिर्धनादिचिन्ता च कार्श्यकारण-