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माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

( १९२ ) माधवनिदान ।

( १९२ ) माधवनिदान ।
१३-कालप्रमेहसे स्याईके समान काला मूते । १४-हारिद्रप्रमेहसे तीक्ष्ण हल्दीके
समान और दाहयुक्त मूते। १५-मांञ्जिष्ठप्रमेहसे आम दुर्गंध और मंजीठके समान
मूते । १६-रक्तप्रमेहसे दुर्गंधयुक्त गरम खारी और रुधिरके समान लाल मूत्र करे ॥
वातकी ४ प्रमेहके लक्षण ।
वसामेही वसामिश्रं वसाभं मूत्रयेन्मुहुः । मज्जाभं मज्जामिश्रं
वा मज्जमेही मुहुर्मुहुः ॥ १६ ॥ कषायमधुरं रूक्षं क्षौद्रमेहं
वदेद् बुधः । हस्ती मत्त इवाजस्रं मूत्रं वेगविवर्जितम् ॥ साल-
सीकं विबद्धं च हस्तिमेही प्रमेहति ॥ १७ ॥
१७-वसाप्रमेही वसा ( चर्बी ) युक्त अथवा वसाके समान मूते । १८-मज्जा-
प्रमेही मज्जाके समान अथवा मज्जा मिला बारम्बार मूते । १९-क्षौद्रप्रमेही कसैला
मीठा और चिकना ऐसा मूते । २०-हस्तिममेही मस्त हाथीके समान निरन्तर वेग-
रहित जिसमें तार निकले और ठहर ठहरके मूते ॥
कफप्रमेहके उपद्रव ।
अविपाकोऽरुचिश्छर्दिर्ज्वरः कासः सपीनसः ।
उपद्रवाः प्रजायन्ते मेहानां कफजन्मनाम् ॥ १८ ॥
अन्नका परिपाक न होय, अरुचि, वमन, ज्वर, खांसी, पीनस ये कफप्रमेहके
उपद्रव हैं ॥
पित्तप्रमेहके उपद्रव ।
बस्तिमेहनयोः शूलं मुष्कावदरणं ज्वरः ।
दाहस्तृष्णाम्लिकामूर्च्छा विड्भेदः पित्तजन्मनाम् ॥ १९ ॥
बस्ति और लिंगमें पीडा होय, अण्डकोशोंका पककर फटना, ज्वर, प्यास, खट्टी
डकार, मूर्च्छा और पतला दस्त होय ये पित्तप्रमेहके उपद्रव हैं ॥
वातप्रमेहके उपद्रव ।
वातजानामुदावर्तकण्ठहृद्ग्रहलोलताः ।
शूलमुन्निद्रता शोषः कासः श्वासश्च जायते ॥ २० ॥
उदावर्त, गला, हृदय इनका रुकना, लोलता ( सर्वरसभक्षणेच्छा ), शूल, निद्रा-
नाश, शोष, सूखी खांसी, श्वास ये वातप्रमेहके उपद्रव हैं ॥
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भाषाटीकासमेत । ( १९३ )
प्रमेहके असाध्य लक्षण ।
यथोक्तोपद्रवाविष्टमतिप्रस्रुतमेव च ।
पिडिकापीडितं गाढं प्रमेहो हन्ति मानवम् ॥ २१ ॥
ऊपर कहि आये अविपाकादि उपद्रव वे सब होंय, जिसके मूत्रका स्राव बहुत
हुआ होय, शराविका आदि जो पिडिका आगे कहेंगे वे होंयँ, रोगका अंगमें प्रवेश
होय ऐसे लक्षण होनेसे वह प्रमेह मनुष्यको मार डाले ॥
दूसरे असाध्य लक्षण ।
जातः प्रमेही मधुमेहिनो वा न साध्यरोगः स हि बीजदोषात् ।
मधुमेही पुरुषसे उत्पन्न भया जो प्रमेहवान् पुरुषका रोग वह बीजदोषके कार-
णसे साध्य नहीं होय । इस जगह मधुमेहशब्दसे साधारण प्रमेह जानना । इस
जगह भी मधुकोशटीकावालेने मधुमेहशब्दपर बहुतसा शास्त्रार्थ लिखा है ॥
कुलपरंपरागत अन्यविकारोंका असाध्यत्व कहते हैं-
ये चापिकेचित्कुलजा विकाराभवन्ति तांस्तान्प्रवदन्त्यसाध्यान्॥२२
जो कोई कुष्ठादिक कुलपरंपरागत विकार हैं वे सब असाध्य हैं ॥
सर्व प्रमेहकी उपेक्षा करनेसे मधुमेह होता है, उसको कहते हैं-
सर्व एव प्रमेहास्तु कालेनाप्रतिकारिणः ।
मधुमेहत्वमायान्ति तदाऽसाध्या भवन्ति हि ॥ २३ ॥
सब प्रमेह औषधके विना काल करके मधुमेहत्वको प्राप्त होते हैं, तब वे असाध्य
हो जाते हैं । धातुक्षय और आवरण इनसे कुपित भयी वायु मधुमेहका हेतु होती है॥
मधुमेहे मधुसमं जायते स किल द्विधा ।
क्रुद्धे धातुक्षयाद्वायौ दोषावृतपथेऽथवा ॥ २४ ॥
मधुमेहमें मूत्र मधु ( शहद ) के समान होय है, सो दो प्रकारका है, एक जो
धातुक्षय होनेसे वायु कुपित होकर होय और दूसरा दोषों करके पवनका मार्ग आवृत
( ढकने ) करके होय है ॥
आवरणके लक्षण ।
आवृत्तो दोषलिङ्गानि सोऽनिमित्तं प्रदर्शयन् ।
क्षीणः क्षणात्पुनः पूर्णो भजते कृच्छ्रसाध्यताम् ॥ २५ ॥
आवृत वायुसे प्रगट मधुमेह जिस पित्तादि दोष करके आच्छादित होय उसके
लक्षण अकस्मात् दीखें, क्षणभरमें क्षीण होय, क्षणमें पूर्ण होय वह कष्टसाध्य जानना॥
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